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© Sunita Maheshwari

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हरी-भरी अंगूर की बेलों से सारा खेत सजा हुआ था। बहती तेज हवाओं में अंगूर की बेलें लकड़ी की बनी खपच्चियों पर चढ़ कर झाँकती हुई ऐसी लग रहीं थीं, जैसे कई बच्चियाँ कार की खुली छत से अपना मुँह निकाल कर जीवन का पूर्ण आनंद ले रहीं हों। बेलों पर लटके हुए मोतियों के गुच्छों जैसे अंगूर ऐसे लग रहे थे, जैसे कि विधाता ने हरी-हरी सुन्दर चादर को कशीदाकारी से सजा दिया हो। रमेश पाटिल अपने लहलहाते खेतों को और हँसते-खेलते निज संसार को देख, मन ही मन बड़े प्रसन्न थे। उन्हें अपने दोनों बच्चों पर बहुत गर्व था, क्योंकि दोनों ही बड़े होनहार थे। पूरे गाँव के लोग उनके बच्चों पर गर्व करते थे और कहते थे “बच्चे हों तो रमेश पाटिल जैसे।

दो बड़ी ज़िम्मेदारियाँ रमेश पाटिल के सामने मुँह बाये खड़ी थीं। एक तो बेटी प्रमिला का विवाह और  दूसरी बेटे राजीव की एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई। शायद वे इस वर्ष अपनी ज़िम्मेदारियों को बखूबी पूरा कर सकेंगे, ऐसी उन्हें आशा थी। वे मन ही मन खर्चे का और फसल से होने वाले लाभ का हिसाब बिठा रहे थे। अचानक आसमान में घने काले बादल छा गए। देखते ही देखते धूंआधार वर्षा प्रारम्भ हो गई। रमेश पाटिल घबरा गए। 

उन्होंने अपने छोटे भाई से कहा “प्रकृति का यह कैसा क्रोध है, जो बे-मौसम ऐसी भीषण वर्षा हो रही है। क्या होगा फसल का? सारी मेहनत पर पानी फिर जाएगा।

तभी रमेश पाटिल के छोटे भाई ने कहा “किसको दोष दे रमेश भाऊ, सब किया धरा तो आदमी का ही है।आदमी कहाँ प्रकृति को चैन से रहने देता है, कभी पेड़ काटता है, तो कभी पहाड़, कभी बाँध बनाता है, तो कहीं प्रदूषण फैलता है। आदमी अपने स्वार्थ के लिए न जाने कितनी तरह से प्रकृति को कष्ट पहुँचाता है, भाऊ, प्रकृति भी आख़िर कब तक सहेगी मनुष्य की मार? वह भी तो बदला लेगी। बस फ़र्क इतना ही है कि बड़े-बड़े लोग प्रकृति को नुकसान पहुँचाते हैं और उसका क्रोध सहना पड़ता है, हम ग़रीब किसानों को।

वे आपस में बात कर ही रहे थे कि दिन में अँधेरा छा गया।भीषण गर्जना के साथ बादल बेतहाशा बरसने लगे। बड़े-बड़े ओले गिरने लगे। रमेश पाटिल का दिल बैठा जा रहा था।ओलों के कारण सारी फसल खराब होने की आशंका से उनके सारे सपने नष्ट होते दिखाई दे रहे थे। वे भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कि बारिश रुक जाए और उनकी फसल बर्बाद होने से बच जाए, पर इंद्र देवता न जाने क्यों इतने क्रुद्ध थे? धुआंधार बरसात सात दिनों से रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। बेमौसम की बरसात ने तबाही मचा दी थी। न घर में चैन था, न खेतों में। घर टपक रहा था। घर में और खेतों में पानी ही पानी भरा था। चूल्हा भी नहीं जल पा रहा था। भूखे-प्यासे रमेश पाटिल परिवार सहित अपनी फसलों को बचाने का असफल प्रयास कर रहे थे। पहले तो छोटे-छोटे अंगूर ओलों और बरसात की मार से चोटिल हो गए फिर अंगूर के बैलें ही अपना सौंदर्य खो कर धाराशायी हो गयीं। अपनी लहलहाती फसल के गिरने का दुःख वे बर्दाश्त नहीं कर पाए और बेहोश हो कर गिर पड़े| उनकी पत्नी श्यामा, उनकी ऐसी हालत देख कर बुरी तरह घबरा गई, उसे लगा कि उसके पति को दिल का दौरा पड़ा है। वह दुःखी होकर कहने लगी अंगूर की बेलें तो धाराशायी हो गयीं, वे तो साथ छोड़ गयीं, कम से कम तेरे पापा की जान तो बचा लें।

राजीव और प्रमिला भी घबरा गए और बोले, “जल्दी करो माँ। हमें देर नहीं करनी चाहिए।

वे रमेश पाटिल को दिल के नामी डॉक्टर खरे के पास ले गए। बड़े इन्तजार के बाद उनका नंबर आया, डॉक्टर खरे ने बड़े प्रभावशाली ढंग से रमेश पाटिल की जाँच की और श्यामा को समझाते हुए कहा इनको किसी बात का भारी सदमा लगा है, जिसका असर इनके दिल पर हुआ है|”

यह सुनते ही श्यामा सुबक-सुबक कर रोने लगी, कहने लगी डॉक्टर साहब, हम लुट गए। इस बारिश में तो हमारी अंगूर की सारी लहलहाती फसल बर्बाद हो गई। इसी सदमे के कारण राजू के पिताजी की यह हालत हुई है। इन्हें बचा लीजिये डॉक्टर साहब! आपकी बड़ी दया होगी। अब आप ही हमारे भगवान हैं।

डॉक्टर साहब ने उसे सांत्वना दी और कहा रोओ मत। ये कुछ टेस्ट हैं, इन्हें करवालो।

श्यामा ने जैसे-तैसे रुपयों का इंतज़ाम किया और सभी टेस्ट कराए। टेस्ट की रिपोर्ट देख कर डॉक्टर ने जो कुछ कहा, उससे तो श्यामा के ऊपर दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ा।डॉक्टर साहब ने कहा पाटिल जी की जान बचाने के लिए तुरंत ही एन्जिओग्राफी करनी पड़ेगी, ज़रूरत हुई तो दिल का ऑपरेशन भी करना पड़ेगा। एन्जिओग्राफी का खर्चा लगभग बीस हजार आएगा।

बीस हजार की रकम सुनते ही श्यामाराजीव और प्रमिला चिंता में पड़ गए। आखिर, वे इतना पैसा कहाँ से लाएंगे। श्यामा ने अपनी अँगूठी व अपनी बेटी की लिए बनवाये हुए गहने ओने-पोने दाम में बेच दिए| जब घर में धन का अभाव होता है तो ज़रुरत पड़ने पर गहने ही काम आते हैं। गहनों के बेचने से जो पैसा आया, उससे रमेश पाटिल की एन्जिओग्राफी हुईश्यामा और राजीव डॉक्टर साहब से रिपोर्ट पूछने गए तब डॉक्टर साहब ने बताया इनकी दिल की नसों में खून का संचार नहीं हो रहा है। उनका ऑपरेशन करना बहुत ज़रुरी है, नहीं तो कभी भी दिल का दौरा आ सकता है और मौत भी हो सकती है। आप तीन लाख रुपयों का जल्दी से जल्दी इंतज़ाम कर लीजिए|”

डॉक्टर साहब की बात सुन श्यामा के हाथ के तो तोते उड़ गए। कहाँ से लायेगी वह इतने रुपये? उसके पास तो जो रुपये, गहने थे वे सब ख़त्म हो गए। उसे कोई राह दिखाई नहीं दे रही थी। अपने पति के जीवन की चिंता रह-रह कर उसे खाए जा रही थी। वह फूट-फूट कर रोने लगी और बोली “डॉक्टर साहब हम बहुत गरीब लोग हैं, फसल पर ही सब आशाएं थीं, अब तो वह भी नष्ट हो गईं। मैं इतने रुपये कहाँ से लाऊँगी? इन्हें बचा लीजिये डॉक्टर साहब।

डॉक्टर साहब ने समझाते हुए कहा घबराओ मत। हमारे पास कुछ फंड है, जो हम आप जैसे लोगों की सहायता के लिए रखते हैं। मैं उस फंड में से आपकी कुछ सहायता करवा दूंगा। इसके साथ-साथ मैं आपकी आर्थिक स्थिति देखते हुए अपनी फीस कुछ कम कर दूंगा। इस तरह लगभग तीस प्रतिशत धन कम खर्च होगा और इनका ऑपरेशन आसानी से हो जाएगा।

डॉक्टर साहब की बातें सुन श्यामा की कुछ जान में जान आई,  जब कि वह खर्चे के विषय में कुछ समझ ही नहीं पायी थी। उसके सामने अपने पति का जीवन था, जिसे वह किसी भी हालत में बचा लेना चाहती थी।वह कहने लगी बड़ी मेहरबानी होगी डॉक्टर साहब,आपकी।कृपया आप इन्हें बचा लीजिये। ये ज़िन्दा रहेंगे तो पैसा फिर भी कमा लेंगे। 

जब रमेश पाटिल को यह सब पता चला तो वे कहने लगे अब मैं बिलकुल ठीक हूँ श्यामा। तुम चिंता मत करो। बच्चों की तरह पाली हुई अंगूर की बेलों का गिरना मुझसे देखा नहीं गया। इसीलिए मैं बेहोश हो गया था। मुझे कोई बीमारी नहीं है।

पर श्यामा और दोनों बच्चे, कुछ सुनने के लिए तैयार ही नहीं थे। अब श्यामा के सामने विकट समस्या थी। इतनी बड़ी धन राशि का इंतज़ाम आख़िर वह कहाँ से करे? घर में बहुत सोच-विचार के बाद माँ तुल्य ज़मीन बेचने का निर्णय लिया गया। ज़मीन बेच कर जो धन आया, उससे रमेश पाटिल का ओपरेशन भली प्रकार हो गया। धीरे-धीरे वे स्वस्थ होने लगे।परन्तु आय का ज़रिया, खेत बिकने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति, दिन पर दिन बिगड़ती जा रही थी| खाने-पीने के भी लाले पड़ने लगे| बेटे की शिक्षा अधूरी रह गईवह मेडिकल के प्रथम वर्ष में पढ़ रहा था, डॉक्टर बनना उसका सपना था, पर धन के अभाव में उसका सपना रेत की तरह हाथ से फिसलता जा रहा था| उसका सपना पूरा करने के लिए माता-पिता ने धन के जुगाड़ की बहुत कोशिश की, पर असफलता ही हाथ आई। बेटी भी बहुत तेजी से बड़ी होती जा रही थी।

“श्यामा बहन, कब तक घर में बिठाए रखोगी इस निगोड़ी को। कहीं कोई ऊँच नीच हो गयी तो कैसे मुंह दिखाओगी किसी को?” गाँव वालों के ऐसे तानों से वे हर दिन मरते थे।उधर बेटा राजीव भी पढ़ाई छूटने के कारण चुप-चुप सा रहने लगा था। उसका डॉक्टर बनने का सपना जो टूट गया था।

एक दिन गाँव के एक तीस वर्षीय बिगड़े दबंग कालू भाई ने रमेश पाटिल से कहा “अपुन आपकी लाड़ली प्रमिला से शादी करना चाहता है।अपुन अक्खा जीवन उसे रानी बना कर रखेगा। बदले में अपुन राजीव की पढ़ाई का खर्चा भी देगा| इससे प्रमिला की शादी भी हो जायेगी और राजीव की पढ़ाई भी।

शादी की बात सुनते ही माता-पिता का खून खौलने लगा था।श्यामा ने गुस्से से कहा “हमारी बेटी फूल जैसी कोमल है।पढ़ी-लिखी है। हम अपनी प्यारी सी बच्ची को इस गुंडे को क्यों देंगे? यह तो रोज़ मार-मार कर ही हमारी बेटी की जान ले लेगा।

वे लोग ऐसे गुंडे-मवाली से अपनी बेटी का विवाह बिलकुल नहीं करना चाहते थे। पर जब उन्होंने शांति से सोचा तो उनकी सोच ही बदल गई। एक तो उन्हें उसकी दबंगई का डर लगने लगा था और दूसरे उसने बेटे राजीव की पढ़ाई का खर्चा देने की बात की थी उन्हें लगा बेटी तो जैसे तैसे पराये घर में निभा लेगी, पर पढ़ाई के लिए फीस मिलने पर, बेटा पढ़ लिख कर डॉक्टर बन जाएगा।

माँ ने प्रमिला से बड़े भारी मन से संकोच से कहा “बेटी प्रमिला, आज कालू आया था। वह तेरा हाथ मांग रहा है। वह कह रहा है कि वह तुझे खुश रखेगा और तुझसे शादी कर के वह राजीव की पढ़ाई का खर्चा उठाएगा।

यह सुन कर प्रमिला सन्न रह गई। वह दिन-रात रोती रही पर अपने प्यारे भाई के सपनों को साकार करने के लिए, वह अपनी ज़िंदगी को दाव पर लगाने लिए राज़ी हो गई। बेचारी लड़कियाँ सदैव से दूसरों की खातिर अपने सपनों को रोंदती रही हैं। विवाह सम्पन्न हुआ। राजीव भी पढ़ने चला गया।जीवन में परेशानियाँ तो बहुत थीं, फिर भी कुछ राहत थी| राजू पढ़ने में बहुत होशियार था, अतः उसे स्कॉलरशिप भी मिलने लगी। देखते ही देखते, उसने एम.बी.बी.एस. कर लिया। अब उसे लोग सम्मान से डॉ. राजीव कहने लगे थे।उसके डॉ. बनने से न केवल घर के लोग प्रसन्न थे, बल्कि उसका पूरा गाँव गौरवान्वित था। वह अपने गाँव का बड़ा प्रिय डॉक्टर बनता जा रहा था। एक दिन उसे न जाने क्या सूझी कि वह अपने पिताजी से बोला “पिताजी मुझे आपकी एन्जिओग्राफी की सी.डी. चाहिए।

रमेश पाटिल ने ढूँढ कर उसे वह सी.डी. दे दी, जिसे डॉक्टर खरे ने उन्हें शायद यह सोच कर दे दिया होगा कि ये अनपढ़ किसान इस सी.डी. को क्या समझेगा। डॉ. राजीव उसे अपने हॉस्पिटल में ले गए। वहाँ ले जाकर जब उन्होंने सी.डी. देखी तो वे दंग रह गए। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था, कि वे अपने पिताजी की ही सी.डी. लेकर आए हैं, क्योंकि उस सी. डी. के अनुसार तो उनके पिता रमेश पाटिल एकदम स्वस्थ थे। उनके ऑपरेशन की कोई आवश्यकता ही नहीं थी।उन्होंने सी.डी. पर लिखे नाम को बार-बार पढ़ा, परन्तु नाम तो एकदम ठीक था। वह उस सी.डी. को लेकर अपने सबसे सीनिअर डॉक्टर गोखले के पास गए। वहाँ कई डॉक्टरों ने मिलकर उस सी.डी. को देखा, देख कर सभी दंग रह गए।सभी को डॉक्टर खरे की नियत समझ आ गई थी। पैसों के लिए कोई इतना कैसे गिर सकता है। डॉक्टर की सलाह से रमेश पाटिल का एक्स-रे निकलवाया गया और अपेक्षित जांच की गयी तो पता चला कि ओपरेशन करके बाई पास तो किया ही नहीं गया। केवल सामने से सीना काट कर पुनः सिल दिया गया है। सब दंग रह गए कोई कैसे इस तरह ऑपरेशन का ढोंग कर सकता है, वह भी किसी गरीब किसान का। पैसों की खातिर क्या आदमी अपनी आत्मा को भी मार देता है? कहाँ मर गयीं संवेदनाएं| क्या गरीब की आह उन्हें चैन से जीने देगी?

डॉक्टर राजीव का खून खौल रहा था, उन्होंने व उनके परिवार ने न जाने कितने दुःख भोगे थे, डॉक्टर खरे की इस दुष्टता के कारण। बहन की याद आते ही उनका मन रो उठा था, जिसने अपने भाई की पढ़ाई की खातिर जीवन भर की प्रताड़ना को स्वीकार कर लिया था। डॉक्टर राजीव ने डॉक्टर खरे के विषय में बहुत सी जानकारी एकत्रित की,  तो पता चला कि डॉक्टर खरे अकेले नहीं हैं, उनके इस पाप कृत्य में दो डॉक्टर और शामिल हैं। सभी डॉक्टर्स की सलाह से, डॉ. राजीव ने मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया में सभी सबूतों के साथ, डॉ. खरे और उनके साथी डॉक्टरों की शिकायत दर्ज करवाई। बात कई साल पुरानी हो चुकी थी उन्हें चिंता थी कि सुनवाई होगी या नहीं? पर सत्य के लिए एक जुट हो कर, सभी डॉक्टर्स ने लड़ने का मन बना लिया था। तीन साल तक डॉक्टर राजीव सत्य के लिए लड़ते रहे।उन्हें बहुत सी परेशानियाँ उठानी पडीं। न जाने कहाँ-कहाँ चक्कर काटने पड़े। एक दिन डॉक्टर राजीव विचारों के भँवर में फंसे हुए बड़े चिंतित बैठे थे।

उनके पिता जी ने पूछा, “बेटा, क्यों परेशान हो?”

डॉक्टर राजीव बोले, “कुछ नहीं पापा बस यही सोच रहा था कि पाप डॉक्टर खरे ने किया था, पर फल भोगना पड़ रहा है, पूरे पाटिल परिवार को। भगवान का यह कैसा न्याय है। अपने पापों का फल तो आदमी को भोगना ही पड़ता है पर दूसरों के पापों का फल भी उसे क्यों भोगना पड़ता है? यह जीवन की कैसी विडम्बना है कि करे कोई, भरे कोई?”

अचानक तभी मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया से पत्र आया कि डॉ. खरे और उनके दोनों साथियों को दोषी पाया गया हैं और उनका प्रेक्टिस का लाइसेंस कैंसिल कर दिया गया है।

पत्र पढ़ते ही उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। रमेश पाटिल बोले, “सच है बेटा, भगवान के घर देर है अंधेर नहीं।

संवेदन शून्यता

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