Quotes New

Audio

Forum

Read

Contests


Write

Sign in
Wohoo!,
Dear user,
बिलौटी
बिलौटी
★★★★★

© Anwar Suhail

Crime Others Inspirational

8 Minutes   14.0K    14


Content Ranking

बिलौटी ठेकेदारिन साइकिल से उतरी। साइकिल स्टैंड पर लगा, सीधे परसाद पान गुमटी पर आई। परसाद का गतिशील हाथ क्षण भर का ठिठका। गुमटी के सामने खड़े अन्य लोगों का ध्यान बंटा।

रामभरोसे हिंदू होटल, धरम ढाबा, ममदू नाई की गुमटी और बस-स्टैंड के आस-पास बिखरे लोग सजग हुए। परसाद ने पान का बीड़ा बिलौटी की तरफ बढ़ाया। बिलौटी पान लेकर बड़ी नफ़ासत से उसे एक गाल के सुपुर्द किया और खुली हथेली परसाद की तरफ बढ़ा दी। परसाद ने अख़बार के टुकड़े पर सादी पत्ती, तीन सौ चौंसठ, चमन बहार और सुपारी के चंद क़तरे रखकर बिलौटी की तरफ पेश किया। पान की एक टूटी डंडी में चूना चिपका कर आगे बढ़ाया। बिलौटी ने बड़े इत्मीनान से तंबाकू-ज़र्दा फांक कर चूना चाटते हुए एक रूपए का सिक्का गुमटी में बिछे लाल कपड़े पर उछाला। फिर सधे क़दमों से साइकिल की तरफ़ बढ़ गई।

बिलौटी के पैरों में जूता-मोजा था। सलीके से बंधी लाल गुलाबी साड़ी में उसकी गेंहुआ रंगत खिल रही थी। साड़ी और ब्लाउज़ के बीच से झांकता उसका पेट और पीठ का हिस्से पर लोगों की आंखें चिपक गई थीं। साइकिल के कैरियर में एक रजिस्टर और एक डायरी फंसी थी। उसकी भूरी आंखों के जादू और मर्द-मार अदाओं से बस-स्टैंड का वातावरण प्रतिदिन इसी तरह मंत्र-बिद्ध होता है।

महाप्रबंधकर कार्यालय की तरफ जाने वाली मुख्य सड़क पर जब वह साइकिल का पैडल मारती सर्र से चली गई, तो तमाशबीन बिलौटी के सम्मोहनी प्रभाव से आज़ाद हुए। सहज हुए लोग, सहज हुए दुकानदार, सहज हुए खरीददार, सहज हुए यात्रीगण और सहज हुए बिलौटी के भूत, भविष्य और वर्तमान जानने का दावा ठोंकने वाले जानकार!

यहां तक कि उसके व्यक्तित्व से अंजान लोगों के दिलो-दिमाग में काफी देर तक सनसनाती रही बिलौटी...

कितना भी बखान किया जाए, बिलौटी के विलक्षण व्यक्तित्व का समग्र वर्णन किसी एक की जु़बान से होना असम्भव है। हर बार कुछ नया जुड़ जाता, कुछ पुराना छूट जाता। नए लोग, पुरानों से खोदा-खादी करते- ''कौन है रे बप्पा, कौन है ई आफ़त!''

पुराने टुकड़ों में बताते बिलौटी-पुराण...

कई टुकड़ों-चीथड़ों को इकट्ठा कर गुदड़ी बनाने का सब्र इस दौर के श्रोताओं में अब कहां दिखता है? वह भी ऐसे समय में, जब टीवी, सिनेमा वाले किस्सा-कहानियों को नज़रअंदाज़ कर मनोरंजन परोस रहे हैं। नतीजतन बिलौटी एक अबूझ पहेली बनी रहती। जब भी वह मर्दों के संसार में प्रवेश करती, अनगिनत प्रश्नों, जिज्ञासाओं, दंतकथाओं के बीज छींट कर फुर्र हो जाती।

कौन जानता था कि पगलिया ससुरी की बउड़ही बिटिया बिलौटी बड़ी होकर इतनी तेज-तर्रार निकल जाएगी। कोयले की झौड़ी (टोकरी) सिर पर ढोते-ढोते इतनी तरक्की कर जाएगी कि एक दिन ‘लेबर-सप्लायर’ बन जाएगी।

‘ठीकेदारिन कहते हैं उसे मज़दूर-रेज़ा, नेता-परेता।

ठाठ तो देखिए...ठाड़े-ठाड़े गरियाती है लेबरों, अफसरों और मउगे नेताओं को।

नेता, अफसर, ठेकेदारों के बीच उठती-बैठती और क्या जाने दारू-मुर्गा भी खींचती है।

ओंठकटवा तिवारी राज़दाराना अंदाज़ में बताता- ''रे बप्पा, खटिया में खुद ‘मरद’ बन जावै है छिनाल! अच्छे-अच्छे पहलवानों की हवा निकाल देवे है। एही कारन तुलसी बाबा आगाह कर दिए हैं कि ढोर, गंवार, सूद्र, पसु-नारी, ई सब ताड़न के अधिकारी। इन सबसे बच सकौ तो बच के रहौ। लेकिन ओही मूड़ै मां चढ़ाए हैं ससुरे ठीकेदार, मुंशी और कोलियरी के अधिकारी। तब काहे न छानी पे चढ़के मूते ई बिलौटिया...जानत हौ भइया, एक गो बिटिया है ओखर, का जाने ‘सुरसत्त्ती’ की का नाम रखिस है। ‘सुरसत्ती’ ससुरी अंगरेजी स्कूल में पढ़े जावै है।''

लोग तो बस याद करते हैं पगलिया को। बिलौटी की मां पगलिया।

पगलिया की बेशुमार गालियां बस-स्टेंड पर अनवर गूंजा करतीं। वह हवा में गालियां बका करती। स्टैंड के पास बने पोस्ट-आफिस के लाल-डब्बे में लोग चिट्ठियां डालने आते तो उसकी गालियों का शिकार बन जाते। पगलिया को भरम रहता कि चिठ्ठी डालने के बहाने लोग उसको और उसकी बिटिया बिलौटी को ताकते हैं। इसीलिए वह अंधा-धुंध गालिया बकती। लोग हंसते। बिलौटी ठीकेदारिन, शक्तिनगर-वाराणसी हाईवे के किनारे बस-स्टेंड के ‘टिन-शेड’ पर साधिकार कब्ज़ा जमाकर गुजर-बसर करने वाली पगलिया की कोख-जाई थी। गरीबी, अभाव, बदकिस्मती और ज़माने की बेरहम ठोकरें खा-खाकर पगलिया का जिस्म जर्जर हो गया था। उसकी रंगत झुलस चुकी थी। कहते हैं कि पगलिया जब आई थी ठीक-ठाक दिखाई देती थी। ओंठकटवा तिवारी ठीकै कहता-''अरे भइया, जवानी में तो गदहिया भी सुंदर दिखाई देवै है।''

यह तो अच्छा ही हुआ कि पगलिया को बिलौटी के बाद और बच्चे न हुए। बिलौटी का जन्म भी साधारण परिस्थितियों में नहीं हुआ था। तब पगलिया का डेरा बस-स्टेंड का टिन-शेड नहीं हुआ करता था।

चौदह-पंद्रह बरस पहले यहां पर कहां कुछ था।

उत्तर-प्रदेश के मिर्ज़ापुर ज़िले का आखिरी कोना। जहां कोयले की खदान खुलने वाली थी। वाराण्सी से रेनूसागर बिजली कारखाने तक काम-चलाऊ सड़क बन रही थी। तब शक्तिनगर आने के लिए सिंगरौली से रास्ता था या फिर औडी मोड़ से पहाड़ी की की जड़ पकड़ कर पैदल चलने से परासी, बीना, खड़िया, कोटा पहुंचा जाता था।

कहते हैं वाराणसी से रेनूसागर तक पगलिया बस से आई थी। बस-स्टैंड पर बस खाली हो जाती।

उस दिन सब सवारियां उतर गईं और पगलिया न उतरी तो कंडक्टर उसके पास गया।

कंडक्टर को उस पर पहले से ही शक था। किराया न अदा की होती तो वह उसे लाता भी नहीं। पगलिया पिछली सीट पर सिकुड़ी-सिमटी बैठी हुई थी। गठरी थी एक उसके पास, जिसे बड़े जतन से गोद में रखे हुए थी। कंडक्टर कई तरह की नैतिक-अनैतिक सम्भावनाओं की कल्पना करता उसकी बगल में जा बैठा। बस में और कोई न था। चालक अपना झोला-सामान लेकर जा चुका था। रात के ग्यारह बज रहे थे। सवारियां अपने गंतव्य तक पहुंचने की हड़बड़ी में थीं। बस-स्टैंड के पश्चिम में एक ढाबा था। ढाबे का मालिक जीवन इस बस का इंतज़ार करके दुकान बढ़ाता था। ठंड अपना असर जमा चुकी थी। जीवन भट्टी की आग ताप रहा था। कंडक्टर और जीवन का पुराना याराना था। कंडक्टर अक्सर बनारस से अद्धा-पउवा ले आया करता और गर्मागर्म पराठे, आमलेट और बैगन-आलू के भरते के साथ दोनों साथ-साथ खाना खाते। जीवन सोच रहा था कि कंडक्टर शायद दिसा-मैदान गया होगा।

लेकिन कंडक्टर के सामने तो एक दूसरी थाली परोसी हुई थी। माले-मुफ्त, दिले-बेरहम... वह अकेले ही उस भोजन का स्वाद चखना चाहता था।

पगलिया की देह से अजीब दुर्गंध फूट रही थी।

बस की नौकरी, अधजले ईंधन की गंध, सिगरेट-बीड़ी-अगरबत्ती की मिली-जुली गंध और दिन भर की थकान से वह परेशान था किन्तु पगलिया की बीस-बाईस साल की युवा देह की दुर्गंध में एक और आदिम गंध शामिल थी।

कंडक्टर तड़प उठा। पूछा तो पगली मुस्कुराई। कुछ न बोली। नाम-गांव, रेनूसागर में किसी सगे-सम्बंधी या अन्य कोई भी जानकारी न देकर वह बस इत्ती सी मुस्कुरा देती। कंडक्टर उसका हाथ पकड़कर उतारने का उपक्रम करने लगा। दुर्गंधयुक्त देह की मादक गर्माहट से वह बौखला सा गया। उसकी बगल में बैठ चुपचाप उसे बांहों में घेर लेना चाहा। पगलिया आंखें झपका कर कुनमुनाई। उसमें इंकार की आहट थी न इकरार की।

बस के अंदर चांदनी रात के चांदीनुमा टुकड़े, खिड़की के रास्ते बिखरे पड़े थे। ऐसा ही एक मद्धम-दमकता सा टुकड़ा पगली के चेहरे पर कुदरती गहने के रूप में आ सजा था। पगली की देह-गंध या तो गायब हो गई थी, या फिर कंडक्टर के कोशिशों को वह सहजता स्वीकार कर रही थी। कंडक्टर इस अद्भुत यथार्थ को ईश्वर का दिया वरदान समझकर प्रसाद स्वरूप ग्रहण करना चाह रहा था। कंडक्टर अधीर होकर उसकी देह का रसपान करने लगा। अचानक उसे लगा कि पगलिया कुछ बोली है। कंडक्टर चैतन्य हुआ। वह भूखी थी। कंडक्टर ने सोचा भगवान का प्रसाद है, बांट कर खाया जाए तो और अच्छा।

कंडक्टर अलग हटा तो पगली खुश दिखाई दी। कंडक्टर की जांघ में चिकोटी काट कर हंसी। कंडक्टर पगली के इस खुशी ज़ाहिर करने के तरीके पर सौ जान कु़रबान हुआ। उसकी छातियां नापता वह नीचे उतर गया।

जीवन, ढाबे का मालिक, बिहार के सिवान जिले का निवासी था और इस बियाबान में बिना परिवार के रहता था। उसने जब कंडक्टर की बात सुनी तो वह काफी खुश हुआ। तय हुआ कि पगलिया के संग बस के अंदर ही ‘जुगाड़-फिट’ किया जाए। उधर पता नहीं पगली को क्या सूझी कि दबे पांव, पोटली कांख में दबाए बस से उतरी और बस के पीछे अंधियारे का लाभ उठाकर उस सड़क पर चल दी, जिसके बारे में वह नितांत अनभिज्ञ थी। उसे नहीं मालूम था कि सड़क कहां जाती है? सड़क वैसे भी कहीं आती-जाती नहीं, जाते तो मुसाफिर ही हैं, किन्तु उसे यह भी तो मालूम न था कि स्वयं उसे कहां जाना है।

आधी रात!

वह भी जाड़े के शुरूआती दौर की रात!

औड़ी मोड़ का यह इलाका अन्य जगहों से कुछ ज़्यादा ही ठंडाता है।

पगली अकबकाई सी रेनूसागर की रोशनियों के विपरीत दिशा में चल दी। सामने भी रोशनियों के टुकड़े छितराए थे। महुआ, पलाश और आम के वृक्षों के बीच से छन कर आने वाली चांदनी की फुहारें रास्ता दिखातीं। पगली के लिए उजाला भी तो उतना ही निरर्थक था जितना कि अंधेरा।

चांद अपना सफर तय करता रहा और रेनूसागर से दक्षिण दिखा की तरफ पगलिया का सफ़र भी ज़ारी रहा। कोयला खदानें अभी नई-नई खुली थीं उनके कामगारों के लिए स्थाई-अस्थाई निवास बने हुए थे। वह एक ऐसी बस्ती में जा पहुंची जिसे खदानी लोग ‘कालोनी’ कहते थे। महुआ का एक बड़ा सा पेड़ देख वह उसके तने से टिक कर बैठ गई।

महुआ के पेड़ के ठीक सामने सिन्हा बाबू का क्वाटर हुआ करता था। नई कालोनी अभी व्यस्थित नहीं हुई थी। ‘ले-आउट’ के अनुसार ठेकेदार धड़ाधड़ ‘फिनिशिंग-टच’ देने का प्रयास कर रहे थे। माचिस की डिबियानुमा क्वाटरों में कर्मचारी अपना संसार गढ़ने में व्यस्त थे। पगली महुआ के पेड़ की पुश्त पर टिकी थी। वह भूख के एहसास को थकावट से पराजित करने का प्रयत्न करती सोने का उपक्रम करने लगी। ठंड अब बढ़ गई थी।

‘ठीकेदारिन कहते हैं उसे मज़दूर-रेज़ा, नेता-परेता।

ठाठ तो देखिए...ठाड़े-ठाड़े गरियाती है लेबरों, अफसरों और मउगे नेताओं को।

नेता, अफसर, ठेकेदारों के बीच उठती-बैठती और क्या जाने दारू-मुर्गा भी खींचती है।

ओंठकटवा तिवारी राज़दाराना अंदाज़ में बताता- ''रे बप्पा, खटिया में खुद ‘मरद’ बन जावै है छिनाल! अच्छे-अच्छे पहलवानों की हवा निकाल देवे है। एही कारन तुलसी बाबा आगाह कर दिए हैं कि ढोर, गंवार, सूद्र, पसु-नारी, ई सब ताड़न के अधिकारी। इन सबसे बच सकौ तो बच के रहौ। लेकिन ओही मूड़ै मां चढ़ाए हैं ससुरे ठीकेदार, मुंशी और कोलियरी के अधिकारी। तब काहे न छानी पे चढ़के मूते ई बिलौटिया...जानत हौ भइया, एक गो बिटिया है ओखर, का जाने ‘सुरसत्त्ती’ कि का नाम रखिस है। ‘सुरसत्ती’ ससुरी अंगरेजी स्कूल में पढ़े जावै है।''

mad women pagal aurat exploitation of mad women hindi story anwar suhail bilauti

Rate the content


Originality
Flow
Language
Cover design

Comments

Post

Some text some message..