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अंतर्द्वंद
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© Madhu Arora

Drama

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"सुशांत, यार बोर हो रहा हूँ, चल मॉल चलते हैं" विक्की ने सुशांत के कमरे में घुसते हुए कहा।

"नहीं यार कल रात ही तो पिक्चर देखी थी। मेरी तो कुछ तैयारी नहीं हुई है, एग्जाम में सिर्फ 10 दिन बचे हैं।"

"ओए, एग्जाम तो मेरी भी है, पर मैं तेरी तरह किताबी कीड़ा बन कर नहीं पढ़ता।" विक्की ने सुशांत की हँसी उड़ाते हुए कहा । "चल तू तैयार तो हो, सौरभ को भी ले लेते हैं, हॉस्टल से भी लड़के आ जायेंगे। वहीं ग्राउंड में क्रिकेट खेलेंगे।"

सुशांत एक छोटे शहर में रहने वाले, मेहनती माँ बाप का इकलौता बेटा था। उसके पिताजी एक बैंक में कार्यरत थे और माँ घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर थोड़ा बहुत कमा लेती थी। माँ- बाप ने पैसे इकट्ठे करके उसे उच्च शिक्षा के लिये बड़े शहर में पढ़ने भेजा था। दोनों ने बेटे को बचपन से अच्छी शिक्षा दी थी और उन्हें उससे बहुत उम्मीद थी।

शुरू में जब सुशांत इस बड़े शहर में एक किराये के कमरे में रहने आया था, तो उसकी किसी से विशेष जान पहचान ना थी। उसे इस शहर के बारे में भी कुछ ज्यादा नहीं पता था। इसलिए उसका अधिकतर समय पढ़ाई में ही जाता था। धीरे- धीरे उसके दोस्त बने और उनके साथ रहकर उसने इस शहर में घूमना और सिनेमा इत्यादि देखा शुरु कर दिया। फिर उसका मन पढ़ाई में कम और मौज- मस्ती में ज्यादा लगने लगा। बस दोस्त बनते गए और वह दोस्तों जैसा बनता गया।

पिछले कुछ अरसे से वह यही कर रहा था। हर सुबह देर से उठना, अक्सर क्लास मिस करना। शाम को दोस्तों के साथ बाहर घूमना, रात में फिल्म, या ड्रिंक पार्टी करना। फिर देर रात वापिस आना। बीच- बीच में मोबाइल पर सोशल साईटस पर स्टेटस डालना और चैट करना। थकान होने पर अगले दिन पढ़ने का सोचना। लगभग रोज़ यही तो हो रहा था।

"यार बहुत हो गई मौज मस्ती, अब हमें पढ़ना चाहिए। परीक्षा में कुछ ही दिन बचे हैं।" ताला लगाते हुए सुशांत बोला

"तू ही पढ़, अपनी तो चिट जिंदाबाद" विक्की ने एक आँख दबा कर धीमे से हँसते हुए कहा

रात का खाना खाकर सुशांत 10 बजे लौटा। फ्रेश होकर पढ़ने बैठा तो उसने भी चिट बनाने का सोचा। कागज कलम हाथ में लिए सुशांत सोचने लगा, आखिर विक्की भी तो यही करता है। इस तरह वह भी मौज मस्ती करके, बिना ज्यादा मेहनत के अच्छे नंबर ला सकता है।

एक दो किताबें उलटने- पुलटने पर भी वह निर्णय नहीं कर पाया कि कौनसी चिट में क्या लिखे। दिमाग बुरी तरह उलझा सा और अशांत लग रहा था।

अशांत मन से उसने कुरसी पर सिर टिकाया और सोचने लगा। आखिर क्यों नहीं वह मन लगा कर पढ़ पाता। हर बार घर से फोन आने पर वह अपने माँ- पिताजी से कहता कि वह अच्छे से पढ़ता है, पर सच्चाई तो कुछ और थी। उसने सोचा वह अपने माँ बाबूजी को निराश नहीं करेगा। आखिर उसका भविष्य भी तो इन्हीं नम्बरों पर टिका है। वह सोचने लगा, अगर अच्छे नंबर ना आये तो उसे इस बड़े शहर में अच्छी नौकरी कौन देगा? उसके बाबूजी ना तो कोई बड़े आदमी हैं और ना ही उनकी कहीं ऊपर तक पहुँच है।

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और वह तो चिट के बल पर परीक्षा पास करने की सोच रहा है। अगर चिट के बल पर परीक्षा पास हो भी गई तो ज्ञान कहाँ से लायेगा? कहीं नौकरी के साक्षात्कार में किसी ने कुछ ऐसा पूछा जो उसने नहीं पढ़ा, तो क्या जवाब देगा? कितना ख़राब लगेगा तब। इस तरह तो अच्छी नौकरी नहीं मिल पायेगीे।

मन लगा कर पढ़ाई करने से ही अच्छी नौकरी मिलेगी। नौकरी ना सही ज्ञान तो मिलेगा और ज्ञान कभी व्यर्थ नहीं होता। पर उसके लिए तो उसे रात दिन एक करना पड़ेगा, तभी कोर्स कवर कर सकेगा। बाबूजी कहते थे "बेटा हमेशा ईमानदारी से मन लगा कर पढ़ना।" जो वह कर रहा है, इसके लिए तो वह खुद दोषी है। क्यों दोस्तों के बुलाने पर चला जाता है। जब वह शहर में पढ़ने आया था, तब तो वह ऐसा ना था।

उसके अंदर एक द्वंद्व चल रहा था। उसकी नजर कमरे में लगे पोस्टर पर गई जो माँ ने उसे दिया था "बिलीव इन योरसेल्फ" अर्थात "अपने आप पर विश्वास रखो" और वह पास होने के लिये चिट पर भरोसा कर रहा है।

अचानक उसे माँ की दी एक सीख याद आई। माँ ने कहा था- "जब भी तुम खुद को कोई निर्णय करने में असमर्थ पाओ, तो

अपना हाथ दिल पर रखकर आँखें बंद करके पूछना, कि मैं जो करने जा रहा हूँ, क्या वह मेरे लिये सही है? दिल तुम्हें हमेशा सही राह चुनने में मदद करेगा।"

सुशांत ने भी वैसा ही किया और सही निर्णय लेने में सफल रहा। नहीं करेगा अब वह कोई भी गलत काम, ना ही चिट बनाएगा। खूब मन लगा कर पढ़ेगा। मौज मस्ती के लिए तो परीक्षा के बाद भी वक़्त मिल ही जायेगा।

यही सोच कर सुशांत ने मन कड़ा करके अपने मोबाइल से सोशल साइट्स की सब ऐप डिलीट कर दी और मोबाइल को साइलेंट पर रख दिया। किताब उठाईं और पढ़ने बैठ गया।उसने सोच लिया रोज़ देर रात तक पढ़ेगा। सुबह अलार्म लगा कर उठ जायेगा। अब से कोई क्लॉस मिस नहीं करेगा और परीक्षा तक कोई फिल्म, पार्टी, घूमना नहीं होगा।

उच्च शिक्षा सोच सीख

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