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विपिन बाबू का चुनाव
विपिन बाबू का चुनाव
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© Supreet Saini

Drama

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विपिन बाबू बहुत परेशान थे। उनकी परेशानी का कारण अंबाला शहर की धूल भरी गर्मी नहीं थी, ना ही ट्रैफिक की ज़हरीली गैसों से लैस उनके शहर की हवा। उनकी समस्या इससे सरल और बेहद महत्वपूर्ण थी। कुछ २ महीने में राज्य में नगरपालिका के चुनाव घोषित हो गये थे और पाँच साल की मौज मस्ती के दिनों का अंत अब सामने नज़र आ रहा था। चुनाव में उनकी हार ऐसी प्रलय को कैसे रोका जाए, इस सोच में पड़े वह हर रविवार की तरह आज सुबह रमेश हलवाई के यहाँ सुबह के भोजन के लिए जा रहे थे। नहा-धोकर तो घर से निकले थे, पर ८ बजे का सूरज भी शरीर से पसीने के फँवारे छुड़वा रहा था। विपिन बाबू ने नज़र दौड़ाई तो देखा की गर्मी के कारण उनकी हालत औरों के प्रति कुछ ज़्यादा ही ढीली लग रही थी। कम्बख़्त ये चुनाव होते ही ऐसे हैं 'कमज़ोर दिल वाले तो इनमे खड़े होने का सोच भी नहीं सकते,' विपिन बाबू ने तो पिछले ५ साल से कुर्सी की सेवा करी है।

मगर अब बात अगले पाँच वर्षों की थी और चुनौती थी कि कैसे सबको विश्वास दिलवाया जाए कि जनता के हितो के लिए लड़ने वाला निडर योद्धा उन्ही को चुनना चाहिए। व्यक्तिगत वार्तालाप में वह यह स्वीकार करने को तैयार थे कि क्षेत्र में विकास की गति पिछले पाँच साल में धीमी ही रही पर आज के ज़माने में दो बेटियों का ब्याह करवाना कोई आसान काम है क्या? अगर कुर्सी ना होती तो ना जाने वह कैसे विवाह का खर्चा उठाते। यही सब सोचते-सोचते वह अंबाला शहर के ठीक बीचो-बीच जाती मुख्य सड़क के किनारे आ खड़े हुए। यहाँ से उन्हे सड़क के उस पार मित्रों की मंडली रमेश हलवाई की दुकान के सामने बिछाई कुर्सियों पर एकत्रित होते नज़र आई।

मित्रों को देख अभिनंदन का हाथ उन्होने उठाया ही था कि एक ट्रक नज़दीक से होता हुआ धूल की बारिश उनके शरीर पर करता हुआ फ़र्राटे हुआ निकल गया। विपिन बाबू की मायूसी और बढ़ने लगी।

चाय के प्याले पर जब मित्रों को उन्होने अपनी समस्या बताई तो उन्हे सहानभूति तो मिली, पर कोई कमाल की राजनीति नहीं। ज़्यादा देर वहाँ नहीं रुके और दोस्तों के बहुत हट करने पर भी वहाँ से विदा ली और घर की ओर चल पड़े। चलते हुए उन्हे राह में सड़क के किनारे उनकी पार्टी का झंडा कचरे के ढेर में पड़ा हुआ मिला। पिछले ही हफ्ते वह पार्टी के मुख्यालय में अपनी उम्मीदवारी के प्रचारण के लिए पैसा माँगने गये थे, पर उन्हे वहाँ बताया गया की इस बार चुनाव मे पार्टी का हाथ बहुत तंग है। इस कारण से पार्टी ने निर्णय लिया है कि आने वाले चुनाव में केवल उन्ही उम्मीदवारों का समर्थन कर पायेंगे जो जीत के प्रबल दावेदार हों। दुर्भाग्य से विपिन बाबू का नाम उस सूची में नहीं था। उस दिन २०,००० का एक चेक दे कर उन्हे पार्टी के दफ़्तर से रवाना कर दिया गया। पार्टी प्रमुख के बच्चों को उन्होने खुद अपने हाथों से पाला था। इस बात का भी कोई लिहाज नहीं किया एहसान फारमोशों ने। खैर, एक बार चुनाव में उनकी जीत एक बार फिर हो जाए और कुर्सी उनके हाथ में आ जाए फिर वह एक-एक को देख लेंगे।

आगे सड़क पर गटर का पानी बह रहा था उसे देख मन ही मन उन्होने सरकारी सफाई कर्मचारियों को कोसा और अपना सफेद पयज़ामा बचाने के लिए अलग रास्ते पर सवार हो गये। इस अलग रास्ते की पतली गलियों से होते हुए वह एक गली में घुसे की उनकी नज़र गली के बीच चारपाई पर लेटे एक वृद्ध व्यक्ति पर पड़ी। सोचा ना जाने लोगों को कब अकल आएगी। सारा रास्ता रोक सुबह-सुबह घर के बाहर लेट रहे हैं। नज़दीक पहुँच विपिन बाबू ने अपनी ज़ुबान और लात दोनो का इस्तेमाल किया। चारपाई पर ज़ोर देकर लात मारी और कहा, "साले! तेरे बाप की सड़क है क्या? चल हट और रास्ता दे।" बूढ़े ने सहम कर अपनी टूटती चारपाई और हड्डियाँ संभाली और खुद चारपाई के साथ खड़ा हो गया। "दोबारा ऐसी बेवकूफी की तो लात तुम्हें पड़ेगी", गुस्से से भीनभिनाते विपिन बाबू चेतावनी देते हुए आगे निकलते बोले।

घर पहुँच कर दारवाज़े पर अभी दस्तक दी ही थी कि विपिन बाबू के दिमाग़ मे एक कमाल का विचार आया। हाथ घर की घंटी बजाए बिना ही वापस खींच लिया और तेज़ कदमों से बूढ़े की ओर भागे। जैसे-जैसे रास्ते में इसके बारे में और सोच रहे थे, तरकीब और भी बढियां प्रतीत हो रही थी। तेज़ चलने के कारण उन्हे बीच राह में रुक कर अपनी पिंडलियों को थोड़ा आराम देना पड़ा। खड़े-खड़े वहाँ उनकी नज़र एक फल वाले पर पड़ी तो सोचा की बूढ़े के यहाँ खाली हाथ जाना ठीक नहीं होगा। एक दर्जन केले ले जब वह बूढ़े की गली मे प्रवेश किए तो देखा की वह ठीक पहले की तरह चारपाई पर लेटा, कुछ सोच रहा प्रतीत होता है। जिस मुद्रा मे वह लेटा था, वहाँ से बूढ़े की नज़रें सीधा विपिन बाबू के चेहरे पर पड़ी। अधेड़ उम्र की जवानी की रफ़्तार से उठ उसने चारपाई रास्ते से हटाई। सुबह की पिटाई की धमकी कानों मे अभी भी ताज़ी थी।

पर नज़दीक आते विपिन बाबू के आवभाव कुछ और कह रहे थे। मिलने पर पैरों को हाथ लगा कर बोले, "धैयाजी, मेरा सादर प्रणाम। यहाँ से गुज़र रहा था कि सोचा आपका आशीर्वाद लेता चलूं। यह लीजिए, आप के लिए थोड़ा फल लाया हूँ। "धैयाजी भी अपनी सुबह की भूल के लिए क्षमा माँगने के मूड में थे और बस हाथ जोड़े खड़े रहे। उधर विपिन बाबू ने आदरपूर्वक तरीके से धैयाजी को चारपाई पर बैठाया और कहा, "आप जैसे महान स्वतंत्रता सैनानि ही तो हमारे शहर का गौरव हैं। जब तक आपका आशीर्वाद हमारे साथ है, अंबाला का गौरव सुरक्षित है।"

धैयाजी ने अपनी भूल के लिए एक बार फिर क्षमा माँगी, और उठ कर चारपाई उठाने की कोशिश करी। पर विपिन बाबू को सवेरे का हादसा बिलकुल याद नहीं था कहने लगे, "आप ज़रूर किसी और से मुझे सोच रहे हैं धैयाजी। मैं तो सुबह उठते ही नहा-धोकर सीधा आपके दर्शन के लिए आया हूँ।" धैयाजी के चेहरे पर उलझन की लकीरे आई, जैसे वो सोच रहे हो कि क्या वह हक़ीकत या कोई बुरा सपना याद कर रहे हो। खैर, कुछ समय इधर-उधर की बातें की और उसके बाद विपिन बाबू ने धैयाजी से विदा ली।

उसी शाम एक फोटो लेने वाला धैयाजी के घर पधारा। अपने को विपिन बाबू का मित्र बताता हुआ वह धैयाजी की उनके टूटे-फूटे घर के साथ कुछ तस्वीरें उतारने मे लग गया। १०-१५ फोटो उतारने के बाद उसने धैयाजी से विनम्रता से विदा ली। जाते-जाते उनके पैर छूए। "नहीं लेगा अंबाला तब तक साँस, जब तक ना होगा धैयाजी का सम्मान।"

ऐलान वाले पोस्टर अंबाला शहर में जगह-जगह अगले कुछ दिनों में नज़र आने शुरू हुए। ऐलान के नीचे धैयाजी की एक उदास सी तस्वीर थी। उसके नीचे विपिन बाबू का एक छोटा सा फोटो था। साथ लिखा था, "अंबाला वासियों का विपिन बाबू का अंबाला के सम्मान की रक्षा के लिए आमंत्रण। महान स्वतंत्रता सैनानी धैयाजी के लिए पद्म भूषण की माँग। दिनांक २६ मई को शाम ६ बजे रामलीला मैदान में एकत्रित हों।"

असल में आज़ादी की लड़ाई में धैयाजी ने १९४२ की लड़ाई में ११ वर्ष की आयु में भाग लिया था। देश भर में तिरंगा झंडा जनता पर जादू किए हुए था और धैयाजी अपने दोस्तों के साथ अक्सर झंडा लेकर गली-गली घूमा करते थे। विपिन बाबू ने एक-आध बार धैयाजी से उस समय के कुछ किससे सुन रखे थे। उस दिन चारपाई पर लात मारने के बाद जब वह घर पहुँचे थे तो उन्हे धैयाजी का ऐसा ही एक ब्यौरा याद आया था और पूरा प्लान उनके मन में घर कर गया था। याद आते ही उन्होने धैयाजी को अपनी कमज़ोर उम्मीदवारी का सहारा बनाने का निर्णय लिया।

प्लान के मुताबिक, अब उन्हे रामलीला मैदान में धैयाजी के देश के लिए किए बलिदान के समक्ष शीश झुकाना होगा और अपने व्यक्तिगत लाभ-हानि को परे कर धैयाजी के सम्मान के लिए लड़ना होगा। धैयाजी को वह कार्यक्रम में ले जा पायेंगे इसका उन्हे कोई शक नहीं था। रही बात कुछ ५०-६० लोगों को जमा करना, और कुछ स्थानीय अख़बारों के लोगों को एकत्रित करना तो वो कोई बड़ी बात नहीं होनी चाहिए। इन कारणों से योजना विपिन बाबू के दिल को छू गयी थी। सोचने लगे कि ज़रूरत पड़ी तो वह एक अनशन का ऐलान भी कर देंगे फिर उस पर वो बैठे या धैयाजी, वो आपस मे बाद मे निर्धारित कर सकते हैं।

निर्धारित दिन दोपहर में ३ बजे वह धैयाजी के दरवाज़े एक सफेद कुर्ता-पयज़ामा ले पहुँचे। सरकारी गाड़ी का इंतज़ाम और उस पर लाल बत्ती पहले ही लग चुकी थी। ८० वर्षीय धैयाजी में अब १९४२ वाला जोश या उर्जा नहीं थी। उम्र ने बहुत कुछ सीखा दिया था और उनकी एक नज़र ये बताने के लिए काफ़ी थी कि विपिन बाबू ना सुनने वालो में से नहीं है। अपनी लंबी ज़िंदगी मे उन्होने बहुत कुछ देख रखा था। ये तमाशा देखने को भी वो राज़ी थे और कौन जाने, क्या पता इस सब के बाद उन्हे सच मे पद्म भूषण मिल जाए।

ठीक समय पर वह रामलीला मैदान पहुँचे जिसके एक कोने में नीम का एक विशाल पेड़ था। ठीक उसी पेड़ के नीचे हलवाई बैठ अपनी कढ़ाई में एकत्रित सभा के लिए ख़ान-पान की तैयारी कर रहा था। लगभग ४०-५० लोग, अधिकतर पुरुष और बच्चे, हलवाई के नज़दीक खड़े हो पकोडे तैयार होने का इंतज़ार कर रहे थे। मैदान के दूसरे छोर पर कुछ कुर्सियाँ लगाई गयीं थी, और उन खाली कुर्सियों के सामने धैयाजी और विपिन बाबू खड़े थे। विपिन बाबू के आवाज़ देने पर भी लोगों के ध्यान कढ़ाई में पड़े पकौड़ों से नहीं हट रहा था। उसी क्षण हवा कुछ ऐसी चली कि हलवाई की जलती लकड़ियों का सारा धुआँ विपिन बाबू और धैयाजी के सफेद कपड़ों पर आया। लोगों का ध्यान जुटाने के लिए उन्होने २-३ आवाज़ें और लगाई पर कोई अपनी जगह से नहीं हिला।

कुछ मिनट बीत जाने पर भी स्थिति नहीं सुधरी। एक महान नेता की भाँति विपिन बाबू ने अब मौके की बागडोर और धैयाजी का हाथ, दोनो अपने हाथों मे लिए और लोगों के समक्ष खुद जा कर खड़े हो गये। वहाँ खड़े हो कर उन्होने अपना भाषण शुरू किया- "मेरे प्रिय अंबाला वासियों, आप सबका यहाँ आने के लिए धन्यवाद। आज हम यहाँ एक साथ अपने बुजुर्ग धैयाजी - जो की गाँधी जी के साथ कंधे से कंधा मिला आज़ादी के लिए लड़े थे के सम्मान की लड़ाई के लिए एकत्रित हुए हैं। धैयाजी के परिवार में इनके पिता और दादा ने देश के लिए अपने प्राण खो दिए और इन्होंने अपने पुरखों की लाज रखते हुए आज़ादी का सपना सच कर दिखाया। एक कारण से हम सभी इनके ऋणी हैं।"

विपिन बाबू के समारोह की तैयारी में कोई कमी नहीं थी। परिवार के सदस्यों को पहले ही समझा रखा था कि भाषण में किस समय तालियाँ पीटनी है। सब कुछ जैसा निर्धारित था वैसा ही जा रहा था।

उधर साथ में खड़े धैयाजी दो सवालों से जूझ रहे थे। उन्हे ठीक से याद नहीं आ रहा था कि यह गाँधी जी कौन थे। क्या वह देश के प्रधान मंत्री थे? यह नाम उन्होने ज़रूर कहीं सुन रखा था पर ठीक याद नहीं आ रहा था। दूसरा, पिता और दादा की याद दिलाने पर उन्हे अपने बेचारे पिता की याद आई। वह अंबाला स्टेशन पर पानी बेचा करते थे और उनकी मौत आज़ादी की नहीं, ग़रीबी की लड़ाई में हुई थी पर आज के दिन वह अपने पिता और गौरव के बीच नहीं आना चाहते थे। आँखों में आँसू लिए उन्होने पिता को याद करते हुए आसमान की ओर देखा, और यह देख भीड़ ने ज़ोरदार तालियाँ पीटी।

विपिन बाबू ने चेतावनी दी, "मैं दिल्ली में बैठी सरकारों को चेतावनी देता हूँ कि हरियाणा और अंबाला के इस पुत्र को नज़रअंदाज़ करने की भूल उन्हे बहुत महँगी पड़ेगी। हम आज धैयाजी के लिए पद्म भूषण की माँग करते हैं। मुझे इंसाफ़ की इस लड़ाई में नेता बनने का बहुत गर्व है। मुझे सत्ता, ताक़त या कुर्सी से कोई लगाव नहीं है। बस धैयाजी जैसे महान लोगों को उनका हक दिलाने में दिलचस्पी है। इस संघर्ष में मैं आप सबको मेरा साथ देने के लिए आमंत्रित करता हूँ।"

कुछ तालियाँ बजीं पर अधिकतर लोगों की उंगलियाँ पकौड़ों की चटनी में डूबी हुई थी इसलिए वह साथ ना दे पाए।

उधर भाषण के बाद विपिन बाबू ने औरों को दो शब्द कहने के लिए आमंत्रित किया पर कोई उसे स्वीकार नहीं कर रहा था। सभा को समाप्त करने के लिए उन्होने "भारत माता की जय" का नारा लगाया और लोगों को आने का धन्यवाद करते हुआ सभा समाप्त की। लौटते हुए लोगों में पकौड़ों के साथ चाय ना होने की शिकायत थी।

नेता राजनीति फायदा सरकार

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