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वो जो बचपन में तुमने खिलाई थी
वो जो बचपन में तुमने खिलाई थी
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© Tauseef Ahmed

Abstract Romance

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वो जो बचपन में तुमने खिलाई थी,
वो भले ही तुम्हारे जूठी थी पर उस टॉफ़ी में सच्चाई थी

पान पसंद का रंग तुम्हारी लाल वाली फ्रॉक से मिलता था,
खाते ही जुबान लाल हो जाती थी और फिर ज़माने भर को हम जुबान दिखाते फिरते थे

जुबान तो मैं अब भी ज़माने को दिखाना चाहता हूँ,
बस कोई साथ में जुबान लाल करने वाला हैं नहीं अब

और काश किस्मी का मतलब बचपन में मालूम होता तो,
उस किस्मी बार को बाटने का मक़सद बदल जाता

और मेलोडी ज़रूर चॉकलेटी थी पर तुम्हारे साथ जब भी खाता था तो कुछ और ही पाता था,
चॉकलेट आज भी खरीदता हूँ इस उम्मीद से शायद वो चॉकलेट का स्वाद तेरी सूरत में ढल जाए और फिर मुझमे घुल जाए

हाँ स्वाद से याद आया, वो जो तुम अपने छोटे भाई के हाथ से, रात के खाने के बाद, आधी जूठी करके भिजवाती थी,
और जब मैं खाता था तो अम्मी कहती थी की 'ये क्या आदत पाल रक्खी हैं रोज़ रोज़ की'
अब उन्हें कौन समझाता की इसी जूठी टॉफ़ी से तो सच्चे ख्वाब आते थे रात भर

और जिन टॉफ़ी के रैपर्स पर तुम कभी वो तीर वाला दिल या कभी अपनी लिपस्टिक के होठ वाले निशान भेजती थी,
वो रैपर्स क्या जानो, किसी जायदाद से कम न थे

अब बड़ा हो गया हूँ पर आज भी वो मोड़ वाली गुमटी से दो टॉफी रोज़ खरीदता हूँ,
एक खुद खाता हूँ और एक तुम्हारी बेटी को देता हूँ,
और जिस रात मैं सुकून से सोता हूँ, मैं समझ जाता हूँ कि वो टॉफ़ी तुम्हारी बेटी ने नहीं तुमने खाई होगी

tausefahmed nazm

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