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डर . . .
डर . . .
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© Gajender Rawat

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जैसे ही उसने सड़क छोड़ी और नहर के मोड पर पहुंचा तो ठिठक गया एक पाँव नहर के किनारे की कोरी मिट्टी पर टिका दिया और गद्दी पर बैठे-बैठे ही साईकिल खड़ी कर ली। चारों तरफ देखा, नहर के दोनों ओर यूकेलिप्टस के ऊंचे पेड़ गाढ़े अंधेरे में इधर-उधर झूल रहे थे, हवा पेड़ों को बुरी तरह झकझोर रही थी। घुप्प अंधेरा और तेज़ दौड़ती साँय-साँय की आवाज़ उसके भीतर एक अद्भुत डर भरने लगी। क्या करूँ? इसी पगडंडी को पकड़ूँ या सड़क का लम्बा रास्ता लूँ? ग्यारह का वक्त तो हो ही गया होगा। वो सोचने लगा। यहाँ, नहर के आस-पास फैली ढेरों किवंदतियाँ, किस्से-कहानियाँ भय के ऐसे वक्त में उसका पीछा करने लगी। बरसों पहले एक प्रेमी जोड़े की नहर में डूबकर हुई मौत के बाद बहुत लोगों ने रात में उन दोनों प्रेमियों को यहाँ किनारे पर बैठे देखा था, उन्हें आपस में बात करते सुना था। उनकी रूहें अभी-भी आस-पास भटक रही हैं, वे शायद भूत बन गए। वैसे वे किसी को कुछ कहते नहीं अपनी आपसी बातों में लगे रहते हैं, प्रेम करते थे वे, बेचारों को जीने नहीं दिया इस जमाने ने! आत्महत्या! ओफ्फो! वो सोचता रहा।

“वे किसी को कुछ नहीं कहते” वो फुसफुसाया, “चल न यार,कुछ नहीं होता...

वो अंधेरे में नहर के किनारे-किनारे पगडंडी की जमीन को देखता हुआ धीरे-धीरे साईकिल के पैडल मारने लगा और फुसफुसाया, “कौन लम्बा चक्कर काट कर जाय, पहले ही टाइम ज़्यादा हो गया है।”

ये चलना बहुत देर तक नहीं हुआ। थोड़ी ही दूर चलकर वो रुक गया। इन दिनों वो एक प्लमबर के पास हेल्पर था। एक मकान का काम पूरा करने में आज बहुत देर हो गई थी। प्लमबर ने उसकी पाँच-छह रोज़ की दिहाड़ी रोकी हुई थी जो अभी रात में काम के बाद ही उसे थमाई थी। अब वही रुपए उसके भीतर कंपन पैदा कर रहे थे। ओफ्फो! ये बड़ी मुसीबत है, साला मिस्त्री ये भी आज देने थे। कोई छीन न ले? उसने सोचा और साईकिल से उतर कर खड़ा हो गया। उसका हाथ ऊपर कमीज की जेब से जा लगा। क्या किया जाय? वो सोचता रहा फिर कमीज़ की जेब से रुपए निकाल कर गोल बत्ती-सी बनाकर पाजामे के नाड़े में ठूँसने लगा। बाद में हाथ से ठीक से जाँचकर फुसफुसाया, “अब ठीक है, निकाल ले साले, कहाँ से निकालेगा'' ये ऊपर कुछ हिम्मत जुटाकर वो साईकिल पर चढ़ गया और पैडल मारने लगा। नजरें साईकिल के सामने की ज़मीन पर गढ़ाये रहा। कहते हैं सालो ने रास्ते में पतली-सी रस्सी बिछाई होती है जब कोई गुज़रता है तो रस्सी खींच देते हैं वो बेचारा औंधे मुंह गिरता है, बस जेबें झाड लेते हैं l ''नीच साले हरामी'' वो सोच रहा था। साईकिल चलाते-चलाते उसके हाथ-पाँव काँपने लगे, धड़कने बढ़ गई । ''पेड़ों के पीछे छिपे होते होंगे, साले रस्सी का सिरा पकड़कर'' वो फिर सोचने लगा और जमीन पर रस्सी जैसी संरचना ढूँढने लगा मगर अंधेरे में बड़ी मुश्किल से ऊंची-नीची मिट्टी ही दिखाई दे रही थी।

साईकिल के पैडल घूमने और तेज हवा की साँय-साँय मिलकर एक अजीब डरावनी ध्वनि उसके साथ-साथ आगे बढ़ती जा रही थी। उसकी धड़कने तेज़ थी फिर भी वो दिल को मनाते हुए सोचने लगा इस अंधेरे में लूट-पाट करने वालों को भी तो डर लगता होगा अगर मेरे सामने कोई आ गया तो भगवान कसम रिंच मारकर सिर फोड़ दूँगा, जो होगा देखा जाएगा अब क्या यार आधा रास्ता तो कट चुका है आगे तो रिंग रोड पर बड़ी-बड़ी लाइटें हैं, पुलिस नाका है, डर की कोई बात नहीं, एक बार बाहर पहुँच जाऊँचलते-चलते अचानक ही साईकिल का अगला पहिया रुक गया और उसी तेजी से वो छिटक कर झड़ियों में जा गिरा। वो बुरी तरह डर गया कि कहीं फंदा तो नहीं था। काँपते-काँपते वो कपड़े झाड़ता हुआ उठा और साईकिल तक आया। वहाँ बैठकर ज़मीन को करीब से देखने लगा, अगला पहिया एक गड्ढे में चला गया था। लाख शुक्र मनाया। वहाँ कोई रस्सी नहीं थी,चारों तरफ अंधेरे में देखा किसी तरह की कोई सरसराहट नहीं थी। उसकी जान में जान आई। साईकिल सीधी खड़ी की और हैंडल पर लटका थैला चैक किया, सामान ठीक-ठाक था फिर कमर की गोलाई में हाथ फेरा सब सुरक्षित था। अब तो साईकिल को लेकर पैदल ही पगडंडी पर चलने लगा। एक झुरझुरी सी अभी भी उसके शरीर में दौड़ रही थी। वहाँ रस्सी नहीं थी,कोई नहीं था ये उसके लिए राहत का बिन्दु था। वो चलता जा रहा था और एक हाथ से अभी भी अपने कपड़े झाड़ रहा था, झाड़ियों की चुभन अभी भी उसकी टांगों पर उठ रही थी। थोड़ी ही देर में वो हिम्मत जुटाकर साईकिल पर चढ़ गया। पैडल मारते हुए मिट्टी के ऊंचे-नीचे स्तर को आँखें गढ़ाए सावधानी से देखने लगा। बीच में क्षणभर के लिए इधर-उधर चारों ओर देख लेता फिर निगाहों को वापस साईकिल के चलते हुए अगले पहिये के नीचे की जमीन पर ले आता। देर तक वो यंत्रवत पैडल मारता रहा। बस थोड़ी और हिम्मत, उसने सोचा और नज़रें उठाकर देखा, सामने रिंग रोड की रोशनी दिखाई देने लगी।

उसका डर फुर्र हो गया,एक नई स्फूर्ति उसके भीतर भर गई। उसने साईकिल तेज़ कर दी और आँखें सामने रिंग रोड की रोशनी पर टिका दी। अब वो रस्सी के नीचे बिछे होने के डर से उबर चुका था। “चलो आज बच गये, सामने ही बैरीकेड है!” वो फुसफुसाया। उसने एक लम्बी सांस ली और भय व अंधेरे की पगडंडी छोड़ बड़े आत्मविश्वास के साथ रिंग रोड ये बारह से ऊपर का वक्त था। सड़क पर ट्रैफिक इक्का दुक्का था। वो दो आड़े बैरीकेड के बीच से निकला ही था कि उसे रोक दिया गया। रोकने वाले दो सिपाही थे लेकिन वो विश्वास से भरा था,यहाँ पर घबराहट का नामो-निशान नहीं था। एक सिपाही ने साईकिल को हैंडल से पकड़ा हुआ था, दूसरा उससे पूछताछ करने लगा। जहाँ वे लोग खड़े थे वहाँ से कुछ सुनाई नहीं दे रहा था बस दिखाई भर दे रहा था। थोड़ी देर में एक सिपाही ने साईकिल अलग खड़ी कर दी और वे दोनों उसके ऊपर झुक गये। शायद कुछ सवाल-जवाब चल रहे थे। अरे ये क्या साईकिल पर लटके थैले को एक सिपाही देखने लग गया फिर देर तक थैले में रखे रिंच पर बहस चलती रही। अरे ये क्या एक ने तो उसकी जेब तलाशी शुरू कर दी. इनकी नीयत ठीक नहीं लगती, कहीं रुपये हाथ न लग जायें! थोड़ी देर में दोनों सिपाही बड़े ही निराश हो गये,लगता है उसके पास से कुछ नहीं मिला। झुँझलाकर एक सिपाही ने उसे साईकिल की ओर धक्का दिया और गुस्से में हाथ के इशारे से जाने को कहा। वो बेचारा पहले से भी अधिक घबरा गया। साईकिल लेकर वहाँ से पैदल ही चलने लगा, निराश, अचंभित और हतोत्साहित! ठगा-सा रह गया था वो, यकीन नहीं हो रहा था कि अभी का घटनाक्रम सचमुच घटा था, वो देर तक चुप बना रहा बस उसके कदम यंत्रवत साईकिल को घसीटे चल रहे थे। कुछ और आगे आकर वो बड़बड़ाया, “ये साले भी! उनसे भी गये गुज़रे! वो तो अच्छा हुआ मैंने रुपये पहले ही सैट कर रखे थे वरना” उसने फिर एक हाथ से जांचा, रुपये सुरक्षित थे। बहुत रात हो चुकी थी उसने एक बार फिर पीछे मुड़कर देखा, नफरत से धरती पर थूक दिया और साईकिल पर चढ़ गया। अब वो तेजी से पैडल मारता हुआ दौड़ रहा था।

 

डर . . .

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