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लैला (भाग १)
लैला (भाग १)
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© Munshi Premchand

Classics

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यह कोई न जानता था कि लैला कौन है, कहां है, कहां से आयी है और क्या करती है। एक दिन लोगों ने एक अनुपम सुंदरी को तेहरान के चौक में अपने डफ पर हाफिज की एक गजल झूम-झूम कर गाते सुना – 

रसीद मुजरा कि ऐयामें गम न ख्वाहद मांद, 

चुनां न मांद, चुनीं नीज हम न ख्वाहद मांद। 

और सारा तेहरान उस पर फिदा हो गया। यही लैला थी। 

लैला के रुप-लालित्य की कल्पना करनी हो तो ऊषा की प्रफुल्ल लालिमा की कल्पना कीजिए, जब नील गगन, स्वर्ण-प्रकाश से संजित हो जाता है, बहार की कल्पना कीजिए, जब बाग में रंग-रंग के फूल खिलते हैं और बुलबुलें गाती हैं। 

लैला के स्वर-लालित्य की कल्पना करनी हो, तो उस घंटी की अनवरत ध्वनि की कल्पना कीजिए जो निशा की निस्तब्धता में ऊंटों की गरदनों में बजती हुई सुनायी देती हैं, या उस बांसुरी की ध्वनि की जो मध्यान्ह की आलस्यमयी शांति में किसी वृक्ष की छाया में लेटे हुए चरवाहे के मुख से निकलती है। 

जिस वक्त लैला मस्त होकर गाती थी, उसके मुख पर एक स्वर्गीय आभा झलकने लगती थी। वह काव्य, संगीत सौरभ और सुषमा की एक मनोहर प्रतिमा थी, जिसके सामने छोटे और बड़े, अमीर और गरीब सभी के सिर झुक जाते थे। सभी मंत्रमुग्ध हो जाते थे, सभी सिर धुनते थे। वह उस आनेवाले समय का संदेश सुनाती थी, जब देश में संतोष और प्रेम का साम्राज्य होगा, जब द्वंद्व और संग्राम का अन्त हो जायगा। वह राजा को जगाती और कहती, यह विलासिता कब तक, ऐश्वर्य-भोग कब तक? वह प्रजा की सोयी हुई अभिलाषाओं को जगाती, उनकी हृत्तत्रियों को अपने स्वर से कम्पित कर देती। वह उन अमर वीरों की कीर्ति सुनाती जो दीनों की पुकार सुनकर विकल हो जाते थे, उन विदुषियों की महिमा गाती जो कुल-मर्यादा पर मर मिटी थीं। उसकी अनुरक्त ध्वनि सुन कर लोग दिलों को थाम लेते थे, तड़प जाते थे। 

सारा तेहरान लैला पर फिदा था। दलितों के लिए वह आशा की दीपक थी, रसिकों के लिए जन्नत की हूर, धनियों के लिए आत्मा की जाग्रति और सत्ताधारियों के लिए दया और धर्म का संदेश। उसकी भौहों के इशारे पर जनता आग में कूद सकती थी। जैसे चैतन्य जड़ को आकर्षित कर लेता है, उसी भांति लैला ने जनता को आकर्षित कर लिया था। 

और यह अनुपम सौंदर्य सुविधा की भांति पवित्र, हिम के समान निष्कलंक और नव कु सुम की भांति अनिंद्य था। उसके लिए प्रेम कटाक्ष, एक भेदभरी मुस्कान, एक रसीली अदा पर क्या न हो जाता–कंचन के पर्वत खड़े हो जाते, ऐश्वर्य उपासना करता, रियासतें पैर की धूल चाटतीं, कवि कट जाते, विद्वान घुटने टेकते; लेकिन लैला किसी की ओर आंख उठाकर भी न देखती थी। वह एक वृक्ष की छांह में रहती भिक्षा मांग कर खाती और अपनी हृदयवीणा के राग अलापती थी। वह कवि की सूक्ति की भांति केवल आनंद और प्रकाश की वस्तु थी, भोग की नहीं। वह ऋषियों के आशीर्वाद की प्रतिमा थी, कल्याण में डूबी हुई, शांति में रंगी हुई, कोई उसे स्पर्श न कर सकता था, उसे मोल न ले सकता था। 

एक दिन संध्या समय तेहरान का शहजादा नादिर घोड़े पर सवार उधर से निकला। लैला गा रही थी। नादिर ने घोड़े की बाग रोक ली और देर तक आत्म–विस्मृत की दशा में खड़ा सुनता रहा। गजल का पहला शेर यह था– 

मरा दर्देस्त अंदर दिल, गोयम जवां सोजद,

बगैर दम दरकशम, तरसन कि मगजी ईस्तख्वां सोजद। 

फिर वह घोड़े से उतर कर वहीं जमीन पर बैठ गया और सिर झुकाये रोता रहा। तब वह उठा और लैला के पास जाकर उसके कदमों पर सिर रख दिया। लोग अदब से इधर-उधर हट गये। 

लैला ने पूछा -तुम कौन हो?

नादिर—तुम्हारा गुलाम। 

लैला—मुझसे क्या चाहते हो?

नादिर –आपकी खिदमत करने का हुक्म। मेरे झोपड़े को अपने कदमों से रोशन कीजिए। 

लैला—यह मेरी आदत नहीं 

शहजादा फिर वहीं बैठ गया और लैला फिर गाने लगी। लेकिन गला थर्राने लगा, मानो वीणा का कोई तार टूट गया हो। उसने नादिर की ओर करुण नेत्रों से देख कर कहा- तुम यहां मत बैठो। 

कई आदमियों ने कहा- लैला, हमारे हुजूर शहजादा नादिर हैं। 

लैला बेपरवाही से बोली–बड़ी खुशी की बात है। लेकिन यहां शहजादों का क्या काम? उनके लिए महल है, महफिलें हैं और शराब के दौर हैं। मैं उनके लिए गाती हूँ, जिनके दिल में दर्द है, उनके लिए नहीं जिनके दिल में शौक है। 

शहजादा न उन्मत्त भाव से कहा–लैला, तुम्हारी एक तान पर अपना सब-कुछ निसार कर सकता हूं। मैं शौक का गुलाम था, लेकिन तुमने दर्द का मजा चखा दिया। 

लैला फिर गाने लगी, लेकिन आवाज काबू में न थी, मानो वह उसका गला ही न था। 

लैला ने डफ कंधे पर रख लिया और अपने डेरे की ओर चली। श्रोता अपने-अपने घर चले। कुछ लोग उसके पीछे-पीछे उस वृक्ष तक आये, जहां वह विश्राम करती थी। जब वह अपनी झोंपड़ी के द्वार पर पहुंची, तब सभी आदमी विदा हो चुके थे। केवल एक आदमी झोपड़ी से कई हाथ पर चुपचाप खड़ा था। 

लैला ने पूछा–तुम कौन हो?

नादिर ने कहा–तुम्हारा गुलाम नादिर। 

लैला–तुम्हें मालूम नहीं कि मैं अपने अमन के गोशे में किसी को नहीं आने देती?

नादिर—यह तो देख ही रहा हूं। 

लैला –फिर क्यों बैठे हो?

नादिर–उम्मीद दामन पकड़े हुए हैं। 

लैला ने कुछ देर के बाद फिर पूछा- कुछ खाकर आये हो? 

नादिर–अब तो न भूख है ना प्यास

लैला–आओ, आज तुम्हें गरीबों का खाना खिलाऊं, इसका मजा भी चखा लो। 

नादिर इनकार न कर सका। बाज उसे बाजरे की रोटियों में अभूत-पूर्व स्वाद मिला। वह सोच रहा था कि विश्व के इस विशाल भवन में कितना आनंद है। उसे अपनी आत्मा में विकास का अनुभव हो रहा था।

जब वह खा चुका तब लैला ने कहा–अब जाओ। आधी रात से ज्यादा गुजर गयी। 

नादिर ने आंखो में आंसू भर कर कहा- नहीं लैला, अब मेरा आसन भी यही जमेगा। 

नादिर दिन–भर लैला के नगमे सुनता गलियों में, सड़को पर जहां वह जाती उसके पीछे पीछे घूमता रहाता। रात को उसी पेड़ के नीचे जा कर पड़ा रहता। बादशाह ने समझाया मलका ने समझाया उमर ने मिन्नतें की, लेकिन नादिर के सिर से लैला का सौदा न गया जिन हालो लैला रहती थी उन हालो वह भी रहता था। मलका उसके लिए अच्छे से अच्छे खाने बनाकर भेजती, लेकिन नादिर उनकी ओर देखता भी न था--

लेकिन लैला के संगीत में जब वह क्षुधा न थी। वह टूटे हुए तारों का राग,था जिसमें न वह लोच थ न वह जादू न वह असर। वह अब भी गाती थीर सुननेवाले अब भी आते थे। लेकिन अब वह अपना दिल खुश करने को गाती थी और सुननेवाले विह्वल होकर नही, उसको खुशकरने के लिए आते थे। 

इस तरह छ महीने गुजर गये। 

एक दिन लैला गाने न गयी। नादिर ने कहा–क्यों लैला आज गाने न चलोगी? 

लैला ने कहा-अब कभी न जाउंगा। सच कहना, तुम्हें अब भी मेरे गाने में पहले ही का-सा मजा आता है?

नादिर बोला–पहले से कहीं ज्यादा। 

लैला- लेकिन और लोग तो अब पंसद नहीं करते। 

नादिर–हां मुझे इसका ताज्जुब है।

लैला–ताज्जुब की बात नहीं। पहले मेरा दिल खुला हुआ 

था उसमें सबके लिए जगह थी। वह सबको खुश कर सकता था। उसमें से जो आवाज निकलती थी, वह सबके दिलो में पहुचती थी। अब तुमने उसका दरवाजा बंद कर दिया। अब वहां तुम्हारे सिवा और किसी के काम का नहीं रहा। चलो मै तुम्हारे पीछे पीछे चलुगी। आज से तुम मेरे मालिक हो होती हूं चलो मै तुम्हारे पीछे पीछे चलूगा। आज से तूम मेरे मालिक हो। थोडी सी आग ले कर इस झोपड़ी में लगा दो। इस डफ को उसी में जला दुंगी।

तेहरान में घर-घर आनंदोत्सव हो रहा था। आज शहजादा नादिर लैला को ब्याह कर लाया था। बहुत दिनों के बाद उसके दिल की मुराद पुरी हुई थी सारा तेहरान शहजादे पर जान देता था। और उसकी खुशी में शरीक था। बादशाह ने तो अपनी तरफ से मुनादी करवा दी थी कि इस शुभ अवसर पर धन और समय का अपव्यय न किया जाय, केवल लोग मसजिदो में जमा होकर खुदा से दुआ मांगे कि वह और बधू चिरंजीवी हो और सुख से रहें। लेकिन अपने प्यारे शहजादे की शदी में धन और धन से अधिक मूल्यवान समय का मुंह देखना किसी को गवारा न था। 

रईसो ने महफिलें सजायी। चिराग। जलो बाजे बजवाये गरीबों ने अपनी डफलियां संभाली और सड़कों पर घूम घूम कर उछलते कूदते। फिरे। 

संध्या के समय शहर के सारे अमीर और रईस शहजादे को बधाई से चमकता और मनोल्लास से खिलता हुआ आ कर खड़ा हो गया। 

काजी ने अर्ज की–हुजुर पर खुड़स की बरकत हो। 

हजारों आदमियों ने कहा- आमीन! 

शहर की ललनाएं भी लैला को मुबारकवाद देने आयी। लैला बिल्कुल सादे कपड़े पहने थी। आभूषणों का कहीं नाम न था।

एक महिला ने कहा–आपका सोहाग सदा सलामत रहे। 

हजारों कंठों से ध्वनि निकली–आमीन!’

कई साल गुजर गये। नादिर अब बादशाह था। और लैला। उसकी मलका। ईरान का शासन इतने सुचारु रूप से कभी न हुआ था। दोनों ही प्रजा के हितैषी थे, दोनों ही उसे सुखी और सम्पन्न देखना चाहते थे। प्रेम ने वे सभी कठिनाइयां दूर कर दी जो लैला को पहले शंकित करती रहती थी। नादिर राजसता का वकील था, लैला प्रजा–सत्ता की लेकिन व्यावारिक रुप से उनमें कोई भेद न पड़ता था। कभी यह दब जाता, कभी वह हट जाती। उनका दाम्पत्य जीवन आर्दश था। नादिर लैला का रुख देखता था, लैला नादिर का। काम से अवकाश मिलता तो दोनो बैठ कर गाते बजाते, कभी नादियों को सैर करते कभी किसी वृक्ष की छांव में बैठे हुए हाफिज की गजले पढते और झुमते। न लैला में अब उतनी सादगी थी न नादिर में अब उतना तकल्लुफ था। नादिर का लैला पर एकाधिपत्य थ जो साधारण बात न थी। जहां बादशाहो की महलसरा में बेगमों के मुहल्ले बसते,थे, दरजनो और कैडियो से उनकी गणना होती थीवहा लैला अकेली थी। उन महलो में अब शफखाने, मदरसे और पुस्तकालय थे। जहां महलसरो का वार्षिक व्यय करोडों तक पहुंचता था, यहां अब हजारों से आगे न बढता था। शेष रुपये प्रजा हित के कामों में खर्च कर दिये जाते,थे। यह सारी कतर व्योत लैला ने की थी। बादशाह नादिर था, पर अख्तियार लैला के हाथों में था। 

सब कुंछ था, किंतु प्रजा संतुष्ट न थी उसका असंतोष दिन दिन बढता जाता था। राजसत्तावादियों को भय था। कि अगर यही हाल रहा तो बादशाहत के मिट जाने में संदेह नहीं। जमशेद का लगाया हुआ वृक्ष जिसने हजारों सदियें से आधी और तुफान का मुकाबिला किया। अब एक हसीना के नाजुक पर कातिल हाथों जड़ से उखाड़ा जा रहा है। उधर प्रजा सत्तावादियों कोलैला से जितनी आशाएं,थी सभी दुराशांएं सिद्ध हो रही थीं वे कहते अगर ईरान इस चाल से तरक्की केरास्ते पर चलेगा तो इससे पहलेकि वह मंजिले मकसूद पर पहुंचे, कयामत आ जायगी। दुनिया हवाई जहाजपर बैठी उड़ी जा रही है। और हम अभी ठेलो पर बैठते भी डरते है कि कहीं इसकी हरकत से 

दुनिया में भूचाल न आ जाय। दोनो दलो में आये दिन लडाइयों होती रहती थी। न नादिर के समझाने का असर अमीरो पर होता था, न लैला के समझाने का गरीबों पर। सामंत नादिर के खून के प्यासे हो गये, प्रज्ञा लैला की जानी दुश्मन।

राज्य में तो यह अशांति फैली हुईथी, विद्रोह की आग दिलों में सुलग रही थीा। और राजभवन में प्रेम का शांतिमय राज्य था, बादशाह और मलका दोनो प्रजा -संतोष की कल्पना में मग्न थे। 

रात का समय था। नादिर और लैला आरामगाह में बैठे हुए, शतरंज की बाजी खेाल रहे थे। कमरे में कोाई सजावट न थी, केवल एक जाजिम विछी हुई थी।

नादिर ने लैला का हाथ पकड़कर कहा- बस अब यह ज्यादती नहीं,उ तुम्हारी चाल हो चुंकी। यह देखों, तुम्हारा एक प्यादा पिट गया। 

लैला ‘ अच्छा यह शह। आपके सारे पैदल रखे रह गये और बादशाह को शह पड गयी। इसी पर दावा था। 

नादिर –तुम्हारे हाथ हारने मे जो मजा है, वह जीतने में नहीं।

लैला-अच्छा, तो गोया आप दिल खुश कर रहे है।‘ शह बचाइए, नहीं दूसरी चाल में मात होती। 

नादिर–(अर्दब देकर) अच्छा अब संभल जाना, तुमने मेरे बादशाह की तौहीन की है। एक बार मेरा फर्जी उठा तो तुम्हारे प्यादों का सफाया कर देगा। 

लैला-बसंत की भी खबर है। आपको दो बार छोड़ दिया, अबकी हर्गिज न छोडूंगी।

नादिर-अब तक मेरे पास दिलराम (घोड़ा) है, बादशाह को कोई गम नहीं

लैला – अच्छा यह शह? लाइए अपने दिलराम को।’ कहिए अब तो मात हुई?

नादिर-हां जानेमन अब मात हो गयी। जब मैही तुम्हारी आदाओं पर निसार हो गया तब मेरा बादशाह कब बच सकता था। 

लैला–बातें न बनाइए, चुपके से इस फरमान पर दस्तखत कर दीजिए जैसा आपने वाद किया था।

यह कह कर लैला ने फरमान निकाला जिसे उसने खुद अपने मोती के से अक्षरो से लिखा था। इसमे अन्न का आयात कर घटाकर आधा कर दिया गया, था। लैला प्रजा को भूली न थी, वह अब भी उनकी हित कामना में संलग्न रहती थी। नादिर ने इस शर्त पर फरमान पर दस्तखत करने का वचन दिया था कि लैला उसे शतरंज में तीन बार मात करे। वह सिद्धहस्त खिलाड़ी था इसे लैला जानती थी, पर यह शतरंज की बाजी न थी, केवल विनोद था। नादिर ने मुस्कारते हुए फरमान पर हस्ताक्षर कर दिये कलम के एक एक चिन्ह से प्रजा की पांच करोड़ वार्षिक दर से मुक्ति हो गयी। लैला का मुख गर्व से आरक्त हो गया। जो काम बरसों के आन्दोलन से न हो सकता था, वह प्रेम कटाक्षों से कुछ ही दिनों में पुरा होगया।

यह सोचकर वह फूली न समाती थी कि जिस वक्त वह फरमान सरकारी पत्रे मं प्रकाशित हो जायेगा। और व्यवस्थापिका सभा के लोगो को इसके दर्शन होंगें, उस वक्त प्रजावादियों को कितना आनंद होगा। लोग मेरा यश गायेगें और मुझे आशीवार्द देगे।

नादिर प्रेम मुग्ध होकर उसके चंद्रमुख की ओर देख रहा था, मानो उसका वश होता तो सौदंर्य की इस प्रतिमा को हृदय में विठा लेता।

मुंशी प्रेमचंद उत्कृष्ट रचना लैला शहज़ादा

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