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पहले प्यार का पहला दिन
पहले प्यार का पहला दिन
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© Pradeep Soni प्रदीप सोनी

Drama Romance

6 Minutes   4.0K    14


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अतीत में मुड़कर आज भी जब उस गुज़रे दौर के बारे में सोचता हूँ तो वक़्त कुछ पल के लिए जैसे ठहर सा जाता है और दिल में बहती हल्की-हल्की फ़िज़ा जैसे किसी अलग ही दुनिया में ले जाती है जहाँ सब कुछ कितना हसीन था सब कुछ कितना नया सा रात के करीब 10 बज चले थे। सर्दियों की वह ठंडी रात और मैं रजाई में घुसकर फेसबुक स्क्रीन पर अंगूठा घिसे जा रहा था कि अचानक मैसेज वाले आइकॉन पर लाल धब्बा आ बैठा। किसी अत्तित  का सन्देश था।

अत्तित: हाई!

ज़िन्दगी में आने वाले एक सुनहरे सफ़र का आगाज इन्ही दो शब्दों से हुआ था। मुझे याद है वो हमारी पहली चैट तकरीबन 10 मिनट चली थी जिसमें उसने मुझे अपने बारे में थोडा सा बताया और अपने कॉलेज आने के लिए आमंत्रित किया था। उस चैट के बाद भगवान झूठ ना बुलवाए मगर दिल के जर्रे-जर्रे में रोमांच का अज़ब सा ज्वार उठ रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे आज तो हवा में ही तैर रहे हैं। उसका वो एक hi बंजर भूमि पर किसी बाढ़ की तरह था।

सर्दियों की वह ठंडी सुबह 5 बजे फ़ोन का रिमाइंडर बज ‘अतीत शहर यात्रा’ मैं फटा फट जंगल पानी और नहा धो कर रोज की तरह कोट में हाथ डाले बस स्टैंड के लिए निकला मगर आज राहें और मंजिल रोज से अलग थी। आज मुझे अतीत शहर जाना था वैसे तो अतीत शहर से मेरा नाता डिप्लोमा के 3 सालों का भी रहा है मगर आज ना जाने सब नया नया सा क्यों लग रहा है। धुंध और कोहरे से ढकी सड़के मौसम की बेईमानी जाहिर कर रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे सडकों को किसी ख़ास के लिए ढक दिया गया है।  सफ़र में उस शहर से घटती दूरी के साथ मन में उस से पहली मुलाकात का ज्वार बढ़ता जा रहा था। और बढ़ रहा था एक अजीब सा डर की ना जाने क्या होने वाला है।

फ़ोन बजते  “हेल्लो... आप कहाँ पहुंचे?” सवाल था

“पता नहीं यार कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा" मैंने कहा

“पूछो ना किसी से।" उसने कहा

“भईया शहर कितना दूर है?” मैंने बगल में बैठे भाई से पूछा

“दस मिनट।” भाई ने बताया

“अभी दस मिनट लगेंगे।" मैंने बताया

“अच्छा ठीक है। जल्दी आ जाओ मैं बस स्टैंड पर ही इंतज़ार कर रही हूँ।”

और फ़ोन हल्की बाई के साथ कट गया।

इसी बीच खिड़की के शीशे पर सर टिका मैं डिप्लोमा के दौरान बिताये अतीत शहर में तीन सालों के बारे में सोचने लगा और सोचने लगा अपने दोस्तों और कॉलेज की ज़िन्दगी के बारे में सडकों के सहारे बने घरों और दुकानों को देख कर याद करने की कोशिश करने लगा कि वहां ये हुआ करता वहां वो हुआ करता और सोच का दायरा बढ़ता गया और यादे दिल की गहराई में उतरती चली “अतीत शहर नगरपालिका आपका हार्दिक स्वागत करती है।” धुंध को चीरते हुए नगरपालिका की लगा बोर्ड दिखाई देने लगा और दिल में उठती आग अब ज्वालाओं का रूप लेने लगी थी।

बस अतीत शहर के बस स्टैंड में आकर ख़ाली हो चुकी थी। मैं बस से उतर कर नजरे घुमा इधर-उधर ताकने लगा मगर वो कहीं दिखाई नहीं पड़ी तभी एकाएक फ़ोन की घंटी बजती है "यहाँ पीछे देखो लेफ्ट साइड में..." हाथ हिलाते हुए उसने इशारा किया।

"अच्छा आज चाँद पीछे छिपा है।" मैं उसे देख हल्का सा मुस्कुराते और शरमाते हुए सोचने लगा, कुछ ही क्षण में मैं उसके नजदीक जा बैठा। (वो बैठना एक दम वैसा था जैसे गैंग्स ऑफ़ वास्स्येपुर पिक्चर में फैज़ल खान - हिमा कुरैशी के नजदीक जा बैठता है।) “सॉरी यार  देर कर दी ना!"

मैंने कांपते हुए सुर में कहा

“नहीं कोई नहीं मैं भी कुछ ही देर पहले आई थी” उसने भी शरमाते हुए कहा

“काफी परेशान हो गयी होगी?” मैंने पूछा

“नहीं कोई परेशानी नहीं हुई बस वो लड़के कुछ कुछ बोल रहे थे। मुझे छेड़ रहे थे... भाई किसी की वेट कर रही है और ना जाने क्या क्या कह रहे थे। (उसने दूर खड़े कॉलेज के बच्चों की और इशारा करते हुए कहा।)

मैं: “चलो कोई नहीं कॉलेज के लड़के ऐसे ही होते है हम  चलते है।”

उधर से कुछ ही दूर एक किराना की दूकान थे।

मैंने कहा: “तुम एक मिनट रुको में अभी आया।”

मैं: “भईया एक चॉकलेट दे दो!”

दूकानदार: “कौन सी वाली?”

मैं: “सबसे महंगी वाली।”

दूकानदार: “ये लो कैडबरी डार्क 80 रुपये की है।”

मैं: “बस... चलो कोई नहीं दे दो।”

शायद वो पहली बार था जब किसी लड़की को मैंने चोकलेट दी थी।  असल में उन दिन बहुत सी चीज़े थी जो जिन्दगी में पहली बार हो रही थी। वो चोकलेट वो मुलाकात वो ज़ज्बात और शायद वो प्यार का आगाज सब पहली बार ही तो था।

मेरे अतीत शहर आने का कारण था की आज हम दोनों को मुराद शहर जाना था तो हमने सोचा की क्यों ना एक साथ ही जाया जाये।  इसी बहाने एक दुसरे को जान भी लेंगे। हम मुराद शहर की बस में आ बैठे कोहरे से ढकी सड़के और बस में बैठी कुछ ही सवारिया जैसे हमें पूरा मौका दे रही थी इक दूजे को समझने का… बात करने का। हम दोनों बस की एक ही सीट पर बैठे थे और उसकी बाते, शरारते और हंसी देख कर बहुत मन हो रहा था की यार इसको केवल एक बार के लिए बस छु लूँ की दिल को ठण्ड पड़ जाए मगर दिल के अन्दर भय की भयंकर अग्नि जैसे मुझे उससे एक हाथ दूर किये हुए थी। याद है मुझे जब कुछ समय बाद मैंने उसे ये छूने की इच्छा वाली बात बताई तो उसने मुस्कुरा कर कथा “आप तो है ही डरपोक से” वो सफ़र मेरी जिन्दगी के सबसे यादगार सफ़र में से एक था। “तेरी बंजारन रास्ता देखे... कब आयगा मेरे बंजारे” ये गाना मैं अपनी जिन्दगी में कभी नहीं भूल सकता और आज भी ये गाना मोबाइल की प्लेलिस्ट में बस्ता है और कभी कभी जब एक दम से इसके बोल “कब आयगा मेरे बंजारे कानो में आ पड़ते है तो वो दिन मेरी आँखों के सामने घुमने लगता है। वो बैकग्राउंड में बजता गाना और शरमाते हुए हम एक दुसरे से नज़रे छिपा एक दुसरे को देखने की जद्दोजहद में लगे रहे। हर बात की शुरुआत “और बताओ” से होती और अंत “बस आप बताओ”  से होती रही और इस तरह अतीत शहर से मुराद शहर के 2 घंटे का रास्ता लगा मानो चंद मिनटों में ख़तम हो गया।

इन्द्रलोक का वो मेट्रो स्टेशन जब हमारी पहली मुलाकात का अंत करती कश्मीरी गेट और रोहिणी की तरफ जाने वाली मेट्रो लाईने सामने आ खड़ी थी। मुझे ध्यान है जब वो कश्मीरी गेट मेट्रो की सीढियों की तरफ बढ़ रही थी और मैं रोहिणी जाने वाली मेट्रो की सीढियों की तरफ जा रहा था और हमारा एक दुसरे को एक ही समय पर मुड़कर देखना। कसम से दिल दहला देने वाला था। कसम से बहुत ख़ास था वो।

एक वो दौर था और एक आज का दिन आ चला है हमारे बीच काफी कुछ बदल सा गया है। समय की मजबूरी और पाबन्दी ने काफी हद तक हमें मजबूर किया है। ये भी नहीं मालूम की समय के गर्भ में क्या छिपा है या किस्मत की लकीरे क्या चाहती है मुझे ये भी पता है की अगले १-२ सालो में सारी तस्वीर साफ़ हो जायगी कि किसकी मंजिल क्या है कहाँ है मगर समय कभी भी हम से हमारा अतीत नहीं छीन पायेगा, वो वक़्त नहीं छीन पायेगा जो हमने एक दुसरे के साथ बिताया, जो हमने एक दुसरे को समझा, जो हमने एक दुसरे का खून पिया। वक्त कभी हमसे पहले प्यार का वो एहसास नहीं छीन पाएगा।

बस कुछ इस तरह का था मेरा पहले प्यार का पहला दिन...!

अतीत सड़क मुलाकात

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