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युग्म
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© Neelam Kulshretha

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युग्म

“ओफ् क्या बेवकूफी है?” उसने गोवा एयरपोर्ट की बाहर रिसॉर्ट द्वारा भेजी कैब में बैठते हुए कहा।

`ह्वट?” केटी का ध्यान तो बैग में से अभी-अभी निकाली अपनी लिपस्टिक की तरफ था जो उसके होंठों को ताज़गी दे रही थी.

“ये कैसी बेवकूफी है कम्पनी अपनी `एनुअल मीट` अगले महीने करेगी और सभी राज्यों की शाखाओं से एच. आर. टीम को अरेंजमेंट करने अभी भेज दिया है। जैसे इस होटल को पाँच सितारे आँखें मूँद कर दे दिए हैं? इस टीम को वार्षिक सम्मेलन से दो दिन पहले अरेंजमेंट के लिए भेजकर प्लेन का खर्च बचाया जा सकता है.”

“मैडम! अपुन को क्या? आपको खुश होना चाहिये कि कम्पनी के खर्चे पर गोवा घूमने को दो बार मिलेगा, अपन खूब मस्ती करेंगे, पार्टी करेंगे. मैम! आप ये बात तीसरी बार कह रही हो. लेट’स एन्जॉय दिस ट्रिप. इट्स वेरी सिम्पल ...भारत में कुछ लोग बेहद गरीब है कुछ लोगों के पास अथाह पैसा है, उन्हें कहीं तो खर्च करना होता है.” आदतन केटी ने आँखें नचाई, गर्दन हिलाने से उसके स्ट्रेट बाल एक काली झालर से हिल उठे.

भंगिमा फिर भी झुंझलाई, “ओके और हाँ, मैंने कितनी बार कहा है कॉल मी बाईं नेम नॉट मैडम. कॉरपोरेट्स में तुम नई आयी हो, कितनी बार बताया है कि यहां सुप्रीम बॉस को भी नाम से पुकारते हैं.”

पता नहीं उसे क्या होता जा रहा है? वह क्यों नहीं केटी की तरह खुश रह पाती जबकि वह मस्ती से छलछलाती ज़िन्दगी को प्यार करती है, उसमें डूबे रहना चाहती है, वह डूबे रहना जानती भी है फिर क्यों ज़िन्दगी के सारे अक्स फीके लगने लगे हैं. एक अनाम खालीपन जो किसी शै से नहीं भरता उसकी ज़िन्दगी पर हावी होने लगा है. वह कह उठती है, “मुझे इस सबसे बहुत बोरियत होने लगी है.”

केटी कुछ नहीं कहती, बस उसे ऐसी नज़रों से देखती है कि उसकी उम्र भी ऐसी हो गई है कि जब मन हर चीज का लुत्फ़ उठाते-उठाते बोर होने लगता है. केटी कोई नई अँग्रेज़ी फ़िल्म का गीत गुनगुनाने लगती है और वह खिड़की से बाहर गोवा की संकरी कभी ऊपर चढ़ती, कभी उतरती सड़क पर गुम होने लगती है. दोनों ओर बने है यूरोप व पुर्तगाली स्थापत्य के बड़े अहाते वाले बंगले, जिनके कम्पाउण्ड में भी व बाहर भी लंबे ऊँचे नारियल के पेड़ खड़े हैं. ये सड़कें ही गोवा की पहचान है. टैक्सी अब एक खुले मैदान में आ गई है. वह मुस्करा उठती है कि एक गोवा ही ऐसा शहर है कि कब बस्ती शुरू हो जाए कब निर्जन मैदान, वह भी ऐसा कि जैसे शहर से बिलकुल बाहर हो गए हैं, कभी सड़क के एक ओर पड़ा समुद्र लहरों में मचलता रहता है, पता ही नहीं चलता।

लगता है रिसॉर्ट आ गया है क्योंकि एक इमारत के बाहर एक लाइन में लगे लाल पीले हरे सफेद झंडे दिखाई देने लगे हैं. ड्राइवर गाड़ी को बड़े गेट से ले जाकर पोर्च में खड़ी कर देता है. वहां का गार्ड बहुत तहज़ीब से कार का दरवाज़ा खोलता है, एक सूटेड-बूटेड व्यक्ति तपाक से उनसे कहता है, “मैडम! वेलकम टु आवर रिसॉर्ट. आई एम फ़र्नाडिस, असिस्टेंट मैनेजर. प्लीज़ कम दिस साइड.” फिर थोड़ा आश्चर्य करता है, “व्हेयर आर दिविक एंड राजुल सर.”

“दे विल कम बाय इवनिंग फ्लाइट.”

वह आगे-आगे लंबे कदम बढ़ाता चलने लगता है. ये दोनों भी उसके पीछे चलने लगती है. एक पोर्टर ने उनके बैग्स संभाल लिए हैं. रिसेप्शन का काँच का द्वार उनके पास आते ही अपने आप खुल गया है. बड़े होल में दो एल शेप के सोफे पड़े हैं. सेंट्रल टेबल पर फ़्लावर वास में अभी-अभी ताज़े फूल लगाये गये हैं. एक बड़ी गणपति की तांबे की मूर्ति है जिस पर ताज़े गेंदें फूलों की माला चढ़ी हुई है. सामने रखी थाली से अगरबत्ती का धुआँ सारे कक्ष को गमका रहा है व सीडी से निकलता “ओ...म ...ओ...म” का मधुर स्वर `शुभ प्रभात` कहता सा लगता है.

“मैडम प्लीज़! हैव अ सीट.” वह बड़े सोफे की तरफ इशारा करता है, “मैनेजर अभी आते ही होंगे, उससे पहले आप चाय लेंगी या कॉफी?”

वे चाय पीते हुए रिसेप्शन के बड़े शेंडिलेयर्स व एम्बिएंस का जायज़ा ले रही है. हर कोने में सूखे नारियल पर कार्विंग करे छोटे लैंप लगे हैं.

“गुड़ मॉर्निंग यंग लेडीज!” एक मध्य वय का व्यक्ति उनके सामने खड़े होकर कह रहा है, “आइ एम मैनेजर पारित.”

`गुड़ मॉर्निंग.” वह प्याला साइड टेबल पर रख देती है

“पहले आप ब्रेकफास्ट करेंगी या रिसॉर्ट देखेंगी.?”

“ब्रेकफास्ट तो हम लोग फ्रेश होकर लेंगे. पहले रिसॉर्ट दिखा दीजिये.”

“ओके, सबसे पहले तो मैं पीछे वाले बीच पर ले चलता हूँ जिसके लिए हमारा रिसॉर्ट पूरे इंडिया में फेमस है.”

रिसेप्शन के पीछे के दरवाजे से निकलते ही स्विमिंग पुल दिखाई देने लगा, उसके नीले पानी में कुछ विदेशी बच्चे तैर रहे थे. वे एक कतार में सजे पाम के गमलों के साथ चलते-चलते बगीचे में इधर उधर फैले कमरों के बीच जा निकले. मैनेजर एक कमरे के आगे रुक गए. साथ आए बेयरे ने एक कमरे के दरवाजे पर लगे छोटे बॉक्स में एक छोटा कार्ड डाला. वह कमरा खुल गया. केटी आश्चर्य से फुसफुसायी, ”खुल जा सिम-सिम.”

उसने आँखें तरेरी, वह झेंप गई. बेयरे ने कमरे की खिड़की खोल दी, “यहाँ से बाहर समुद्र दिखाई देता है.”

केटी उत्साह में खिड़की के पास खड़ी हो गई और वह चुपचाप टीवी, फ्रिज, माइक्रोवेव व फर्नीचर की क्वालिटी का जायज़ा लेने लगी. मैनेजर की आवाज़ से उसकी तन्द्रा भंग हुई, “आइए हम लोग बीच पर चलते हैं.”

रिसॉर्ट के पीछे के छोटे से लोहे के गेट से ढलान पर वह उतरने लगे, नीचे उतरकर रेत की चादर के पार फैला था अथाह हल्के आसमानी रंग में भीगा समुद्र... लहरों की सलवटों में फैला हुआ.

“ओ माई गॉड डॉल्फिन.” केटी तो जैसे चीखने लगी.

मैनेजर मुस्कराये, ”इसलिए तो मैं आपको ये दिखाने लाया था. जब आप लोग दोबारा आए तो सुबह सात बजे सब लोग यहाँ आकर इन्हें देख सकते हैं।”

सामने समुद्र में दो तीन डॉल्फिंस पूरी ताल से अर्ध गोलाकार बनाती निकलीं और पानी में अलोप हो गई “छपाक-छपाक-छपाक...” दूर पीली `बनाना बोट` समुद्र में गिर गई थी. उसमें से लाइफ बोट पहने लड़कियां गिर रही थी,” `छपाक-छपाक-छपाक” बोट वाले तत्परता से उन्हें सम्हालकर बोट सीधी कर रहे थे. डॉल्फिंस फिर समुद्र के निकली फिर वही “छपाक-छपाक.”

दूर बहुत दूर फिर एक बनाना बोट गिरी “छपाक ...”

कुछ सैलानी मोटर बोट में सैर कर रहे थे, कुछ समुद्र में नहाने का मज़ा ले रहे थे. वह मन ही मन संतुष्ट हो उठी कि उसने सही रिसॉर्ट नेट पर सर्च किया है लेकिन अभी वह मैनेजर को अपना निर्णय बतायेगी नहीं कि एनुअल मीट के लिए ये रिसॉर्ट फाइनल है. मैनेजर ने विदा माँगी, “मैडम आप लोग यहाँ एन्जॉय करिये. जब आप चाहेंगी तब हम लोग मेरे ऑफिस में बैठकर मेनू डिसाइड कर लेंगे.”

“ओके.”

केटी भागती हुई समुद्र में आगे चली गई, भंगिमा सैंडिल उतारकर धीरे-धीरे चलती समुद्र में अपने पैर भिगोने लगी. उसका थ्री फोर्थ भीग गया था. उसने भी कभी नहीं देखी इतनी डॉल्फिंस. उन्हें पानी में से ऊपर उछलते देखकर बहुत मज़ा आ रहा है लेकिन आदतन उसकी आँखें क्षितिज में समाते समुद्र के दूर के छोर पर जा उलझी. क्या ऐसा ही कोई सपाट वीराना उसके अन्दर फैला हुआ है... असीम ...क्यों? यहीं तक पहुँचने की उसने जी तोड़ मेहनत की थी. पापा से झगड़ा किया, “मुझे शादी नहीं करनी, आप मेरे दहेज के पैसे से मुझे दिल्ली से एमबीए करवा दीजिये.”

तब घर में कितना हंगामा मच गया था कि शादी क्यों नहीं करेगी? क्या कोई अपने आप देख रखा है? ऐसा भी कोई होता है कि कोई लड़की शादी ना करे? मम्मी तो उसके सपने के आगे आ खड़ी हुई थी. “क्या मैंने तुझे और विशु को नहीं पाला? क्या शादी के साथ नौकरी नहीं की? ”

“नहीं मम्मी! मुझे दो नावों में सवार ज़िन्दगी नहीं चाहिए. मुझे क्या पता नहीं है कि आपने कितनी मेहनत से हमे पाला है. उस पर हमेशा पापा के नखरे सहती रहीं. मैं बिंदास जीना चाहती हूँ. हाँ, आप डरना नहीं, मैं न तो फ्लर्ट हूँ, न विकेड हूं` ये तो आप भी जानती हो.”

दिल्ली में जब वह एमबीए कर रही थी माँ हमेशा सूँघती रहती थी कि कहीं उसकी नज़र किसी से टकरा तो नहीं गई, वह मन ही मन प्रार्थना करती कि एक दिन ऐसा आए कि भंगिमा उन्हें `सो एंड सो` से मिलवाये लेकिन उनका सपना, सपना ही रह गया. वह पहले ही कैम्पस इंटरव्यू में सेलेक्ट होकर मुंबई उड़ गई. कंपनी जूनियर एग्ज़ेक्यूटिव सेलेक्ट करने कैम्पस इंटरव्यू लेने आई थी लेकिन भंगिमा को सीधे ही सीनियर एग्ज़ेक्यूटिव चुन लिया गया था.

वह पहले एक महीने कम्पनी के गेस्ट हाउस में रही थी फिर ब्रोकर की मदद से उसे ऑफिस के पास ही घर वन बेडरूम फ्लैट मिल गया था. उसने मम्मी को घर सेट करने बुला लिया था. सुबह जब वह लैपटॉप कन्धे पर लटका कर निकलती थी तो मम्मी की सूरत देखकर उसे अपनी मुस्कराहट दबानी पड़ती. उनकी कुछ रुष्ट आँखें जैसे कह उठती थी कि ये जीवन नहीं है. उन्होंने तो उसके शादीशुदा घर में आने का सपना देखा था. कम्पनी की गाड़ी का ड्राइवर गाड़ी के पीछे का गेट खोलता और वह अपना लैपटॉप सीट पर रखकर बालकनी में खड़ी मम्मी को बाय करके गाड़ी में बैठ जाती.

मम्मी जब दोबारा आई तो उसने उनके सामने शेवरलेट ले ली थी. तीसरी बार तो पापा मम्मी दोनों को आना पड़ा था क्योंकि उसके अपने नए फ्लैट की गृह प्रवेश पूजा होनी थी. पापा पूजा के बाद बहुत खुश होकर बोले थे. “क्या ज़माना आ गया है, बेटियां भी अपने फ्लैट खरीदने लगी हैं.”

मम्मी हमेशा की तरह असमंजस में थी, “टीवी पर नहीं देखते कि लड़की कह रही है कि शादी तो करूँगी, तीन साल बाद अपना घर खरीद कर. कभी ये सोचा है कि दोनों अड़ गए कि हम तो अपने ही घर में रहेंगे तो शादी का क्या होगा? “हवन का धुआँ सारे फ्लैट में फैला हुआ था. आठ दस मुंबई वाले रिश्तेदार भी थे. सब `हो`, `हो` कर हंस पड़े थे. उनकी बात धुएं में ही उड़ गई थी. हालाँकि ये बात हँसने जैसी नहीं थी.

“क्या सोच रही हैं?” किटी ने उसके पास आकर उस पर समुद्र का पानी उछाला.

“नथिंग मच, मैं रूम में फ्रेश होने जा रही हूँ.”

“तब तो मुझे भी चलना होगा...”

वे दोनों अपने कमरों में फ्रेश होकर अनलिमिटेड ब्रेकफास्ट का जायजा लेने लगीं. काउंटर पर सजे हुए हैं, कटे हुए फल, सैंडविच, नूडल्स, बेक्ड पास्ता, छोटे पिज्ज़ा, इडली व वड़ा सांभर, डोसा, आलू पराठा, छोले भटूरे, ड्राई फ्रूट्स, चाय, कॉफी व छाछ. दूध के बाल में मशीन से झरते कर्नल फ़्लेक्स को देखकर कैटी के होंठों की मैरून लिपस्टिक मुस्कराहट में फैली हुई है. वह पहली बार पाँच सितारे ब्रेकफास्ट के नखरे देख रही है. बस वह दिमाग पर कुछ दबाव महसूस कर रही है कि उसके दो सहायक साथ होते तो अच्छी तरह निर्णय ले सकती थी कि कौन सा बोर्ड रूम मीटिंग व बेंकेट हॉल लंच डिनर के लिये बुक करना है. भंगिमा इस सबसे ऊब तो नहीं गयी है लेकिन उसके लिए अब नया कुछ नहीं बचा है. पता नहीं उसे क्या होने लगा है? क्यों सब खाली-खाली लगने लगा है. उसे तो हंगामों से बेहद प्यार था लेकिन क्यों उसकी आत्मा अकुलाई सी कुछ ढूँढ़ती रहती है या उसके शरीर में से निकल कर टहलने निकल पड़ती है, अपनी उदासियां उस पर उलीचती रहती है. कैसा मन बावरा है, सब कुछ तो है उसके इर्द-गिर्द लेकिन सृष्टि की सिर्फ़ एक... सिर्फ़ बस एक रचना के कारण सब बेमानी होता जा रहा है.

चाय के प्याले में शुगर क्यूब्स चम्मच से घोलते हुए उसके मन में उदासी घुलने लगी. उसकी एक-एक रग चाहत में बदलती जा रही है. दिल में साँझ जैसी कोई धुंध घुली रहती है, उसकी नीरवता जैसे जिस्म में घुली जा रही है ...इन सबका एक ही उत्तर है ...उसकी आँखों की स्वप्निल उड़ानों पर कोई कैसे रेत डालता जा रहा है? वह अपनी समृद्धि के ढेर पर बैठी क्यों अपूर्ण होती जा रही है...और क्या चाहिये उसे? दुनिया में ढेर से लोग हैं, उसके लिए सब बेमानी क्यों हो उठे हैं? क्यों उसे काली आँखें वो काली पलकों की झालरें कैद करती रहती हैं?

ब्रेकफास्ट के बाद वे मैनेजर के चैंबर में आ गई. पारित खड़े होकर बहुत तहज़ीब से कहा, “मैम! प्लीज़ हैव अ सीट.” व मेनू कार्ड खोलकर उनके सामने रख देते हैं.

उसने ये कार्ड केटी के सामने रख दिया, “पहले तुम कॉन्टिनेंटल डिशेज सेलेक्ट करो. बाकी मैं चूज़ कर लूँगी.”

पारित बताने लगते हैं, “आपकी कम्पनी ने तीन वर्ष पहले भी हमारे यहाँ एनुअल मीट रखे थी. हमें कोई शिकायत नहीं मिली.”

“या... या आई रिमेम्बर.” भंगिमा कार्ड देखते हुए उत्तर देती है. सब कुछ बहुत बारीकी से सोचकर तय किया जाता है. कहीं कुछ किसी प्रदेश या देश का व्यंजन रह ना जाए. केबिन से बाहर निकलते ही भंगिमा कहती है, “केटी! मैं सोना चाहती हूँ. सुबह का प्लेन पकड़ने के चक्कर में रात भर गहरी नींद नहीं आती.”

“ओ श्योर! मैं भी यही कहना चाह रही थी.”

फिर चलते-चलते उसने बताया, “बौब्स व शेरी का फोन आया था. वो गोवा पहुँचकर चार पाँच होटलों में डेलीगेट्स के कमरों की बुकिंग कन्फर्म करते हुए यहाँ पहुँचेंगे.”

“ओके.” कहते हुए वह अपने कमरे के दरवाजे को कार्ड से खोलते हुए उसमें दाखिल हो गई. उसे बेड की सफेद चादर अपने ऊपर खींचते हुए लगता है कि ये नीरवता उसे बेचैन कर रही है, ऐसा लगता है कोई उसे सूनेपन की अन्धेरी खोह में हाथ थामे लिए जा रहा है ... शायद ऐसा भी नहीं ...किसी की याद उसे घेर रही है. नितांत अकेलेपन में उसे किसी की बुरी तरह वजूद को घेरती याद से डर लगता है. वह इस याद को झटकना चाहती है ...क्यों किसी को याद करे? क्या नहीं है उसके पास? नई से नई ड्रेस से, सैंडिल से भरी अलमारियाँ, कार, फ्लैट व भरा हुआ बैंक. कमी कहाँ रह गई है?

नौकरी के पहले वर्ष वह अपने पुराने कपड़े मम्मी के घर ले गई थी. एक लॉन्ड्री बैग में भरकर स्टोर में रख आयी थी. दूसरे दिन ही मम्मी वह लॉन्ड्री बैग निकाल लाईं थी, “ये कपड़े धुलवाने हैं तो वॉश प्लेस पर रखती. क्या स्टोर में रख आई है?”

“मॉम! ये धुलवाने नहीं हैं, इन्हें तुलसी की बेटियों को दे दीजिये.”

“क्या?” उन्होंने वो बैग ज़मीन पर उलट दिया था, रंग बिरंगी डिजाइनर कुर्ती, लेगिंस, प्लाजा व जींस ज़मीन पर बिखर गए,” दिमाग खराब हो गया है तेरा? जरा ये कपड़े देखना ...ना इनकी चमक गई है और ना ही ये कहीं से फटे तो क्यों नौकरानी को दे रही है?”

उसने उनके गले में बाँहें डाल दी थी. “आप चिन्ता क्यों कर रही हैं, आपकी बेटी इतना कमा रही है कि इन्हें दान कर सकती है. आपकी बेटी शहजादी की तरह रह रही है.”

पापा बाथरूम से गीले बाल तौलिये से पोछते हुए निकले थे, “मैं तो कब से कह रहा हूँ कि कारपोरेट कल्चर में एक एमप्लोयी को जितना मिल रहा है उसमें कम से कम चार परिवार आसानी से पल सकते हैं. देश में खाने को नहीं है. कुछ लोगों के पास इतना पैसा आता जा रहा है कि वे टैक्स बचाने के लिये ज़मीन व फ्लैट ख़रीद रहे हैं ...ऑल दिस नॉनसेंस.”

“लो फिर शुरू हो गए. अपने फ़िलॉसफ़ी रहने दीजिये. कभी आपने अपनी पढ़ाई के समय इतनी मेहनत की है जितने अपनी बच्ची ने की थी. सुबह उठते ही कालेज जाना. शाम को चाय नाश्ता करके रात के एक या दो बजे तक कंप्यूटर पर बैठे रहना.”

“मैं कब कह रहा हूँ कि इनको मेहनत का फल नहीं मिलना चाहिये लेकिन समाज में कहीं संतुलन तो हो.”

“अगर ऐसा है तो क्यों लोगों के सामने गर्दन अकड़ा कर कहते हो कि हमारी बेटी एम. एन. सी. में काम कर रही है?” वैसे कहते समय वह भी महसूस कर रही होंगी कि ये बात गर्व की भी है लेकिन आज के इन मध्यवर्गीय माँ बाप के गले में आस-पास की बदहाली की सोचकर आठ सौ रुपये का पिज्ज़ा अटक भी जाता है. कैसे मम्मी डिप्रेशन में चली गई थी जब उन्हें पता लगा था कि बेटी को एक लाख रुपया बोनस मिला है, फ़ोन पर उन्होंने भंगिमा से कहा था, “मेरा तो दिल बैठा जा रहा है. इतना रुपया पाकर तू मुंबई की चकाचौंध में खो मत जाना.”

अब उन्हें क्या बताये जिन विकृत मस्तिष्क वालों को बिगड़ना होता है, वो तो गांव तक में बिगड़ जाते हैं. भंगिमा तब बहुत अच्छे मूड में थी पापा से उलझना नहीं चाहती थी वरना अपनी कार में सड़क पर चलते उसके शीशों के पार उसे भी तो दिखाई देता है ...-वो फटे कपड़ों व बदहाल ज़िन्दगी का संसार. ये समस्या उसने नहीं पैदा की है, ना ही उसने इतनी बर्बर नीतियां बनाईं कि इतना वीभत्स विभाजन होता रहे ...वो चुपचाप कमरे से बाहर चली गई थी. मम्मी व पापा की नोक-झोंक होती रही थी.

अब इस शहजादी को क्या हो गया है. पहले वह ब्यूटी पार्लर में स्पा करवाती, बालों को सेट करवा कर पेडीक्योर व मेनीक्योर करवा कर वहाँ से निकलती जैसे दुनिया उसके कदमों तले है. ऑफिस में सैंड्रा उसका मज़ाक उड़ाती थी. “जब तेरे को मुंबई जैसी जगह, ब्वाय फ्रेंड, डेट नहीं होने को मांगता तो काहे ब्यूटी के लिए को पैसे को खराब करने का?”

“ये डेफ़िनेशन किसने बनाई है कि फ़ीमेल्स को मेल्स के लिए सजना चाहिये. मैं तो अपने लिए सजती हूँ? आई एम लव इन माइसेल्फ़.”

अपने सपने, अपना सौंदर्य, अपना करियर, माँ का परिवार और ख़ुद से बेइंतहा प्यार ...फिर क्यों कोई अधूरापन उसे आंदोलित करने लगा है. बरसों पहले उड़ीसा के किसी रिसॉर्ट में ऐसी ही एनुअल मीट थी. उसने सुना था कोई सी.ई.ओ. मिस्टर कुमार है जो क्रोनिक बैचलर हैं. खड़ूस लेकिन बेहद अनुशासित जो इस मीट में रुचि ले रहे हैं. कहा तो ये जा रहा था कि वे जिस कार्यक्रम में रुचि ले लें, उसे कोई भूल नहीं सकता.

तब उसके हेड छुट्टी पर थे इसलिए उस मीट के लिए मुंबई की प्रतिनिधि बतौर उनसे वही बात करती थी, फ़ोन पर बहुत कुछ तय होता था. वह कभी भी बेतक्कलुफ़ी से उसके विषय में कुछ नहीं पूछते थे. बस मीटिंग्स का एजेण्डा या डेलीगेट्स की जानकारियाँ लेते रहते थे. उसने उन्हें पहली बार उस मीट की पहली बोर्ड रूम की मीटिंग में देखा था. वे कम्पनी की अंतर्राष्ट्रीय य नीति का परिचय देते रहे थे. दो दिन की व्यस्तता में कहां दिन निकल गए पता ही नहीं चला. दूसरी रात को डी जे से पहले किसी प्रसिद्ध ओडिसी नृत्यांगना का नृत्य होना था. कॉरपोरेट्स के सांस्कृतिक कार्यक्रम में भी लड़कियां जीन्स या थ्री फ़ोर्थ स्क‌र्ट्स में चली आती हैं लेकिन वह साड़ी पहनना पसंद करती है. उसने उस दिन चंदेरी की हल्की गुलाबी ज़री की किनारी वाली साड़ी पहन रखे थी. आगे की पंक्ति में रखे सोफों के पीछे वाली कुर्सियों की पंक्तियों में उसे एक कुर्सी खाली दिखाई दी. उसने उसके पास जाकर देखा कि उस पर एक फाइल रखी हुई है लेकिन पास की कुर्सी पर बैठी शीना ने उसे देखकर खुशी से हाथ हिलाया व बोली, “ये फाइल कर्वे सर की है. जब वे यहाँ आयें तो उठ जाना.”

“ठीक है. कहती वह बैठ गई थी. उसने सुरुचिपूर्ण से सजाये हॉल का जायजा लिया था, वह भीने सेंट से महक रही थी. उसने कन्धे पर पड़े बालों को पीछे करने के लिये गर्दन को हलका झटका देते हुए उसकी आई लाइनर लगी नज़र सामने की दीवार पर थोड़े दायीं तरफ लगे दर्पण पर पड़ी, उसे लगा उसके शरीर में दौड़ता हुआ रक्त एक झटके से फ्रीज़ हो गया हो. उस दर्पण में सी ग्रीन कलर की शर्ट व काली पेंट पहने कुमार सर की भव्य आकृति दिखाई दे रही थी जिनसे वह औपचारिक रुप से एक दो बार ही मिली थी. उनके गोरे चेहरे पर एक ठहराव था. चेहरे पर संतुलित राजसी शान, काली मूँछों व काली भौंहों के नीचे थोड़ी झुकी हुई काली पलकों की दृष्टि उसकी दृष्टि से टकरा गई ...उसे एक झटका लगा. उस लंबे आइने में समाई हॉल की सिर्फ़ एक आकृति और उस पर जमी हुई दृष्टि ...वह और सकुचा उठी ये सोच कि दर्पण का एक नियम होता है जैसे उनके व्यक्तित्व का समूचा अक्स उसके सामने है वैसे ही वह भी तो गुलाबी साड़ी में नाज़ुक मोतियों की लड़ में सजी सँवरी उनके सामने उजागर हो रही होगी.

वह शर्म से ज़ार-ज़ार हो उठी व उसने शीना से कहा, “कर्वे साहब प्रोग्राम के बीच में आ गये तो उठना पड़ेगा. मैंने उन्हें पीछे की सीट पर देखा है. मैं उन्हें उनकी सीट पर वापिस भेजती हूँ. “मन पर छाती पलकों की चादर से बचने का यही तरीका उसे समझ में आया. वह उनकी फाइल लेकर उठी और पीछे की पंक्ति में जा पहुँची थी. कर्वे अपने किसी दोस्त से अलमस्त गप्पें मार रहे थे. उसने उनकी फाइल देते हुए कहा, “गुड इवनिंग सर!”

“गुड इवनिंग. हाउ आर यू?”

“फाइन, आप अपनी फाइल ले लीजिये और प्लीज़! अपनी जगह पर आगे बैठ जाइये.”

“अरे नहीं! आप ही वहीं बैठिये ये जनाब बहुत मुश्किल से पकड़ में आए हैं. आज इनसे जी भर बातें कर लेने दीजिये. ”

“प्लीज़ ....”

“प्लीज़! आपको तो खुश होना चाहिए कि आपको आगे सीट मिल रही है.”

उसके कदम नहीं उठ रहे थे लेकिन लौटना उसकी विवशता थी. उस जगह की तरफ बढ़ते हुए जैसे उसका एक-एक कदम सिहर रहा था. कैसी खुदा की कुदरत थी, हॉल में इतने परिचित थे, इतनी भीड़ थी फिर भी उस आइने के कोण के कारण सिर्फ़ दो लोग आमने सामने बँध गए थे. दोनों ही अपने सजीले व्यक्तित्व सहित बिल्कुल आमने सामने. कितनी ही नज़र इधर-उधर करो उन अधमुँदी आँखों की काली झालर से अपने को बचा ही नहीं सकती थी, उसने तो वहाँ से उठ जाने की ईमानदार कोशिश भी की थी लेकिन वह उन्हीं अधमुँदी आँखों में कैद हो रही थी. हॉल में किसी को भी ख़बर नहीं थी आईने की इस गुस्ताखी की.

उन नज़रों की ताप से वह पिघल रही थी, संभलने की कोशिश में वह और भी पिघलती जा रही थी. ऐसा लग रहा था कि किसी ऊँचे शिखर से पिघलता नरम गरम मोम नीचे आ रहा है इधर भी, उधर भी. उन दोनों को सराबोर करता अपने साथ पिघलाकर बह उठा है किधर कौन जाने?

कार्यक्रम के उद्घोषक क्या बोल रहे हैं, कुछ सुनाई नहीं दे रहा था. उसकी तो उम्र गुज़र गई अपने आप में डूबे हुए. अब जब वह तय कर चुकी थी उसे कोई आईना नहीं तलाशना, आज आईने में उसे आईने ने तलाश लिया था. उन नज़रों की आँच से वह लरज रही थी, जैसे चिकने हरे पत्ते पर बारिश की पहली बूँद थरथराती है. बूँद चाहे ना चाहे एक लय में थरथराती, धीरे-धीरे अपना आकार खोती चिकने व हरे पत्ते की बाँहों में फिसल अपना वजूद खो बैठती है.

वह बौराई...बेसुध एक सुकुमार अंधड़ से थरथराती, कांपती एक सुरमई धुंध में डूबती जा रही थी. आईने में सामने दिखाई देती आकृति के चेहरे की रंगत भी गुलाबी होती जा रही थी या उसका गुलाबी आँचल वहां थरथरा रहा था. उन दोनों के बैठने का कोण ऐसा है कि एक दूसरे के अक्स से निज़ात पाना मुश्किल था. वह नीले आसमान में तिरते बादल में कैद हवा जैसी बेबस हो रही थी,जो उसकी धुंध के बीच बेचैन घूमती बाहर निकलने का रास्ता ढूँढती रह जाती है. उनके चेहरे के बदलते रंग को देखकर लग रहा था, वे भी तो बेबस हो रहे थे.

वह हवा जैसी स्वयं थरथरा रही थी, उधर की बेचैन थरथराहट को महसूस कर. उसका हृदय तेज़ी से धड़क रहा था, इतना कि वह हल्के-हल्के काँप रही थी. अपनी इस कंपकंपाहट पर स्वयं विस्मित थी उसे होता क्या जा रहा है. हॉल अब तक भर चुका था लेकिन कहीं क्यों नहीं कोई दिखाई दे रहा था?

बस लग रहा है सृष्टि के ये दो रंग गुलाबी व सी ग्रीन ही शाश्वत होकर रह गए हैं. क्या सच ही सारे ब्रह्मांड में दो विपरीत इकाइयों के बीच के उत्कट चुंबकीय आकर्षण के सामने सब कुछ बौना हो जाता है. बाकी सब कुछ जीने का बहाना मात्र है? इस बिन्दु पर सोच विचार, नफ़ा-नुकसान, दुनियादारी कुछ भी नहीं सूझता सिवाय एक चुंबकीय आकर्षण में बहते जाने के? सामने की आकृति की तेज़ चलती सांसो की तपिश से वह इतनी दूर से भी वह कांप रही थी. मन जैसे अपने पहरे की गिरफ़्त से छूटकर नंगे पाँव दौड़कर इस लरज व थरथराहट में समूचा समा गया था.

तालियों की गड़गड़ाहट से दोनों की तन्द्रा टूटी थी ...अरे! नृत्य आरंभ होकर भी समाप्त हो चुका था. नृत्यांगना झुककर हाथ जोड़कर अभिवादन कर रही थी. उस भव्य आकृति ने बायीं ओर गर्दन मोड़कर, अपनी झुकी हुई आँखों से, तेज़ चलती सांसों से, सख्ती से भिंचे हुए होंठों से सब कुछ कह डाला था. वह अपनी बेकाबू सांसों से इस सच की ख़ूबसूरत सौगात से उनकी झुकी हुई पलकों पर अपनी स्थिर दृष्टि की काली झालर रखकर जैसे मुहर लगाने को मजबूर हो गई थी. वे उस पर सीधी दृष्टि डालकर सामने कार्यक्रम को देखने का अभिनय करने लगे थे. वह उस सीधी दृष्टि से बिंध गई थी. मन के धुँधलके में बस एक ही विचार तिर रहा था ...वह जाने अनजाने बदल चुकी थी ...बिलकुल बदल चुकी थी.

वह बेड पर लेटे-लेटे सोचने लगती है कितने बरस हो गये इस बात को ...एक दो सात...अरे नहीं दस, अरे नहीं ... बस ये अभी की तो बात है. उस प्रोग्राम के बाद वह उनके सामने पड़ने से बचती रही थी. सैंड्रा को लेकर सुबह पुरी के बीच पर निकल गई थी. सामने दूर तक फैले निश्चल बीच में, जिसमें सूरज की किरणें चांदी चमका रही थी, वह अपनी थरथराहट भिगोती रही थी, सैंड्रा उसे अनमनी देखकर बार-बार पूछती रही, “ओ मैन! तुम काहे को इतना डिस्टर्ब लग रहा है. में देखी कि तुम डिनर टाइम में भी एक कोने में प्लेट लेकर खड़ा था.”

वह उत्तर में उसे क्या बताती? वो किसके सामने पड़ने से बच रही थी. सबको अपने-अपने शहर लौटना ही था. जब वह एचओडी बनी तब उसे कभी-कभी उनसे फ़ोन पर बात करनी पड़ जाती थी. जब भी वे “हैलो” कहते उसे लगता पुरी के समुद्र की लहरें मचलती रेत की चादर पर बिछ गई हैं और उसकी आवाज़ उन लहरों के बीच फँसी धड़क उठी है. उन धड़कनों को सम्भालते हुए वह जब भी बात करती उसे लगता कि वह सतही तौर पर एक प्रोफेशनल की तरह बात कर रहे हैं. कभी लगता उनकी आवाज़ की निचली सतह पर कुछ लरज रहा है, कहीं कोई आईना हिलता हुआ उसकी आँखों पर सूरज से समेटी अपनी रोशनी डाल रहा है. उनकी तारीफें उस तक पहुँच ही जाती थी. उन्होंने जब ऑफिस में देखा कि काम कम है, सभी कर्मचारी बचे समय में लेपटॉप पर फेसबुक या और कोई सोशल साइट खोलकर मुस्कराते रहते हैं. उन्होंने कम्पनी से और काम मंगाना आरंभ कर सबको कम्पनी के काम में व्यस्त कर दिया, ज़ाहिर है कम्पनी मुनाफ़ा देने लगी. उनकी और भी काबिलियत को देखकर वो कम्पनी के इंटरनेशनल हेड बनाकर यूएस भेज दिए गए थे. कुछ भी स्पष्ट नहीं हो पाया कि आईना उनके दिल में भी रच बस गया है या वही उसमें कैद हो गई है या उसे गलतफ़हमी है कि उससे बात करते समय उनकी आवाज़ लरजती है. यही ख़बर थी कि वे शादी करना ही नहीं चाहते कहीं कोई चोट ...?

उसने भी तो बिंदास जीवन चुना था ...जब मर्ज़ी हो उठो जब सोना हो सो जाओ ...कहाँ जाना है ...क्यों जाना है ...किससे मिलने जाना है ...किसी को भी सफ़ाई देने की ज़रूरत नहीं. जब मर्ज़ी हो आईने के सामने लेटेस्ट आउटफ़िट्स पहनकर खूब इतराओ, अपने से बेपनाह प्यार करो. अपने सपने को जिओ, करियर की उड़ान भरो लेकिन वह आईने में पहली जैसी नहीं रह गई. ये उड़ान बेमानी हो उठी है. जीवन में कहीं कोई अधूरापन अपने होने के एहसास से उसे अपने में समेटता रहता है. आत्मा से लिपटा कोमल मलमल जैसा कोई सच सरसराता रहता है ...वह क्यों अपने को अधूरा महसूस करने लगी है? क्यों प्रकृति की दो विपरीत इकाइयों को आस पास देखकर बेचैन होने लगी थी ...फिर चाहे वह कभी बालकनी की मुंडेर पर आपस में चोंच लड़ाते चिड़ा-चिड़ी ही क्यों ना हों. उसकी उदासी का सिर्फ़ एक ही पर्याय है, सिर्फ़ एक. उसकी कुछ और भी पाने की चाहते हाथ से फिसलती रेत हो उठी है. वह अपनी समृद्धि के ढेर पर बैठी पहले जैसी भरी पूरी नहीं रही है. दुनिया तो इतनी बड़ी है, अपार लोगों से भरी हुई. उसकी बेचैन निगाहों की सोच बस वहीं जा रुकती है. क्यों उसे लगने लगा है कि वह एक अधूरे वृत्त की परिधि है जो अपने आलेपन के कारण हमेशा सुलगती, लहकती रहती है कि उसे अपना आधा वृत्त मिले तो वह संपूर्ण हो जाए, तृप्त हो जाए. ब्रह्मांड की लय के साथ गोल-गोल घूमती रहे. क्यों उसे लगता है वे उसे बाहों में घेर लें और वह उनके सीने से लगकर ज़ोर से रो उठे ...ये कसकता सा कौन सा दुःख हरदम सीने को बेचैन किए रहता है ...उस बेचैनी की सिर्फ़ एक ही राहत है?

हैरानी की बात तो ये है कि वे इस मीट का इनोगरेशन करने गोवा आने वाले हैं. कैसे सामना करेगी उनका? अमेरिका जैसे रंगीन देश में इतने बरस गुजार देने के बाद उन्हें कहाँ याद रहा होगा वो आईना? और वह आज भी अपने एकांत क्षणों में वही थरथराहट अपने शरीर में महसूस करती है. उन नज़रों के स्पर्श की आँच आज भी अपनी पलकों पर महसूस होती है ...सोचते-सोचते कब उसकी पलक झपक गई.

शाम को केटी ने शोर मचा दिया, “मुझको यहां का वाघा बीच देखना है.”

“देखो, मैं तो थकी हूँ, मैं कहीं नहीं जाने वाली.”

“आपको तो चलना ही पड़ेगा. मीट के टाइम तो टाइम नहीं मिलेगा. अब जब मैं गोवा में हूँ तो बिना वाघा बीच... वाउ! - वन ऑफ़ द मोस्ट रोमैंटिक बीचेज़ ऑफ़ इंडिया ... देखे बिना नहीं जाऊँगी और अकेले तो मैं जा नहीं सकती तो आप को तो चलना पड़ेगा.”

कैब से उतरते ही वाघा बीच का दूर तक फैला रेतीला किनारा दिखाई देने लगा. समुद्र के किनारे बने थे कुछ-कुछ गोलाई में रेस्टोरेंट्स. वे दोनों रेत में चलने लगीं. पैर बार-बार बालू में फँस रहे थे. उसने वाघा बीच के एक रेस्टोरेंट के सामने पड़ी कुर्सी पर बैठे हुए व्हाइट सॉस में बेक्ड पास्ता को खाते हुए सोचा कि वो कौन सी दुनिया में इतने बरस विचरती रहीं जो एक बार यहाँ आई है और इसकी रूमानियत महसूस नहीं कर पाई. रात के कालेपन में काले आसमान में छिटके हुए टिमटिमाते तारों तले मचलता समुद्र और परत दर परत बिछती जाती इसकी काली-काली लहरें... उनके मचलने की रुनझुन उनके गीले आँचल से ठंडी होती, मदहोश हवाओं के थपेड़े. इसके तट पर बने छोटे मोटे होटल नीम अन्धेरे में डूबे हुए. जिनके बाहर लगी मेज़ों पर लालटेन नुमा लाइट जली हुई. दूर-दूर तक अर्द्धचंद्राकार बीच पर ऐसी ही लालटेन मेज़ों पर रखे जुगनुओं की तरह जगमगा रही हैं, लोगों की परछाईं भर दिखाई दे रही है. समुद्री हवा से केटी के बाल फड़फड़ा रहे हैं, “हाउ... रोमैंटिक.” कहते हुए वह इस हवा को सीने में भर लेती है फिर फेनी का गिलास मुँह से लगा लेती है.

कहीं-कहीं दो सिर आपस में जुड़े हुए सरगोशियों में लगे हुए हैं. बेयरे बहुत धीमे स्वर में से ऑर्डर ले रहे हैं कि कहीं किसी का रोमांस ना भंग हो जाए. भंगिमा का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा है. केटी भावुक हो रही है, “आई एम मिसिंग रूथ.”

भंगिमा जानती है रूथ इसका ब्वाय फ्रेंड है लेकिन वह क्यों किसी आईने में दिखाई देती परछाई में उलझती जा रही है, उसका चेहरा तीखी वेदना से नहाता जा रहा है. केटी आँखों से दायीं तरफ इशारा करती है, “सी दिस कपल. इन्हें किसी का होश नहीं है.”

दायीं तरफ लम्बा तंदुरुस्त एक विदेशी जोड़ा बैठा है जिनकी उमर पचास वर्ष से अधिक ही होगी. औरत ने फूलों वाला शोल्डरलेस गाउन पहन रखा है व ऊपर से काली नेट का केप [शॉल] पहन रखा है. केप में से उसकी जगमगाती गोरी मांसल त्वचा झांक रही है. पुरुष की नीली आँखें उसके आँखों में उलझ बिलकुल डूब गई लगती है. वे मुस्कराते हुए धीमे-धीमे फुसफुसाकर अंग्रेज़ी में जाने क्या बात कर रहे है बिल्कुल बेखबर, अपने में डूबे हुए. लग ही नहीं रहा कि वे किसी और देश की धरती पर हैं. क्या दो धड़कते हुए दिलो के लिए देश-समय-जगह की सीमा नहीं होती? वे चाहे तो आपस में कहीं भी डूब सकते हैं, आँखों से छलकते हुए.

“शिट! ये फॉरनर्स हमारे यहाँ बुढ़ापे में भी रोमांस करने चले आते है जबकि जेनुइन इंडियंस फीमेल्स को तो दिल के रोमांस पर ताला मारने, बच्चों को होम वर्क करवाने, अपने दिल-फेंक पतियों को आवारा औरतों से बचाने व किचेन से ही फुर्सत नहीं मिलती. आई एम फीलिंग वेरी जेलस. ”

भंगिमा को तो नहीं जलना चाहिये ...उसने तो अपने को बरसों पहले इस सबसे काट लिया था ...आश्चर्य ये है कि वह भी तीव्र जलन महसूस करने लगती है. कहीं कोई आईने का अक्स उसके सामने ढीठ बना हट ही नहीं रहा. क्यों उन्हें यहाँ होना चाहिये था? ...क्यों वे अपनी पलकों में उसे कैद करे पास बैठे होते ...क्यों वह सिहर रही होती? ...-क्यों वह अधूरापन महसूस कर रही है? एक अकुलाहट कैसे पूरी होना चाहती है?

उसकी स्वप्निल आंखों व उसके खोये-खोये चेहरे को देखकर केटी फुसफुसा उठती है, “भंगिमा! मैंने कहा था ना! गोवा का वाघा बीच बहुत रोमांटिक है. यहाँ की हवाएं लंबे लंबे नारियल के सतर खड़े पेड़ों के बीच सरगोशियाँ करती लगती हैं.”

“वॉट डु यू मीन बाय दिस?”

“नथिंग.” वह कह नहीं पाती रोमांस के लिये तरसते अपने चेहरे को देखिये. किसी बीच के रेस्टोरेंट से डिस्को म्यूजिक की आवाज़ केटी को बेचैन कर रही थी, वह बेसब्री से बात बदलकर बोली, “लेट्स डांस प्लीज़!”

“किटी ये गोवा का वाघा बीच है, यहाँ पर सिर्फ़ कपल्स को अन्दर जाने देते हैं, वह भी हाथ पर स्टैंप लगाकर.”

“ओ शिट!”

समुद्र की बालू में सैंडिल्स धँसाती वे लौट चली थी. रिसॉर्ट पहुँचकर पता लगा कि दिविक व राजुल डिनर लेकर सो चुके थे. भंगिमा अपनी बेचैन रूह से रात भर बिस्तर पर करवटें बदलती रही थी. दूसरे दिन शाम की फ्लाइट से इस टीम को मुंबई लौटना था.

एनुअल मीट के लिए देश के कोने-कोने से डेलीगेट्स गोवा के इस रिसॉर्ट व अन्य होटलों में इकट्ठे हो चुके थे. मुंबई के सीईओ भंगिमा की ड्यूटी लगा रहे थे कि वह मिस्टर कुमार को एयरपोर्ट से उनके साथ रिसीव करने चले लेकिन उसने बहाना बनाकर दिल्ली के एचआर हेड को उन्हें उनके साथ रिसीव करने भेज दिया था. वह सीधे-सीधे उनके सामने नहीं पड़ना चाहती थी. भंगिमा ने अपनी टीम को सुबह सात बजे ही अपने कमरे में बुला लिया था व एक हरे रंग का हैंड बैंड का पैकेट सबको दे दिया व सख्ती से कहा, “आप लोग एक-एक डेलीगेट से मिलकर उनसे कहिये कि जब तक ये गोवा में हैं ये हैंड बैंड पहने रहे. यही इनका आइडेंटिटी कार्ड है.”

केटी सबसे जूनियर थी, वह आश्चर्य से बोली, “दे आर मेच्योर्ड परसंस खो थोड़े ही जायेंगे.”

दिविक बोल पड़ा, “अभी तू नई है जानती नहीं है. कुछ लोग तो मुफ्त की मिली इतनी दारू पी जायेंगे व आस पास के बीच पर जाकर पड़ जायेंगे तो एचआर टीम को रात में बीच पर नशे में पड़े हुए लोगों को ढूंढ-ढूंढ कर होटल इसी बैंड से पहचान कर इन्हें होटल के कमरों में पहुँचाना होगा.”

“ओ...दिस और वेरी डिसगसटिंग. ऐसे लोग ही कॉरपोरेट्स का नाम बदनाम करते हैं.”

राजुल बीच में कूद पड़ा, “सो वॉट? ऐसे एडिक्टेड दो चार लोग किस सेक्टर या गली में नहीं हैं? तुझे गर्व नहीं होता अपने देश के मेहनतकश लोगों पर जिनके कारण विदेशी यहाँ अपनी पूंजी लगा रहे हैं, रोजगार बढ़ रहा है.”

दिविक भंगिमा को याद दिलाने लगा था. “भंगिमा! याद है ... क्रूज की एनुअल मीट में कैसे कुछ डेली गेट्स ने दारू पीकर शीशे का दरवाज़ा तोड़ दिया था कैसे कम्पेनसेशन देना पड़ा था.”

“फ़ॉर्गेट दिस नॉनसेंस ...से लोगों को घर में या वर्कप्लेस पर सम्हालना पड़ता है. अच्छे लोगों की ट्रेजडी ये है कि उनका इस सब में समय कितना नष्ट होता है. ”

भंगिमा इन लोगों को सारी फ़ाइल्स करीने से सम्भलवा कर वॉश रूम में चल दी. वे सब भी तैयार होने अपने कमरों में चले गए. जब वह अपने गीली बालों में तौलिया लपेटे बाहर निकली तो बाहर से बाहर से गिटार की धुन के साथ रेमो फ़र्नाडीज़ के गीत को गाने की आवाज़ आने लगी, “या या माया या ....”, उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क उठा ...वे आ गये हैं क्योंकि इस रिसॉर्ट की परंपरा के अनुसार रंग-बिरंगे फूलों वाली कमीज व काली पेंट व कैप पहने-पहने प्यानो कार्डियन व गिटार बजाते, झूमते दो गोवा के सिंगर किसी विशिष्ट अतिथि का स्वागत करते हैं.

थोड़ी देर बाद उसकी टीम ने उसके कमरे को नॉक किया, वह अन्दर से बोली, ”आप लोग चलिए ...मैं आती हूँ और हाँ बुके ले लिए.?”

वह जान बूझकर तैयार होने में देर लगा रही थी. इतनी भीड़-भाड़ में किसकी नज़र पड़ेगी कि वह लेट आई है? लेट जाने में सुविधा थी कि आगे की सीट भर जायेंगी और वह किसी कोने की सीट पर छिपी सी बैठ जायेगी. उसका अनुमान सही था क्योंकि प्रोग्राम शुरू हो चुका था, लाउंज खाली पड़़ा था. काउंटर पर बैठे किसी एमप्लोयी ने उसे फाइल व फ़ोल्डर पकड़ते हुए कहा, “गुड़ मॉर्निंग मैम!”

जैसे ही उसने धीमे से हॉल का दरवाज़ा खोला एक ठंडा झोंका उसके गालों को सहला गया. वह चुपचाप जायज़ा लेने लगी. पीछे की सारी कुर्सियां भरी हुई थी, वह धीरे-धीरे आगे बढ़ती गई. चौथी लाइन की बीच की कुर्सी खाली थी. वह अपनी फाइल सम्हालती वहीं जा बैठी.

उसने अपने सतरंगे स्टोल को गले पर ठीक करते हुए डायस पर दृष्टि डाली तो लगा उसका रक्त दिल की तरफ दौड़ पड़ा है ...धड़ धड़.  बीच में बैठे थे मिस्टर कुमार और उनकी दो जोड़ा आँखें उस पर टिकी हुई थी. वे धीमी स्मित से मुस्करा दिए. उसने उसी धड़कते दिल से सिर हिलाकर अभिवादन करने के औपचारिकता निबाह दी. उसका दिल बेहद ज़ोर-ज़ोर से धड़क उठा. उसे लगा उसके दिल व उनके दिल के बीच झनझनाती, लहकती, दिल को धड़काती एक अंतर्धारा बह उठी है, सच ही इस दिलकश बहाव को सिर्फ़ वह ही महसूस कर रही है, यहाँ से वहाँ तक? लगा वे भी इस जुड़ाव को महसूस कर रहे हैं ...जैसे कि मचलती तरंगों की डोर बन गई हो उनके बीच. पता नहीं ये उसका भ्रम था कि सच कुमार उसी मुस्कराहट से मुस्कराते रहे जब तक भाषण देने के लिये उद्घोषिका ने उनका नाम पुकारा.

वे उठे और सीधे चलते माइक के पास आ गये. एक गहरी व सीधी दृष्टि उन्होंने कुछ कहने से पहले उसकी तरफ डाली, वह सिमट सी गई. वे क्या साबित करना चाहते हैं? वो अमेरिका के ऑफिस के कामों के नए प्रयोगों की बातें बता रहे थे ...वो क्या कह रहे हैं, वह समझ नहीं पा रही थी. उसे लग रहा था कि सामने कोई आईना उभार आया है और वह उनकी पलकों की झालरों में कैद होती जा रही है ...उसका बदन सुन्न होता जा रहा है. अचानक तालियों की गड़गड़ाहट से उसकी तंद्रा भंग हुई. वे अपनी सीट पर आकर बैठ गए, फिर उसे देखकर उसी परिचित मुस्करा उठे. उद्घोषिका बता रही थी, “थैंक्स यू मिस्टर कुमार टु इनौगरेट आवर एनुअल मीट. डियर फ़्रैंड्स! आइ एम हैपी टु इंफ़ॉर्म यू दैट मिस्टर कुमार विल बि ओपनिंग अ न्यू ब्रांच ऑफ़ आवर कम्पनी इन जर्मनी एंड ही विल फ्लाय टु मुंबई एंड दैन म्यूनिख़ टुमारो मॉर्निंग.”

तालियों की आवाज़ से सारा हॉल गूँज उठा था. बस एक वही थी जो सामने घूरती हुई आँखों से जड़ बैठी थी और खुश थी कि चलो सुबह बला टल जायेगी ...बला? ओ! उसे ऐसा नहीं सोचना चाहिये ...क्या यदि वे अमेरिका नहीं गए होते तो क्या वे दोनों ऐसे अजनबी रह पाते? ...जो सुगंध उसमें धीरे-धीरे मद्धिम स्वर में फैलती चली गई और वह बदलती चली गई ...याद करती रही वह आईना या आईने से अलग कहाँ रह गई थी. उनसे बार-बार जो बच रही है वह क्या वो उसके अकेले ज़िन्दगी काटने की ज़िद है, जो अपनी हार नहीं मानना चाहती. उनका अकेले रहने का फैसला हार नहीं मानना चाहता. शायद वह वैसे ही भावुक हो रही है मोबाइल है, नेट है, उन्होंने कभी क्यों नहीं कुछ कहा? बस वह ऑफिस काम से फ़ोन करती तो उसकी `हाय` पर वे बहुत लम्बी `हाँ ...” कहते रहे. वो क्यों अभी भी बिना शादी के है? कोई चोट? जैसे कि वह शादी और प्रेम जैसे हादसों से अपने को बचाती आ रही है. दिल्ली की उसकी दो रूम मैट ही नहीं थी, सबसे प्यारी दोस्त भी थी. रूना मयंक के प्यार में धोखा देने से इतनी डिप्रेस्ड हो गई थी कि एमबीए अधूरा छोड़ गई थी. अवनिका ने शादी के एक साल के अन्दर ही आत्महत्या कर ली थी. मम्मी कितना समझाती रह गई थी सबके साथ ऐसा नहीं होता लेकिन वह तो पहले ही निश्चित कर चुकी थी कि कहीं नहीं बंधेगी और तब के वो हादसे ... लेकिन इन सबके बीच कुमार साहब कहां से चले आए हैं?

लंच के समय केटी डाइनिंग रूम में उसे ढूंढ़ती आ पहुँची है, “भंगिमा! प्लीज़! मेरा कुमार साहब से इंट्रॉ करवा दो.”

वह बहाना बनाकर उसे मना करना चाहती है लेकिन वे ही अपनी प्लेट लिए उसकी तरफ चले आ रहे हैं, अब बचने का कोई बहाना नहीं है. वह भी कुछ कदम उनकी तरफ बढ़ जाती है, “हाय!”

`हाय! हाउ आर यू भंगिमा?” उन्होंने उससे हाथ मिलाया तो उसका हाथ पकड़े ही रह गए कहीं कुछ दोनों के बीच लरज उठा.

“एबोसोल्यूटली फ़ाइन! “उसने हल्के से अपना हाथ छुड़ाया,” मीट केटी ...शी`ज़, आवर न्यू एग्ज़ेक्यूटिव.”

उन्होंने औपचारिकता निभाई, “नाइस टु मीट यू.”

केटी ने उत्साह से उनसे हैंड शेक किया, “आपके बारे में बहुत सुना था. आई एम ग्लैड टु मीट यू.”

उन्होंने जल्दी से हाथ छुड़ाकर औपचारिकता निबाही, `आई टू.’

बौब्स व शेरी भी उसके पास आकर बोले, “भंगिमा! हमारा भी इंट्रॉ करवा दीजिये.”

“ओ श्योर! ”वह उनका परिचय करवा कर वहाँ से सरक ली. मेज पर से वह पनीर टिक्का लेकर अपनी प्लेट में डालने लगी व बार-बार इतनी दूरी बनाए रखे कि वे दोबारा ना उससे टकरा जाए.

मीट के दूसरे सेशन में भी उनका एक लेक्चर था. वह जल्दी से जाकर पीछे की सीट पर बैठ गई थी कि कहीं फिर उनकी आँखों के सामने ना बैठना हो जाए. रात को सबको फिर डिनर के लिये इकट्ठा होना था. उसे लगा अब कुमार साहब उसे अनदेखा कर रहे थे, लेकिन कोई स्वप्निल उदासी उनकी आँखों में तैर रही है सच में ऐसा है या ये उसका भ्रम है. वह कोने में सूप लेकर खड़ी थी, वे जानबूझकर स्टार्टर लेने लग गए. वह खाने के बाद ब्राउनी पर आइसक्रीम डलवाने गई गई तो वो डेज़र्ट टेबल पर रखे प्लेट लेते-लेते रुक गए. एक कातर खामोशी से तड़पते हुए उसे देखा, और पानी पीने दूसरी मेज पर चले गए.

उस ये क्या हो रहा है? उसे क्यों बुरा लग रहा है? क्यों उसका दिल उनकी इस बेरुखी से तड़प रहा है? वह भी तो उनसे बचती आ रही है. खाना खाते लॉन में डीजे का संगीत ज़ोर से बज उठा. केटी दोनों हाथ ऊपर मटकाती चहकती काले गाउन में आ गई, “लेट्स डांस.”

“तुम चलो, मैं पाँच मिनट में आती हूँ.”

भंगिमा कुमार साहब की बेरुख़ी से बौखलाई हुई थी. कुमार साहब वहां भी इग्नोर करेंगे तो वह कहीं सबके बीच रो ना पड़े लेकिन क्यों? क्यों रोयेगी? वो क्यों पागल जैसी बातें सोच रही है? नहीं, नहीं फिर भी यदि ऐसा हुआ तो ...वो चुपचाप छिपती छुपाती अपने कमरे में आ गई. जल्दी-जल्दी कपड़े बदलकर गहरी नींद में डूब जाना चाहती थी लेकिन बिस्तर पर पड़ते ही वह ज़ोर से रो उठी, आँसुओं से सिसक उठी.

वह कब सो गई उसे पता भी नहीं चला.

सुबह डोर बेल बज उठी. उसने बमुश्किल आँखें खोल कर देखा सुबह के छ; बजे हैं, इस समय कौन हो सकता है? वह अलसाई सी अपनी गुलाबी नाइटी को समेटती उठी, लगता है कोई डेलीगेट नशे में डाइनिंग रूम में तोड़-फोड़ कर आया होगा और बेयरा उस तोड़-फोड़ का बिल लिए खड़ा होगा. उसने दरवाज़ा खोला ...सामने खड़े थे भावुक आँखें लिए कुमार साहब. वह स्तब्ध रह गई, “अअआप.”

उन्होंने फुसफुसाते हुए बस इतना कहा, “भंगिमा! मुझे जर्मनी जाने से रोक नहीं सकती थीं? या मेरे साथ चलने की बात नहीं कह सकती थीं?”

वह सकते की हालत में मौन उन्हें देखती रह गई फिर उसके रुंधे गले से बहुत मुश्किल से निकले शब्द, ”आप ख़ुद भी तो ये सब कह सकते थे?”

फिर वहां कुछ नहीं बचा ना रिसॉर्ट ...ना ज़मीन ...ना आसमान ...ना समुद्री हवाएं सा कुछ ...उनके बीच अब आईना भी नहीं था.

 

 

युग्म

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