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ख़ामोशी
ख़ामोशी
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© Nikhil Sharma

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गुमनाम एहसासों की एक दास्ताँ होती है
हर अंदाज़-ए- बयां की एक कशिश होती है
दिल जब किसी का ऐतबार करने लगे
तो ख़ामोशी भी एक जुबां होती है

कोई खुद को तन्हा समझता है 
कोई हर वीराने को महफ़िल समझता है
जो आँखे कहती है उस एहसास को बस एक दिल समझता है
जब अनकही उलझनों में कोई साथ देने लगे
उस साथ की भी ख़ामोशी जुबां होती है

जब दो इशक़ज़ादे एक दूजे से मिलते है 
तो ना लफ्ज़ होते है, ना साज़ होते है
फिर भी दिल के तार मिलते है
उन जुड़े दिलो से जब सरगम बनने लगे 
उस सरगम की रूह भी ख़ामोशी होती है

बिन कहे हर एहसास को कहा जा सकता है
बस जज्बातों की एहमियत होती है 
कब बच्चा माँ से दर्द का इज़हार करता है 
कब खुदा से कोई दीदार करता है
ख़ामोशी की जुबां से ही तो हर रिश्ता चहकता है..........

गुमनाम एहसासों की एक दास्ताँ होती है

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