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बेवजह... भाग २
बेवजह... भाग २
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© Harshad Molishree

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इस कहानी का हेतु किसी भी भाषा, प्रजाति या प्रान्त को ठेस पोहचने के लिए नही है... यह पूरी तरह से एक कालपनित कथा है, इस कहानी का किसी भी जीवित या मृद व्यक्ति से की संबंध नही है, यह पूरी तरह से एक कालपनित कथा है जो कि जाति वाद, स्त्री भ्रूण हत्या, बलात्कार, जबरन और अवेद कब्ज़ा, आत्महत्या आधी के खिलाफ निंदा करते हुए यह कथा प्रदान की गई है.....

अब तक....

आपने इसके पहले भाग मैं अब तक देखा कि, कैसे कियान अपने अंदर कई रहस्यमयी बातें छुपाये... जीविका की माँ को अधमरी हालत मै मिलता है... उनके घरपर आसरा मिलने के बाद, कुछ अजीब और दिल को हिला देने वाली सचाई से वह वाकिफ होता है... इसी बीच कियान... उन लोगों से घुल मिल जाता है...

अब आगे....

"घना प्यारा नाम है बेटा"..... जीविका की माँ

"हां माँ ने बहोत प्यार से रखा था"... कियान

"के मायने होवे है बेटा इस नाम के"... माँ

कियान ने प्यार भरी मुस्कान से जीविका की माँ को देखा... कियान की आँखों से कुछ अलग सी चमक झलक रही थी... और उसने हस्ते हुए कहा....

"माँ से अक्सर पूछा करता था...?? की मेरा नाम कियान क्यों रखा है, क्या मतलब है इस नाम का....??? और अक्सर माँ बड़े प्यार से कहती थी, कियान का मतलब, कीसी बढ़ी सी रियासत का राजा"....

"माँ के ऐसे कहने पर हमेशा माँ से मैं केहता, मगर इस राजा का महल कहा है....??? तब माँ मुझे घर की छत पर ले जाती और हाथ फैलाकर कहती.... यह सारा जहान मेरे बेटे का है.... ये आसमान उसका महल और ये धरती उसकी राजधानी है.... और मैं बहोत खुश होता था माँ की इन दिलचस्प बातें सुनकर"..... कियान

"घनी प्यारी होगी थारी माँ ".... माँ

"बहोत... बहोत".... कियान

बातें करते करते वक़्त बीत गया... शाम का वो केसरिया उजाला आसमान की शोभा बढ़ा रहा था, और फिर कुछ ही देर मैं रात के काले अंधेरे ने आसमान को ढक लिया...

रेगिस्तान की रेत दिन मैं जितनी आग उगलती है, यह उतनी ही ठंडी रात के समय होती है.....

कियान काफी गहरी नींद में सोया था.... और अपने सपने मैं अपनी माँ को ढूंढ रहा था....

"माँ .... माँ कहा हो माँ "....

माँ , माँ चिल्लाते हुए कियान अपनी घर की और बढ़ रहा था, फिर वही दृश्य उसकी आँखों के सामने आने लगा... अपने हाथ में एक लकड़ी लिए अपनी ही मस्ती में गुनगुनाते हुए, कियान अपने घर की और बड़ रहा था... अपनी ही मस्ती मैं मगन, कियान को नही पता था की जिस राह पे बढ़कर वह अपने घर लौट रहा है... वहा पहुँचें ही उसकी दुनिया बदल जाएगी... सपने मैं वह अपने घर पोहचा, तब उसने देखा कि....?? रोज की तरह आज भी चुला जल रहा था मगर चूले के पास मां नही बैठी थी, नाही चुले पर कुछ बन रहा था, रोज की तरह नल से पानी बेह रहा था, मगर आज वहा बहन काम नही कर रही थी, रोज की तरह ही लकड़ियों के ढेर के पास कुल्हाड़ी पड़ी थी मगर बाबा वहां आस पास नही थे... सबकुछ बहोत शांत था, इस शांत माहौल के कारण कियान घबरा रहा था... और जैसे ही वह घर मैं दाखिल हुआ.......????

घबराकर वह नींद से उठ गया... कियान का चेहरा पसीने से भीग चुका था, उसने सामने देखा.... कियान के ठीक सामने जीविका अपने कानों को अपने दोनों हाथों से जोर से दबाये हुए अपनी आँखें मीचे एक कोने मैं बैठी थी...

तभी कियान ने गौर किया.... बाहर से आवाज़ें आ रही थी....

"नही नही... आप मुझे ले चलिये, मैं आती हूँ... साहब वो बच्ची है, आप तो जानो हो, मेहरबानी कीजिये म्हारे पे, मैं सच बोलू हूँ वह कुछ नही जानती, उससे कुछ नही पता".... यह आवाज़ जीविका की माँ की आवाज़ थी....

कियान धीरे से चारपाई से उतार कर दरवाजे के पास पोहचा... और दोनों दरवाजे के बीच के किराड़ से कियान ने देखा कि दो आदमी खड़े है.... जिनमें से एक काफी रईस लग रहा था.... जीविका की मां उस इंसान के पैरों मैं गिर कर गिड़ गिडारहि थी...

उस इंसान ने बिना कुछ सोचे जीविका की माँ को लात मार कर जमीन पर गिरा दिया.... और बड़े ही गुस्से मैं कहा....

"बजजात औरत, रोज का तेरा यही ड्रामा है.... सारा मजा किरकिरा कर दिया... कितने दिन संभाल कर रखेगी आखिर अपनी बेटी को".....

इतना कहते ही उस इंसान ने जीविका की माँ के बाल कस कर पकड़े और बड़े ही रॉब से कहा.... "अगली बार नही छोडूंगा... अगली बार जब आऊंगा उसे उठा कर ले जाऊंगा"......

इतना कह कर उस इंसान ने जीविका की माँ को जमीन पर पटक दिया...

कियान ये सब देखकर सहम सा गया.... जीविका की माँ ... वही बाहर बैठकर रेत को अपने हाथों से इधर उधर करते हुए पागलों की तरह रोने लगी... जोर जोर से चीखने लगी....

कियान को समझ नही आ रहा था कि क्या किया जाए, उसने जीविका की और देखा, फिर उसके पास जाकर कियान ने धीरे से उसका हाथ पकड़ा, मगर कियान का हाथ छूते ही जीविका बोखला उठी... कियान को धकेल कर खुद पीछे पीछे सरकने लगी... जीविका मानो होश में नही थी, कियान से वह डर रही थी.... कियान की जगह पर उसे वह इंसान दिख रहा था... जीविका को ऐसा लग रहा था कि, वो इंसान उसे अपनी और खिंच रहा है, जीविका जोर जोर से चीखते हुए यह कहनी लगी....

"छुओ मत.... मुझे छुओ मत.... मेरे पास मत आओ".....

जीविका की चीख सुनते ही... उसकी माँ दौड़ कर घर के अंदर आई... और आतेही उन्होंने जीविका को अपने सीने से लगा लिया... और बढ़े ही प्यार से जीविका को शांत करने लगी...

"कोई नही छोरी... कोई नही, म्हारी लाडो को कोई नही छुएगा, मैं हूँ ना लाडो, कोई नही छुएगा.... तुझे"....

जीविका और उसकी माँ को इस हालत मैं देख कियान की आँखों से भी आंसू बहने लगे.... बहोत कुछ कहना चाहता था वह मगर कियान के पास उस वक़्त शब्द ही नही थे...

जीविका की माँ ने कुछ देर बाद कियान को देखा और उन्होंने अपने हाथों से कियान को पास आने का इशारा किया....

कियान बिना कुछ सोचे समझे उनके पास जाकर उनके पैरों से लिपट गया.... तभी उन्होंने कियान को पैरों से उठाकर अपने सीने से लगाया... और दूसरी तरफ जीविका की और देखकर उसकी आँखों से आंसू पोछकर... रोते हुए भी लबों पे एक हसी दर्शा कर... कियान और जीविका दोनों को सहलाया.... दोनो को एक हौसला प्रदान किया...

आगले दिन सुबह सब... कुछ पहले जैसा था... कियान ने गौर किया कि जीविका और उसकी माँ , बड़े ही सरल भाव से अपने रोज मरः के काम कर रहे है....

कियान घर के बाहर आया....

"अब कैसा है छोरे... अरे क्या नाम था तेरा... हाँ कियान, भूल जाऊ हूं मैं, अब कैसा लग रहा है".... माँ

"ठीक हूँ अब".... कियान

कियान ने जीविका की और देखा... जीविका चूल्हे के सामने बैठी खाना पका रही थी... और कियान की नजरें ठहरे हुए पानी की तरह जीविका पर ठहर गई....

"क्या सोचे है कियान".... माँ

"कल के बारें".... कियान की बात पूरी हो इस्से पहले ही जीविका की माँ ने उसे बीचमें ही टोकते हुए कहा....

"कल पुराना होगया छोरे...... और नजाने यह ऐसी कितनी ही औरतें है जिनके नसीब मैं हर बीते कल मैं एक आहहह.... चुप्पी होती है...... हम यहा कल मैं नही जीते... हम अभी जिंदा है और बस आज मैं जीते है.. कल शायद हो न हो, किसे पता"......

जीविका की माँ की बातें कियान को कुछ ज्यादा समझ नही आरही थी... मगर सच कहा उन्होंने...

"कब तक आप ऐसे जियोगे, और कब तक इस मासूम को ऐसे जीने दोंगे".... कियान

"यहां हर कोई मासूम औरत बस्स कुछ, रईस मरदो की ग़ुलाम होवे है... और कुछ नही"....माँ

"इस ग़ुलामी से बचा भी तो जा सकता है"....... ???

"मजबूर होकर क्यों जिये जब आज़ादी हम हमारी मुठी मैं लिए घूमते है"...... कियान

यह सुनकर जीविका की माँ जोरो से हसने लगी... और उन्होंने कहा.....

"घना नादान हैं तू छोरे, कोन कहता है कि आज़ादी मुठी मैं क़ैद होती है, यह औरतों के नसीब मैं सिर्फ गुलामी होती है"....माँ .

"इस गुलामी की आदत डालकर, खुदको गुलाम समझना गलत है, कल तक आपने गुलामी की, फिर आपकी छोरी, कब तक ये दौर ऐसे चलता रहेगा"..... कियान

"उम्र मैं छोटा है, पर बातें घनी बड़ी करता है तू, मगर छोरे यहां बातों से पेट नही भरे जाते".....माँ

"माँ डाल बन गई है".... जीविका.... जीविका कियान और उसकी माँ के चलते हुए सवांद को बीचमें ही रोकते हुए बोली

"हां... चल खाना परोसा दे... चल छोरे... हाथ मुह धोके जल्दी से आ जा... खाना खाने के वास्ते".... माँ

भोजन के कुछ देर बाद कियान, जीविका और जीविका की माँ ... घर के बाहर आंगन में बैठे थे, एक तरफ जमीन पर जीविका और उसकी माँ बैठे थे... और ठीक उसके सामने कियान एक चारपाई पर बैठा था....

शाम का वक़्त था, मौसम भी बड़ा प्यारा था, आसमान मैं जैसे सूरज का रंग पिघल चुका था, सारा आसमान केसरिया रंग से उमट रहा था.... हवा में कुछ हल्की सी नामी थी, हवा के झोकों के साथ, कही से रेत उड़ रही थी....

तभी एक तरफ से कियान को एक मधुर संगीत सुनाई पड़ा, संगीत को सुनते ही कियान को कुछ अलग सा सुकून मिला.... हवा के हल्के दबे आवाज़ के बीच सारंगी की मधुर धुन मौसम में मानो हल्का सा नशा घोल रही थी... जीविका भी उस सारंगी के सुर मैं मोहित होगयी... और अपने शब्दों को आज़ादी देते हुए... उसने संगीत के साथ सुर मिलाते हुए कहा....

"बाबा तेरी चिरैया मै....

मैं तो ना जाऊ परदेश रे....

बाबा तेरी चिरैया मै....

मैं तो ना जाऊ परदेश रे....

तेरा हाथ छोड़कर, तेरा हाथ छोड़कर ना थामु मैं दूजा हाथ रे....

बाबा ओ... बाबा....

काहे भेजे मुझे दूर तू... मै चिरैया तेरे आंगण की...

न बना मुझे तुलसी किसके आंगण की...

मै तेरी बिटियां , तेरे आंगन की चिरैया...

बाबा तेरी चिरैया मै....

मैं तो ना जाऊ परदेश रे"....

जीविका के मुख से ये अटबोले सुर में मधुर शब्द सुनकर, माँ की आँखें भर आई....

कियान ने कहा.... "चुप क्यों होगई, गाओ"....

माँ ने जीविका का हाथ थामा और कहा....

"ना जान मुझको पराया मै, धन हु तेरी लाज का...

ना जान मुझको बोझ तू , मै सहारा हु तेरे सायें का....

क्यों छोड़े मुझको तू ऐसे भवर मैं...

घबराए मन , काँपे मेरे हाथ रे...

क्यों जाने मैं बनु तुझपे बोझ रे...

क्यों जाने मैं बनु तुझपे बोझ रे...

बाबा तेरी चिरैया मै....

मैं तो ना जाऊ परदेश रे"....

जीविका ने फिर अपनी माँ के साथ... गाते हुए कहा...

'बिटियां में तेरी माँ ... न समझ मुझको पराया तू...

मुझसे ये धरती, ये अम्बर का सितारा...

क्यों जाने फिर मुझको नकारे ये जमाना...

क्यों ये समझे है, श्राप मुझको माँ ...

यहां लडकी होना गुनाह है क्या माँ ...

माँ तेरी चिरैया मै....

मैं तो ना जाऊ परदेश रे"....

"माँ कहलाऊँ कभी... कभी भैया की राखी...

बिटियां मै लाडली... तो कभी बहुरानी...

फिर भी क्यों समझे बोझ है बिटियां...

बाबा तेरी चिरैया मै....

मैं तो ना जाऊ परदेश रे"....

"ना मार मुझको ताना, लागे है मुझको चोट...

क्यों देखे ये जमाना, जैसे मैं कोई चोर....

है गर इतनी ही लाज, बेटी है जो बजजात....

तो क्यों मैं फिर जनमु, क्यों मै ना ये समझू...

ये जग है पराया, यहां कोई ना सहारा".... जीविका के आँखों से आंसू थमने का नाम नही ले रहे थे, सीने मैं इतना दर्द था कि जीविका की जबान लड़खड़ाने लगी... और वो गाते हुए बस रुक गई....

कियान के कानों मै ये शब्द गूंजने लगे... उसके दिल मे कही ये बोल घर कर गए... जीविका के इन्ही शब्दों में उसे कही उसके सवालों का जवाब दिखने लगा... जिस वज़ह को ढूंढते हुए वो अपनो से दूर... इस हाल मैं बेवजह ठोकरे खा रहा था... उन ठोकरों की वजह... उसे जीविका के शब्दों मैं नजर आने लगी.........

माँ प्यार कहानी बिटिया चिड़िया

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