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अम्मी
अम्मी
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© Sahil Tanveer

Inspirational

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छोटे भाई का कॉल आया "अम्मी आखिरी सांसें ले रही है, आप जल्दी से घर आ जाओ।" मैंने तुरंत ट्रेन पकड़ी और घर के लिए निकल पड़ा।  

अभी आधे रास्ते में ही था कि छोटे भाई का फिर से कॉल आया, रुंधे हुए स्वर से कह रहा था "अम्मी आपसे बात करना चाहती है। आप अपनी गलती की माफ़ी मांग लीजिये और दूध का क़र्ज़ बख़्शवा लीजिये।"

मेरे आँखों में आंसूं भर चुके थे, गला रुंध गया था। उधर अम्मी की ज़ानिब से कुछ सिसकियों की आवाज़ आ रही थी। मैं अम्मी से कैसे कुछ कह पाऊं, ना दिमाग काम कर पा रहा था और ना ही जुबां हरकत कर पा रही थी। बस आँखों से जारो-कतार आंसू गिर रहे थे। अम्मी की क्या अहमियत होती है, शायद यहीं बात समझ आ रही थी। 

अम्मी बताती है, वह उस वक़्त से नमाज़ पढ़ती है जब से उसने उठना बैठना सीखा, तुतलाई ज़ुबान में बोलना सीखा (ऐसा उसे उसके अम्मी-अब्बू यानी मेरे नाना-नानी बताते हैं)। चूँकि अम्मी भी कभी एक छोटी बच्ची थी, किसी की बेटी है ।
वह बताती है, जब उसकी शादी हुई तो उस वक़्त हमारा घर आर्थिक तंगियों से जूझ रहा था। अब्बू की अभी-अभी सरकारी नौकरी लगी थी 1200 रूपये महीने पर, पेमेंट तय तारीख पर नहीं मिलती और इसी पर एक लंबा-चौड़ा परिवार आश्रित था। कभी-कभी ही दो वक़्त का खाना नसीब हो पाता। अम्मी जिसे नैहर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी, यहाँ भूखों पेट बिना किसी से कुछ कहे, सो जाना पड़ता। चावल, दाल, तेल वगैरह जो कुछ भी सामान खरीदकर आता उसमें से वह थोड़ा-बहुत छुपाकर रख देती। यह बचाया हुआ अनाज  किसी मेहमान के घर आ जाने पर काम आता। मेहमान को आभास नहीं होने दिया जाता कि हमारी दयनीय स्थिति क्या है।

चूँकि,अब्बू सख्त मिजाज़ के थे (हालांकि अब ज़्यादा सख्तमिजाज़ नहीं हैं)  हर वक़्त गुस्से में रहते। अम्मी की कोई क़द्र नहीं करते।  सुना है कि कभी-कभी वो अम्मी पर हाथ भी उठा देते, लेकिन बावजूद इसके उसे कोई शिकायत नहीं होती। वह बताती है कि उसके नैहर में कभी कोई भूले से भी डांटकर नहीं बोलता था। घर में सबसे प्यारी वो ही  थी। यहाँ उसे अपने सास के नखरे भी उठाने पड़ते।

चूँकि, अम्मी एक सभ्य समाज की सभ्य औरत भी है, उसे पता है मान-मर्यादा,इज़्ज़त किसको कहते हैं। उसे बताया गया कि एक अच्छी बहू किस तरह की होती है। उसे यह भी बताया गया कि ससुराल की बातों को नैहर में बताया नहीं करते।

वह हर नमाज़ों में अब्बू की सख्तमिज़ाज़ी, अपने सास यानी मेरी दादी की सख्तमिज़ाज़ी और घर की आर्थिक तंगी को लेकर दुआएं करती।

ननद  यानी मेरी बुआ जो कि एक अब्बू से बड़ी थी और एक अब्बू से छोटी, उनके भी नाज़ ओ नखरों को अम्मी को बर्दाश्त करना पड़ता। देवर यानी मेरे अंकल जो छोटे-छोटे थे उन्हें वह एक भाभी की तरह नहीं, बल्कि एक माँ की तरह ख्याल रखती।

दिन धीरे-धीरे सुधरने शुरू हुए, लेकिन पड़ोसियों ने धीरे-धीरे हमारे घरवालों को तंग करना शुरू कर दिया। नतीज़ा घर अभी आर्थिक तंगियों से उबरा नहीं था कि विपदाओं से घिर गया, जिससे अब्बू का गुस्सा ज़ाहिर था और ज़्यादातर गुस्सा अम्मी पर ही निकलता।

अम्मी बताती है कि जिस दिन मेरी पैदाईश हुई उसी दिन घर पे जो केस-मुकदमा दर्ज था सारा रफा-दफा हुआ।

हम दो भाई ही हैं। मैं और मुझसे छोटा, कोई बहन नहीं है। अम्मी चूँकि पांचवी ज़मात तक पढ़ी थी तो उन्होंने ही हमें ऊर्दू का अली बे, हिंदी का क ख ग,  इंग्लिश का ए बी सी और गिनती,पहाड़ा सिखाया।

अब्बू टीचर थे (थे नहीं अब भी हैं) हमें पढ़ाते भी थे, लेकिन सबक याद ना होने पर काफी धुनाई करते। कई बार तो याद होते हुए भी हम डर से भूल जाते। अम्मी ने वहीं चीज़ खेल-खेल में प्यार से सिखाया, हमारी प्राथमिक शिक्षा दी। उसके बाद अब्बू ने कुछ पढ़ाया। अब्बू के डर की वज़ह से हम अम्मी के पास जाकर छुप जाते (हालाँकि अब डर नहीं लगता वो अब एक दोस्त की तरह बर्ताव करते हैं)

मैं आठवीं क्लास तक बिस्तर पर ही पेशाब कर देता था, अम्मी बिना उफ़्फ़ किये पूरे बिस्तर को धोती। जब मैं साल भर का था तो मुझे न्यूमोनिया हुआ था, बचने की कोई उम्मीद नहीं थी और इधर अम्मी का मेरी तबीयत ख़राब देखकर बुरा हाल था। रोते-रोते आँखों के आंसू सूख गए थे। अम्मी बताती है कि अब्बू भी रो पड़े थे मेरे बचने की कोई उम्मीद ना देखकर।

खैर,मैं दुआओं से बच गया।

जब अम्मी का ऑपरेशन हुआ था, उस वक़्त हम दोनों भाई क्रमशः 8, 5 साल के थे।  अम्मी के बचने की कोई उम्मीद नहीं थी। वो बार-बार हमें देख रही थी और उसके आँखों से जारो-कतार आंसूं गिर रहे थे (हम भाइयों का इस बात का इल्म नहीं, घरवाले बताते हैं)। जानने वाले कहते हैं कि अम्मी हम लोगों की वज़ह से  बच गई।

चूँकि, अम्मी धार्मिक है। फ़रिश्ते आये भी थे रूह कब्ज़ करने, लेकिन अम्मी के ज़हन में सिर्फ और सिर्फ हमारा चेहरा था। हमारे परवरिश की चिंता थी। बताते हैं कि वह हमारे वज़ह से खुदा से चन्द साँसें  मोहलत की मांग ली।

उसके पास पैसे नहीं होते थे। थोड़ा सा जो धान,गेहूं बचाकर वह रखती थी अपने सास के चुपके हमें थमा देती, हम दोनों भाई दौड़कर दुकान जाते और चवनिया, अठनिया मिठाई खरीद कर मस्ती में झूमते गाते।

अब्बू किसी ख़ास मौके पर ही हमें चार आना, आठ आना या फिर एक, दो रुपया दिया करते थे। कभी कोई मेहमान आ जाता तो हमलोगों के लिए बहार आ जाती। वज़ह, उनके जाते वक़्त 5, 10 रूपये हमें मिल जाते।

अम्मी हमें सलाहियत वाली बातें सिखाती, जैसे:- बुज़ुर्गों की इज़्ज़त करना, झूठ नहीं बोलना, मन लगाकर पढ़ाई करना, चोरी नहीं करना (जबकि वह हमारे वज़ह से थोड़ा-बहुत धान,गेहूं छुपा लेती।) और नमाज़ पढ़ना वग़ैरह...वग़ैरह... जो अब भी घर जाने पर नसीहतों की पोटली बांधकर देती है।

अम्मी ने कभी हम दोनों भाईयों के बीच कम-ज़्यादा मुहब्बत नहीं किया। हालाँकि अब्बू मुझसे ज़्यादा मुहब्बत करते हैं, छोटे भाई की अपेक्षा। लेकिन माँ की ममता सभी बेटों पर एक समान होती है।

एक बार अब्बू ने मुझे जोर से थप्पड़ जड़  दिया था, मैं रोते-रोते घर से भाग जाने की बात करने लगा। पर भाग कर जाता कहाँ? घर के पीछे बने अनाज़ की बेरी के पीछे छुप गया। कुछ देर के बाद सबको ज्ञात हुआ कि मैं घर से भाग चुका हूँ। अम्मी जो हमेशा अब्बू से दबी हुई आवाज़ में बात करती, अब्बू से लड़-झगड़ रही थी(मैं छुपा सबकुछ सुन रहा था।) पूरा गांव ढूँढ लिया गया, रिश्तेदारों तक मेरे भाग जाने की ख़बर पहुँचाई जाने लगी। लेकिन  मैं  कहीं दूसरी जगह होता तभी तो मिलता, मैं  तो यहीं, घर पर ही छुपा था, बेरी के पीछे। खैर, जब भूख लगी 3-4 घंटे बाद तो मैं निर्दोष भाव से अम्मी के पास चला गया। अम्मी रो रही थी। मुझे देखते ही उसने अपने आँचल में छुपा लिया।

इधर दो साल पहले जब मैं घर लौटने में देर हो चुका था, रात के करीब नौ बज रहे थे तो अम्मी ने फोन पर हिदायत देते हुए कहा "आओ मैं तुम्हारी खबर लेती हूँ, तुम्हें बहुत पीटूंगी, तुम हद से ज़्यादा बिगड़ गए हो, बताओ इतनी रात तक घर से बाहर कौन  रहता है?" वग़ैरह... वग़ैरह...

पहले तो वो काफी परेशान थी लेकिन मेरे घर पहुँचते ही उसके जान में  जान आयी। मैंने हंसते हुए कहा "अम्मी तुम  तो मुझे मारने वाली थी, क्या हुआ?"

उसने बेना(पंखा,हाथ से डुलाने वाला पंखा) से धीरे-धीरे एक दो बार मारा, जिसपर मैं यह कहते हुए हंसने लगा कि "अम्मी इससे चोट तो लगी ही नहीं" इसपर वह भी हंसने लगी।

अम्मी बताती है कि मैं किस हाल में रहता हूँ उसे  सारी खबर होती है। वह घर बैठे-बैठे मेरी खैरियत जान लेती है।

               "दूर होने पर भी नज़दीक से देखती है

               "माँ बिन बताये बेटे की खैरियत समझती है "

इधर जब दिल्ली में मेरा बाइक से एक्सीडेंट हुआ था, तो कुछ देर बाद ही अम्मी का कॉल आया। वह कह रही थी कि उसे कुछ गड़बड़ लग रहा है कहीं तुम्हें कुछ हुआ तो नहीं?

चूँकि, मैं अम्मी को  परेशान नहीं होने देना चाहता था, उसे बेचैन नहीं होने देना चाहता था तो मैंने सबकुछ सामान्य बताया। लेकिन, माँ तो आखिरकार माँ ही होती है। ना जाने कैसे उसे सबकुछ पता चल जाता है।

3-4 महीने बाद जब मैं घर गया, तो उसे मेरे चेहरे के दुबलाहट के पहले मेरे ज़ख्मों के निशान दिखाई पड़े, जो कलाई के पास थे और जिन्हें काफी सलीके से मैंने छुपा रखा था। वो मुझपर भड़क उठी कहने लगी "मुझे तुमपर यकीन नहीं रहा, तुमने झूठ क्यूँ बोला? तुमने कुछ बताया क्यों नहीं? अरे, तुम्हें कुछ हो गया होता तो हमारा क्या होता ...?" और ग़मगीन हो गई। 

वह कहती है कि जिस दिन मैं उससे बात नहीं करता उसे नींद नहीं आती है। वह मेरे ही ख्यालों में खोई रहती है कि मैं कैसा हूँ। 

इधर, एक बार और जब अम्मी की बिमारी ने गंभीर रूप धारण किया। (पटना, दिल्ली और भी बहुत जगहों से लगभग पिछले 10 सालों से इलाज़ चल रहा था लेकिन तबीयत में कुछ सुधार नहीं हो पा रहा था और ना हीं कोई बीमारी सामने आ रही थी। रिश्तेदारों में से बहुतेरे शैतानी हरकत की आशंका जताते तो बहुतेरे खुदाई इम्तेहान की बात भी बताते।)

तो छोटे भाई का एक दिन कॉल आया "अम्मी आखिरी सांसें ले रही है, आप जल्दी से घर आ जाओ।"  मैंने तुरंत ट्रैन पकड़ी और घर के लिए निकल पड़ा।  

अभी आधे रास्ते में ही था कि छोटे भाई का फिर से कॉल आया रुंधे हुए स्वर से कह रहा था "अम्मी आपसे बात करना चाहती है।  आप अपनी गलती की माफ़ी मांग लीजिये और दूध का क़र्ज़ बख़्शवा लीजिये। "

मेरे आँखों में आंसूं भर चुके थे, गला रुंध गया था। उधर अम्मी की ज़ानिब से कुछ सिसकियों की आवाज़ आ रही थी। मैं अम्मी से कैसे कुछ कह पाऊं, ना दिमाग काम कर पा रहा था और ना ही जुबां हरकत कर पा रही थी। बस आँखों से जारो-कतार आंसू गिर रहे थे। अम्मी की क्या अहमियत होती है, शायद यहीं बात समझ आ रही थी।

खैर, अगले दिन घर पहुंचा, अम्मी बेहोश थी। काफी देर बाद बेहोशी टूटी। अम्मी की आवाज़ नहीं निकल पा रही थी। मेरे सलाम  का जवाब उन्होंने ख़ामोशी से दिया। गौर से देखा बेबसी के आंसूं निकल रहे थे, जिसे देखकर छोटा भाई कमरे से बाहर निकलकर रोने लगा। मेरे आँखों से भी आंसूं निकलने वाले थे लेकिन मैं ढ़ीठ होकर उनसे मुक़ाबला  करता रहा।

बाकी रिश्तेदार बता रहे थे कि अम्मी की ये हालत देखकर अब्बू भी रो पड़ते हैं, शायद अम्मी की अहमियत उन्हें  समझ आ चुकी हैं।

फरवरी से दिसम्बर टोटल 11 महीने तक अम्मी की तबीयत  ख़राब रही, खुदा के फ़ज़्लो-करम से हालत अभी सुधर रहे हैं।  इन्हीं 11 महीनों के बीच में मुझे डेंगू हो गया था। मैंने अम्मी की दुआओं में सुना वो खुदा से कह रही थी "जितने भी दुःख, तकलीफ, परेशानी हो खुदा तुम मुझे दे दो। मेरे बेटों के हिस्से की सारी तकलीफें मुझे दे दो। हमारे बेटों को हमेशा खुशहाल, आबाद रखो, उन्हें किसी भी तरह की परेशानियों में मत डालो।" 

ये दुआएं वो उस वक़्त मांग रही थी जब सभी कह रहे थे कि इतनी पीड़ा कोई सहन न कर पाए, दुःखों से टूटकर ख़ुदकुशी कर ले। इस नाज़ुक परिस्थिति को देखते हुए अब्बू ने मेरी शादी करनी चाही ताकि बहू अपने सास यानि मेरी अम्मी की सेवा कर सके, कम से कम अपनी पहली पतोहू का मुंह देख ले। लेकिन अम्मी ने यह कहकर साफ मना कर दिया कि "मैं अपनी थोड़ी सी लालसा खातिर अपने बेटे के सफलता के मार्ग में रोड़ा नहीं बनना चाहती। मैं रहूँ या ना रहूँ जब बेटा अपनी पढ़ाई कम्पलीट कर ले, जब कामयाब हो जाये तभी उसके पसंद से उसकी शादी की जाये" 

     "कहते हैं कि अम्मी ने हमारे खातिर फिर से खुदा से चन्द सांसें मोहलत की मांग ली है"

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