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अंदाज़ अपना अपना
अंदाज़ अपना अपना
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© Naresh Kumar Behera

Inspirational

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हज्रत "फ़तिमा" से रिवायत है कि "रसुलल्लाह" फर्माते है जो शक्स दिन की मसरुफ़ियत से थक जाता है वो सोते वक्त तैंतिस बार "सुभानल्लाह", तैंतिस बार "अलहम्दुलिल्लाह", चौंतिस बार "अल्लाहु अकबर" पढने से दिन भर की थकान मिट जाती है और बहुत आराम से सोया जा सकता है।" 

मेरे एक क़रीबी दोस्त को ये मैंसेज पढ कर बहुत ही अच्छा लगा। क्योंकि पहली बार किसी शख्स ने ऐसे मैंसेज भेजे हैं, नहीं तो बस मज़ाक, चुट्कुले, शायरी भेजते रहते हैं। लेकिन इनका एस.एम.एस. पाकर मुझे ऐसा लगा, चलो कोई तो एक बन्दा निकला जो खुदा की कद्र करता है, अपना धर्म का मान रख रहा है। नहीं तो आजकल धर्म के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है उसे सुनना या देखना अशोभनीय है। करीब एक हफ्ते पहले ही गणेश जी का विसर्जन हुआ था और फिर रमज़ान का महीना शुरु हो गया। गणेश पुजा के दौरान कि एक बात बताना चाहता हुँ। एक दिन शाम को जब मैं आफिस से लौटा तो देखा कि मेरे घर के सामने वाले घर के सामने, यानी की दरवाज़े पर बहुत भीड़ लगी थी, कुछ ज़ोर से आवाज़ें भी आ रही थी। मैंने सोचा जाके ज़रा पूछ लुँ, आखिर क्या माजरा है? फिर सोचा, अरे रहने दो। क्यों कि एक घन्टा रोज बस में सफ़र करके आने के बाद कुछ भी देखने या जानने का मन नहीं करता। बस थोड़ा सा नहा धो लो, और आराम करो। 

आखिर थोड़ी ही देर बाद कुछ लोगों को मेरे दरवाज़ें के पास आने का एहसास हुआ। क्योंकि मैं चौथी मंजिल में रहता हुँ और वहाँ कोई आता भी नहीं। तभी किसि ने दरवाज़ा खटखटया और बोला- भाई साहब... ऐक्सक्युज़ मि सर! जब मैंने दरवाजा खोला और देखा- अरे ये तो शायद वही लोग हैं जो उनके घर के सामने कुछ अजीब से पेश आ रहे थे। "हाँ, बताइए- क्या बात है?" मैंने पूछा तो एक ने बोला, जो सामने था- "हमारी ग़ली में गणेश जी की पुजा हो रही है, इसलिए कुछ चन्दा दिजीए।" हाँ, क्युं नहीं, एक मिनट ठहरिए- कहकर मैं अन्दर आया। पर्स में देखा तो- एक बीस का, एक पचास का, और एक सो का नोट है। सोचा कितना दूँ- डेढ़ सौ दूँ या सौ दूँ। इतने बड़े फ्लैट में रहता है और इतनी कंजुसी। थोड़ा हडबडाया सोचने में और सोचा क्युं न उन्हीं से पूछ लूँ? बाहर निकला तो वो लोग बातचीत कर रहे हैं:- वह अपने आप को सोच क्या रही है? शाली, कुकुरमुत्ती... पुलीस-वाली की बीवी है तो चंदा नहीं देगी... बोलती है लाइसेंस ख़ारिज कर देगी... जैसे कि वो लाइसेंस का ठेका लेके बैठी है... आने दो उसके हसबेंड को... हम बात करेंगे... आखिर आठ साल से हम यहाँ पुजा करते हैं, हमारा भी अधिकार है चंदा मांगने का...। इतने में मैंने उनसे पुछा कि- भाईसाहब आप चंदा कितना ले रहे हैं? 

जीतना आप दे सकते हैं, आप की मर्ज़ी। वैसे तो मिनिमम पचास रु. है- उससे आगे आपकी मर्ज़ी- पाँच सौ, हजार, पाँच हजार तक भी दे सकते हैं। बट नो चैक, ओनली कैश। 

तब मैंने 101 रु. उनकी तरफ बढ़ा दिए और रसीद ले ली। सोचा-मामला कुछ तगड़ा है, पुलिस-वाले की बीवी के साथ झगड़ा करके आये हैं...जवान हैं...जोश अधिक है- ऐसे होता है। लेकिन, सौ-दो सौ चंदा देने में भी लोगों की कंजुसी? फिर उनसे बहस! क्या ज़रूरत है? उसने भी अपनी जवानी दिखा दी होगी- जवानों को। ऐसा ठीक नहीं है। साल में एक बार गणेशजी आते हैं। हर महिना थोड़े ही आते हैं! और उनकी आने की खुशी में थोड़ा नाच-गाना भी हो गया तो क्या हुआ? और मैं तो कहता हूँ, ये होना ही चाहिए। बारह महिनों में तेरह पुजा तो भारत में चली आ रही है। जिसकी वजह से आज हमारी संस्कृति अटल है। हर धर्म, हर मज़हब के लोग यहाँ पर मिलजुल कर अपनी-अपनी गाथा सुनाते हैं। हर खुशी-हर ग़म में भागीदार होते हैं। यही तो, एक ही देश है, जहाँ अनेकता में एकता का दर्शन होता है। और इसी को बनाय रखना भी हम सभी का कर्तव्य है। न कि इस को मिटाना। भारतीय संविधान में भी सभी धर्मों को समान अधिकार दिया गया है। यहाँ हर किसी को अपने-अपने दिवस मनाने में कोई पाबंदी नहीं है। परंतु इसका ग़लत इस्तेमाल करना- अपनी माँ का चीर हरण करना ही जैसा है। ऐसे लोगों को कदापि इस मिट्टी में रहने का अधिकार ही नहीं देना चाहिए। जो कि धर्म, पुजा, पाठ आदि के नाम पर अपनी संस्कृति, अपनी सभ्यता का उल्लंघन करते हैं। अपने ही देश की मिट्टी पर दुसरों का नंगा नाच देखते हैं। विदेशी वस्त्रों का इस्तेमाल तो करते हैं। अपनी माँ का साडी चीर के, अपनी छाती और जांघ दिखाने का वस्त्र निर्माण करते हैं। धिक्कार है ऐसे लोगों को, और ऐसी नियत पर। 

उसी हफ़्ते, इतवार के दिन, पास के स्कूल ग्राउंड में, हमारे गणेश पुजा कमीटि के युवाओं ने रिकार्ड डांस का आयोजन किया था। मैंने अपने नये मित्र सुन्दरजी से पूछा- क्या भाई, पुजा के नाम पर ये रिकार्ड डांस कितना उचित या अनुचित है आप ही बताइये? मैं तो यहाँ नया हूँ, क्या हर साल ये बच्चे ऐसे प्रोग्राम करते हैं? 

-पिछले दो साल तो मैलोडी-प्रोग्राम हुआ था। उससे पहले एक बार डांस प्रोग्राम हुआ था। और ये चौथा कार्यक्रम है। सुना है इस बार अच्छे डांसर बाहर से बुलाये गये हैं। और टिकट है 50 रु. का। 
-पचास रुपया तो बहुत कम है... पर ये कितने दिनों तक चलेगा? 
-बस दो ही दिन। दिन में चार शो। और एक शो देढ़ घंटे का। 
-प्रोग्राम के बारे में तो पुरा ज्ञान है आपको! लगता है आप बहुत शौक़ रखते हैं इन सब में। तब तो आप ज़रूर देखने जायेंगे? 
-हाँ क्यों नहीं? हमारे ही बच्चों का शो है। न गये तो बुरा मानेंगे। और मुझे तो पास भी दिये हैं। अगर आप चाहे तो आप भी आ सकते हैं, मेरे साथ- बिल्कुल मुफ़्त में... 
-ठीक है। पर डांस प्रोग्राम तो मैंने कभी देखा नहीं है, न ही मुझे दिलचस्पी है। मुझे तो गाना सुनना या जो टी.वी पर गाने के प्रोग्राम आते हैं, वही देखना पसंद है। 
-फ़िर भी। अगर शाम को आप फ़्री है, तो मुझे एक मि़स कॉल दे दिजिए। हम और आप मिलके चले जायेंगे देखने के लिये। देढ़ घंटे का ही तो शो है, युं ही चला जायेगा... और पैसे थोड़ी लगेंगे? 

आखिर उसी दिन शाम हम और सुन्दर निकल पड़े प्रोग्राम देखने। टी.वी. में तो अनेक कार्यक्रम आजकल होते हैं, जिसे देखने के लिये हमारे पास फ़ुर्सत ही क्या, टी.वी. ही नहीं है। और आज लाईव शो देखने का मौका मिला है। जो कि मेरे जीवन का पहला और आखिरी लाईव प्रोग्राम रहेगा। मेरा कहने का मतलब ये घटना-लुम्बिनि पॉर्क या गोकुल चॉट जैसा भयानक तो था नहीं। वैसा होता तो और भी अच्छा होता-खुदा के पास होता। ये तो उससे भी कई ज़्यादा भयानक निकला। ये ऐसे हुआ- शाम का मौसम थोड़ा भिगा था, बूँद-बूँद बारिश भी होने लगी थी। फिर भी हम दोनो निकले- शो के लिये। ऐन्ट्री पास रहने के कारण हमें वी.आई.पी. स्थान में बैठने का मौका मिला। शो का प्रारंभ तो बहुत ही अच्छा रहा। होस्ट बहुत ही रोमांचक बना रहे थें शो-को। एक आईटम- फिर दुसरा आईटम- फिर तीसरा शुरु होने ही वाला था कि कुछ बच्चे चिल्लाने लगे- ए... बन्द करो ये सब! ये देखने के लिए हम सब यहाँ पर नहीं आये... असली माल दिखाओ...असली... बहुत हो गया... और टाईम वेस्ट मत करो हमारा... बुलओ अपने मैनेजर को... हम बात करेंगे उससे...। 

मैंने सोचा, अरे ये किस माल की बात कर रहे हैं? अभी तक जो हुआ, ठीक ही तो था। फिर ये चिल्ला क्युं रहे हैं? तब मैंने उठकर उन बच्चों से कहा जो चिल्ला रहे थे- अरे भाई साहब, आप थोड़ा शांत रहेंगे, कृपया शो देखने दिजिए। उधर से आवाज़ आई- ऐ मामुँ, चुपचाप बैठ जा... इस उम्र में इतनी आवाज़ ठीक नहीं। असली शो तो अभी शुरु होगा... चुपचाप बैठ। ऐ...शुरु करो रे...। 

सुन्दर ने मेरा हाथ खींच लिया कुछ कहने से पहले ही और बोला - अरे ये बच्चें हैं, उनका कुछ पसंदिया गाना बजाने के लिये कह रहे होंगें। 

उसके बाद जो शो चला वही था असली शो- उनके लिए। न की मेरे लिए। स्टेज पर कुछ विदेशी नर्तकियाँ और कुछ भारतीय नर्तकियाँ आने लगी एक के बाद एक और हर गाने में नाचते-नाचते अपने सारे वस्त्र उतार के चले जाते... जब वह बिना वस्त्र के अपने अंगों को हिलाते, युवाओं की खुशी की सीमा न रहती, उनकी सीटी की आवाज़ से तो मेरा कान के परदे हिलने लगे। सुन्दर की तरफ देखा तो वो एकदम अबाक से मुँह खोले देख रहा था, तब कहने लगा- "अरे ये सब क्या है? मुझसे ये सब देखा नहीं जानता।" तब मैंने कहा- "तो मुँह खोलके क्या देख रहा है? ये पेड़ के आम नहीं है, अंगुर के रस नहीं है जो तेरे मुँह में आ के गिर जायेंगे। तुमने ही तो मुझे कहा था ना रिकार्ड डांस है... अजी ये नेकेड डांस है। रिकर्ड डांस नहीं। मैं तो चला यहाँ से अब आप भी जल्द आ जाओ। बैठे-बैठे कुछ तो रस मिलेगा नहीं... खुद का रस बह जायेगा।" 

बस मैं खीसक गया वहाँ से। बाहर आकर एक ठंडी आह ली, बारिश हो रही थी। सोचा दो मिनट प्रतिक्षा की जाये- शायद सुन्दर भी आ जाये। लेकिन व्यर्थ। टेंट के बाहर कोई भी नहीं था। आश्चर्य हुआ इन नंगा नाच का कार्यक्रम देखने के लिए प्रशासन भी कितना आग्रह है। वहाँ, बाहर एस.पी. की गाड़ी, एम.एल.ए. की और कई बड़े-बड़े अधिकारियों की गाडी की लम्बी लाईन लगी थी। सुरक्षाबल के सभी कर्मचारी भी अंदर घुस गये थे। बाहर एकदम सन्नाटा। जैसे कि सबको साँप सुंघ गया हो। लेकिन ठीक इसका विपरीत माहौल अंदर का था। घर आते आते कुछ क्षण सोचने लगा- अगर मैं अल-कायदा या किसी आतंकवादी संगठन का आदमी होता तो पहले मैं यहाँ पर बमफोड़ता, न कि मंदिरों में, मस्जिदों में या गीर्जाघरों में। वहाँ तो कई-कभार एक-दो पापी मिलेंगे। लेकिन ये जगह तो पुरे पापियों का भण्डार हैं। धर्म के नाम पर, पुजा के नाम पर अपनी संस्कृति और सभ्यता का नामों-निशान मिटाने पर जुटे हुए हैं। घृणा है ऐसी पुजा, ऐसी सम्प्रदाय पर और धिक्कार है ऐसे लोगों को। 

लोग कहते हैं, कवल धर्म ही जाति की बृद्धि का कारण है। ये तो ठीक है, परंतु यह धर्मांकुर जो मानव जाति का निर्माण करता है, इस असभ्य, कमीने और पापमय जीवन की गंदी नाली से कभी नहीं उगता। बुद्ध मंदिरों या गिर्जा घरों की मोमबतियों की रोशनी से जापान या एशियाई देश इतने उच्चस्तर पर नहीं पहुंचे हैं। भारत के कई वर्ष बाद स्वाधिनता पाकर भी जापान भारत से आगे चला गया है। क्योंकि ये उनकी कठोर जीवन और तपस्या बल के कारण ही है न कि ऐसे देहलोलुपियों की वजह से जो धर्म के नामपर लोगों को चुना लगाते हैं, लूटते हैं। मैं तो कहता हूँ, भारत में आज जो कुछ भी है वह अंग्रेज़ों का झुठा दाना है। नहीं तो अंग्रेज़ों से पहले यहाँ कई राजा-महाराजाओं का अत्याचार चलता रहा और आज इन महानुभवी मंत्रियों का। और हमारे जैसे कुछ लोगों की वजह से जो चंदा दे-देकर ऐसे पाप-कर्मों को बढ़ावा देते हैं उसी का कारण है- ये देश-भर में बढती जगह जगह पर अन्याय-अत्याचार, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, महंगाई, मिलावट आदि का दर्शन। 

भारत में दो-सौ वर्ष की अंग्रेज़ों का शासन और उससे पहले भी कई राजा महाराजाओं का शोषण से तो भारत एक बिना माँस वाला काया जैसा ही था। और इस कंकाल शरीर को अगर जीवीत किये हैं तो वो हैं, इस मिट्टी में जन्म लेने वाले कई धार्मिक महापुरुष। जैसे- संत गौतम बुद्ध, संत महावीर, ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती, संत शेख फ़रिद, संत नामदेव, संत रामानंद, संत कबीर, संत एकनाथ, संत गुरु नानकदेव, संत चैतन्य महाप्रभु, संत तुलसीदास, प्रेम दीवानी मीरा, संत दादू दयाल, संत तुकाराम आदि। 

और आधुनिक युग के संत स्वामी दयानन्द सरस्वती, राजा राममोहन राय, संत रामलिंगर (वल्लल्लार), श्री रामकृष्ण परमकृष्ण, संत स्वामी विवेकानन्द, शिरडी साई बाबा, श्री आरोबिन्दो, डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर, श्री नारायण गुरु, महात्मा गांधी, श्री सत्य साई बाबा, स्वामी शिवानन्द, ठाकुर श्री श्री अनुकूलचन्द्र, भगवान स्वामीनारायण, श्री श्री श्री तिरुचि स्वमिगल, ब्रह्मकुमारी, माता अमृतानन्दमयी (अम्मा), राधास्वामी, सदगुरु श्री श्री रविशंकरजी, संत श्री आसाराम बापू जैसे कई महान आत्माएँ जो कि इस साश्वत और पवित्र भूमि पर जन्म लेकर हम सभी को धर्म का हिस्सा बनाने में कामया़ब हुए हैं। और इन्हीं महापुरुषॊं की वजह से ही आज हमारा देश आगे की और चल रहा है। इन सभी का अंदाज़ या तरीका अलग-अलग क्यों न हो जैसे- कोई शिव को, कोई राम को, कोई अल्लाह को, कोई ईसा मसिह को अपना दिव्य मानकर पुजते हैं। लेकिन सबकी मंज़िल एक ही है- एक ही खुदा, एक ही ईश्वर। एक परमेश्वर और एक मानवजाती। 

मनुष्य का धर्म है- जीयो और जीने दो। जीने के लिए अन्न के सिवाय कुछ और भी आवश्यक है, वह है ज्ञान, सदाचार और आचरण। बिना ज्ञान का मनुष्य पशुतुल्य है। क्योंकि मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसे ऊपरवाले ने ज्ञान दिया है, बुद्धि दी है सोचने और विचारने के लिये। नहीं तो वह भी पशु की भांति कुछ भी अनाब-शनाब खाता और जहाँ-तहाँ सो जाता। रिश्तें-नाते, अपना-पराया, भाई-बहन, पति-पत्नी, मान-मर्यादा, प्रेम-द्वेष कुछ भी न रहता। विदेशी सभ्यता मे जो हो रहा है, वह आज यहाँ भी दिखने लगा है- भाई-बहन का जो पवित्र बंधन, वह आज दृढ नहीं है। उनमें भी अनैतिक और दैहिक संबंध दिखाई दे रहा है। केवल क्षणिक सुख के लिये ही। जो पिता अपने बेटी की उम्र कि लड़की से शादी करता है। वह भी कुछ माह या साल के लिए। पता भी नहीं वह अपनी ही किसी पुर्व प्रेयसी की बेटी ही होगी। ऐसे कई उदाहरण जो आजतक विदेशों में मिलते थे, आजकल वह यहाँ भी दिखाई देने लगे हैं। 

दो साल पहले की ही बात है, जब मैं कुछ ही महीनों के लिये दिल्ली गया हुआ था। तभी अपने मित्रों के साथ किसी शनिवार को या कभी कभी किसी की जन्म-दिवस के अवसर पर पार्टियों में जाने का मौका मिला था। तब मुझे एहसास हुआ कि हमारी संस्कृति अब हमारी नहीं रही। तब हम थे तो दिल्ली में ही, परंतु ऐसा लग रहा था की यह भारत की राजधानी नहीं है। जहाँ पर बाप और बेटी, भाई और बहन या बेटा अपनी मां के साथ हाथों में शराब का गिलास लिए ठुमका मार रहे थे। अंधेरे मे जो डांस का म्युजिक चल रहा था। पता नहीं कौन किसके बाहों में, छाती पर और किसी की कमर पर हाथ डाले नाच रहे थे। और ये सब देखकर हमारा दिल्ली में दिल नहीं लगा और तुरंत कुछ ही दिनों में हम लौट आये थे। उसी दौरान की बात है - जब हम अपने मित्रों के साथ हरिद्वार और ऋषिकेश की यात्रा पर गये हुए थे। कई पुराने पत्र-पत्रिकाऒं में हमने जो पढा था - बनारस, हरीद्वार और ऋषिकेश के पाखंडियॊं के बारे में, तभी हमने देख भी लिया। आश्चर्य हुआ, ऐसे पाखंडी लोगों को इतना धैर्य और साहस किसने दिया, ऐसे अपकर्म करने के लिए। पुरे हिन्दुस्तान का नाम बर्बाद कर रखा है इन कम्बख्तों ने। ब्राह्मण के नाम पर धब्बा है ऐसे लोग। सब के सब धोखेबाज-चोर-लुच्चे-लफ़ंगे हैं। 

शाम होने जा रहा था। जब हम हरीद्वार पहुँचे। वहाँ की गंगा की आरती जो टी.वी. पर देखा करते थे। हम ने तय किया, चलो सीधा गंगा किनारे चलते हैं। शाम तो हो रही है, आरती देख लेंगे फिर कमरा ले लेंगे। यह विचार करके हम चले गंगा आरती देखने। बहुत ही अविस्मरणीय था वो शाम और वह दृश्य गंगा जी का, ऐसे लग रही थी जैसे की स्वयं गंगा मैया शिवजी की जटा से उछल कर आ रही है। सुर्यास्त के साथ साथ दिपों की टिमटिमाहट से बढ रही आलोक से पुरा गंगा किनारा प्रज्वलित हो गया था। चारों तरफ़ दिपों की आलोक और बिजली की आलोक से आलोकित सचमुच किसी स्वर्ग की भांति और हरी का द्वार जैसा महसुस होने लगा था। आरती के बाद जब हम गंगा घाट से शहर की ओर निकले, तब एक ब्राह्मण पाखंडी से सामना हो गया। वह हमें कहने लगे- "महाशय, पुजा तो कर लिजिए। अच्छा महुर्रत है और हम आपका पुरा बन्दोबस्त भी कर देंगे। आपके रहने का, खाने का और उसका भी...।" 

-"अरे पंडितजी, वो उसका भी का क्या मतलब है?" 

हमने पुछा तो जवाब दिए- "क्युं शर्मिंदा करते हैं आप मुझे उलटा पुछ के अजी, जवान है आप, आप की सेवा करना तो हमारा धर्म है। अतिथि देवो भव:। और आप तो सही वक्त पर पधारे हैं। एकदम नयी माल आयी है ज्वालापुर से। और हम पंडितों की वजह से पुलिस का कोई टेंशन ही नहीं। आराम से रात गुज़ार सकते हैं और कल सुबह हो सके तो ऋषिकेश, देहरादून आदि घूम लेंगे। और कल की रहणी अगर ऋषिकेश में होगी, तो उसका बन्दोबस्त भी हम करवा देंगे। क्या कहते हैं महाशयजी?" 

मेरा तो दिमाग ग़रम हो गया ये सब सुनके। दिनभर तो लुटते रहते हैं यात्रियों से और शाम होने पर शुरु ये घटिया धंधा। तमाशा लगा रखा है इन कमिनों ने। मैंने उनसे विनयपुर्वक कहा- "पंडितजी, आपने अभी अभी जो व्याख्या सुनाई, कृपया वो ज़रा हमारे माता-पिता को बताए तो अच्छा होगा। वो ज़रा पीछे आ रहे हैं।" 

-"क्युं शर्मिंदा कर रहे हैं आप मुझे। ठीक है अभी नहीं तो फिर कभी। अगर आपका मन ललचाया, अगर...तो बेफ़िक्र मेरे पास आ जाईये। वो जो पुजा की सामग्री और कैसेट की दूकान है-वो हमारी है। वहाँ आकर रामलाल से, यानी की मुझसे मिलना है कहिए, ज़रूर मिलवा देंगे। नमस्कार।" 

-नमस्कार। 

सामने देवी का मंदिर और पिछॆ देवियों की मंडी। ठीक ही तो दिख रहा है अब यहाँ- कितनी तपस्या करलो, कितना तीर्थ करलो, कितना ध्यान, कितना प्राणायाम, कितनी बार हज, कितने साल रोज़ा, कितने व्रत, कितने उपवास, कितने गुरु, कितने संत, कितनी दीक्षा, कितनी शिक्षा करने से क्या फ़ायदा अगर अपना आचरण शुद्ध न हुआ तो ये घर घर की महाभारत कभी भी ख़त्म नहीं होगी। क्योंकी ये सब से सभी के हृदय पर जीवनव्यापी प्रभाव नहीं पड़ेगा- प्रभाव तो सदा सदाचरण का पड़ता है। साधारण ज्ञान, साधारण उपदेश की चर्चा तो हर गिर्जे, हर मंदिर और हर मस्जिद मे होते हैं। परंतु उनका प्रभाव तभी हम पर पड़ता है जब मंदिर का पुजारी स्वयं ब्रह्मर्षि होता है, मस्जिद का मुल्ला स्वयं पैगंबर और रसुल होता है, गिर्जे का पादरी स्वयं ईसा होता है। तब जाकर हमारा ये अमुल्य जीवन, ये मानव जन्म साकार हो सकता है। इसके अतिरिक्त तो कदापि नहीं। 

पिछले साल जब हम वल्लारी (कर्णाटक) में थे। तब मेरे कई मुसलमान दोस्त बन गये थे। जो आज भी मुझसे काफ़ी दिल्लगी से, प्यार से और कभी कभी खफ़ा होकर भी फ़ोन पर बात कर लिया करते हैं। जैसे कि- "आपका जाना हमारे लिए किसी ग़म की सरहद को पार करने का जैसा है... गुलशन में, गुलों की बाग़ में बिखरा हुआ गुलाब के जैसा हुँ मैं।" 

वल्लारी छोटा सा सहर है, पर महंगा बहुत है। वहाँ का रहन-सहन बैंगलुर से भी महंगा है। ये मेरा तजुर्बा कहता है। क्युं कि, उसी साल मेरे साथ और बारह कर्मचारी भी वल्लारी छोड़ चले आये थे। सिर्फ़ वहाँ कि महंगाई और घरों की ज़्यादा किराये की वजह से। एक बार मेरे अजीज़ दोस्त शाहरुख ताज के निमंत्रण से इद-उल-फ़ितर के अवसर उनके जुलुस में जाने का मौका मिला था। बहुत ही शांति-पूर्ण यात्रा था वह और उसी दिन किसी महिला प्रवचक से कई ज्ञान की बातॆं भी हमें सीखने को मिली, जो कि एक महिला सभा में भाषण दे रहे थे। वह बड़ी ही कट्टरपंथी महिला थी। उनका भाषण पुरी तरह उन मुसलमान महिलाओं के लिए था जो कि अपनी चाल-चलन और आधुनिक ढंग के रहन-सहन से अपनी संस्कृति और धर्म का अपव्यवहार करते हैं। आज कल के छोरों और छोरियों कि बात, जो पाँचों वक्त नमाज़ अदा करने की तो दूर की बात, एक बार भी मस्जिद जाना पसंद नहीं करते। जिनका कर्तव्य है सूरज उगने के बाद सूरज डूबने की सीमा तक बुर्खे का धारण करें... 
खुदा न करे मरने के पश्चात उनको कब्र नसी़ब न हो। पाश्चात्य सभ्यता और दूसरे धर्मों की मुखालफ़त करना हमारे क़ुरान में नहीं है। परंतु अपने धर्म का मान रखना, अपने कर्म में लगा रहना ही एक सच्चा मुसलमान का कर्तव्य है। ये शरिर मिट्टी से बना है और एक दिन मिट्टी में दफ़्न हो जायेगा। जिसके लिये तु इतना सज़-धज़ रहा है, जिसके प्रति तेरा इतना लोभ और मोह है, वह सब एक दिन ख़ाक में मिल जाएगा। दूसरों का दोष, दूसरों की खराबी, दूसरों की निन्दा करने में जितना समय तू व्यर्थ करता है, उतना समय तू अगर अपने चरित्र सुधारने में लगेगा, तो ये देश, ये संसार अपने आप ही सुधर जायेगा। सच्चा मुसलमान वही है जो ओलिया-ए-दीन पर चले, सुबह उठकर वजु करे, मुंह-हाथ, पांव धोकर नमाज़ अदा करे। जो सिर अपने मालिक के सम्मुख न झुके, उसे काटकर धड से अलग कर देना ही उचित है। 

माशा-अल्लाह, क्या सुकून था उस आवाज़ में। मेरे तो रोंयें खड़े हो गए और दिल पिघल कर आँसू में बह गया। सच में, ऐसे प्रचारक, ऐसे प्रबंधक मुल्क के हर कोने में होने चाहिए। हर किसी के दिल में ये आवाज़ पहुँचनी चाहिए। 

असल बात तो ये है कि दिन-ब-दिन दुनिया जितनी आधुनिकता और मशिनीकरण होती जा रही है- मनुष्य उतना ही आलसी और व्यसन-विलासी बनने लगा है। और उसी कारण से ही, मनुष्य सब जानते हुए भी अपने अंदर कि ज्ञान को, अपने में जो कला है, हुनर है- समाज की भलाई के लिए उपयोग नहीं कर रहा है। मनुष्य ये सोचना चाहिए कि ज्ञान, कला और हुनर जो भी है उसे बाँटने से और भी अधिक बढता है, न की घटता है। और उसी चीज़ों को सही समय पर, सही मार्ग पर, सही-आवश्यक जगह पर व्यवहार करने से ही एक सच्चे और ज्ञानी मनुष्य का श्रेय प्राप्त होता है। 

मेरे एक मित्र के छोटे भाई ने लगभग देढ-या-दो साल पहले ही इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिये थे। सुनकर तो आश्चर्य हुआ परंतु उनसे मिलने को मुझमें उत्सुकता बढ़ने लगी। असल मे बचपन से ही मुझे धर्म, संप्रदाय, ज्ञान-चर्चा के विषय मे ज़्यादा रुचि है। परंतु मंदिर जाना, नारियल तोड़ना, माथा टेकना... ये सब मुझसे नहीं हुआ है। ये शायद आधुनिक सभ्यता का एक प्रकार का कुप्रभाव भी है मेरे ऊपर। मुझे न किसी धर्म से द्वेष है, न किसी जाती से घृणा है, न किसी संप्रदाय से लगाव है। ये जाती, धर्म, संप्रदाय जो भी है, सभी एक एक विभाग है, जो कि ऊपरवाला ने बनाया है। और हम सब उन विभागों के कर्मचारी हैं। कोई उच्चस्तर पर तो, कोई मध्यस्तर पर, कोई निम्नस्तर पर। एक नाटक, कहानी या सिनेमा तभी अच्छी लगती है जब पुरे कलाकारों का सत-प्रतिशत योगदान रहा हो। सिनेमा में भी देखिये - एक छोटे से छोटा पात्र भी महत्वपूर्ण है कहानी को सम्पूर्ण या सफल बनाने में। वैसे ही यहाँ हर किसी को अपने जीवन में, इस संसार मे आवश्यकता है। और उस नाटक रचयता को ही मालूम होगा कब तक किसकी आवश्यकता है। ऊपरवाले ने मुझे एक हिन्दु परिवार में जन्म दिया है और ये हुआ मेरा वर्ग कि मैं एक हिन्दु हूँ। लेकिन इतने में बात ख़त्म नहीं हुई। सब के लिए कुछ न कुछ कर्म बाँट दिये गये हैं। तुम ये करो, तुम वो करो, ऐसे। परंतु ये सभी का मकसद एक ही है- मंज़िल एक ही है। 
"रास्तें अलग़-अल़ग हैं खुदा को पाने को मगर, मंज़िल एक है, जुदा-जुदा नहीं" – ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती। 

धर्म कुछ भी क्युं न हो, कर्म एक होना चाहिए। वह है सेवा। ईश्वर कहो, अल्लाह कहो, साई कहो, ईसा कहो - सभी ने यही आदेश दिया है कि- दिन मे मुझे थोड़ा याद करो और लोगों की सेवा करो। सेवा भी ऐसी होनी चाहिए, नि:स्वार्थ सेवा। न कि किसी का गला काट कर किसी दूसरे की सेवा करो। उसे सेवा नहीं कहते अघोर पाप कहते हैं, जिसका कोई क्षमा भी न हो शायद। 

वल्लारी से आने से पहले मेरे प्रिय मित्र इस्माईलजी मुझसे बहुत नाराज़ थे। वजह थी कि थोड़ी ही दिनों में मैं जुदा होने जा रहा था उनसे। इसके विपरीत मैंने उन्हें हैदराबाद आने का आमंत्रण दिया। इसमें वह मंज़ूर तो थे, लेकिन एक ही बात उन्होंने कही- मुझे भय है! ये सुनकर मेरे मुँह से तुरंत यह बात निकली -किस चीज़ का भय? कम्युनिटी की? गोली मारो उसको। दस साल पहले, मैं हैदराबाद में तीन साल रह चुका हूँ। इससे अच्छी जगह आपको कहीं नहीं मिलेगी। खामखा आप परेशान हो रहे हैं! और रही बात कम्युनिटी की, इतना ही भय है तो निकाल के फ़ेंक दीजिए अपने दिल से कि आप मुसलमान हैं। जैसे कि मैं जी रहा हुँ। हर मंदिर, हर गिर्जा, हर मस्जिद मेरे लिये खुला है। मुझे ज्ञान चाहिए और मेरे पास जितना कुछ भी है वह मुझे लोगों में बाँटना है। यही तो खुदा का आदेश है। जिसकी वजह से आज मैं बिन्दास घुम-फ़िर रहा हूँ। क्या है कि- एक चीज़ को पकडकर रखने से या ज़्यादा पसंद करने से, उसे खोने का भय रहता है। अगर चोरी हो भी जाती है, तो दु:ख होता है। दिल को चोट पहुँचती है। फिर गुस्सा आता है, मन में हिंसा की भावना जागृत होती है। और उसके आगे जो होगा... उसे खुदा के लिए न सोचना ही भला है। इसलिए घर में हम कभी-कभी चिंटियॊं के लिये अलग से शक्कर किसी कोने में रख देते हैं। ताकी वह हर जगह मुँह न मारें। मेरी बात मानिये आप हैदराबाद आ ही जाईये। मुझे तो आप अपना छोटा भाई मानते हैं फिर डरने की क्या बात है? और तो ये भारत है न कोई पश्चिमी देश है जहाँ पिस्तौल लेके सभी घूम रहे हैं। दिन-बदल रहे हैं। आज वैसा नहीं है जो कुछ साल पहले हुआ करता था। और विज्ञान की प्रगति का यही एक फ़ायदा हुआ है कि- सब इतने व्यस्त हो गये हैं, कि किसी को किसी का बुरा सोचने का समय ही नहीं है। 

आख़िर मुझे दु:ख हुआ कि इस्माईलजी फ़िजिक्स के इतने अच्छे प्रोफेसर होकर भी उनके मन में इतना भय था- सिर्फ समाज में रहने के लिये। ये कैसा न्याय है? आतंकराज के कारण एक अनिर्द्धिष्ट भय जो कई लोगों के दिल में जमा बैठा है। कब ख़त्म होगा इसका कोई निर्द्धिष्ट सीमा नहीं है। आधुनिकता और वाणिज्य की वर्तमान स्थिति में एक व्यक्ति को दुसरे व्यक्ति से वैसा भय तो नहीं रहा जैसे पहले रहा करता था पर एक जाति को दूसरे जाति से, एक देश को दूसरे देश से भय के कुछ झलक आज भी दिखाई देती हैं। जिन्हें मुलोत्पोटन करना हम सभी का कर्तव्य है। ऐसी कई परिस्थितियों से हम गुज़र चुके हैं। गुज़र रहे हैं और गुज़रेंगे ज़रूर, परंतु उन परिस्थितियों का सामना या उनका समाधान अपने-अपने अंदाज़ से शांतिपूर्ण तरीके से करने से ही हमारे देश में चैन-व-अमन कायम रह सकता है। इसी में सब की भलाई है। यही मनुष्य जीवन जीने कि सार्थकता है। 

 

 

 

 

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