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सिरकटा भूत
सिरकटा भूत
★★★★★

© Mahesh Dube

Thriller

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मुझे बचपन से ही भूतों से बड़ा डर लगता है। अँधेरा हुआ कि प्राण कांपने लगते। शायद बचपन में बड़े भाई बहनों द्वारा सुनाई गई डरावनी कहानियां इनकी जड़ में हों। चुड़ैल के पाँव के पंजे उलटी दिशा को मुड़े होते हैं और दोपहर में बांस के झुरमुट से डायन निकलती है आदि बातों ने आज तक मेरा जीना हराम कर रखा है। मेरा गाँव एकदम बीहड़ में है। जहां अभी तक बिजली भी नहीं पहुंची। मुख्य बाज़ार से कई मील पैदल चलकर ही वहां पहुँच सकते हैं और रास्ता भी एकदम सूनसान और झाड़ झंखाड़ से भरा हुआ। बीच में एक नहर है जिसे पार करने के लिए एक सीमेंट का चपटा बिजली का पोल डाल दिया गया है जिसे पार करने के लिए जिमनास्ट जैसे कौशल की ज़रुरत पड़ती है। इस बार गाँव गया तो ट्रेन लेट थी पर बाज़ार पहुँचने तक तो अच्छी खासी रोशनी थी। मुझे लगा कि सूर्यास्त तक घर पहुँच जाऊँगा पर आधी राह तय करने तक अचानक अन्धकार हो गया। तरह तरह के पशु पक्षी विचित्र आवाज़ें निकाल रहे थे। अब मेरी भय से बुरी हालत होने लगी। मेरे पास टॉर्च भी नहीं थी। हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। तभी कोढ़ में खाज जैसी बरसात शुरू हो गई। मैं बुरी तरह फंस गया। न आगे जा सकता था न पीछे। हनुमान चालीसा याद थी उसका संबल लेकर धीरे धीरे आगे बढ़ा। अब बिजली भी रह रह कर चमकने लगी थी तो उसके प्रकाश में राह सूझ जाती। लेकिन हर पेड़ पौधा और झाड़ी मुझे भूत प्रेत ही नज़र आ रहे थे। डर के मारे मैं काँप रहा था। पर मरता क्या न करता, चलता रहा। अचानक बिजली चमकी और मैंने कुछ फर्लांग दूर ऐसा दृश्य देखा जिसने मुझे जड़ कर दिया। उस समय की अपनी अवस्था का वर्णन मैं चाहकर भी नही कर सकता। हृदय इतनी ज़ोर से धड़क रहा था मानो मुंह से बाहर आ जाएगा। एक लगभग आठ फुट का दुबला सा आदमी लहराता हुआ चला जा रहा था। जिसका सर उसके शरीर की तुलना में कई गुना बड़ा था और उसने ऊपर छतरी तान रखी थी। डर के मारे मेरी घिग्घी बंध गई। कदम उठाना मुहाल हो गया। घुप्प अँधेरे में मैं आँखे फाड़ फाड़ कर उस विचित्र आकृति को देखता रहा। अगली जो घटना हुई उसने रही सही कसर भी पूरी कर दी। उस भूत ने शायद आज मुझे मार डालने की ही ठान रखी थी। मेरे देखते देखते वो थोड़ा सा लड़खड़ाया और उसका सर धड़ से टूट कर भूमि पर आ गिरा। धप्प की धीमी सी आवाज़ मेरी तेज़ चीख में दब गई। मेरी चीख सुनकर वो सरकटा भूत आकर्षित हुआ और तेज़ी से मेरी ओर बढ़ने लगा। अब मुझपर बेहोशी छाने लगी। प्राण बचना असम्भव था। किन्तु पता नहीं कैसे ईश्वर की कृपा से मैंने अपने पास अपने चचेरे भाई को पाया। उसे देखते ही मुझे ऐसा लगा मानो मरते मरते संजीवनी बूटी मिल गई। उसके पूछने पर मैंने भूत का सारा किस्सा सुनाया तो वो ज़ोर ज़ोर से हंसने लगा और बोला, "बुद्धू! भूत नहीं वो मैं था। बाज़ार से चीनी की बोरी सर पर लादकर घर जा रहा था कि बरसात शुरू हो गई और मैंने ऊपर छतरी तान ली। अचानक एक गड्ढे में पाँव पड़ जाने से बोरी फिसलकर गिर पड़ी तब तक तुम चीख पड़े और मैं तुम तक आ पहुंचा। फिर हम दोनों मज़े में बोलते बतियाते घर आ गए और मैं समझ गया कि हमारे वहम से बड़ा भूत और कोई नहीं होता।

सस्पेंस हॉरर

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