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गोबर के ऊपले
गोबर के ऊपले
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© Yogesh Suhagwati Goyal

Drama

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ये बात तब की है जब हम करीब ८ साल के थे। हमारी बीच वाली भुआजी अपनी बेटी माया के साथ आयी हुई थी। हम और माया दोनों ही करीब बराबर की सी उम्र के थे। दोनों की खूब जमती थी। दिन भर धमाचौकड़ी करते रहते थे।

यहाँ एक और बात बताना जरूरी है। हमारा गाँव खेरली अलवर जिले में है। रेल और बस सुविधा से सभी बड़ी जगहों से जुड़ा हुआ है। उस जमाने में खेरली अनाज की प्रमुख मंडियों में से एक थी। खासकर सरसों की तो बहुत बड़ी मंडी थी। नयी फसल की आवक के वक़्त दूर-दूर के व्यापारी और सरसों तेल मिल मालिकों के प्रतिनिधि वहाँ आकर कई कई दिनों तक रहा करते थे।

उस जमाने में ट्रेक्टर मुश्किल से एक या दो किसानों के पास थे। आस पास के छोटे-छोटे गाँव वाले सारे किसान अपना माल बेचने हमारे गाँव में ही आते थे और उन किसानों के पास अपना अनाज ढोने का एक मात्र विकल्प बैलगाड़ी या पड्डागाड़ी ही होता था। सुबह ६ बजे से पहले ये लोग मंडी पहुँच जाते थे। अपना माल व्यापारी के फड़ पर उतारकर, दोपहर में किसी पेड़ की छाँव के नीचे आराम करते थे। उनके बैलों और पड्डों को भी आराम मिल जाता था। शाम को व्यापारी से माल का भुगतान लेकर किसान अपने गाँव लौट जाते थे। फसल की आवक के वक़्त ये बैलगाड़ियाँ सैकड़ों की संख्या में होती थी।

हमारा घर नये गंज में था। नए गंज के घरों के आगे बहुत खुला खुला था, और काफी खाली जमीन थी। एक अजीब सी बात है लेकिन ये सच है, हर घर के सामने एक नीम का पेड़ था। मैं इतने दावे से ये इसलिये कह सकता हूँ, क्योंकि मेरा सारा बचपन इन्हीं पेड़ों के साये में गुजरा है। कितने ही पेड़ों की डालियों पर सावन में हम खूब झूले हैं। और हाँ, ज्यादातर पेड़ों के चारों तरफ पक्का ओटा बना हुआ था। कहीं गोल और कहीं चौकोर। कुल मिलाकर ये जगह किसान और उनके बैलों के दोपहर के विश्राम के लिये सबसे उपयुक्त थी।

एक दिन मुझे और माया को ना जाने क्या सूझी ? घर के सामने और आसपास बहुत से बैल और पड्डे बंधे हुए थे। चारों तरफ गोबर ही गोबर पडा हुआ था। हम दोनों ने गोबर बीनने की सोची। दोनों ने घर में से एक एक परात उठाई और शुरू हो गये। दोनों अपनी अपनी परात में गोबर बीनते और घर के सामने वाले ओटे के पास खाली कर देते। ये तो याद नहीं कि कितने घंटे ये सब किया, लेकिन शाम तक हम दोनों ने गोबर इकठ्ठा कर करके एक बहुत बड़ा ढेर लगा दिया। गोबर के ढेर को देखकर हम दोनों बहुत खुश थे।

गोबर का ढेर दिखाने को, हमने ख़ुशी ख़ुशी अपनी चाचीजी को आवाज लगाई। उन्होंने नीचे आकर जब ढेर देखा, तो उनकी आँख फटी रह गयी। उनको अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। ये तुम दोनों ने किया है ! उन्होंने तुरंत ही मेरी माँ को बुलाया और वो ढेर दिखाया। माँ बहुत नाराज़ हुई। आज सारी दोपहर तुम दोनों ने ये सब किया है। तुम दोनों बावले हुए हो क्या ? कहीं कोई बीमार हो गया तो ? ये तुम्हारे करने का काम है क्या ?

हम तो सोचे बैठे थे कि बहुत शाबाशी मिलेगी और यहाँ तो डाँट पड़ रही थी। खैर, उसके बाद जो हुआ, तब हमको अपनी बेबकूफी का अंदाजा हुआ। अगले ४ दिन तक सबको मिलकर गोबर दोमंजिले की छत पर ढोना पड़ा। तब कहीं जाकर उस गोबर के ऊपले थापे गए। हमारी माँ और चाचीजी ७ दिन तक रोज लगी रही। पूरे घर की छत ऊपलों से भर गयी। अगले एक साल का पर्याप्त स्टॉक हो गया था, लेकिन माँ और चाचीजी की हालत देखकर खुद की बेबकूफी पर गुस्सा भी आ रहा था।

गोबर उपले बैल

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