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वो इश्क की शुरुआत
वो इश्क की शुरुआत
★★★★★

© Kshitij Bhatt

Romance

3 Minutes   2.7K    16


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आज भी कुछ ढाई साल पुराने वो लम्हें याद करता हूँ तो चेहरे पर एक मुस्कान खुद अपना स्थान बना लेती है। तब मैं बिल्कुल ऐसा न था, बहुत ज्यादा गंभीर व्यक्तित्व को खुद में सहेजता था, लगता था कि कम बोल कर दुनिया को अपना बना लूँगा और तुम मुझसे पूरी तरह अलग थी- मस्ती की चलती फिरती दुकान की तरह।

मुझे आज भी वो लम्हा अच्छे से याद है, जब हम एक टूर की वजह पहली बार मिले, तुम बस में बैठी हुई थी और मैं जब अपने दोस्तों के साथ बस में चढ़ा तो मेरी नजर तुमसे जा टकराई, मैं मुस्कुराया जो कि बिना प्रयास के हुआ- कभी-कभी सोचता हूँ कि शायद वो मुस्कान इक तरफ़ा प्यार की शुरुआत थी...

वो टूर कुल पाँच दिनों का था पर उस दरमियाँ हमारी कभी बात तक नहीं हुई, शायद तुमने मुझे तवज्जो नहीं दी और मैं किसी को भी तवज्जो देना नहीं चाहता था लेकिन जिस दिन हम लौट रहे थे तब तुम्हारा फोन खराब हो गया जो मेरे थोड़े से प्रयत्न से सही तो हुआ ही, साथ ही एक कहानी का सूत्रधार बन गया क्योंकि अगले दिन सुबह तुम्हारा मुझे मैसेज आया था- 'गुड मॉर्निंग'।

उस एक 'गुड मॉर्निंग' ने जिन्दगी में बहुत कुछ अच्छा किया तो बहुत कुछ खराब भी...

तब हम दोनों एक-दूसरे से बहुत दूर जा चुके थे, इतने कि मिलना संभव ना था पर हमारी बातें शुरु हुई, दोनों को लगा कि वो हम सफर मिल गया जिसकी तलाश है। फेसबुक पर ही बात करते करते दो साल बीत गए, दोनों 'बेस्ट फ्रेंड' बन गए थे पर मैंने मन ही मन तुम्हें कुछ और ही मान लिया था, जिसका जाने अनजाने मैं तुम्हारे सामने इज़हार करता रहता था और तुम ऐसा बर्ताव करती थी जैसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा है पर आज भी जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि शायद तुम मेरा दिल टूटने से बचाना चाहती थी।

फिर जिन्दगी का वो पड़ाव आया जिसने प्रेम के इज़हार को संभव बनाया। तब हम दोनों की परीक्षाएँ समाप्त हो चुकी थी, उन दिनों दोनों के घर में दिन में कोई नहीं होता था तो बातों का सिलसिला ऐसा शुरू हुआ कि कब रात को होती फेसबुक चैट से दिन भर की 8-9 घण्टे की फोन कॉल में आ गये पता भी नहीं चला और वो एक महीने की फोन कॉल एक दूसरे के इतना पास ले आई जितना दो साल की चैट भी नहीं ला सकी थी, दोनों के मन में भावनाओं का ज्वार हिचकोले मार रहा था, एक आकर्षण प्रेम में बदल रहा था जो मेरे लिए किसी संजीवनी से कम नहीं था।

अंततः वह दिन भी आया जिसका मुझे बेसब्री से इंतजार था, तुम्हें खोने के डर से तुमसे कभी प्रेम का इज़हार नहीं कर पाया था, पर इशारों ने दोनों को अब तक सब कुछ समझा दिया था। रात को लगभग 11:30 में जब तुमने दोनों के दिल की बात सामने रखी तो तुम भी जानती थी कि नहीं की कोई संभावना नहीं है क्योंकि दोनों एक दूसरे के दिल के भावों से वाक़िफ़ थे पर तब भी उस सच को सुनकर मैं कुछ पागल सा हो गया था।

तुमने इज़हार से पहले ही शर्त रखी थी कि अगर पहले भावों को मैं अभिव्यक्त करूँगी तो आगे आने वाली सभी समस्याओं जिनमें दोनों के परिवारों को रजामंद करना भी था मेरी जिम्मेदारी होगी और इसे नकारने का मेरे पास कोई कारण भी तो नहीं था।

यहाँ पर ऐसा लगने लगा था कि जिन्दगी पूरी हो गई है, तलाश खत्म हो चुकी है पर ये तो शून्य के जन्म की पटकथा मात्र थी जिसकी रिक्तता मुझे आज तक अंदर ही अंदर खाए जाती है और शायद तुम्हारे साथ भी यही होता होगा...

पटकथा रिक्तता शून्य

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