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क्या बनोगे तुम
क्या बनोगे तुम
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© Urmila Prasad

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सूरज पाँच साल का बच्चा है, वह अपने पापा के पास पढ़ने बैठा है। पापा के हाथ में एक किताब है जिसमें बहुत सारे चित्र हैं। पापा पढ़ते जाते हैं, “बेटा देखो ये डाँक्टर, ये कोब्लर, ये पुलिस, ये टेलर, ये बार्बर, ये टीचर इत्यादि।” बच्चा उनके मुँह से सुनता है और दोहराता है।अचानक से जब वे डाँक्टर शब्द पर पहुचते हैं तो ये शब्द ही उन्हे जैसे घेर लेता है। इस शब्द से वे निकल ही नहीं पाते।बार-बार इस शब्द को सूरज के दिमाग में ठूंसना चाहते हैं।तुरंत पूछ बैठते हैं, “तुम बड़े होकर क्या बनोगे सूरज?” फिर अपने आप वे ही उत्तर भी देते हैं,  “डाँक्टर... मेरा राजा बेटा डाँक्टर बनेगा! इंजेक्शन लगाएगा, आला लगाएगा।” 

उसके बाद से ही उस बच्चे से अगर कोई पूछता या स्कूल में टीचर जब भी पूछती है कि बड़े होकर तुम क्या बनोगे तो वह यही कहता है कि वो डाँक्टर बनेगा। सूरज के ही जैसे और भी कई बच्चे हैं जो या तो डॉक्टर बनना चाहते है या इंजीनियर।शिक्षक कोई नहीं बनना चाहता। ये उनके माँ बाप की इच्छाएं हैं जो अपने बच्चों के माथे मढ़ दिए हैं ।टीचर ने एक दिन कक्षा में पूछ ही लिया बच्चों से, “बच्चों! तुम लोग बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?”  सब बच्चे एक  ही उत्तर दे रहे थे, डॉक्टर... इंजीनियर... तब टीचर ने मन ही मन चिंतित होकर सवाल किया, अगर इन लोगों मे से कोई भी टीचर बनना पसंद नहीं करेगा तो इनके आने वाले बच्चों को डाँक्टर, इंजिनीयर बनाएगा कौन।

क्या बनोगे तुम

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