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हमारी यात्रा के हादसे-२
हमारी यात्रा के हादसे-२
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© Vijay Kumar Tiwari

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सबसे बड़ी समस्या है कि अभी कोई सहायता का मार्ग दिख नहीं रहा है और मुझमें वह हिम्मत नहीं है कि हो रहे आँधी-तूफान और बरसात में एयरपोर्ट से बाहर निकलूँ।सबसे पहले हमने गो-एयर के काउण्टर से यह पता करने की कोशिश की कि अब क्या हो सकता है।सुना था कि विमान कम्पनी ऐसे हालात में अपने यात्रियों की व्यवस्था करती है।लम्बी लाईन के पीछे मैं भी खड़ा हो गया।कुछ लोग वही कर रहे थे जो अपने देश में होता रहा है।लोग लाईन तोड़कर आगे जाकर अपना काम करवा लेते थे।कुछ लोग विरोध भी कर रहे थे परन्तु किसी को कोई सुननेवाला नहीं था।चारो ओर आपाधापी मची थी।रात के लगभग ९ बजे मेरा नम्बर आया और मुझे अगली फ्लाईट की टिकट मिली जो १२ नवम्बर की थी।

रात के ९ बजे रहे है।बाहर भीषण आँधी-तूफान और बरसात हो रही है।बहुत से लोगों ने एयरपोर्ट पर स्थित रहने की व्यवस्था की बुकिग कर ली है।स्थानीय लोग अपने-अपने घरों को लौटने लगे हैं।कुछ लोग अपने रिश्ते-नाते के लोगों से सम्पर्क कर रहे हैं।पत्नी कुछ ज्यादे ही परेशान है और धैर्य खो रही है।उसकी बातों में तल्खी उभर रही है।पता चला कि आसपास के सारे होटल भी भर गये हैं।मेरी समस्या यह है कि बाहर बरसात में सामान लेकर किधर जाऊँ।मैं भी बहुत लोगों से सम्पर्क साधने की कोशिश कर रहा हूँ परन्तु सफलता नहीं मिल रही है।नेटवर्क भी सही तरीके से काम नहीं कर रहा है।कुछ लोग उपदेश दे रहे हैं।ऐसे लोगों से चिढ़ हो रही है।शायद लोग मेरी शारीरिक कमजोरी और मनोदशा को नहीं समझ रहे हैं।साथ में खड़ी पत्नी भी आतंकित और भयभीत है।

कुछ फोन लग नहीं रहे हैं और जो लग रहे हैं उसमें से कोई -कोई उठा नहीं रहा है। इसी उधेड़बुन मे धनबाद के मनोज जी का फोन आया।जब मेरा रिंग गया तो वे कहीं व्यस्त थे।बताये कि वे कुछ मित्रो के साथ विन्ध्याचल में माँ के दर्शन के लिए आये हैं।मैंने अपनी परिस्थिति की चर्चा की।उन्होंने कहा,"आप बिल्कुल चिन्ता ना करें,कोलकाता में मेरा भाई अपने परिवार के साथ बड़ा बाजार में रहता है।अभी उससे बात करता हूँ।आपके रहने की व्यवस्था हो जायेगी।"

जान में जान आयी।थोड़ी देर में उनके भाई धनञ्जय जी का फोन आया। उन्होंने मुझे बताया कि एयरपोर्ट से बाहर बूथ है, जहाँ से टैक्सी उचित दर से मिल जायेगी।पैसा जमा करके कूपन या टिकट लेना है।वहाँ भी लाईन लगी थी।नेटवर्क यहाँ भी धीमा था।लाईन में लगे लोग आपस में बातें कर रहे थे।सबकी अपनी-अपनी समस्यायें हैं।सबको अपने-अपने घर जाने की जल्दी है।उनकी बातें सुनकर हमारा भी मन थोड़ा हुलसित हुआ और भीतर का भय कम होने लगा।धनञ्जय जी भी किसी काम से कहीं बाहर हैं।हमलोग टैक्सी में बैठ गये तो ड्राईबर से उनकी बात हो गयी।बरसात हो ही रही है।थोड़ी सी चिन्ता और भय अभी भी है।फिर भी टैक्सी अपनी धीमी रफ्तार से चल रही है।मुझे ना मार्ग का पता है और ना दूरी का। 

लगभग चालिस साल पहले का कुछ याद आ रहा है जब मैं कोलकाता में रहता था,सेंट जेवियर मे बी.एड का छात्र था और इसी बड़ा बाजार में किसी व्यवसायी की लड़की को पढ़ाता था। 

जिस जगह टैक्सी रुकी,वहाँ दूर-दूर तक ट्रकों की लाईन लगी थी।रातभर ट्रकों में सामान लादा जायेगा।सैकड़ो लोग खुले में बड़े-बड़े भवनों के नीचे सोये हैं।ये लोग दिनभर मजदूरी करते हैं और रात में इन्ही भवनों के नीचे आश्रय पाते हैं।कुछ लोग खुद और कुछ लोग सामूहिक खाना बनाते हैं।बरसात में दीवार से सटे सोने की कोशिश कर रहे हैं।उनकी जिन्दगी देखकर ईश्वर की व्यवस्था पर सोचने के लिए मजबूर हो रहा हूँ कि कैसे-कैसे वह सबकी व्यवस्था करता है।

धनञ्जय जी का फ्लैट चौथे तल्ले पर है।अभी तक वे घर नहीं आये हैं।एक छोटी लड़की सहमते-सहमते उतरती है और हमें लिफ्ट में आने का संकेत करती है।उनका घर अच्छा है।तीन बड़े कमरे हैं,कीचन और बाथरुम भी।धनञ्जय बाबू की बहन भी उनके साथ रहती है।उसके दो बच्चे हैं-एक लड़का,एक लड़की।धनञ्जय बाबू को भी एक लड़का और एक लड़की है।सभी किंचित संकोच और लज्जा के साथ मिलते हैं,चरण छूकर प्रणाम करते हैं।सामने शीघ्र ही बिस्कुट पानी के साथ चाय भी आ गयी।शायद मुझे चाय की तलब भी थी।धनञ्जय जी भी थोड़ी देर में आ गये।मनोज जी ने विधिवत परिचय दे दिया था, अतः परिचित होने में कोई देर नहीं हुई।उनकी सेवा-भावना देखकर मन खुश हो गया।खुशी और संतोष तो परमात्मा की इस लीला पर हुई और मेरा मन श्रद्धा से झुक गया।

हम उनके साथ १२ नवम्बर तक रहे और उनकी सेवा,श्रद्धा और आदर-सत्कार पाते रहे।मेरा हृदय परमात्मा के प्रति श्रद्धा से भर गया जिसने फिर एक बार मुझे बचाया और ऐसे लोगों के बीच रखा जहाँ मुझे प्रेम और आदर मिला।मैं कहता हूँ कि हम ईश्वर से नाता जोड़े रहें तो वह हमें कभी नहीं छोड़ता।केवल और केवल उसपर विश्वास करें और उसकी भक्ति में लगे रहें।

अगले दिन रविवार था और धनञ्जय बाबू का अवकाश था।उनके साथ हम राम-कृष्ण परमहंस की लीलास्थली जाकर परम पावनी गंगा और काली माँ का दर्शन किये। शायद परमात्मा की यही ईच्छा थी कि हम सिंगापुर जाने के पहले परमहंस राम-कृष्ण जी की आराध्या काली माँ का दर्शन करें।मैं तो यह भी मानने लगा हूँ कि परमात्मा हमें हर उस स्थान पर ले जाता है जहाँ जाना हमारी उन्नति या ऋण-मुक्ति के लिए आवश्यक है।बहुत आनन्द और भक्ति के साथ हम घर लौटे।प्रायः हर दिन हम धार्मिक-अध्यात्मिक चर्चा करते और यह चर्चा देर रात तक चलती।आनन्द यह भी था कि यहाँ सभी शाकाहारी और लहसून-प्याज के बिना भोजन करने वाले मिले।

बच्चे बहुत जोशीले और उत्साही हैं।आपस मे प्रेम भी है और प्रति-स्पर्धा भी। घर में धार्मिक संस्कार है तो नहाना और पूजा-गृह में हाथ जोड़ना उनकी दिनचर्या में है।उन सभी मे होड़ लगी रहती कि मेरी सेवा ज्यादा से ज्यादा करें।कोई बाँह दबा रहा तो कोई पैर।सभी बच्चे कहानियाँ,कवितायें और भजन सुना रहे हैं।भगवान से मेरी प्रार्थना है कि इन सभी पर कृपा करें और पूरे परिवार पर अपना अनुग्रह बनाये रखें।श्रीमती जी की भी खूब सेवा हो रही है और उनका मन प्रफ्फुलित रह रहा है।  

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