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बदसूरत आदमी
बदसूरत आदमी
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© Rani Ram Garhwali

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दरवाजे पर थप-थप की आवाज़  सुनकर मैंने घड़ी में देखा तो सुबह के छः बज रहे थे। सर्दियों का

मौसम था। कोहरे ने पूरी तरह से अपना जाल फैला रखा था। इसलिऐ सुबह का समय होने के कारण कुछ

भी दिखाई नहीं दे रहा था। अगर कुछ दिखाई दे रहा था तो केवल अँधेरा ही अँधेरा  था।

सुबह-सुबह कौन हो सकता है? बुदबुदाते हुऐ  मैंने दरवाजे की तरफ देखा। लेकिन कमरे में घुप्प अँधेरा

होने के कारण मुझे कुछ भी दिखाई नहीं दिया। मुझे लगा कि यह मेरा वहम है या फिर मेरे कान बज रहे

होंगे, या फिर ऐसा भी हो सकता है कि वह थपथपाने की आवाज़  और कहीं से आ रही हो। दिल्ली जैसे

शहरों में कोई कभी भी किसी का भी दरवाजा खटखटा सकता है। मैंने उस आवाज़  पर कोई ध्यान नहीं दिया

और अपने चारों ओर रजाई को लपेटते हुऐ  मैंने करवट बदल ली थी। रजाई में से मेरा उठने का मन नहीं हो

रहा था। वैसे भी उस कमरे मे मैं अकेला था और किराए पर रह रहा था।

मैं सुबह अपने समय पर अपनी नौकरी पर चला जाता और अँधेरा  होने पर ही अपने कमरे में लौटता।

इसलिऐ  मेरा उस मकान में रहने वाले लोगों से ज़्यादा कोई सम्पर्क नहीं था। कई लोग तो ऐसे भी थे जो न

मुझे जानते थे और न ही मैं उन्हें जानता था। न राम-राम और न ही दुआ सलाम। अपने काम से काम...।

तभी दुबारा फिर से थप-थप की आवाज़  मेरे कानों से टकराई, वह आवाज़  मेरे कमरे के दरवाजे से ही आ

रही थी। मुझे पूरा यक़ीन   हो गया था कि कोई मेरे दरवाजे को थपथपा रहा है।

न चाहते हुऐ  भी मैंने दरवाजा खोलकर देखा तो सामने गबरू खड़ा था। उसके एक हाथ में खाली बोतल

थी और दूसरे हाथ में पुराना टीन का डिब्बा था। डिब्बा देखकर मैंने अंदाज़ा लगा लिया था कि वह छत पर

पक्षियों के लिऐ  दाना डालकर आया होगा।

“क्या बात है...?” अपनी आवाज़  पर थोड़ा सा ज़ोर  देते हुऐ  मैंने पूछा।

“एक बोतल मिट्टी तेल उधार दे दो शाम तक वापस लौटा दूँगा। अगर मुझे तेल नहीं मिला तो मैं भूखा ही

रह जाऊँगा।”

उसके शब्दों को सुनकर मुझे बहुत गुस्सा आया। क्योंकि मैं गबरू को अपने आगे खड़ा नहीं देखना चाहता

था। मुझे उसकी शक़्ल से ही नफ़रत थी। इतना बदसूरत आदमी मैंने अपनी ज़िंदगी  में पहले कभी नहीं देखा

गबरू उम्र में साठ साल से भी ऊपर का रहा होगा। उसके सारे के सारे बाल सन के फूल की तरह सफेद हो

चुके थे। चेहरे पर झुर्रियों ने अपना जाल बिछा रखा था। उसकी आँखों का रंग नीला था जो कि उल्लू की

तरह बड़ी-बड़ी व बाहर को निकली हुई थी। लेकिन उसकी उन आँखों पर नज़री चश्मा था। जिसके शीशे

बहुत मोटे थे। जिसके फ्रेम को उसने कई जगह से धागे से बाँध कर ठीक किया हुआ था। उसकी नाक

लगातार बहती थी। वह हमेशा लँगड़ा कर चलता था।

अगर उस वक़्त  मेरे हाथ में छुरी होती तो मैं अवश्य ही वह छुरी गबरू के सीने में भोंकते हुऐ  उसकी हत्या

कर देता। मैंने इतनी ज़ोर  से दरवाजा बंद किया कि दरवाजा बंद करने की कर्कश आवाज़  उस मकान में रहने

वाले लोगों ने भी सुनी होगी। यहाँ तक कि दरवाजे की आवाज़  सुनकर उस वक़्त  सोए हुऐ  नन्हें बच्चे भी

बिलबिलाते हुऐ  जाग गऐ  होंगे।

उस दिन मैं गुस्से में भन्नाता रहा। मैं ऑफिस  में मन लगाकर काम नहीं कर सका। कागज-पेन हाथ में लेता

या किसी फाइल को देखता तो ऐसा लगता जैसे गबरू एकाएक फाइल में से निकल कर मेरे सामने खड़ा हो

गया हो। लंच के समय जब मैंने लंच बाक्स खोला तो गबरू के टेढ़े-मेढ़े, पीले, सड़े, काले दाँत, याद आते ही

मुझे उबकाई आने लगी तो मैंने अपना सारा खाना उठाकर सड़क के किनारे लेटे हुऐ  कुत्ते के सामने डाल

दिया था। जब तक मैं ऑफिस में रहा ऐसा लगा जैसे कि गबरू किसी साये की तरह मेरे पीछे-पीछे चल रहा

छुट्टी होने के बाद जैसे ही मैं ऑफिस  से बाहर निकला, हल्की बारिश होने लगी थी। बारिश में भीगते हुऐ

जब मैं घर पहुँचा तो बदन मे धीरे-धीरे दर्द होने लगा था। दर्द से छुटकारा पाने के लिऐ  मैंने दर्द निवारक

गोली ली। फलस्वरूप कुछ ही देर में मुझे आराम मिल गया।

दूसरे दिन फिर मैं ऑफिस  के लिऐ  जाने निकला तो दर्द फिर सुरू हो गया था। मैंने फिर गोली ली और

फिर अपने ऑफिस चला गया।

इसी तरह से मुझे गोली लेते हुऐ  सात-आठ दिन बीत गऐ  थे। लेकिन इसके बाद जब मुझे बुखार आया तो

मेरे लिऐ  चारपाई में से उठना मुश्क़िल  हो गया था। सारी रात मैं बुखार में तड़पता रहा। बुरे-बुरे सपने

देखता रहा, बड़बड़ाता रहा, क्या बड़बड़ा रहा था...? मुझे नहीं मालूम...। सुबह होते ही मैंने यह सोचकर

दरवाजा खुला छोड़ दिया था कि अगर कोई आऐगा  तो मुझे दरवाजा खोलने के लिऐ  उठना न पड़े।

मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैं अकेले डा0 के पास जा पाता। मैं लगातार इस इंतेज़ार  में रहा कि

कोई कमरे मे आऐ  तो मैं उसे डा0 के पास चलने के लिऐ  कहूँ। लेकिन सारा दिन बीत जाने के बाद भी जब

कोई नहीं आया तो अँधेरा  होते ही मैंने फिर वही दर्द निवारक गोली ले ली थी। दरवाजे के दोनों पट मैंने इस

कदर आपस मे भिड़ा दिऐ  थे कि अगर कोई दरवाजा थपथपाये तो मुझे दरवाजा खोलने के लिऐ  न उठना

पड़े। बल्कि दरवाजे पर थोड़ा सा भी ज़ोर पड़ने पर दरवाजा अपने आप ही खुल जाऐ ।

दूसरे दिन भी कमरे में कोई नहीं आया। बुखार में तपने के कारण मैं अपने होश-ओ-हवास में नहीं था। आँखें

खोलते ही मुझे ऐसा लगता जैसे किसी दूसरी दुनिया के लोग मुझे अपने साथ ले जाते हुऐ  मुझे तरह-तरह की

यातनाऐं  दे रहे है।

लेकिन तीसरे दिन चर्र की आवाज़ सुनकर मैंने आँखें खोली तो दरवाजे पर गबरू खड़ा था। मेरे पास

आकर वह बोला, “क्या बात है? तुम दो-तीन दिनों से दिखाई नहीं दिऐ?”

“तुम्हें क्या मतलब...?” मैं इतने धीरे से बोला कि उसने मेरे शब्दों को सुना होगा कि नहीं, मुझे कुछ पता

नहीं...। लेकिन मेरे माथे पर अपना दाहिना हाथ रखते हुऐ  उसने कहा, “ओ! तुम्हें तो बहुत तेज़   बुखार है!

दवाई ली...?”

मैं ख़ामोश रहा।

“अच्छा मैं डा0 को बुलाकर लाता हूँ।” कहते हुऐ  उसने अपनी जेब को हलके से दबाया और लँगड़ाते हुऐ

बाहर निकल गया । जाते हुऐ  वह दरवाजा पूरी तरह खुला छोड़ गया था। सरसराती हवा के बदन से

टकराते ही मेरी आँखें बंद होने लगी थी।

कुछ ही देर बाद गबरू डा0 को लेकर आ गया था। डा0 ने माथे पर हाथ लगा कर व स्‍टैथस्‍कोप से

जाँचने के बाद कहा, “कुछ खाया...?”

“नहीं...।” मैंने ‘न’ में अपना सिर हिलाते हुऐ  मरी हुई-सी आवाज़  में कहा।

“पहले कुछ खा लो सुई लगेगी।”

डा0 की बातें सुनकर मैं ख़ामोश हो गया। क्योंकि कमरे में खाने के लिऐ  कुछ भी नहीं था। लेकिन गबरू

लँगड़ाते हुऐ  कमरे से बाहर निकल गया था। कुछ ही देर बाद जब वह वापस लौटा तो उसके एक हाथ में

ब्रेड व दूसरे हाथ में दूध का गिलास था। दूध का गिलास व ब्रेड मेरी ओर बढ़ाते हुऐ  उसने कहा, “थोड़ा खा

लो, सुई लगेगी।”

“मुझे भूख नहीं है।”

“खाली पेट दवाईयाँ नहीं दी जाती। आपको थोड़ा-बहुत तो खाना ही पड़ेगा?”

डा0 के कहने पर मैंने न चाहते हुऐ  दूध और ब्रेड ले ली थी। मुझे सुई लगाने के बाद डा० और गबरू दोनों

बाहर निकल गऐ  थे। डा0 को छोड़ने के बाद गबरू ने वापस आकर कुर्सी पर बैठते हुऐ  कहा, “मैं बदसूरत

आदमी हूँ। लोग मेरी सूरत से नफ़रत करते हैं। शायद आप भी मुझसे नफ़रत करते हो। इसीलिऐ  तो आपने

मुझे मिट्टी तेल नहीं दिया। मेरी बदसूरती के कारण ही मेरी पत्नी किसी दूसरे आदमी के साथ भाग गई थी।

पता नहीं, ईश्वर ने मुझे इतना बदसूरत क्यों बनाया है?... शायद यह मेरे किसी पिछले जनम के करम होंगे,

या फिर ऐसा भी हो सकता है कि मैं पिछले जनम में बहुत ख़ूबसूरत रहा हूँगा। कहते हैं कि हर इंसान को

अपने पिछले जन्मों के करमों को भोगना पड़ता है। पहले मैं इस बात को नहीं मानता था। लेकिन जिस दिन

से मेरी पत्नी भागी...मैं इन बातों को मानने लगा हूँ और अपने अगले जनम को सुधारने की कोशिश कर रहा

हूँ। ताकि अगले जनम में मेरी बेटी मुझे पिता कहे।”

गबरू की बातों को सुनकर मेरा माथा झनझना गया था। अपने गुस्से को रोकते हुऐ  मैंने चुपचाप करवट

बदल ली थी। ताकि गबरू चला जाऐ । लेकिन गबरू नहीं गया। कुछ देर तक कमरे में शांति छाई रही और

फिर उसने कहना शुरू किया, “मेरी एक लड़की है, वह अपने चाचा-चाची के साथ रहती है! मैं उसका पिता

हूँ। यह बात वह अच्छी तरह से जानती है। लेकिन फिर भी वह अपने चाचा को पिता और अपनी चाची को

माँ कहती है। मैंने जब भी उससे कहा कि मैं उसका पिता हूँ तो उसने कहा, ‘नहीं मेरा पिता मंगलू है।’ मंगलू

अर्थात मेरा छोटा भाई। मैं जब भी गाँव जाता हूँ तो उसके लिऐ  ढेर सारे खिलौने, कपड़े व उसकी पसंद की

चाकलेट ले जता हूँ ताकि वह मुझे पिता कहे। लेकिन वह मुझे पिता नहीं कहती, मैं चाहता हूँ कि वह मेरी

गोद में बैठकर मुझे पिता कहे। अपनी बच्ची के मुँह से अपने लिऐ पिता शब्द सुनने के लिऐ मेरे कान तरस

गऐ  हैं। रोज रात को सोचता हूँ कि सुबह उठते ही वह मुझे पिता कहते हुऐ  अपने साथ खेलने को कहेगी, मेरे

से चिजी माँगेगी। उस वक़्त  मैं उसे अपने दोनों हाथों में लेकर हवा में उछालूँगा। उसे गुदगुदी देकर ज़ोर -ज़ोर

से हँसाऊँगा। वह हँसती रहेगी और मैं उसके नन्हें-नन्हें सफेद मोती जैसे दाँतों को देखकर सोचूँगा कि मेरा

जनम सफल हो गया है। लेकिन सुबह होते ही वह मेरे पास तक नहीं पटकती। वह मुझे पिता नहीं कहती।

जबकि मैं चाहता हूँ कि वह मुझे पिता कह कर पुकारे। मुझे देखते ही वह चीखने चिल्लाने लगती है। शायद

इसलिऐ  न कि मैं बदसूरत आदमी हूँ।”

मैं ख़ामोश   रहा। शायद वह मेरे ‘क्यों’ शब्द के इंतेज़ार  में था। जबकि मैं उससे क्यों नहीं पूछना चाहता

गबरू बड़ी देर तक मेरे पास बैठा रहा। उसकी बातें मुझे नीरस व बे सिर-पैर की लग रही थी। बुखार के

कारण मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। अगर उस वक़्त  मेरे पास छुरी होती तो अवश्य ही मैं उस

बदसूरत आदमी का ख़ून  कर देता। मैंने गुस्से में भन्नाते हुऐ  कहा, “क्यों मुझे परेशान कर रहे हो?...मुझे चैन

से रहने दोगे या नहीं। तुम्हारी पत्नी भाग गई है तो मैं आत्महत्या कर लूँ क्या?...तुम्हारी बेटी तुम्हें पिता

इसलिऐ  नहीं कहती कि तुम इसके काबिल हो ही नहीं। तुम्हारी इन बातों ने मुझे परेशान कर दिया है।”

गबरू ने उठते हुऐ  कहा, “कोई भी मेरी बातों को सुनने के लिऐ  तैयार नहीं होता। मैंने सोचा कि तुम मेरी

बातों को सुनोगे, लेकिन तुमने भी मेरे साथ वही व्यवहार किया जो और लोग मेरी बातों को सुनकर करते

हैं। फ़र्क  इतना रहा कि लोग मेरी बातों को सुनकर ज़ोर -ज़ोर  से हँसते हैं लेकिन तुम मेरी बातों को सुनकर

नहीं हँसे। मेरे साथ सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि मैं किसी के सामने न तो रो सकता हूँ और न ही हँस

सकता हूँ। मेरी पत्नी होती तो मैं उसके सामने हँस लेता या फिर रो लेता!”

“...तू रो या मत रो। लेकिन मुझे चैन से रहने दे।” कहते हुऐ  मैंने अपने दाँतों को भींच लिया था। अगर

शरीर में उठने की हिम्मत होती तो मैं फल काटने वाली छुरी को लेकर उसका ख़ून  कर देता। मुझे वह अच्छा

नहीं लगता था। उसकी शक्ल से मुझे नफ़रत सी हो गई थी। क्योंकि मुझे वह दुनिया का सबसे बदसूरत

आदमी दिखाई देता था।

गबरू बड़बड़ाते हुऐ  उठकर चला गया। लेकिन कमरे से बाहर जाते-जाते उसके शब्द लगातार मेरे कानों

से टकरा रहे थे।

“मैं जानता हूँ...सभी मुझसे नफ़रत  करते है। क्यों करते हैं..? यह मुझे कोई नहीं बताता। लेकिन मैं

जानता हूँ कि वे मुझसे नफ़रत  क्यों करते हैं, क्योंकि मैं बदसूरत आदमी हूँ? मेरी शक्ल अच्छी नहीं है।

लेकिन इसमें मेरा क्या दोष...? दोष तो नीली छतरी वाले का है न, जिसने मुझे ऐसी शक्ल दी है। लोग भी

ठीक ही करते हैं जो कि मुझसे नफ़रत  करते हैं। अगर मैं बदसूरत नहीं होता तो मेरी पत्नी मुझे छोड़कर क्यों

गबरू के चले जाने के बाद मैंने चैन की सांस ली। अपनी आँखों को खोलने का प्रयत्न करते हुऐ  मैं

बड़बड़ाया था, ‘तुझे ज़िंदा  रहने का कोई हक नहीं है गबरू। जब तेरी पत्नी तुझे छोड़कर चली गई है और

तेरी लड़की तुझे पिता नहीं कहती है तो तुझे मर जाना चाहिऐ । ऐसे आदमी को आत्महत्या कर लेनी

चाहिऐ । तेरे जैसे बदसूरत आदमी का इस दुनिया में ज़िंदा  रहना ठीक नहीं है। लेकिन मैं तुझसे वादा करता

हूँ गबरू, जिस दिन मेरा मौका लगेगा मैं तेरी हत्या कर दूँगा । जब तक तू मर नहीं जाऐगा तब तक मैं तेरे

पेट में छुरियाँ  घोंपता रहूँगा।’

बड़ी मुश्क़िल  से चारपाई से उठकर मैंने यह सोचकर छुरी उठाकर अपने तकिऐ  के नीचे छिपा ली थी कि

गबरू जब मेरा हालचाल जानने के लिऐ आऐगा  तो मैं उसका ख़ून  कर दूँगा। मुझे बीमार देखकर कोई भी

मेरे पर यह शक़ नहीं करेगा कि मैंने ही गबरू का ख़ून  किया है। अगर कोई शक़  करता है तो करता रहे। वैसे

भी गबरू को इस दुनिया में जीने का कोई हक नहीं है।

लेकिन उसके बाद गबरू नहीं आया। मैं हर बार छुरी को देखता कि वह अपनी जगह है या नहीं। मुझे

उम्मीद थी की गबरू मेरा हालचाल जानने के लिऐ  ज़रूर  आऐगा  और जैसे ही वह आऐगा  मे उसकी हत्या

कर दूँगा । लेकिन गबरू को नहीं आना था तो वह नहीं आया।

तीसरे दिन रात को मेरी तबियत बहुत ज्यादा खराब हो गई। कुछ देर तक मैं उल्टियाँ  करता रहा। लेकिन

उसके बाद क्या हुआ मुझे कुछ पता नहीं। लेकिन जब मैंने अपनी आँखें खोली तो मैं अस्पताल में पड़ा था।

नर्स का कहना था कि मुझे अस्पताल में पूरा एक महीना हो चुका है। जब तुम्हें इस अस्पताल में लाया गया

तब तुम मरणासन्न हालात में थे। तुम्हें कोई होश ही नहीं था।

तभी मुझे गबरू आता दिखाई दिया। उसके हाथ में फल थे। मेरे पास बैठते हुऐ  उसने कहा, “तुम्हें

अस्पताल में पूरा एक महीना हो गया है। जब मैं तुम्हारे कमरे में आया तो तुम बेहोश थे। मैं ही तुम्हें

अस्पताल लाया था। अच्छा किया न मैंने...? लेकिन तुम्हें अवश्य ही बुरा लग रहा होगा कि मुझे तुम्हें

अस्पताल नहीं लाना चाहिऐ था। मैं जानता हूँ कि तुम मुझसे नफ़रत करते हो। लेकिन मैं किसी से नफ़रत

नहीं करता। अपनी पत्नी से भी नहीं जो कि किसी दूसरे पुरुष के साथ भाग गई थी।”

उसने एक बार मेरे माथे पर अपना हाथ रखा और अपने थैले में से पपीता व छुरी निकाल कर मेरे सामने

रखते हुऐ कहा, “तुम्हारे लिऐ पपीता लाया हूँ।”

मैं कुछ देर तक छुरी देखता रहा। सोचने लगा कि उस छुरी से गबरू का ख़ून हो सकता है या नहीं। जब मैं

उस छुरी से गबरू पर वार करूँ तो उस वक़्त वह छुरी उसके कलेजे के आर-पार हो सकती है नहीं। गबरू

किसी भी तरह से बचना नहीं चाहिऐ ।”

“छुरी अच्छी है न...? मैंने कल ही इस पर तेज़  धार लगाई है, ताकि फल काटने में तुम्हें कोई परेशानी न

हो। हाथ मत काट देना। शरीर में थोड़ी सी भी खरोंच लगने से बहुत दर्द होता है।”

मैंने एक बार अपने आस-पास देखा। लोगों की नज़रें  हम दोनों पर ही टिकी हुई थी। अगर उस वक़्त  कमरे

में कोई और नहीं होता तो मैं सचमुच में ही गबरू का ख़ून  करके वहाँ से भाग जाता।

“जब भी तुम्हें भूख लगे। पपीता थोड़ा-थोड़ा करके खाते रहना। शरीर में ताकत आऐगी। आदमी के शरीर

में ताकत रहेगी तो वह कुछ भी कर सकता है, मतलब किसी का ख़ून भी कर सकता है! लेकिन भूखे पेट तो

वह मक्खी भी नहीं मार सकता।” कहते हुऐ वह ज़ोर -ज़ोर  से हँसने लगा था। उसकी हँसी सुनकर वार्ड के

सभी लोग हमारी ओर देखने लगे थे। मुझे लगा जैसे अचानक ही कोई भूखा भेड़िया वार्ड मे घुसकर अपने

साथियों को बुला रहा हो।

गुस्से मे कसमसाते हुऐ मैंने छुरी उठा ली थी। लेकिन यह जानते हुऐ मैं ख़ामोश   रहा कि सभी लोगों की

नज़रें  हम पर टिकी हुई हैं।

मेरे बार-बार मना करने के बाद भी गबरू हर रोज मुझे देखने अस्पताल आता रहा । मेरे लिऐ अन्य फलों

के साथ-साथ वह पपीता ज़रूर लाता था। एक दिन अपने थैले में से पपीता निकालते हुऐ उसने कहा,

“पपीता रोज खाना चाहिऐ , पपीता सेहत के लिऐ  बहुत लाभदायक होता है।...मेरी पत्नी को पपीता बहुत

पसन्द था। वह जब तक मेरे साथ रही मुझसे पपीता लाने को कहती रही। पता नहीं... दूसरा आदमी उसके

लिऐ  पपीता लाता भी होगा या नहीं?” कहकर वह उदास को गया।

“...तुम्हारी पत्नी क्या खाती थी, क्या नहीं खाती थी...? मुझे तुम्हारी ये ऊट-पटाँग की बातें बिलकुल

पसन्द नहीं हैं। मुझे यहाँ चैन से रहने दो।’’

गबरू ख़ामोश   हो गया था। उसकी आँखें गीली हो आई थी। अपने आँसू पोंछते हुऐ वह बोला, “मैं जिस

किसी को भी अपने दुःख की बातें सुनाता हूँ उसे मेरी बातें बे सिर-पैर की नज़र आती हैं। मुझे यह शक्ल

देकर ईश्वर ने मेरे साथ न्याय किया या अन्याय...यह मैं नहीं जानता। लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि

ईश्वर ने मुझे वह दर्द ज़रूर  दिया है जिसके कारण मैं दूसरों के दर्द को अपना दर्द समझता हूँ।” कहते हुऐ

गबरू चला गया।

उसकी आँखों में आँसू देखकर मैं विचलित हो गया था।

मैं समझ गया था कि वह बदसूरत ही नहीं पागल है। ऐसे पागल को इस संसार में जीने का कोई हक़ नहीं

है। धरती का बोझ तो कुछ कम होगा। अगर अस्पताल में रहते हुऐ मैं उसका ख़ून  कर दूँगा तो मेरे पर कोई

शक़ नहीं करेगा। सभी जानते हैं कि मैं तो एक महीने से अस्पताल में पड़ा हूँ। सोचते हुऐ मैंने अपने तकिए के

नीचे हाथ डालकर देखा तो छुरी अपने स्थान पर ही थी। आज तो गबरू चला गया है। लेकिन कल वह फिर

आऐगा  और जैसे ही मुझे मौका मिलेगा। मैं उसका ख़ून कर दूँगा।

अगले दिन गबरू फिर अस्पताल आया तो मेरे पास बैठते हुऐ वह बोला, “अब कैसे हो...?”

“ठीक हूँ।” न चाहते हुऐ भी मुझे उसे जवाब देना पड़ा। मैंने इधर-उधर देखा। वार्ड में बैठे सभी लोगों की

नज़रें गबरू पर टिकी हुई थी।

“आज मैं तुम्हारे लिऐ  कोई फल नहीं लाया। आज मैं तुम्हारे लिऐ  चाकलेट लाया हूँ। जानते हो क्यों...?”

“हाँ...क्योंकि तुम्हारी बेटी को चाकलेट बहुत पसन्द है...”

मेरे उत्तर को सुनकर वह ज़ोर -ज़ोर  से हँसने लगा था। हँसते हुऐ  उसके पीले दाँत साफ़  दिखाई देने लगे थे,

दाँतों के बीच में पीला-पीला पीप जैसा कुछ जमा हुआ था। अचानक ही उसके मुँह से बदबू का एक भभका

मेरे नथुनों से टकराया तो मेरा जी मिचलाने लगा था।

“तुम जानते हो कि मैं लँगड़ा कर क्यों चलता हूँ, नहीं जानते न...? एक बार बचपन में मेरे पैर में एक

फोड़ा हो गया था। आस-पास कहीं डा0 तो था नहीं...। इसलिऐ  मेरी माँ रात को मेरे घुटने पर सोते समय

मिट्टी का लेप कर दिया करती थी। मुझे क्रिकेट खेलने का बहुत शौक़ था। एक दिन मैं गाँव के बच्चों के साथ

क्रिकेट खेल रहा था। मैं विकेट के पीछे गेंद को पकड़ने के लिऐ खड़ा रहता था। हमारे गाँव में बदरू नाम का

एक लड़का तेज़ गेंद फेंकता था। जब वह गेंद फेंकता था तो मैं डर जाता था। उसी की एक तेज़  गेंद को

पकड़ने की कोशिश में गेंद मेरे पैर में फोड़ें की जगह लगी। जिसके कारण मेरे पैर का फोड़ा फूट गया। ख़ून

बहने लगा था। दर्द के मारे मेरा बुरा हाल था। उस रात माँ ने मेरे पैर पर मिट्टी व राख का लेप लगा दिया

था। मैं रात भर दर्द से तड़पता रहा। मेरी चीखें सुनकर माँ सारी रात मेरे पास बैठी रही। काफ़ी कोशिशों के

बाद मेरा पैर ठीक तो हुआ, लेकिन लँगड़ा हो गया। तब से मैं लँगड़ा कर चलता हूँ। ज्यादा पैदल चलने से

मेरे पैर में दर्द होने लगता है।...पर मैं कर भी क्या सकता हूँ? मजबूरी है। पैर कटने से तो लँगड़ा कर चलना

ही अच्छा है...

मैं चुपचाप उसकी बातें सुनता रहा। कर भी क्या सकता था। जब वह जाने लगा तो मैंने तकिऐ के नीचे से

छुरी निकाली और धीरे-धीरे उसके पीछे-पीछे चलने लगा। जब वह सीढ़ियों से उतरने लगा तो मैंने इधर-

उधर देखा। वहाँ सीढ़ियों पर कोई नहीं था। मेरे पास गबरू का ख़ून करने के लिऐ  यह एक अच्छा मौक़ा था।

मैंने छुरी का हत्था मजबूती से पकड़ लिया था। मन में खयाल आया कि गबरू का काम दो-तीन बार में ही

हो जाना चाहिऐ ।

मैं दबे कदमों से उसके पीछे-पीछे सीढियाँ उतरने लगा तो अचानक ही वह पीछे पलटते हुऐ  बोला,

“अरे...तुम क्यों आऐ ? कुछ चाहिऐ  क्या? तुम्हें सख़्त आराम की ज़रूरत है।” कहकर उसने मेरा हाथ पकड़ा

और फिर मुझे वापस चारपाई तक छोड़कर चला गया ।

अगले दिन गबरू फिर अस्पताल आया। स्टूल पर बैठते ही वह बोला, “अपना ध्यान रखना। एक-दो दिन

में तुम्हें अस्पताल से छुट्टी मिल जाऐगी। लेकिन मैं उस वक़्त नहीं आ सकूँगा। बहुत ज़रूरी काम आ गया है।”

कहकर वह चला गया। अन्य दिनों की अपेक्षा आज वह मेरे पास ज्यादा देर नहीं बैठा। लेकिन नर्स के पास

जाकर वह बड़ी देर तक बातें करता रहा। क्या बातें करता रहा मुझे नहीं पता।

उसके ठीक दो दिन बाद नर्स ने मुझे डिस्‍चार्ज स्लिप देते हुऐ  कहा, “अब आप घर जा सकते हैं। आपको

अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है। लेकिन आज वह आदमी नहीं आया...?”

“कौन सा आदमी...?”

“वही, जो हर रोज़ तुम्हारे पास आता था। जो भेड़िये जैसी आवाज़ में हँसता था। गबरू...गबरू...!”

“वो बदसूरत आदमी...!”

“हाँ...हाँ...वही, क्या लगता है वह तुम्हारा?”

“कुछ भी नहीं...!”

“कुछ भी नहीं...?” नर्स ने चौंकते हुऐ  कहा, “लेकिन तुम्हें बचाने के लिऐ तो उसी ने अपना ख़ून  दिया

“ख़ून ...और मुझे...उस बदसूरत आदमी ने...?”

“हाँ...। अपना ख़ून  देकर उसने तुम्हें बचाया है। बदसूरत होने से क्या होता है? वह रूप तो उसे ईश्वर ने

दिया है। उसके दिल में झाँक कर देखते तो तुम्हें उसकी ख़ूबसूरती नज़र आती। वह अपनी पत्नी से बहुत प्यार

करता था, अब भी करता है।”

“आपको यह सब किसने बताया...?”

“उसी ने बताया है। वह रोज हमारे पास आकर हमसे कहता कि हम तुम्हारा ख़याल रखें। तुम उससे

नफ़रत  करते हो न...?”

नर्स की बातें सुनकर मैं सन्न रह गया। जिस बदसूरत आदमी का मैं ख़ून करना चाहता था। वही मुझे

अपना ख़ून देकर नयी जिन्दगी दे गया। मैं सोचों मे उलझ गया। गबरू दो दिनों से अस्पताल नहीं

आया।...क्यों, नहीं आया होगा?

सोचते हुऐ  मैं तकिऐ के नीचे से छुरी निकालकर कर उसे बड़ी देर तक देखता रहा और फिर मैंने गुस्से मे

आकर वह छुरी खिड़की की ओर उछाल दी थी। उसके बाद मुझे गबरू फिर कभी नहीं मिला।

लेकिन एक दिन मुझे अचानक ही गबरू का पत्र मिला। पत्र में उसने लिखा था, “अब आप कैसे हो...? मैं

अपने गाँव में हूँ और ठीक हूँ। तुम्हारी बहुत याद आती है। कभी अस्पताल की तरफ जाओगे तो नर्स को मेरी

नमस्ते कहना। कहना कि मैं उन्हें भी बहुत याद करता हूँ। आपको अच्छी ख़बर देना चाहता हूँ। मेरी बेटी की

शादी हो गई है। जिस दिन वह विदा हुई, उस दिन वह मेरे सीने से लगकर बहुत रोई थी। वह रोते हुऐ मुझे

बार-बार पिता कह रही थी। उसके मुँह से पिता शब्द सुनकर मुझे इतनी ख़ुशी हुई कि मुझे लगा...मैं दुनिया

का सबसे ख़ूबसूरत व भाग्यशाली पिता हूँ। बेटी को विदा करते वक़्त अगर मेरी पत्नी होती तो वह मुझसे भी

ज्यादा रोती। तब मैं उसे सांत्वना देते हुऐ  कहता, ‘कि मत रो...बेटी तो पराऐ घर की अमानत होती है।’ मैं

जानता था कि तुम मेरा ख़ून करना चाहते थे। इसीलिऐ तुम मेरे पीछे-पीछे अस्पताल की सीढ़ियों तक आये

थे। लेकिन ख़ून करना इतना आसान नहीं होता, जितना कि तुम सोचते हो...। अपना ख़याल रखना। पपीता

ज़रूर  खाना...!

गबरू का पत्र पढ़ते हुऐ  मैं बड़बड़ाया, ‘तुम्हें सब पता था गबरू, फिर भी तुम ख़ामोश रहे।’ बड़बड़ाते हुऐ

मैंने उस पत्र को छुरी की जगह तकिये के नीचे रख लिया था।

 

बदसूरत आदमी

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