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रेमन की कमीज़
रेमन की कमीज़
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© Jiya Prasad

Inspirational

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आज सुबह अपने भाई की दफ़्तरी की तैयारी देख रही थी। कभी कोई क़मीज़ निकाल रहे थे तो कहीं कुछ जुराबों की जोड़ी देख रहे थे। इस बीच भाभी की क्लास भी लग रही थी। तुम न जाने कहाँ सामान रख देती हो... खाना तो लगा दो... लंच रख दिया...शाम को गोभी मत बना देना...कुछ अच्छा सा पका देना... जया कुछ दिन ही यहाँ है। फिर तो ये चली ही जाएगी, गाँव में। भाभी के चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था। कभी देखा भी नहीं है। जो भैया बोल रहे थे उसे करने की खामोश हामी देती जा रही थीं। मैं होती तो शायद हंगामा ही कर बैठती। मैं सुबह से उनके कमरे में ही लेटी हुई थी। इसलिए इस नज़ारे को पास से देखने में अजीब सा लग रहा था। 

आज भैया ने पीले रंग की क़मीज़ पहनी थी। अच्छे लग रहे थे। अचानक मेरी तरफ़ देख कर बोले- 'आज जाना नहीं है कहीं, कुछ दिन से देख रहा हूँ, अज़ीब सी रहती हो… जैसे गुम हो कहीं… ठीक हो? तुम्हें भी न जाने क्या सुझा है कि गाँव में पड़ी हुई हो। शहर में अच्छा नहीं लगता क्या? यहीं रह जाओ!’ वाक्यों में आये सवाल मुझे क़मीज़ के ख़याल से जगा गये। मैंने अपनी गरम शाल को अच्छे से बदन पर लपेटते हुए कहा- ‘हाँ, कुछ थकावट सी लग रही है। जानते ही हो सर्दी और शहर में तबीयत कैसे बिगड़ जाती है और आलस बहुत आ जाता है...।' वो बस ‘हम्म’ बोले और जल्दबाज़ी में निकल गए। उनके पास समय कहाँ था, नौकरी जो बजानी थी। 

मेरे मन में बार बार क़मीज़ का ख़याल रह रहकर आ रहा था। जिस क़मीज़ का ख़याल आ रहा था उसका रंग गाढ़ा लाल था। क्यों अटका है दिमाग, आज क़मीज़ पर? शायद कोई कहानी आने को हो रही है मेरे मन में। भाभी मुझे चाय देने आई तब ध्यान टूटा और मैंने अपने हाथ में गरम गिलास ले लिया। मुझे लगा वो कुछ देर मेरे पास बैठेंगी और कुछ बात होगी। पर वो तो तुरंत ही चली गईं। मैंने सोचते सोचते चाय पी। आख़िरी घूट जो अंदर गया तो लगा- 'हाय इतनी जल्दी ख़त्म हो गई!' चाय पीने के थोड़ी देर बाद मुझे नींद आ गई। जब ऐसी नींद का अहसास हो तब मुझे अंदाज़ लग जाता है कि मैं देर तक इस दुनिया में नहीं रहूँगी। कोई दरवाज़ा खुलता है और में भीतर चली जाती हूँ। जिसे लोग सपना या ख़्वाब कहकर पुकारा करते हैं मैं उस दुनिया को अपने सबसे क़रीब पाती हूँ। अपनी असली जगह। ख़ैर, मैं पहुँच चुकी थी। 

इस बार मेरी उम्र लगभग दस बरस के आसपास है। रविवार का दिन है सो माँ ने हम सभी पर मेहनत कर के हमें तैयार कर दिया है। हम कुछ ही समय के लिए गाँव में रहने आए हैं। मैंने अपना वही नीला रंग पहना है। मेरे लिए ख़ास तौर से माँ ने सिला है। नीला सूती का टॉप और निकर। पापा को मैं ऐसे ही कपड़े में अच्छी लगती हूँ। बालों को ज़िद्द कर के पापा ने कटवा दिया है। माँ का कहना है कि लड़कियों के बाल बड़े होने चाहिए। पर दिल्ली जाने से पहले वो बाल कटवा गए। सर्दी जाती हुई दिनों में थोड़ी बहुत ही रह गई है।... लो टीवी के एंटीना पर कौआ बोल रहा है। मैं गणित की कॉपी में कुछ सवाल हल कर रही हूँ। शायद गुणा के हैं। मैंने उस पक्षी को घूरा। काले कागा का बोलने का मतलब घर में किसी मेहमान का आना। मैंने कागा को घूरते हुए सोचा अब कौन आ सकता है। मामाजी तो कुछ दिन पहले ही गए हैं। अभी इसी तरह के खयाल चले रहे थे दिमाग में, तभी किसी ने मेरे नाम को उत्साह से पुकारा। देख जया! जल्दी नीचे आ!... फूफाजी आए हैं और देख कितना सामान लाये हैं। हम दोनों भाई बहन की निगाह सबसे पहले उनके हाथ में पड़े खाने के सामान पर गई। 

मेरे फूफाजी एकदम वज़नदार आदमी थे। रंग ख़ूब गोरा था इसलिए बुआ की जगह, दादी को पसंद आ गए थे। यह नहीं मालूम कि बुआ को वो उस समय पसंद थे भी या नहीं। बस दादी ने ही सभी फैसले ले लिए थे। बुआ की शक्ल से ऐसा मालूम होता है कि वो बहुत जल्दी 'अडजस्टमेंट का शिकार' हो गई थीं। माँ के बारे में ऐसा नहीं लगा। शायद हो भी सकता है। माँ अच्छी अभिनेत्री है। जब देखो खुश ही नज़र आती है। ख़ैर, मेरे आस पड़ोस में सभी शादीशुदा औरतें खुश ही दिखती हैं। ...वापस फूफा जी पर आते हैं। फूफा जी दिल के बेहद बुरे इंसान हैं। वो लोगों पर बहुत खर्च करते हैं इसके अलावा लड़कियों को बहुत छूट भी देते हैं। इतनी छूट दी है कि लड़कियों की ज़ुबान कैंची जैसी चलती है। ऐसा मेरी दादी और फूफाजी की माँ का कहना है। पर हमारे घर जब भी आते हैं, मुझे तो बहुत अच्छा लगता है। 

माँ के साथ तरकारी कटवाने के साथ साथ कई गाँव की बातें भी बताते हैं। मुझे बैठने का मौका भी मिल जाता है। हालांकि माँ की शिकायत है कि बड़ों की बैठकी में 'तुम बच्चे' नहीं जमने चाहिए। पर फूफा जी अलग हैं। कहते हैं- 'जाने दो, इन्हें भी तो कल दुनियादारी में उतरना ही है। अभी से सीख लेने दो।' 

बातें निकलती हैं तो कितने क़िरदार भी निकल आते हैं उनके साथ। ऐसा ही एक क़िरदार हलधर भईया निकल आए। फूफाजी के सबसे बड़े लड़के। गाँव से शहर तक उन्हीं के चर्चे गूँजते हैं। सो इस बार फिर उनकी शादी का ज़िक्र छिड़ गया। फूफाजी तो अब हलधर भईया के इस नए रूप को अपना चुके हैं पर बुआ हैं कि आज भी उन पर शादी का दबाव डाल रही हैं। 

'हलधर भईया कुँवारा बाप हैं।'  

कुछ बरस पहले वो दिल्ली में हमारे ही साथ रहते थे कोई तकनीक की पढ़ाई पढ़ रहे थे। उन्हें भी कपड़ों का बेहद शौक़ था और फूफाजी से वह बेहिसाब रुपया लेकर अपने पर खर्च करते थे। माँ ने कई बार कहा भी कि इतनी खर्चीली अच्छी नहीं है। तब वह कहते - 'मामी, तुम न जानो कि क्लास में कितने बड़े लोग आते हैं। बराबर का न दिखूँ तो किताब के शबद (शब्द) भागने लगते हैं। आँख टिकती है नहीं।' इसी दौरान उन्हें किसी पहाड़ी लड़की से इश्क़ हो गया। उस लड़की को लाल रंग बहुत पसंद था। सो हलधर भईया लाल रंग की क़मीज़ बहुत पहना करते थे। हालांकि हम सब उनका मज़ाक उड़ाते थे। पर वह कहते थे- 'इश्क़ होगा तब जानोगे!' उन्हें अपनी एक ख़ास कपड़े की क़मीज़ से न जाने क्यों इतना लगाव था कि वह खुद उसे धोया करते। बड़े जतन से रखते थे। माँ ने कहा भी- 'मुझे दे दिया करो धोने के लिए। पढ़ाई में मन लगाओ। घर के काम तुम न किया करो। दीदी सुनेंगी तो कहेंगी कि मेरे लड़के की एक क़मीज़ भी नहीं धोई जा रही।'

लेकिन हलधर भईया ने कहा- 'मामी आप चिंता न करो। रेमंड की क़मीज़ है। इसकी धुलाई मैं ही करूँ तो अच्छा है।' इस बात से इतना तय था कि यह क़मीज़ उनकी जान बन गई थी। एक दाग भी नहीं लगने देते थे। मैंने पूछा भी था एक बार। 'भईया, ऐसा क्या है इस क़मीज़ में जो जान से अधिक समझते हो?' वो बस मुस्कुरा कर बोले- 'बच्ची है तू! चल जा पढ़ाई लिखाई कर।'

पढ़ाई के बीच में उन्हें गाँव से बुलावा आ गया कि माँ की तबीयत ठीक नहीं है। सो दो या चार दिन ख़ातिर आ जाओ। वो जो गए वापस दिल्ली लौटे ही नहीं। गाँव के ही होकर रह गए। 

आइये, उनकी आगे की कहानी लोगों की कही- सुनी बातों से आप लोगों को बताती हूँ। 

अक्तूबर की हल्की सर्दियों के महीने में वे गाँव गए। बुआ की हालत बहुत ही अधिक खराब थी। फूफा जी का दिल बैठ गया था कि उन्हें कुछ हो गया तो बेटियों और बेटे को कौन देखेगा। इस हालात में हलधर भईया ने बुआ जी की ख़ूब सेवा की और अच्छे से अच्छे अस्पताल में ले गए। उनकी दशा में सुधार आ रहा था। दिसंबर के अंत में बुआ जी बिलकुल चंगी हो गई थीं। सो हलधर भईया पर दबाव डाला गया कि शहर आकर अपनी पढ़ाई पूरी कर लें। वो शुरू में राज़ी नहीं थे। पर फूफाजी की बातों से मान गए। 

हमारे गाँव से रेलवे स्टेशन लगभग तीन सौ किलोमीटर दूर है। इसलिए ट्रेन चाहे कितने भी समय कि हो लोग कई घंटे पहले ही पहुँच जाते हैं। कारण कोई साधन नहीं है। जो हैं वे भी बहुत नाममात्र के। इसलिए जनवरी के सर्द दिनों में कोई भी वाहन ही नहीं मिल रहा था जो रात को स्टेशन पहुंचा दे, ताकि सुबह की ट्रेन पकड़ी जा सके। ट्रेन का टिकट तो रात के समय वाला भी मिल सकता था। ताकि सुबह स्टेशन के लिए रवाना हुआ जाए। पर हलधर भईया रात को सफर कर के (गाँव से स्टेशन का) परंपरा और डर ख़त्म करना चाहते थे। गाँव के लोगों में भूत-पिशाच, चुड़ैल, डाकू, चोर लूटेरों आदि का गजब भय था। इसलिए वे रात को ही सफर पर जाकर यह बतलाना चाहते थे कि इन सब वहम को ख़त्म करना होगा। इसलिए जानबूझकर ऐसी टाइमिंग वाली ट्रेन का टिकट ले आए थे। 

फूफाजी भी कोई कच्चे खिलाड़ी नहीं थे। उन्हों ने रात के अंधेरे को ख़त्म करने के लिए जाने कौन सी कुलदेवी की पूजा का आयोजन कर लिया और सभी गाँव वालों को रातभर उसमें शामिल होने का न्योता दे डाला। इससे दो काम हुए। गाँव में जनरेटर से लाइट आ गई। गाँव रोशनमान हो गया दूसरा गाँव के सभी बड़े-बूढ़े, लड़के लड़कियां, बच्चे, आदमी औरतें एक जगह इकट्ठा हो गए। तय किया गया कि देवी का विसर्जन स्टेशन के पास पढ़ने वाली नहर में कर देंगे। नहर है तो क्या हुआ, सुना है गंगा जी से ही निकली है। 

लोग बताते हैं कि उस रात गाँव में बहुत हलचल थी। गीत संगीत, बातें, दुख, किस्से, खुशी, हंसी, किलकारी सब कुछ इकट्ठा हो गया था। फूफाजी के नाम को लेकर आशीष गीत गाये जा रहे थे। छ या सात जीपों का इंतजाम किया गया था। देवी के विसर्जन में यह सभी जीपें जाने वाली थीं। आठवीं जीप में हलधर भईया और गाँव के पाँच छ लड़के स्टेशन तक उन्हें छोड़ आयेंगे, ऐसी योजना बनाई जा चुकी थी।

औरतों ने गीत मंगल गाया और विदा किया। सभी जीपें आगे जा रही थीं अच्छी गति के साथ। सबसे पीछे हलधर भईया की जीप थी। भईया ने पहले ही चालक को जीप धीमें धीमें चलाने का हुक्म दिया था। सो ये सभी दोस्त यार ख़ूब शहर और उसके मिजाज की बात करते हुए मज़े में जा रहे थे। कोई भोजपुरी गीत भी बजाया जा रहा था।

भईया को अचानक क्या सुनाई दिया और गाना बंद करवा कर सभी को श...कर के चुप करवाया। बोले- 'कोई बच्चा रो रहा है शायद!' गाड़ी में बैठे लोगों में से एक बोला- 'अरे चलो। किसी डायन या चुड़ैल का काम है। ऐसे ही रास्ता रोका जाता है।' भईया नहीं माने और गाड़ी से उतर गए। टॉर्च को जलाते हुए वह उस जगह पहुँच गए जहां से बच्चे की रोने की आवाज़ आ रही थी। टॉर्च की रोशनी में उन्हे वह बच्चा दिखा तो झट उठा कर सीने से चिपटा लिया। जैकेट के अंदर और रेमंड क़मीज़ से चिपटा हुआ बच्चा कुछ पल में सर्दी से राहत पा कर चुप हो गया। भईया ने कई आवाज़ें लगाईं। गुस्से में आठ दस भयंकर गाली भी दी। कहा- 'साला, पालना नहीं होता तो पैदा क्यो करते हो? सर्दी में इतने से बच्चे को कोई छोड़ता है क्या? साले इंसान हो या जनावर'(जानवर)...!' थोड़ी सी दूर कोई सफ़ेद साया सा दिखा। लेकिन भईया जैसे ही टॉर्च उस ओर ले गए, हिलती हुई झाड़ियों के अलावा कुछ न दिखा। बच्चा रेमंड क़मीज़ से चिपकाए वे वापस जीप में आए और घर वापस चलने को कह दिया। 

उधर फूफाजी स्टेशन पर हलधर भईया को न पाकर ख़ूब परेशान हुए और देवी को विसर्जित किए बिना ही वापस घर आ गए। ...घर पहुंचे तो बेटे को तो नहीं पाया पर कंबल में एक बच्चे को गोद में लिया हुआ कुँवारा बाप ज़रूर उन्हें दिखा। उस रात गुस्सा और ख़ामोशी फूफाजी के घर में ख़ूब रही। शायद यह सिलसिला ज़्यादा चला भी। किसी ने भईया को 'किरांतिकारी' तो 'पागल' भी कह दिया था।  

बच्ची अब थोड़ी बड़ी हो गई है। भईया ने उसका नाम बुलबुल रखा है। कहते हैं यही अच्छा नाम है। शुरू में उनके इस फैसले से बहुत झगड़े हुए पर अब घर सामान्य हो गया है। भईया 'हलधर मैया' में तब्दील हो चुके हैं। शहर के प्रेम को यह कहानी सूचित कर चुके हैं। उन्हें दुख है पर बुलबुल को देखकर भूल जाते हैं। 

रुकिए...रेमंड की क़मीज़ को क्यों भूल गए?

बुआ एक रोज़ उस क़मीज़ को धोने जा रही थीं। भईया ने न जाने क्या सोचकर कहा कि इसका पौंछा वगैरह बना लो। मैं नहीं पहनूंगा। इस बात पर बुआ हैरान होकर बोल उठीं- 'तू ही तो कहता था रेमन की क़मीज़ है रेमन की क़मीज़ है...और आज इसे कह रहा है पौंछा बना लो। तुझे क्या हो गया है...इस बच्ची के पीछे तू पगला गया है।' भईया कुछ न बोले बस बच्ची की ओर देखा। वह बड़े इत्मीनान से सो रही थी।

लगभग एक महीने बाद दूसरे किसी गाँव से खबर आई कि किसी लड़की ने आत्महत्या कर ली है। पुलिस जांच में कुछ और मालूम चल रहा है। कहा जा रहा है कि एक लड़की का उसी के घर किसी रिश्तेदार ने जबरन अत्याचार किया था। लड़की ने राज़ खोलने की धमकी दी तो मार दिया गया। पुलिस की तहक़ीक़ात जारी है। लोग बोलते हैं बुलबुल उसी की लड़की है।

...मेरी आँखें खुली हैं तो ऐसा लग रहा है कि मैं कई महीनों से सोई हूँ। सपने देखना अपने को थका भी देता है। कितने बरस पीछे चली गई थी। माँ ने जया-जया कर मुझे उठाया तो मालूम चला बुलबुल आई है फूफाजी के साथ घूमकर। मैं फौरन उठकर उससे मिलने चल दी। ट्रेन की टिकट भी बुक करनी है। हलधर भैया बुलबुल को देखने के लिए बेताब हुए जा रहे हैं। मैंने उन्हें विश्वास दिलाया था कि मैं इसका अच्छे से खयाल रखूंगी और समय पर साथ लेकर फूफाजी और माँ के साथ लौट आऊँगी।

 

 

समाज सकारत्मक क्रांति ममता पिता

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