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बीबी
बीबी
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© Harish Sharma

Drama

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कंजूसी और चटोरापन शायद बुढ़ापे और बचपन की विशेष आदतें है।

घर का सबसे पुराना और ठंडा कमरा। इसकी छत आज भी लकड़ी के लाल शहतीरों से बड़े करीने से सजी है। कमरे के पीछे एक और कमरा। इसमें पुराने संदूक और पेटियां बड़े बड़े गलीचों से ढकी पड़ी है। कमरे की एक दीवार में बनी अलमारी में कुछ पुराने पीतल के बर्तन जैसे किसी याद को सहेज के रखा गया हो। अन्य दीवारों पर देवी देवताओं के कुछ नए पुराने कलेंडर। एक कोने में पुरानी हाथ से चलाई जाने वाली चक्की। कमरे के बड़े रोशनदानो में कुछ पुराने मटके।

छत के बीचो बीच चलते पंखे के नीचे बड़े पायों वाली पुरानी चारपाई। ये चारपाई और इसकी मजबूती शायद उतनी ही पुरानी है जितनी पुरानी है हमारी बीबी की इस घर से जुडी यादें। सुबह होते ही वे सबसे पहले उठ कर अपने पोपले मुंह को खाने लायक बनाने के लिए अपनी चारपाई के नीचे पड़े लोटे को उठाएगीं। उसके भीतर भरे पानी में डूबे अपने नकली दांत इस तरह फिट करेगी जिस तरह कोई अपने जेब में पर्स रखता हैं। फिर कुल्ला करके दीवार में बनी एक अलमारी से रस का पैकेट निकलेगी और मेज पर कटोरी से ढके चाय के गिलास को वही पड़ी बड़ी कटोरी में डाल लेगीं और उसमे रस को डुबो डुबो कर खायेंगी।

चाय में आज भी मीठा कम हुआ तो "ये बहूँ चाय दे के गयी है यां गर्म पानी। अरे भई तुम लोगो को ये शूगर वूगर होता है तो क्या सारा संसार मीठा खाना बंद कर दे।" वे मन ही मन कोसेगीं।

"अरे गुड्डू ...बेटा थोड़ी चीनी दे के जाना ...।" वो पोते को आवाज लगा देगीं।

असल में वो सुनाना बहू को ही चाहती है। और फिर बहूँ खीजती सी आयेगी और शक्कर का एक छोटा डिब्बा लगभग पटकते हुए उनके पास रख देगी।" जितना मन हो डाल लो, हमारे डालने से तो तुम्हारा मीठा पूरा होने से रहा।"

बीबी बूढ़ी हैं और उनकी सारी इच्छाएं जीभ पर केंद्रित हो गई है। पर मन है कि पैसा होने के बावजूद उसे खर्च करने का हौसला नही देता। बीबी ऐसी ही हैं हमारी। उम्र लगभग अस्सी के पार। चलने फिरने की ज्यादा इच्छा नही है। बाथरूम टॉयलेट कमरे के साथ ही है, बस वहां तक दिन जितना चल दी अब हैं तो हैं, आप जितना मर्जी प्रवचन कर लीजिए, मरती मर जाएगी पर खीसे से एक पैसा भी बड़ी कंजूसी से खर्च करेंगी।

बाबा सरकारी कर्मचारी थे, उनके जाने के बाद अच्छी पेंशन पाती हैं पर आदत अभी भी पैसा जोड़ने और कंजूसी से ख़र्चनी की गई नही।बच्चों की तरह अपने पास पड़ी विशेष खाने वाली वस्तु को किसी के साथ नहीं बांटेगी। रोटी सब्जी जो घर मे बनी हो, वो पेट भर गुजराकरती है।

दलिया, खिचड़ी की पूरी शौकीन। कब्ज की मरीज वो दूसरों के लिए थी।

"अरे भाई जब कुछ आने लायक होगा तो अपने आप बाहर आ जायेगा, सारा दिन बेकार पखाने की चिंता किये रहते हो।" उनके लिए कब्ज एक वहम थी।

चाचा, पिता जी सब समझाते -अब तुम्हारा हाजमा कमजोर पड़ गया है, सलाद, दाल और फल ज्यादा खाया करो। पर वे टस से मस न हुई।

उलटे उन्ही को सुनते हुए कहती" अपनी घरवालियों का हाजमा सभालो। हमने तो तुम सबको जो खा के पैदा किया और बाद में खाया उसी की बदौलत अभी तक काम चल रहा है। एक ये हैं फल, सलाद खाने वाली, बच्चे भी जने तो पेट चिरवा के, झाड़ू पोचा वो इनसे बैठ के होता नहीं, अभी क्या उम्र है इनकी और सब घुटने पकड के हाय हाय करती रहती हैं। इनकी उम्र में पूरा घर लीपा है मैंने गोबर और मिटटी से पैरो के सिरहाने बैठ कर। मुझे कहती है कि मेरा हाजमा कमजोर है। फ़िक्र मत करो तुम्हारे ऊपर अपनी देह का बोझ नहीं पड़ने दूँगी, इश्वर ने चाहा तो खाती पीती और चलती फिरती मरूंगी।"

पिछले दस सालो में तीन चार बार उनकी तबियत खराब हुई। लगा कि अब कुछ दिन की मेहमान है। डाक्टर से चेकअप होता। सारे टेस्ट सही आते। शूगर बी पी सब नार्मल। थोडा बहुत केलोस्ट्रोल बढ़ा दिखता। दो चार दिन दवा पानी खाकर फिर ठीक हो जाती। खाने पीने की फिर वही आदते। अच्छी तड़का लगी खिचड़ी, गुड की शक्कर से सरोबार गेंहूँ का दलिया और तली बघारी सब्जी बीबी के खान पान में फिर शामिल हो जाते। रिश्तेदार और आस पड़ोस के लोग कहते कि जो मांगती हैं वही दे दो। उसके भाग का है, पूरा कर रही है। सेहत की जयादा चिंता मत करो।

घर की सब बहुएं भुनभुनाती हुई सुनती। उन्हें भी आदत पड़ चुकी थी। बाकी कडवा सच तो था ही।

रात के खाने में अगर दाल बनती तो मुंह फूला लेती, मन मारकर रोटी के टुकड़े को डाल से जरा जरा सा छुआकर खातीं। मां चाची उनके नखरों को लेकर बड़बड़ाया करती।

बीबी के नखरेबाज होने का भी कारण था। वह अक्सर बताया करती कि किस तरह उनके जब वो कुआरी थी किस प्रकार सारे घर का काम काज संभालती थी। पांच भाइयों की इकलौती बहन। भाई और पिता खेती का सारा काम संभालते। जमीन काफी थी। घर मे पांच भैसे और दो देसी नस्ल की गाय थी। उनका दूध दुहना, सम्भालना, मथना आदि सब काम बीबी के जिम्मे थे। घर मे दूध लस्सी घी की कोई कमी नही थी पर सब पर बीबी का नियंत्रण था। चौके में चूल्हे पर रखे बड़े मिट्टी के बर्तन में दूध कढता रहता। खेत मे जब फसल का काम होता तो चाय लस्सी सब बीबी खेत मजदूर के हाथ भेजती। बीस बीस जनों की रोटियां बना पका कर भेजना सब बीबी अपनी भाभी के साथ करवाती।

उनकी माँ गठिया की मरीज थी जिस कारण उनसे ज्यादा काम न होता था। शाम मुंह अंधेरे जब भी और पिता घर लौटते तो चूल्हे पर कढ़ रहे दूध में आटे से बनी सवईया पक चुकी होती। बीबी खुद सबको बड़े कटोरों में भर भर कर खाने को देती। पास में गुड़ की शक्कर का भरा कटोरदान पड़ा होता जिसका जितना मन होता अपनी सेवइयों में डाल लेता। उन दिनों लोग शारीरिक मेहनत ज्यादा करते थे इसलिए मीठा खूब खाते पर किसी को शक्कर रोग नही होता था। बीबी कई बार भाइयों के लिए रोटियों में शक्कर और खूब सारा घी डाल कर चूरी कूटती। और उनके लड्डू बनाकर थाल में रख देती। सब भाई बांट कर खाते और बीबी की बड़ी प्रशंसा करते। भाभी को भी अपनी ननद का पता था कि खाने में दाल उसे बिल्कुल पसंद नही। तली बघारी सब्जियां हो, खिचड़ी, दलिया, सवईया, खीर पूड़े हो, ये ही बीबी की पसंद थे।

साढ़े पाँच फुट से ज्यादा लम्बी बीबी घर के कूड़े करकट से भरी तीस चालीस किलो के बड़े टोकरे को ऐसे ही थोड़ा उठा कर बाहर ढलान में फेंक आती। सारे पशुओं का गोबर खींचना, इकठ्ठा करना और उसके बाहर लगी रूडी पर फेंकना बड़े जोर के काम थे। बीबी सब बड़े हिम्मत से करती।

"ये घर कम था, हवेली ज्यादा। रहने वाले मै, तेरे बाबा और उनकी माँ। काम तो एक आंगन और कमरे से चल जाता था लेकिन पूरे घर को मै झाड़ू, पोछा लगा के साफ़ रखती।पूरे घर का फर्श गोबर और मिटटी से लीपती। मेरे भाई ने एक बार गाँव से ही मिस्त्री भेज दिया और उसके साथ खुद काम करवा के सब टूट फूट की मुरम्मत करवाई। बंटवारे के बाद जब सरकार ने घर का कब्ज़ा दिया था तो मेरे ससुर को ये घर मिला। परिवार बड़ा था इसलिए घर भी काफी बड़ा था। पहले इस घर में मुसलमान रहते थे। सुनते है जाने से पहले अपना सब दबा गडा अपने जान पहचान वाले पड़ोसियों को दे गये थे। हम लोग भी ऐसे ही लुट पिट कर लाहौर से इधर आये थे। तब बड़ा बुरा वक्त था। मै भी कोई बाढ़ तेरह साल की रही हूँगी।" बीबी बताती और हम बच्चों की आँखों के सामने कितने ही दृश्य जैसे साक्षात् होने लगते।

"अच्छा बीबी अपने घर से कोई सामान वगैरह नहीं निकला, जो मुसलमान छोड़ गए थे।" हमें जिज्ञासा होती जानने की।

"अरे कहा दो दो फुट चौड़ी दीवारे थी इस हवेली में, दीवार में कही कही ईंट की पीछे कोई खड्ड सी होती। उसमे मिटटी के बर्तन निकलते या उनमे चूना भरा होता। हाँ ये ऊपर की तरफ मेरे कमरे की दीवार में एक अलमारी जैसा रखना सा बना था। भाई ने मिस्त्री से छत की मुरम्मत करवाते समय साफ़ करवाया तो लोहे के बड़े बर्तन निकले थे। और बाकी मेरी सास बड़ी घुन्नी थी, सब पैसा टका कहाँ है कहाँ नहीं है वो सब खोज बीन कर चुकी थी। तेरे बाबा के लिए पूरे पांच हजार उन दिनों मेरे ससुर एक बनिए के पास जमा कर गये थे। उनके मरने के बाद जब मेरी सास बनिए से पैसे मांगने गयी तो वो साफ़ मुकर गया। कहने लगा कि पैसे तो दिए थे लेकिन सिर्फ दो हजार, ये लेने हो तो जब मर्जी ले जाओ। मेरी सास ने बहुत शोर मचाया पर बनिया एक न माना और दो हजार देकर पल्ला झाड गया। कहते है कि एक साल के भीतर ही बनिए का बना लड़का मर गया।उसकी घरवाली को वहम रहने लगा। बनिए की घरवाली ने मेरी सास के पैर पकडे और बाकी पैसे देकर भूल चूक मानी।"

उस ज़माने में पांच हजार बड़ी रकम होती थी। उन पैसो का क्या किया होगा, कैसे खर्च किये होगे।इस बारे में हम पूछते तो बीबी कहती, "अरे मेरी सांस और तेरे बाबा खाना कम खाते थे और मिठाई ज्यादा। मेरी सांस के सिरहाने एक छोटी मटकी पड़ी मैंने भी देखी थी। उसमे बर्फी, खोया और जलेबिया रखा करती। दोनों माँ बेटे चाय या दूध के साथ खा पी के गुजारा करते। आस पड़ोस वाले यही बताते थे मुझे जब मै ब्याह कर आई।" बीबी की बात सुनकर पिता जी हसने लगते।

"बताओ भला हमारी दादी पांच हजार की बर्फी खा गयी, माँ उन दिनों रूपये किलो तो बर्फी का रेट होगा ...तुम भी क्या बात करती हो।"

"अच्छा ये बता काका, जब तू आठ साल का था तो यहाँ आंगन वाले कुंए में अगर कोई बर्तन भांडा गिर जाता तो कैसे रस्सी के सहारे फट से उतर जाता था, आजकल ये तेरे बच्चे इतने बड़े हो गये है पर है कोई जो ऐसा जोखिम वाला काम कर सके। चुबारे की सीढियां चढ़ते तो इनके दम फूल जाते है। अरे ओःले लोगो की खुराक भी थी और काम भी बहुत थे, अब तो न ढंग का खाने को है और न कोई जोर वाला काम।" बीबी की बात सुनकर सब चुप कर जाते।

वैसे समय बदला तो खाने पीने के ढंग भी बदल गये। अब सारा मामला ही परहेज पर अटक गया है। ये खाओ, वो न खाओ और क्या खाएं क्या न खाएं वर्तमान समय के बड़े विमर्श हो चुके हैं।

अब पिता, और चाचा जी भी कब तक पेंशनर बीबी की कंजूसी से परेशान होकर फल वगैरह लाते।कई बार आदमी किसी की जिद पर खीज ही जाता है। सबकी अपनी अपनी जिम्मेदारी और खर्चे बढ़ गए थे। उनोहने बीबी को उनकी जिद और कंजूसी के साथ ही झेलने का मन बना लिया। फिर भी कभी कभी लोक लाज से डरते फल लाकर दे देते, कब्ज के लिए लिवर टानिक ला रखते तो बीबी कह देती " भैया इसके पैसे ले लो जितने भी लगे हैं, तुम लोगो का अपना बहुत खर्चा है "। कहकर अपने कुरते की जेब से पैसे निकाल कर दे देतीं।

उनकी उम्र बढ़ रही थी, शरीर का वजन बढ़ रहा था। ज्यादा चलने फिरने की अब उन्हें आदत न थी। पानी वो बहुत कम पीती। खाना खाने की बाद जो पी लिया सो पी लिया आजकल की तरह कोई दस या बारह गिलास पानी पीने का टार्गेट बना कर वो नहीं चलती थी।

"पानी भी कोई पीने वाली चीज है, ऐसे ही आदमी अपना पेट फाड़ ले। जब जरूरत हो तो पानी पियो .पानी से पेट भर लेने से थोडा काम चलता है, भोजन के लिए भी तो जगह बचे।" बीबी के अपने तर्क थे और उनके तर्कों के सामने सबके सुझाव बेकार थे।

हर महीने पेंशन का उन्हें पूरा ध्यान रहता। पिता जी से पूछती रहती थी कि सरकार कब पैसे बढ़ाएगी। हर महीने स्कूटर के पीछे बैठकर बैंक तक जाती और अपनी पेंशन का बस तीसरा हिस्सा ही निकलवाती।

"जब पूरा एक लाख हो जाय, साहब उसकी ऍफ़ डी करवा देना, और वारिस के नाम में मेरे सब लड़कों का नाम डालना।" बैंक मैनेजर से कह देती। पिता जी साथ होते, उन्हें पहले पहल ये बात बुरी लगती थी कि बीबी उनसे क्यों नहीं कहती, बड़ा अविश्वास उन्हें महसूस होता। पर धीरे धीरे वो अपनी माँ के स्वभाव को समझने लगे थे, कुछ न बोलते।

परिवार में बच्चों और बुजर्गों की खूब बनती है, उनमे परस्पर प्यार और लेनदेन का अपना हिसाब किताब होता है।इस मामले में भी बीबी चूक गयी थी। वे परिवार के बच्चों को भी त्योहार या किसी अन्य मौके पर बड़ी कंजूसी से कुछ देती। हम बच्चे भी उनके नखरों और आदतों को देखते सुनते बड़े हुए थे। इस कारण हमारे मन मे भी उन्हें लेकर एक दूरी बनी रही। इनकी कंजूसी पर कई बार बहुत गुस्सा भी आता। इसलिए घर के बच्चे भी उन्हें लेकर स्वार्थी हो गए थे।

मुहल्ले में जितने मर्जी फल बेचने वाले निकले, पर वो कभी नही खरीदेगी। इनके हिसाब से फलों के रेट अब बहुत ज्यादा है। कहीं न कही उनके मन मे चीजों की कीमतें बहुत पुरानी कीमती पर ठहरी हुई हैं और वे उनके हिसाब से ही चीजों के महंगे सस्ते होने का मापदंड तय करती हैं।अगर कोई फल या मिठाई दे गया तो उसे लेकर उनका मोह बच्चों वाला है।फिर चाहे कोई बच्चा हो या बड़ा, उससे छुपा के रखेगीं।

कई बार घर के सदस्य जान बूझ कर पूछते " अब सारी घर ग्रहस्थी की जिम्मेदारी तो तुम निपटा चुकी हो, तो क्यों ऍफ़ डी के चक्कर में पड़ी हो, खा पी लिया करो।"

" क्यों भाई तुम्हे क्या तकलीफ है ...और मेरे भी खर्चे हैं। दवा है, कोई आया गया होता है तो शगुन भी देना पड़ता है। त्यौहार और कभी गाँव का मेला आता है ...तो सब बच्चे मेरी तरफ देखने लगते है। अभी पोते पोतियों की शादियों में भी सोने की अंगूठियाँ, झुमके, कपडा वगैरह की जिम्मेदारी जो मेरी है वो बिना पूरा किये कैसे काम चलेगा। पिछले साल जब बेटी के बच्चों की शादी में शगुन दिया था तो ये सब बहुएं मेरी तरफ कैसे देख रही थी। अब ये बिना लिए मानेगी और मै तो खुद ही देने को तैयार हूँ, इसीलिए जोड़ रही हूँ। मैं क्यों फ़ालतू खर्च करूँ भला।....और अगर कल को मुझे कुछ हो जाय तो तुम लोगो पर क्यों भोज का खर्च पड़े ...आज कल मरे पर कौन कम खर्च होता है। चार पैसे जोड़ रही हूँ तो इसी लिए कि तुम लीगो को मुसीबत न हो " बीबी सुना सुना कर कहती। उनकी इस दूर दृष्टि पर कोई खीजता तो कोई मुस्कुराता।

बाबा जब तक जिंदा रहे उनोहने एक नया पैसा उसके हाथ पर न रखा। वे कहते- जो लेना है, कह दे। बाजार चलना है साथ चले, जो कहे वही दिलवा दूंगा पर पैसे नगद नही दूंगा। अब बाबा का अपना हिसाब किताब। वे भी पूरे अक्खड़ थे। जो कह दिया सो कह दिया।

बीबी बताया करती है कि अपने बाप को उनोहने अक्सर अपनी शादी एक बेहाल घर में करने के लिए कोसा। बीबी के पिता दुखी होते और कह देते कि बेटी जिसका जहाँ संजोग बना होता है, वहीं बांध जाता है। हम तुम करने वाले कौन है ?सब दाता की मर्जी।

असल में एक खाते पीते घर की लड़की की शादी एक बेहाल, अव्यवस्थित घर में हो जाये तो हैरानी तो होती है। पर ये पुराने ज़माने के किस्से ऐसे ही थे शायद। कोई रिश्तेदार लड़का लड़की के बारे में बात करता और एक रुपया शगुन का ले देकर बिना देखे रिश्ते हो जाया करते। विशवास और इज्जत का बड़ा नाम था उस ज़माने में।

बाबा का घर बेहाल था। उनके पटवारी पिता की मृत्यु बहुत पहले हो चुकी थी। पुरखो की बड़ी हवेली थी। पिता पटवारी थे और कईयों के पुरोहित भी। इसलिए जायदाद भी अच्छी बनायीं थी। जायदाद उड़ने में भी उमोहने उतनी ही तत्परता दिखाई। खाने पीने के शौक़ीन थे। पुरखो की बने जमीन ऐश परस्ती में उड़ा दी। बाबा अभी चार साल के थे तो पिता के जाने के बाद घर अव्यवस्थित हो गया। उनकी माँ सदमे में थी इस लिए ज्यादा काम धाम नहीं करती थी। मिठाई खाने की शौक़ीन थी। मिटटी के सकोरे में छुपाकर रखती। जिन घरो के पुरोहित थे उनोहने सब राशन पानी का इंतजाम किया। अडोस पड़ोस की स्त्रियाँ थोडा बहुत बुहार संवार जाती। धीरे धीरे हवेली मकड़ी के जालो, धुल और गर्द से भर गयी। धीरे धीरे बाबा बड़े हो गये। एक रिश्तेदार ने एक सरकारी महकमें में नौकरी लगवा दी। अब लड़का नौकर था, बड़ा घर था चाहे बिगड़ा हुआ था, माँ आधी पागल थी।ऐसे समय में रिश्तेदारों ने सोचा कि अगर एक सुशील कन्या आ जाये तो क्या पता घर को दुबारा भाग लग जाय। बाबा का मुलाजिम होना और उनके पास बड़ी हवेली या घर होना एक बड़ी बात थी उन दिनों के लिए। इसी बात के स्तर पर बाबा के ताऊ जी ने उनका घर बसाने में मदद की।उनका रिश्ता तय हुआ और बीबी इस घर में ब्याह कर आई।

बीबी के आने पर बाबा थोडा सहज हो गये। घर में चूल्हा जला, सफाई हुई और एक व्यवस्था चल पड़ी। बीबी की सास को व्यवस्था में रहने की आदत नहीं थी और बीबी को व्यवस्था में रहने की आदत थी। यही बात दोनों के बीच अक्सर झगड़े का कारण बनती। बीबी की सास अक्सर आने जाने वालो से शिकायत करती कि जबसे ये आई है मेरा लड़का मुझसे छीन लिया है। वो सुबह का चाय पानी पीकर बाहर गाँव में चली जाती। यजमानों के घर घूमती रहती, वहीँ चाय पानी और भोजन वगैरह खा पी लिया करती।

बीबी बताती हैं कि उनकी सास जाते जाते घर के दरवाजे के बाहर चूल्हे की राख बिछा देती, ताकि अगर कोई घर से बाहर जाये या अंदर आये तो उसके पैरों के निशान राख पर छप जाएँ और शाम को वो घर लौटकर झगड़े का कोई कारण ढूंढ सके। बाबा को भड़का सके।

बीबी बताती है कि उन दिनों बाबा के ताऊ जी दो या तीन दिन बाद घर का चक्कर लगाते थे। घर के अंदर कभी न आते। घर के बाहर पड़ी चारपाई पर बैठ जाते और आवाज लगाकर घर का हाल चाल पूछ लेते। किसी चीज की कोई जरूरत हो तो बताने को कहते। बीबी से वो चाय या लस्सी कहकर मांग लेते थे। लस्सी में शक्कर घोल कर पीते थे। बीबी बताती है कि उनोहने कभी ताऊ जी कि शक्ल नहीं देखी थी। दो हाथ का घूँघट निकलने का रिवाज जो था।

बाबा के हिस्से की जमीन पर भी ताऊ और उनके बेटे खेती करते थे और हर साल फसल में से हिस्सा दे दिया करते। एक गाय बीबी के पिता जी छोड़ गए थे। बाबा जब भी शाम को अपनी सरकारी नौकरी से लौटते, आते हुए अपनी साइकिल पर हरे चारे का गठ्ठर लाद लाते। पर चारे को बारीक काटने से लेकर गाय को दुहने तक का काम बीबी करती। क्योकि शाम को बीबी की सास भी लौट आती थी और उसके सामने अगर बाबा बीबी का हाथ भी बटाना चाहते तो वो टोक देती और कहती कि इसे खुद सारा काम करने दे वर्ना लोग बाग़ कहेंगे कि जोरू का गुलाम बन गया है। बीबी की सास यानी हमारी पड़दादी एक दकियानूसी समाज की परम्परावादी बुढ़िया थी।

खैर समय बीतता रहा। हर दो साल बाद परिवार में एक नया सदस्य आता गया। कुल पाच बच्चे हुए बीबी को, जिनमे से एक बच्चे की नमूनिया से मौत हो गयी। उन दिनों इलाज के इतने अच्छे साधन या डाक्टर नहीं थे न ही परिवार में देखभाल करने की अक्ल। बच्चे गिरते पड़ते खुद ही संभले तो ठीक वर्ना उनकी किस्मत। बच्चे पैदा करने में कोई कंजूसी न दिखाई जाती।

परिवारों में यह सोच हावी थी कि जितने ज्यादा बच्चे होंगे उतना ही घर और खेत के कामों में सुभीता होगा, कमाने वाले ज्यादा होंगे। भरे पूरे परिवार का मतलब यही था कि रहने खाने की कोई श्रेष्ठ व्यवस्था हो या न हो पर जब कोई पूछे कि परिवार में कितने बच्चे है तो आप सीना तान कर ये कह सके कि अच्छी खासी गिनती है जी। गाँवों में तो ये शायद मर्दानगी का बड़ा सबूत भी था। और बच्चो को ज्यादा पढ़ने लिखने या उन पर जयादा खर्च करने का भी कोई प्रचलन नहीं था। गाँव के हर वर्ग और जाति में यही सब चल रहा था। शिक्षा और परिवार नियोजन वाली क्रांति तो अब भी बीस प्रतिशत लोगों पर काम कर रही है।

बीबी बताती है कि बच्चो के बड़े होने से कुछ सहारा सा हो गया। अब घर अकेलापन नहीं था। बाबा भी बच्चों के प्रति अपना थोडा बहुत फर्ज निभाने लगे। बीबी की सास के मरने के बाद अडोस पड़ोस की स्त्रियाँ भी सारी दोपहर घर के आंगन में रौनक बनाये रखती। घर का आंगन खुला डुला था इसलिए दरी बुनने, चरखा कातने और सूत रंगने का काम इकठ्ठे बैठकर किया करती। चरखे की मद्धिम घू घू अनोखा सा संगीत वहां फैलाये रखता।

"अपने मुहल्ले की सभी लड़कियों की शादी में दी जाने वाली लगभग सभी दरियां अपने घर में बुनी गयी। हाथ खड्डी लगी होती और वो बातें करती दरिया बुनती रहती। सिरहानों के गिलाफ, बिस्तर की सूती चादरों पर रंगीन धागों से लडकिय सुंदर कढाई करती। पहले ये सब लड़कियां एक दुसरे से देखकर या अपनी माँ से सीखती थी। ये सब लड़कियों के लिए जरूरी था। आजकल तो सब बाजार जाती है, जितना मन करे अपनी मर्जी का उठा लाती है। पहले ऐसी मौज नहीं थी।" अपने कमरे की चारपाई पर बैठी वो अपने अतीत को याद करती हुई हमें बताया करती। मोटे शीशे वाले चश्मे के पीछे दिखती उनकी आँखे जैसे कई दृश्य हमारे सामने लाकर रख देती। हम अपने मोबाईल में खोये हूँ हूँ करते रहते। ये जरूरी था अगर हम हूँ हूँ न करते तो वो बाते सुनना बंद कर देती और कहती "निकम्मों मेरी बात का कोई हुन्गारा तो तुम लोग भरते नहीं, मै पागलो की तरह बोलती जा रही हूँ।" हम माफ़ी मांगते हुए बात सुनने की मिन्नत करते पर फिर वो न बोलती और फिर अगले दिन बात शुरू करती।

हम सब बच्चों ने बचपन से उनकी अनेको बाते, कहानियां ऐसे ही सुनी है, इनमे हूँ हूँ करना एक अहम शर्त थी। जब हम छोटे थे तो अक्सर सोने से पहले खा पीकर बीबी के बिस्तर पर जाकर उनके साथ लेट जाते। वे कहानिया सुनाती।

चिड़िया, कौआ, राजा रानी, जादूगर, परी के अनेक किस्से। बीबी पढ़ी लिखी नहीं थी पर फिर भी उनके पास पहेलियों और कहानियों का खजाना था। हम हैरान होते उनके इस संग्रह पर। जाने कहाँ कहाँ से उनोहने इतनी कहानियां जुटाई थी। वे एक के बाद एक सुनाया करती, कभी न थकती।

हम सुनते सुनते सो जाते तो कई बार वो हिला कर पूछती "अरे तुम लोग सो गये .न हूँ ना हाँ करते हो। जाओ अब भागो अपने बिस्तरों पर। "

हम इनकार करते कि नहीं सोये ताकि कहानी चलती रहे पर नींद हमें हरा देती। कई बार सुबह आँख खुलती तो सोचते की हम बीबी के बिस्तर से उठकर यहाँ अपने बिस्तर पर कब आये। असल में माँ या पिताजी कई बार हमें सोने पर गोद में ही उठा लाते या हम खुद आधी नींद में मन के साथ उठ कर आते और सुबह याद न रहता।

और अब हालत ऐसे है कि अपनी जिन्दगी में इतने व्यस्त हो गये है कि कई कई बीबी का हाल चाल भी नहीं पुछा जाता। उनके पास दो घडी बैठकर उनकी बाते नहीं सुनी जाती। अब बच्चे भी अपनी आदते बदल चुके है। बीबी के किस्सों की जगह अब मोबाईल गेम्स और टीवी कार्टून्स ने ले ली है।

बीबी की नजर अब धीरे धीरे कमजोर हो गयी है, उनका शरीर कमजोर हो गया है। कई बार बैठे बैठे लुढक जाती है। पूछो कि क्या हुआ तो कहेंगी।

"जाने कौन मुझे धक्का दे जाता है।"

उनकी हालत धीरे धीरे बिगड़ रही है। पुरानी स्मृति सब याद है, नया भूल जाती हैं। मिलने कोई आएगा तो उसे बताएगी कोई और। हैरानी की बात ये है कि इस हालत में भी पेंशन, पैसे और खर्च का पूरा हिसाब अब भी सही बताती हैं।

खैर समय बीत रहा है। बीबी का शरीर लगातार कमजोर पड़ रहा है। आजकल उन्हें अकेले रहना अच्चा नहीं लगता। सारा दिन पड़े पड़े वे ऊब जाती है। लगता है जैसे वे बहुत सी बाते और अनगिनत किस्से सुनना चाहती है। कई बार जब सब घरवाले फुर्सत में उनके पास इकठ्ठे हो जाते है और कोई पुराणी बात छेड़ते है तो वे न जाने कितनी ही नयी बाते सुनाया करती हैं। नए पात्र, उनको लेकर उनका रोष, प्यार और भावनाए खासकर वो अपने पिता को कोसना नहीं भूलती। बहुओं को कोस भी देती है और उनकी फ़िक्र भी करती हैं। अपने पैसे को लेकर वे आज भी परेशान हो जाती हैं। उनकी बातो, लोप होती स्मृतियों और उनकी झुर्रियों में खोती चेतसब को एक निश्चित समय के लिए तैयार कर चुकी हैं।

सब बीबी को लेकर तटस्थ है। सबको कभी भी कुछ भी हो जाने की एक बेकार सी प्रतीक्षा है।

कहानी बीबी बुजुर्ग

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