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पिता को वो आखिरी पैगाम
पिता को वो आखिरी पैगाम
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© Lalima Shrivastav

Drama

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बस अपनी रफ्तार से चल रही थी। सड़कों पर कहीं-कहीं जब गड्ढे पड़ते, तब रचना अचानक अपने ख्यालों से बाहर आ जाती, लेकिन जैसे ही बस फिर से रफ्तार पकड़ लेती, रचना फिर कहीं खो जाती। उसके मन में कई सारे सवाल आ रहे थे। सवालों के काले-घने बादल उसके दिल और दिमाग पर छाते जा रहे थे, आखिर वह 18 साल बाद अपने उस गाँव जा रही थी, जहां उसका जन्म हुआ था। 4 साल की थी रचना, जब अपनी माँ के साथ अपने गाँव से नाना-नानी के घर इंदौर आ गई थी और उसके बाद से कभी भी वापस नहीं गई थी। माँ और पिता का तलाक हुए भी 17 साल हो गए थे, उसके बाद से उसने अपने पिता को नहीं देखा था। रचना के मन में बार-बार एक ही सवाल आ रहा था, आखिर उसके भाई का वो खत उसके घर क्यों आया था? ऐसा क्या हो गया था जो उसके भाई ने रचना और उसकी माँ को गांव बुलाया था ? मन में आ रहे इन्हीं सारे सवालों के बीच रचना ने बगल में बैठी अपनी माँ की तरफ देखा, उसकी माँ मधु सो रही थी, इसलिए रचना ने उन्हें जगाया नहीं और उसने भी खिड़की से बाहर देखते हुए अपनी आँखें बंद कर लीं।

रचना की माँ मधु और उसके पिता राजन की मुलाकात करीब 30 साल पहले कॉलेज में हुई थी। राजन छिंदवाड़ा के सारना गाँव से था और ग्रेजुएशन के लिए इंदौर आया था, जहां कॉलेज के दौरान मधु से उसकी दोस्ती हुई। मधु इंदौर की ही थी, वहीं पली बढ़ी थी, राजन के साथ दोस्ती उसे पसंद आई। दोनों की दोस्ती धीरे-धीरे प्यार में बदल गई, दोनों ने साथ जीने-मरने की कसमें खाईं । कॉलेज जब तक था, दोनों ने एक-दूसरे के साथ बहुत अच्छा समय बिताया, जब कॉलेज खत्म हुआ, तब राजन अपने गाँव वापस जाने की तैयारी में लग गया। उसे कोई सरकारी नौकरी करने का शौक नहीं था, न ही वह किसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी करना चाहता था, वह तो गाँव में अपने माता-पिता के साथ रहकर खेती करना चाहता था। राजन अपने माता-पिता के कहने पर बाहर पढ़ने जरूर गया था, लेकिन वह कभी भी अपना गाँव छोड़ना नहीं चाहता था। कॉलेज खत्म होने के बाद उसने मधु के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया। मधु अपने माता-पिता की दूसरी संतान थी, उससे बड़ा उसका एक भाई भी था। मधु ने राजन को अपने माता-पिता से मिलवाया।

मधु के पिता ओम प्रकाश ठाकुर इंदौर के बडे़ व्यापारियों में गिने जाते थे, उनकी पसंद भी थोड़ी अलग थी। राजन से मिलने के बाद उन्होंने मधु से एक ही बात कही

"मर जाऊंगा लेकिन तेरी शादी इस लड़के से नहीं कराऊंगा।'

अपने पिता की ये बात सुनकर मधु ने दोबारा उन्हें मनाने की कोशिश नहीं की, वह सीधे अपनी माँ के पास गई, लेकिन माँ ने भी कह दिया,

"'जो तेरे पिता कहेंगे वही होगा।"

माँ की बात सुनकर मधु को धक्का सा लगा, लेकिन उसने पहले ही राजन के साथ पूरी जिंदगी बिताने का सपना देख लिया था। उसने राजन से कहा,

"मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती राजन, शादी करूंगी तो तुमसे ही करूंगी।"

मधु की बात सुनकर राजन ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन मधु नहीं मानी। ऐसा नहीं था कि राजन मधु से शादी नहीं करना चाहता था, लेकिन वह यह नहीं चाहता था कि उसके कारण मधु अपने परिवार से दूर हो जाए, इसलिए वह कोई भी कदम उठाने से डर रहा था। वह मधु से कहता रहा कि वह अपने माता-पिता की मर्जी के खिलाफ कुछ न करे, लेकिन मधु अपनी जिद पर अड़ी रही। आखिरकार राजन को उसके आगे झुकना पड़ गया। मधु ने अपने माता-पिता की मर्जी के खिलाफ राजन से शादी कर ली, राजन भी उसे लेकर अपने गाँव चला गया।

राजन के माता-पिता बेहद सरल स्वभाव के थे, उन्होंने बड़े प्यार से मधु का स्वागत किया और पूरे गाँव को दावत दी। मधु और राजन एक-दूसरे के साथ बहुत खुश थे, मधु हमेशा से शहर में रही थी, गाँव का यह उसका पहला अनुभव था। वह अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रही थी कि गांव के माहौल में खुद को ढाल सके, राजन भी इस बात को समझता था और इसलिए मधु की छोटी-मोटी गलतियों को नजरअंदाज कर देता था । शादी के दूसरे साल दोनों को एक बेटा हुआ। बच्चे का नाम उसके दादा-दादी ने हर्ष रखा । हर्ष जब दो साल का था तब राजन और मधु की एक बेटी भी हुई, उसका नामकरण भी दादा-दादी ने किया और उसे रचना नाम दिया। हर्ष और रचना के बारे में जब ओम प्रकाश को पता चला, तब उनके मन में अपने नाती-नातिन को देखने की इच्छा जागी, लेकिन अपने घमंड के नशे में चूर ओम प्रकाश सारना जैसे छोटे से गांव में कैसे जा सकते थे। उन्होंने मधु को खत लिखा। सालों बाद पिता का खत पाकर मधु की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मधु ने भी अपने पिता को खत लिखा, हर्ष और रचना की तस्वीरें भी भेजी। तस्वीरें देखने के बाद ओम प्रकाश के मन में बच्चों को देखने की इच्छा बढ़ गई। मधु के भाई की शादी को चार साल हो गए थे, लेकिन कोई बच्चा नहीं हो सका था, ऐसे में ओम प्रकाश हर्ष और रचना को इंदौर लाने के बारे में सोचने लगे थे।

और वो हुआ जिसका डर था...

उन्होंने धीरे-धीरे मधु को कई खत लिखे और हर खत में उन्होंने मधु को एहसास कराया कि वह शहर में कैसे परियों की तरह रहती थी और गाँव में उसकी जिंदगी किस तरह बदल गई है। ओम प्रकश ने मधु के मन में राजन और उसके परिवार के खिलाफ जहर घोलने की कोशिश की। एक खत में उन्होंने लिखा,

"प्यारी बेटी मधु, मुझे पता है कि तुम राजन से बहुत प्यार करती हो, लेकिन वो लड़का तुम्हारे लायक नहीं है। तुम्हारी ज़िन्दगी देखो क्या से क्या हो गई है। मुझे दुख होता है कि मेरी जिस बेटी ने अपने मायके में किचन में कभी कदम भी नहीं रखा था वह आज इतने बड़े परिवार के लिए रोज खाना पकाती है। मैं जानता हूं ऐसी जिंदगी की कल्पना तुमने कभी नहीं की थी, लेकिन तुमने अपनी जिद के आगे कभी कुछ नहीं सुना। बेटी अब तुम अकेली नहीं हो, तुम्हारे दो बच्चे भी हैं, तुम्हीं सोचो कि बदलते जमाने में तुम हर्ष और रचना को गाँव में अच्छी शिक्षा कैसे दे सकती हो? यहां आ जाओ बेटी, अपने नहीं तो हर्ष और रचना के भविष्य के बारे में सोचकर ही आ जाओ। मैं ये नहीं कह रहा कि अकेले आओ, राजन से भी कहो कि वह यहां आकर मेरी कंपनी में नौकरी करने लगे। बेटी तुम हमेशा से ही पढ़ने में बहुत होशियार थी, लेकिन तुमने अपने भविष्य को ताक पर रखते हुए गांव में शादी कर ली, ये तुम्हारा सपना नहीं था। मुझे याद है कि तुम कितनी महत्वकांक्षी लड़की हुआ करती थी, लेकिन अब तुम्हें गांव में इस तरह देखकर हुए मुझे बहुत दुख होता है। बेटा यहां आ जाओ, मेरी कंपनी को संभालो, भविष्य बहुत अच्छा हो जाएगा। राजन को भी मनाओ।"

पिता की इन बातों का मधु पर कुछ ऐसा असर हुआ कि वह बदल सी गई। वह हर वक्त ये सोचने लगी कि कहीं उसने राजन से शादी करके गलती तो नहीं कर दी ? क्या उसने अपनी जिंदगी का अहम फैसला लेने में जल्दबाजी कर दी थी ? उसके बच्चे गाँव में पढ़ते हुए कैसे इस जमाने की बराबरी करेंगे ? ऐसे तमाम सवाल मधु के मन में आने लगे थे। मन में चल रही इस उधेड़बुन के कारण मधु चिड़चिड़ी हो गई थी,वह राजन से भी सीधे मुंह बात नहीं करती। वह जानती थी कि राजन कभी भी उसके साथ इंदौर जाने पर राजी नहीं होगा, लेकिन फिर भी उसने राजन से एक बार इस बारे में बात की। मधु ने राजन के सामने इंदौर शिफ्ट होने का प्रस्ताव रखा, उसने बच्चों की पढ़ाई से लेकर तमाम तरह की दलीलें दीं, लेकिन राजन ने साफ मना कर दिया। राजन के मना करने पर मधु और भी ज्यादा परेशान हो गई। राजन ने कई बार उसे समझाने की कोशिश की और यह विश्वास दिलाने की भी कोशिश की कि वह अपने बच्चों के भविष्य के साथ कभी भी खिलवाड़ नहीं करेगा, लेकिन मधु के दिमाग में पिता की बातें बुरी तरह से घर कर गई थीं। राजन भी जानता था कि मधु बहुत जिद्दी है, वह जानता था कि मधु किसी के सामने नहीं झुक सकती, इसलिए उसने मधु को समझाना छोड़ दिया। मधु का बर्ताव दिन-ब-दिन अपने सास-ससुर के लिए सख्त होता जा रहा था और फिर वह दिन भी आ गया, जब मधु ने घर छोड़ने का फैसला कर लिया।

मधु ने अपना सामान पैक किया और दोनों बच्चों को लेकर इंदौर चली गई। राजन को लगा कि कुछ दिनों में जब गुस्सा शांत हो जाएगा तब मधु वापस आ जाएगी। राजन जानता था कि मधु उससे बहुत प्यार करती है और वह दिल की बहुत साफ है, इसलिए वह जरूर वापस आएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दो महीने बीत गए, मधु वापस नहीं आई। राजन इंदौर गया और मधु से वापस आने की बात की। उसने मधु को बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं मानी। मधु जिद करती रही कि राजन भी इंदौर में ही शिफ्ट हो जाए और उसके पिता की कंपनी में काम करने लगे। राजन अपने माता-पिता और गांव को नहीं छोड़ सकता था, वह जानता था कि उसके गाँववालों को उससे बहुत उम्मीदें थीं, गाँववाले उसे देवता की तरह पूजते थे। वह खुद भी यह जानता था कि गाँव के प्रति उसकी बहुत जिम्मेदारियां हैं, इसलिए वह किसी भी कीमत पर गाँव नहीं छोड़ सकता था। आखिरकार राजन खाली हाथ ही वापस आ गया। मधु भी फैसला कर चुकी थी कि अब वह वापस नहीं जाएगी। उसने तलाक लेने का फैसला कर लिया। कुछ दिनों बाद राजन के घर पर तलाक के कागज पहुंच गए, उसके पैरों तले तो मानों जमीन ही खिसक गई, लेकिन वह कर ही क्या सकता था। वह समझ चुका था कि अब मधु कभी भी वापस नहीं आएगी, लेकिन दोनों बच्चे अभी तक मधु के पास ही थे, इसलिए उसने बच्चों के लिए केस लड़ने का फैसला किया। दो साल तक केस चला और कोर्ट ने तलाक को मंजूरी दे दी। रचना छोटी थी इसलिए उसकी कस्टडी मधु को मिली और हर्ष की कस्टडी राजन को मिली।

हर्ष अपने पिता के साथ सारना में पला बढ़ा। राजन ने हर्ष की पढ़ाई से लेकर उसके रहन-सहन, लाड़-दुलार, किसी भी चीज की उसे कभी कोई कमी नहीं महसूस होने दी। राजन ने अपने बेटे को माँ का प्यार देने की भी पूरी कोशिश की, लेकिन वह हर वक्त अपनी बेटी को भी याद करता था। हर्ष ने रचना के लिए अपने पिता की तड़प देखी थी। उसने देखा था कि किस तरह उसके पिता रात में अपनी बेटी और पत्नी की तस्वीर देखकर अकेले में रोते थे। हर्ष की परवरिश पूरी तरह से गाँव के माहौल में हुई, राजन ने उसे वो सारे संस्कार दिए जो उसके पिता ने उसे दिए थे। सरल स्वभाव के दादा-दादी और पिता की संगति में रहते हुए हर्ष भी बहुत ही सभ्य युवक बन गया। वहीं दूसरी तरफ मधु के पास रचना थी। मधु ने भी रचना की पढ़ाई-लिखाई में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। मधु ने अपने भाई के साथ अपने पिता की कंपनी संभाली और रचना की परवरिश की। रचना बचपन से अपने नाना-नानी और माँ के द्वारा यह सुनते आई थी कि किस तरह उसके पिता अपनी जिद पर अड़े रहे और गाँव नहीं छोड़ा। रचना को उसके नाना ने यह बताया कि राजन ने अपने फायदे के लिए मधु से शादी की और गाँव में उससे नौकरानी की तरह काम करवाता रहा। अपने पिता के बारे में बचपन से नकारात्मक बातें सुनकर रचना के मन में कभी भी पिता के लिए आदर और प्रेम भावना नहीं आई, बल्कि वह मन ही मन अपने पिता से नफरत करने लग गई। उसे लगने लगा कि उसके पिता ने उसकी माँ को धोखा दिया था।

देखते ही देखते रचना 22 बरस की हो गई। उस दिन भी रोज की तरह ही वह अपने कॉलेज से घर आई थी, उसी वक्त दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। रचना दरवाजे पर पहुंची, उसने देखा कि एक डाकिया अपने हाथ में एक लिफाफा लिए खड़ा है। रचना ने उससे वह लिफाफा लिया। अपनी जिंदगी में पहली बार उसे अपने भाई की तरफ से कोई खत मिला था। मोबाइल के जमाने में खत आना रचना को बहुत आश्चर्य की बात लग रही थी। उसने लिफाफा खोला, उसके अंदर रचना के बचपन की कुछ तस्वीरें, राजन-मधु-रचना-हर्ष-दादा-दादी सबकी एक ग्रुप फोटो और एक लेटर था। लेटर में हर्ष ने रचना से विनती की थी कि वह एक बार गाँव आ जाए। हर्ष ने कुछ इस तरह से अपनी बात लिखी थी कि रचना भावुक हो गई। उसने मधु से बात की और कहा कि वह गाँव जाना चाहती है। बेटी की इस बात को मधु काट नहीं सकी और सारना जाने के लिए मधु ने भी हामी भर दी। चूंकि मधु के अंदर अपने बेटे से बात करने की हिम्मत नहीं थी, इसलिए उसने किसी तरह गाँव के सरपंच का नंबर खोजा और उन्हें फोन मिलाकर अपने और रचना के आने की जानकारी दी।

छिंदवाड़ा के सफर पर रचना

दो दिन बाद रचना और मधु छिंदवाड़ा जाने वाली बस में बैठ गए। रचना पूरे रास्ते अपने बचपन की तस्वीरें देखती रही और भाई के खत के बारे में विचार करती रही। मधु की आँखों के सामने भी बार-बार राजन और हर्ष का चेहरा आ रहा था, लेकिन अब वह इतनी कठोर हो चुकी थी कि अपनी भावनाओं को आसानी से नजरअंदाज करना आने लगा था उसे। 9 घंटे के सफर के बाद आखिरकार रचना अपनी माँ के साथ अपने पिता के गाँव पहुंची। दोनों ने सबसे पहले सरपंच अरुण वर्मा से मुलाकात की। अरुण जब छोटा था, तब उसने मधु को देखा था। मधु को पहचानने में उसे देरी नहीं हुई। उसने राजन के घर की चाबी मधु को थमा दी। रचना ने बहुत सारे सवालों के साथ अपने पिता के घर में प्रवेश किया। मधु ने घर के सारे कमरों को देखना शुरू किया। उसने टेबल पर रखी तस्वीरों को देखा, उसने राजन के कमरे के पलंग के ऊपर लगी उस तस्वीर को भी देखा, जिसमें वह राजन के साथ दुल्हन के लिबास में खड़ी थी, लेकिन मधु अब इतनी सख्त हो चुकी थी कि उन पुरानी तस्वीरों को देखने के बाद भी उसके आँखों में आंसू न आ सके।

वहीं रचना को इस घर के बारे में कुछ भी याद नहीं था।उसकी आखें अपने पिता और भाई को तलाश रही थीं। उसी वक्त वहां अरुण आ गया, उसके हाथ में कुछ कागजात थे। रचना ने अरुण से अपने पिता के बारे में पूछा। रचना ने कहा

"'मेरे पिता कहां हैं?"

अरुण ने बताया कि राजन अब इस दुनिया में नहीं है। राजन को ब्रैन ट्यूमर था, जिसके कारण छह महीने पहले ही उसका निधन हो गया था। यूं तो रचना के मन में अपने पिता के लिए जरा भी प्रेम नहीं था, लेकिन उनके गुजरने की खबरे सुनकर उसे अजीब सा दुख हुआ, जिसे वह उस वक्त समझ नहीं पाई। वहीं मधु भी राजन के चले जाने की खबर सुनकर कहीं खो सी गई, उसके आँखों में इस वक्त आंसू आ गए, लेकिन किसी तरह उसने आसुंओ को गिरने से रोका और एक बार फिर भावनाओं को नजरअंदाज कर दिया।

अब रचना की आँखें अपने भाई को तलाशने लगी। उसने अरुण से पूछा,

"हर्ष भैया कहा हैं? कहीं दिख नहीं रहे", उन्होंने ही हमें खत लिखकर बुलाया था।"

अरुण हर्ष का अच्छा दोस्त था, इसलिए वह हर्ष द्वारा रचना को खत लिखे जाने की बात जानता था और उसी खत के बारे में बात करने के लिए ही वह मधु और रचना से मिलने राजन के घर आया था। अरुण ने बताया कि हर्ष आगे की पढ़ाई करने के लिए अमेरिका चला गया है और रवाना होने से पहले ही हर्ष ने रचना को वह खत पोस्ट किया था। यह सुनकर रचना को कुछ ऐसा महसूस हुआ कि जैसे कोई प्यारा सा सपना टूट गया हो, क्योंकि हर्ष का खत पाने के बाद से ही उसके मन में कहीं न कहीं अपने भाई से मिलने की इच्छा जाग गई थी... और सारना आते तक उसने कई बार यह सोचा था कि वह अपने भाई से मिलने के बाद सबसे पहले क्या कहेगी और क्या बात करेगी।

कुछ देर शांत रहने के बाद रचना ने अरुण से कहा,

"भैया ने खत में लिखा था कि कुछ है गाँव में, जिसके लिए मुझे यहां आना जरूरी था, क्या है वह", आखिर क्या बात है? भैया ने हमें यहां बुलाया क्यों है?"

रचना के मन में चल रहे ढेर सारे सवालों के बारे में अरुण पहले से ही जानता था। अरुण ने कहा,

"मैं जानता हूं कि आप क्या सोच रही हैं, मैं इसी बारे में आपसे बात करने यहां आया हूं। ये कुछ कागजात हैं, जो हर्ष ने आपको देने के लिए कहा था। इसे देख लीजिए, आपको आपके सारे जवाब मिल जाएंगे।"

इतना कहकर अरुण ने वो कागजात रचना को थमा दिए। तब तक मधु भी रचना के पास आकर खड़ी हो गई थी। अरुण ने रचना को दो लिफाफे दिए थे। एक लिफाफे में वो खत था जो हर्ष ने रचना को लिखा था और दूसरे लिफाफे में था राजन का खत।

भाई और पिता का खत

रचना ने पहले हर्ष का खत पढ़ा,

"प्यारी रचना, मैं जानता हूं कि इस वक्त तुम्हारे मन में ढेर सारे सवाल होंगे। तुम बहुत कुछ सोच रही होगी। तुम ये सोच रही होगी कि मैंने तुम्हें यहां क्यों बुलाया। भाई के ऊपर तुम्हें बहुत गुस्सा भी आ रहा होगा, कोई बात नहीं नटखट चिड़िया... तुम्हें पूरा हक है मेरे से गुस्सा होने का। होना भी चाहिए गुस्सा, तुम्हें गाँव बुलाकर मैं खुद जो वहां से चला गया, लेकिन क्या करता मजबूरी थी। खैर ये सब छोड़ो... ये बताओ कि तुम्हारी नाक अभी भी छोटे चूहे जैसी है या फिर चुहिया जैसी। हाहाहाहा, बुरा मत मानना, मजाक था, खैर फिलहाल तो मैंने तुम्हें बहुत जरूरी काम के लिए यहां बुलाया है। अब तुम बड़ी हो गई हो, मैं अब जो तुम्हें बताने जा रहा हूं, उससे तुम आजतक अनजान थी। मैं जानता हूं कि तुम्हें पापा और मेरे बारे में कुछ भी याद नहीं है और तुम्हारे मन में पापा के लिए जरा भी प्यार नहीं है, लेकिन सच ये है कि पापा तुमसे बहुत प्यार करते थे। तुम उनकी आँखों का तारा थी, जब मम्मी और तुम यहां से चले गए थे, तब ऐसी कोई भी रात नहीं बीती, जब पापा तुम्हारी फोटो देखकर रोए नहीं।

रचना, मेरे से कहीं ज्यादा प्यार पापा तुमसे करते थे। उन्होंने मुझे पिता और माँ , दोनों का प्यार देने की कोशिश की, लेकिन उनके मन में हमेशा ये ख्याल रहता था कि तुम्हें वहां पिता का प्यार नहीं मिलता है। पापा ने मम्मी को कभी धोखा नहीं दिया, उस वक्त हालात ही कुछ ऐसे हो गए थे कि दोनों को अलग होना पड़ा। मम्मी शहर में रहना चाहती थीं और पापा गाँव नहीं छोड़ सकते थे, इसलिए हालातों ने दोनों को अलग कर दिया। पापा ने कई बार तुमसे इसलिए माफी मांगी है क्योंकि उन्हें लगता था कि उनकी मजबूरी के कारण तुम्हें पिता का प्यार नहीं मिल रहा है। वो बहुत भले इंसान थे, लेकिन वो ज्यादा नहीं जी सके, दो साल पहले ही पता चला था कि उन्हें ब्रैन ट्यूमर है। बहुत इलाज कराया मैंने, लेकिन मैं उन्हें बचा नहीं सका।

पापा आखिरी बार तुम्हें देखना चाहते थे, लेकिन जानते थे कि नाना और मम्मी ऐसा होने नहीं देंगे, इसलिए कभी हिम्मत नहीं की, लेकिन उन्होंने जाने से पहले अपनी वसीयत तैयार कर दी थी। पापा ने तुम्हें और मुझे अपनी संपत्ति का आधा-आधा हिस्सा दिया है, लेकिन मैं जानता हूं कि तुम्हें पापा का प्यार कभी नहीं मिल सका है, इसलिए मैं अपने हिस्से की जायदाद भी तुम्हारे नाम कर रहा हूं, ताकि पापा की पूरी प्रॉपर्टी तुम्हें मिले और तुम यह एहसास कर सको कि वो और मैं तुमसे कितना प्यार करते हैं। एक और बात पापा ने आखिरी वक्त में तुम्हारे लिए एक खत भी लिखा था। उनका खत और प्रॉपर्टी के पेपर्स सब अरुण के पास है। अगर मन करे तो मुझे फोन जरूर करना, नंबर अरुण से ले सकती हो। मम्मी को नमस्ते कहना। तुम्हारा भाई- हर्ष।"

भाई का खत पढ़कर रचना की आँखों में आंसू आ गए। थोड़ी देर तक कुछ सोचने के बाद उसने दूसरा लिफाफा खोला, उस लिफाफे में राजन का खत और प्रॉपर्टी के पेपर्स थे। उसने पेपर्स एक तरफ कर दिए और आतुरता के साथ खत पढ़ने लगी, राजन के खत में लिखा था,

"प्यारी बेटी रचना, कैसी है बेटी? मुझे विश्वास है कि माँ के साथ है तो खुश ही होगी, वो तेरा बहुत ख्याल रखती है, ये भी मैं जानता हूं। बेटा तुझे देखने के लिए आँखें तरस रही हैं, पता नहीं दुनिया छोड़ने से पहले तुझे देख भी पाऊंगा या नहीं... तू न बचपन में बहुत नटखट थी, हमेशा पापा चॉकलेट, पापा चॉकलेट करती रहती थी। हाहाहहाहा... मैं भी कभी पिपरमेंट, तो कभी पार्ले, तो कभी इक्लेयर्स लेकर आता था, लेकिन तुझे लॉली पॉप पसंद थी। उसमें पीछे जो सीटी लगी होती थी ना... तू हमेशा उसे बजाती थी और फिर जोर से हंसती थी और मैं भी हंस देता था। दादा-दादी को तो तेरे साथ खेले बिना नींद ही नहीं आती थी, तू भी दादी के पल्लू से चिपकी रहती थी। बेटा तू सबकी लाडली थी और अभी भी है। बहुत सारी बातें करने का मन है तेरे से, कभी मौका ही नहीं मिला। इसलिए, आज सोचा कि तुझे खत ही लिख दूं, जानता हूं कि ये खत तुझे उसी वक्त मिलेगा जब मैं दुनिया में नहीं रहूंगा, लेकिन फिर भी तुझे ऊपर से देखता रहूंगा।

तेरा जब जन्म हुआ था न, तब तू बिल्कुल मेरे जैसी दिखती थी। मैं मधु को चिढ़ाता था कि देख रेचू कितनी क्यूट है, क्योंकि वो मेरे जैसे दिखती है... और तेरी माँ भी बहुत चिढ़ती थी। हाहाहाहाहा.... तूझे याद नहीं होगा लेकिन तुझे कीचड़ में लोटपोट करना बहुत पसंद था। जैसे ही बारिश होती तू छोटे-छोटे कदमों से, बिना कोई आवाज किए आंगन में पहुंच जाती और गिरते-पड़ते किसी तरह पानी में उछलने लगती... थोड़ी देर में कीचड़ बन जाता आंगन में और तू उसमें लोटपोट होने लगती... सही में बहुत नटखट थी। मधु हमेशा बोलती थी कि ये लड़की इतनी शैतान है न कि बड़े होकर खिलाड़ी बनेगी, तब मैं कहता कि नहीं, रेचू जो चाहे वो बने, उसकी मर्जी। सच बेटा, आज सुनने में आया है कि तू फैशन डिजाइनर बनने वाली है तो बड़ा गर्व होता है। तू मेरा और तेरी मम्मी का नाम रोशन कर रही है। मैंने सही में पिछले जन्म में कोई बहुत अच्छे कर्म किए होंगे, जो मेरी जिंदगी में तू, हर्ष और.... मधु आए।

मैं जानता हूं कि तेरी मम्मी मेरे से नाराज है, लेकिन ये भी जानता हूं कि वो मुझसे बहुत प्यार करती है और हम जिससे प्यार करते हैं, उससे ही तो नाराज होते हैं। खैर, उसे नाराज होने का पूरा अधिकार है....। रेचू, मैं तुझसे कुछ नहीं मांगूंगा, केवल एक बात मेरी मान ले... वो भी तेरी मर्जी है... अगर तू गाँव आती है तो एक बार माँ दुर्गा के मंदिर के सामने बैठे गरीबजनों को एक वक्त का खाना खिला देना... वो क्या है न कि मैंने मन्नत मांगी थी कि अगर तू गाँव आएगी तो मैं गरीबजनों को भोजन करवाऊंगा, लेकिन अब मेरा बचना मुश्किल है, ये भी जानता हूं कि तू जब यह खत पढ़ेगी तब तक मैं ज़िंदा नहीं रहूंगा, इसलिए मेरी केवल ये मन्नत पूरी कर देना। बेटा मेरे पास खेती और घर है, तेरी मर्जी तुझे खेती चाहिए या घर, जो तुझे लेना है ले लेना। हर्ष से मैंने बात कर ली है, उसे कोई परेशानी नहीं है। बहुत कुछ लिखने का मन कर रहा है रेचू, लेकिन अगर सब लिखने बैठ गया तो पूरी किताब लिखा जाएगी और तू भी कितना ही पढ़ेगी... हाहाहहा।

तुझसे बस ये कहना चाहता हूं कि तू मेरी शान है बेटी, दुख होता है कि तुझे पिता का प्यार नहीं दे सका, मजबूर था। गांव और माता-पिता के प्रति मेरे बहुत फर्ज थे, इसलिए मैं इसे छोड़ नहीं सका और शहर में मधु के साथ शिफ्ट नहीं हो सका। मुझे माफ कर देना बेटा, सच कह रहा हूं कि मैं बहुत मजबूर था, तेरी कुछ तस्वीरें हैं अलमारी में बचपन की, देख लेना... हर्ष कहता है कि रेचू की नाक चुहिया जैसी है, मैं हमेशा उसे डांटता हूं कि बहन के बारे में ऐसा नहीं कहते, लेकिन भाई है वो तेरा, इसलिए तुझे छेड़ने का हक भी है उसे। खैर, वो भी तेरे से बहुत प्यार करता है। उससे मिल जरूर लेना एक बार, वो भी तेरे से मिलना चाहता है। मधु से कहना कि अब गुस्सा थूक दे, मेरी आत्मा को शांति मिल जाएगी। अच्छा रेचू अपना और मधु का ख्याल रखना। तुहारा पापा "

पिता का खत पढ़कर रचना की फूट-फूटकर रोने लगी, मधु भी साथ ही साथ खत पढ़ रही थी, इस बार वह भी अपनी भावनाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकी और उसकी भी आँखों से आंसू बहने लगे। मधु ने रचना को गले लगाया और वो भी रोने लगी.... अब तक अरुण वहां से जा चुका था।

माता-पिता ज़िद बच्चे अलगाव दुःख ख़त पछतावा

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