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School Buddies
School Buddies
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© Manju Sharma

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जाड़े की रात थी। मैं अपने दो स्कूली दोस्तों रोनित और भास्कर के साथ राजधानी एक्सप्रेस से मुंबई जा रहा था। मैं (अरुण), रोनित और भास्कर बचपन के दोस्त थे। हम 30 साल बाद मिल रहे थे। हम स्कूल के दिनों के अपने एक कॉमन दोस्तों में से एक मानस से मिलने मुंबई जा रहे थे। सुना है मानस मुंबई में एक बहुत बड़ा व्यापारी बन गया है। मुंबई के पॉश इलाकों में उसके तीन इंटीरियर के बड़े बड़े शोरूम हैं। मैं बहुत खुश था लेकिन मेरी पत्नी अदिति मेरे साथ यात्रा नहीं कर रही थी इस बात को लेकर तनिक दुख था दिल में। मैं और अदिति एक दूसरे को कॉलेज के दिनों से जानते थे। हर कोई कहता है कि हम दोनों एक-दूसरे के लिए बने हैं। 


अगले दिन सुबह हम मुंबई पहुँच गए। हमने होटल में चेक-इन किया पर हम सभी बहुत थके हुए थे तो हमने होटल में ही कुछ देर आराम करना मुनासिब समझा। अब शाम के 5 बज चुके थे और हम सब मुंबई भ्रमण के लिए तैयार थे। हमने टैक्सी ड्राइवर को "द गेटवे ऑफ़ इंडिया" की ओर ड्राइव करने के लिए कहा। मौसम भी सुहाना था। दूर से सुंदर सूर्यास्त दिख रहा था। आग की लाल गेंद धीरे-धीरे समुद्र के अंदर जा रही थी। मैं सोचने लगा कि सूर्य के उदय और अस्त होने की यह प्रक्रिया कितनी आश्चर्यजनक होती होगी। अचानक मुझे एहसास हुआ कि यह जीवन भी तो सुर्य की तरह है " यहां जो आया है उसे एक दिन तो जाना ही है"।


"अरुण अरुण, चलो हमें देर हो रही हैं, मानस हमारा इंतजार कर रहा होगा", अचानक मैंने सुना कि भास्कर मुझे बुला रहा था। हम कार में बैठ गए और ड्राइवर को मीरा रोड पर ले जाने के लिए कहा। हमारी गाड़ी एक बड़े से शोरुम के पास रुकी और हम ने जैसे ही शोरूम मे प्रवेश किया एक सुरक्षाकर्मी हमारे साथ आने लगा। हमें इशारे से एक केबिन की ओर जाने का निवेदन किया। उसका ऐसा करने पर हमें बड़ा गौरव का एहसास करा गया। हमारे चेहरे पर एक खुशी की लहर दौड़ने गई और तभी हम एक उच्च तकनीकी उपकरणों और सुविधाओं से लैस बड़े से केबिन में दाखिल हुए । वहाँ एक मोटा लेकिन आकर्षक दिखने वाला व्यक्ति हमारा इंतज़ार कर रहा था। उसे देखते ही हम चिल्लाए "ओए मानस तू कितना मोटा हो गया रे"। फिर हमने एक-दूसरे को बहुत कसकर गले लगाया। यह हम सभी के लिए एक भावनात्मक क्षण था। कुछ सेकंड के बाद हम सभी स्कूल में अपने बचपन के दिनों की स्मृतियों में खो गए। एक घंटा बीता, दो घंटे बीते पर हम अपनी बातों में पूरी तरह खो चुके थे। अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई तो देखा कि ऑफिस बाॅय कांच के दरवाजे से झाँक रहा था। साहेब, क्या मैं आप सभी के लिए कुछ खाना ऑर्डर कर दूं। उसकी आवाज़ सुनने के बाद हमें एहसास हुआ कि हमें जोरो से भूख लगी है और पेट में चूहे भी तांडव कर रहे हैं। मानस ने हम सभी के लिए भोजन और शीतल पेय लाने का आदेश दिया और हम फिर अपनी बातों में मशगूल हो गए। रात के खाने के बाद मानस ने हमें हमारे होटल में छुड़वा दिया। होटल में आने के बाद भी आज की हमारी मुलाकात के बारे में ही काफी देर तक सोचता रहा। तीन दशकों के बाद हम सब दोस्तों ने एक अच्छा समय बिताया था और हम सभी बहुत खुश थें। अचानक याद आया कि आज अदिति से सुबह से बात नहीं हुई है तो मैंने अदिति को फोन करना चाहा पर दुसरी तरफ फोन की घंटी बज रही थी लेकिन कोई जवाब नहीं आ रहा था। सोचा आधी रात हो चुकी है अदिति सो गई होगी। 


अगले दिन हम सभी के अपने अपने कार्यक्रम और योजनाएं थी। मुझे भी अपने कुछ रिश्तेदारों से मिलने जाना था। मैं पूरा दिन उनसे मिलने में ही व्यस्त रहा। शाम को मैंने सोचा कि चलो मुम्बई के कुछ प्रसिद्ध कैफे में जाएं और कुछ अच्छा समय बिताए। मैंने ड्राइवर से पूछा, क्या आप मुंबई के कुछ प्रसिद्ध कैफे जानते हैं। वह मेरी तरफ देखते हुए बोला, हाँ साहब, बहुत सारे हैं आप बताइए मैं आपको कहाँ ले जाऊँ। मैंने उससे कहा कि मुझे अपनी पसंद के अनुसार किसी अच्छे कैफे में ले जाओ। हमने एक कैफे में प्रवेश किया। प्रवेश द्वार पर एक सुरक्षाकर्मी कलाई में बैंड बांध रहा था और कैफे में प्रवेश करने की अनुमति दे रहा था।


जब मैं अंदर गया तो वहाँ एक युगल पहले से कैफ़े में बैठा हुआ था। प्रकाश कम होने के कारण, मुझे नहीं पता था कि वे कौन थे जब तक कि महिला घूम नहीं गई, और मैंने देखा कि वह महिला और कोई नहीं बल्कि मेरी पत्नी अदिति मानस के साथ बैठी थी। मैं हैरान था और मुंबई में उसे मानस के साथ देखकर तो बेहद ही हैरान हो गया। मैंने एक लंबी सांस ली और धीरे से मुँह में ही कुछ फुसफुसाया, अदिति, यहाँ कैसे आ गई। अचानक मुझे वहां देख कर वह भी सकते में आ गई थी लेकिन वह चुप रही और मानस मुझे कुछ समझाने की कोशिश करने लगा लेकिन मैं उससे कुछ भी सुनने के मूड में नहीं था। मैं कैफे छोड़ कर अपने होटल लौट आया। 


वो मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकती है? अदिति मुझे धोखा कैसे दे सकती है? अगर अदिति को मुंबई आना ही था तो वह मेरे साथ क्यों नहीं आई ? 

क्या मानस और अदिति अपने अपने जीवनसाथी को धोखा दे रहे हैं? 


ये सारे सवाल मेरे दिमाग में आ जा रहे थे और इसी उधेड़बुन मैं पूरी रात सो नहीं पाया और अगले दिन भी देरी से ही उठा। सिर भारी सा था और मैं कहीं जाने या किसी से बात करने के मूड में भी नहीं था। मानस और अदिति रात से ही मेरे नंबर पर कॉल करने की कोशिश कर रहे थे लेकिन मैं उनके कॉल का जवाब नहीं दे रहा था। मैंने अपने फोन और कमरे पर "डोंट डिस्टर्ब" का साईन लगा रखा था । दोपहर हो चुकी थी, एक होटल का कर्मचारी मेरे कमरे में आया और मुझे एक हाथ से लिखा हुआ नोट दिया, हालाँकि मैं कुछ भी स्वीकार करने के मूड में नहीं था लेकिन मैंने उससे नोट ले लिया। "आप भाग्यशाली विजेता हैं और आपके लिए एक सरप्राइज प्रतीक्षा कर रहा है"। नोट पढ़ने के बाद मैंने सोचा कि चलो देख ही आते हैं कि क्या सरप्राइज है। मैं नीचे लॉबी में आ गया। एक व्यक्ति मेरा इंतजार कर रहा था। मैंने उससे पूछा कि क्या है? वह मुझे होटल के मुख्य द्वार की ओर ले गया जहाँ एक बड़ी महंगी कार खड़ी थी। उसने मुझे कार में बैठने को कहा। मैं एक सम्मोहित व्यक्ति की तरह कार में बैठ गया। जैसे ही मैं कार में बैठा ड्राईवर ने कार चला दी और मुझे एक विशालकाय शोरूम के बाहर उतार दिया। मैं हैरान परेशान सा इधर उधर देख रहा था तभी मेरी निगाह शोरूम के अंदर गई और मैंने देखा कि शोरूम में अदिति, मानस, रोनित और भास्कर पहले से ही मौजूद हैं। मैं फिर से आश्चर्यचकित हो गया और मन में बुदबुदाने लगा आखिर यह क्या चल रहा है और सब मुझसे क्या छुपाने की कोशिश कर रहे हैं। धीरे धीरे मैं द्वार की तरफ बढ़ा और जैसे ही मैं अंदर पहुंचा तो मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं रही। 


तीस साल के बाद हमारे मिलन को एक विशेष रूप में चिह्नित करने के लिए मानस ने एक नए शोरूम का भव्य उद्घाटन रखा था और उस शोरूम का नाम "School Buddies" रखा था। मानस ने यह सब चुपके से अदिति की मदद से व्यवस्थित किया था। तभी अदिति मेरे पास आई है और मुझे कसकर गले से लगा लिया ।सब कुछ गुप्त रखने के लिए मुझसे माफ़ी मांगी। मानस, रोनित और भास्कर सभी हँसने लगे। मेरी आँखे नम हो गईं और उनमें से खुशी के आँसू भर आए। सब ने एक दूसरे को गले लगाया और उत्सव का आनंद लिया । वो रात हमारी जिंदगी की हसीन यादों को फिर से जीवित कर गई। धीमे स्वर में मधुर संगीत का आनंद लेते हुए हम सब फिर एक बार पुरानी यादों में खो गए और कब सुबह हो गई पता ही नहीं चला। उसी शाम हम सब को दिल्ली वापस लौटना था तो सब मानस को विदा कर अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान करने लगें। यह हम सभी के लिए एक यादगार यात्रा थी। 


दिल्ली पहुंच कर मुझे एहसास हुआ कि कभी-कभी हर किसी के जीवन में एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है जिसमें हम एक दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण को सही रूप से नहीं आंक पाते हैं और हम उन्हें एक बुरा व्यक्ति समझने लगते हैं। लेकिन जब सच्चाई से रूबरू होते है तो हमें वह व्यक्ति ही जीवन का सबसे अच्छा व्यक्ति लगने लगता है। यहां भी मेरे साथ वही स्थिति पैदा हो गई थी। मानस के साथ अदिति को देखने के बाद मैं उन दोनों को धोखा देने का आरोप लगा रहा था लेकिन अंत में स्थिति कुछ और ही निकली। जीवन में एक दूसरे पर भरोसा ही सही मायने में हर रिश्ते को बहुत आगे तक ले जाता है।


मैंने अदिति को एक प्यार भरा नगमा सुनाया जिसे सुनकर वह इतनी खुश हुई कि उसने मुझे गले से लगा लिया। 


जीवन दृष्टिकोण का

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