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जहाँ चाह वहाँ राह
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© Yogesh Suhagwati Goyal

Drama

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बात सन १९६८-६९ की है। मैं आदर्श विद्या मंदिर, जयपुर में कक्षा ११ में पढ़ता था। पढ़ाई-लिखाई में, मैं एक औसत विद्यार्थी था लेकिन मेरे पिताजी हमेशा से मुझे एक मैकेनिकल इंजीनियर बनाना चाहते थे। कक्षा ११ की परीक्षा का परिणाम ज्यादा उत्साह वर्धक नहीं रहा। कई कॉलेजों में प्रवेश की कोशिश की, मगर उस परिणाम के आधार पर कहीं भी सफलता नहीं मिली। परन्तु मेरे पिताजी ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने कई मित्र और सलाहकारों से सलाह ली और सबकी राय पर ये निश्चित हुआ कि मुझे कक्षा ११ दुबारा पढ़ाई जाए। इस बार जयपुर नहीं, बल्कि अलवर में पढ़ाया जाए। इस निर्णय की वजह श्री नरेन्द्र माथुर साहिब थे, जो उन दिनों गणित पढ़ाने और समझाने में अतुल्य और अद्वितीय थे। सन १९६९ के जून माह में हमने अलवर के नवीन उच्च माध्यमिक विद्यालय में प्रवेश लिया साथ ही हमारे पिताजी ने माथुर साहिब के हाथों में हमारे भविष्य की बागडोर सौंप दी। अलवर में हम अग्रवाल हॉस्टल में रहते थे। उसके पीछे ही माथुर साहिब का घर था। वहीं हम ट्यूशन पढ़ने जाते थे।


आज भी अच्छी तरह याद है, शुरू-शुरु में ट्यूशन पढ़ने वाले हम अकेले विद्यार्थी थे। माथुर साहिब मुझे सुबह पढ़ाया करते थे। कई बार तो घर पहुंचकर उन्हें मैं ही जगाता था । सर्दी के दिनों में वो रजाई ओढ़े, अपने बिस्तर में बैठे-बैठे ही पढ़ाते थे । ४ महीने में ही मेरी गणित की समझ में काफी सुधार हुआ था। अब मुझे गणित हौवा नहीं, बल्कि सबसे अच्छा लगता था। फाइनल परीक्षा से ३ महीने पहले और विद्यार्थी भी आने लगे थे। माथुर साहिब का पढ़ाने का तरीका भी काफी अलग था। वो किसी भी सवाल को ३-४ अलग-अलग तरीकों से हल करके समझाते थे।


मार्च १९७० में परीक्षा हुई। हम अपने प्रदर्शन से काफी खुश थे । और फिर राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का परिणाम घोषित हुआ। गणित में हमें १०० में से ९८ अंक मिले थे। हमने जयपुर, जोधपुर और पिलानी के इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश के लिए आवेदन किया। किस्मत से तीनों जगह ही प्रवेश मिल गया। तीनों जगहों में से हमारे पिताजी ने जयपुर को प्राथमिकता दी, जिसकी वजह हमारे गाँव का नज़दीक होना था। सन १९७५ में मैकेनिकल इंजीनियरिंग के स्नातक हो गए और ज़िन्दगी शुरू हो गई। काम करने के साथ-साथ पढ़ाई भी करते रहे और आगे बढ़ते रहे। सन १९९६ में इंग्लैंड से एम.बी.ए. किया। कुल मिलाकर ईश्वर, माथुर साहिब और माता-पिता का आशीर्वाद हमेशा साथ रहा और एक अच्छा खासा सफल कैरियर रहा। इस सबके बीच, कई बार माथुर साहिब से मिलना चाहा लेकिन कोई सम्पर्क स्थापित नहीं हो पाया। शायद मेरी नौकरी भी उसमें एक बड़ी वजह रही।


शुरू के १४ साल तक पानी के जहाजों पर सेल करता रहा जो दुनिया भर में घूमते थे। उसके बाद १७ साल दुबई में रहा। स्कूल के दोस्तों से भी बहुत ज्यादा सम्पर्क रह नहीं पाया। मन में चाह तो बहुत थी लेकिन कुछ हो नहीं पा रहा था। जब भी इस खूबसूरत और संपन्न जीवन यापन के बारे में सोचता था तो आँखों के सामने बस एक ही इंसान आता था, माथुर साहिब। उनसे मिलकर मैं अपना आभार प्रदर्शित करना चाहता था लेकिन कहीं कोई राह नहीं सूझ रही थी।


सन् २००९ में दुबई छोड़कर वापिस अपने देश आ गए और जयपुर में बस गए। इस वक़्त तक संचार व्यवस्था बहुत बदल चुकी थी। यहाँ आकर सबसे पहले मैंने अपने सारे स्कूल और कॉलेज के दोस्तों को ढूँढ़ने और जोड़ने का काम किया। इस सब में कुछ वक़्त तो लगा लेकिन काफी हद तक सफल रहा। एक दिन बातों बातों में मैंने अपने दोस्त खंडू भाई को माथुर साहिब के बारे में बताया। वो भी अलवर का ही रहने वाला है। किस्मत से अगले दिन ही, वो एक शादी समारोह में सम्मिलित होने अलवर जा रहा था। खंडू ने उनका मोबाइल नंबर लाने का वादा किया। आखिर किस्मत मेहरबान हुई और एक दिन बाद, माथुर साहिब का मोबाइल नंबर मेरे हाथ में आया। मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। तुरंत ही मैंने माथुर साहिब को फोन किया लेकिन सम्पर्क हो नहीं पाया। मैंने व्हाटसअप पर खुद का परिचय देकर संदेश छोड़ दिया। करीब ३ दिन बाद, सुबह ७.३० बजे माथुर साहिब का फोन आया, “योगेश, तुम्हारे बारे में पता लगा, कैसे हाल चाल हैं, आजकल क्या कर रहे हो, बच्चे क्या कर रहे हैं।", जैसी बहुत सी बातें हुई। फिर बोले कि मैं अपने बच्चों के पास जयपुर आता रहता हूँ। अगली बार तुमसे जरूर मिलूंगा।


करीब १ महीने बाद माथुर साहिब का फिर फोन आया कि वो अगस्त के पहले हफ्ते में जयपुर आ रहे हैं और आखिर वो दिन आ गया। ५ अगस्त २०१८, करीब ४९ साल बाद मैं अपने परम आदरणीय और प्रिय गुरूजी से मिलने वाला था। मेरी पत्नी और बच्चे मुझसे भी ज्यादा रोमांचित थे। सुबह से ही बच्चों के सन्देश आ रहे थे। कोई कुछ कह रहा था, कोई कुछ पूछ रहा था। हमारे घर में उनकी इतनी सारी बातें हुई थी कि मेरा पूरा परिवार उनको बहुत अच्छी तरह जानता था। दोपहर करीब १ बजे अपनी पत्नी के साथ माथुर साहिब के घर पहुँचे। उनको अपने सामने देखकर, मानों मेरा रोम रोम झूम उठा। मन ख़ुशी के गीत गा रहा था। मैं तो बस एकटक उन्हें ही देखे जा रहा था।


माथुर साहिब ८९ साल की उम्र में भी एकदम फिट थे। उनकी याददाश्त बहुत अच्छी थी और उस दिन भी उतने ही अच्छी तरह तैयार हुए थे। अपनी जवानी के दिनों में माथुर साहिब स्कूल में सबसे अच्छे कपडे पहनते थे। गुरूजी का पूरा परिवार उनके साथ था। उनके परिवार के सदस्यों ने बताया कि माथुर साहिब भी मुझसे मिलने को उतने ही उत्साहित थे जितना मैं था। घर पर पिछले ४ दिन से वो मेरी ही बातें कर रहे थे। व्हाटसअप पर मेरी फोटो दिखाकर बच्चों से कहते, देखो ये मेरा विद्यार्थी हैं, ये मुझसे मिलने आ रहा है। करीब १ घंटे हम सब साथ रहे। बहुत सी बातें की। गुरूजी का आभार व्यक्त किया ।

सच कहूँ तो ५ अगस्त २०१८ को मेरी ४९ साल की तपस्या पूरी हो गई थी।

संस्मरण बचपन तरक्की कृतज्ञता

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