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खूनी दरिंदा   भाग 3
खूनी दरिंदा भाग 3
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© Mahesh Dube

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काफी सारा रसायन खन्ना की देह पर गिरा था और वे भूमि पर पड़े त्वचा की जलन से तड़प रहे थे। ऊपर टेबल पर बीकर आड़ा पड़ा इधर-उधर झूल रहा था कि भयानक जंतु ने टेबल पर छलांग लगाईं और बीकर लुढ़क कर खन्ना के मुंह पर आ गिरा। उस समय खन्ना दर्द से तड़प रहे थे तो खन्ना का मुंह खुला हुआ था और वे चिल्ला रहे थे तो बीकर का द्रव उनके मुख से होता हुआ पेट तक चला गया। उन्हें ऐसा लगा मानो तेज़ाब की एक लकीर भीतर का सब कुछ जलाती हुई अंदर पहुँच गई है। कुछ देर छटपटाने के बाद खन्ना के शरीर में अजीब से परिवर्तन होने लगे। उनका शरीर धीरे-धीरे फूलने लगा और बदन पर बाल बढ़ने लगे। खन्ना आश्चर्यचकित से देखते रह गए उनके हाथों और पैरों के नाखून खूब लंबे और पैने हो गए। केनाइल दांत भी लंबे होकर होंठों से बाहर निकल आये। शरीर की वृद्धि से उनके कपड़े फट कर झूलने लगे और वे एक दम किसी विशाल पशु जैसे दिखाई देने लगे। एकदम पशु बन चुकने के बाद खन्ना ने अपने प्रतिद्वंदी जंतु को घूरा जो खुद विस्मय से उन्हें देख रहा था। खन्ना भयानक रूप से गुर्राते हुए जंतु पर झपटे तो वह अपनी आठ टांगों पर चलता हुआ काफी तेजी से भाग खड़ा हुआ, पर खन्ना की रफ्तार अप्रत्याशित रूप से तेज निकली उसके दूर निकलने के पहले ही खन्ना उसके सिर पर पहुँच कर झपट्टा मार चुके थे और पंजे से उसके शरीर को छिन्न- भिन्न करके उन्होंने उसे मुंह में डाल लिया और चबा गए।

खन्ना का दिमाग अब उस रसायन के प्रभाव में था और उनसे पशुवत व्यवहार करवा रहा था। उनके दिमाग के दो हिस्से हो चुके थे जिनमें से एक उन्हें संयत होने की गुहार कर रहा था और दूसरा हिस्सा पाशविकता की ओर धकेल रहा था। वे गरजते हुए प्रयोगशाला के बाहर आये और इधर-उधर देखने लगे। बाहर दरवाजे के पास वाचमैन रघुवीर अपना डंडा लिए स्टूल पर बैठ कर ऊँघ रहा था। खन्ना किसी विशाल गोरिल्ले की तरह चार पैरों पर चलते हुए उसके पीछे पहुंचे और एक हाथ से उसकी गर्दन पकड़कर उसे हवा में ऊँचा उठा लिया। सचेत होने पर उसने इस भयानक पशु को अपने ऊपर हमलावर पाया तो भय से उसकी घिग्घी बंध गई। उसके पाँव हवा में लहरा रहे थे और वो जान बचाने के लिए हाथ पाँव मार रहा था। उसका डंडा अभी उसके हाथ में ही था जिसे घुमाकर उसने जोर से खन्ना की आँख पर वार किया। जोरदार चोट लगने से पशु रूपी खन्ना जोर से चिंघाड़े और उनके हाथ से चौकीदार की गर्दन छूट गई वो जान बचाकर सरपट भागा लेकिन खन्ना ने अभूतपूर्व तेजी के साथ उसे लोहे के गेट के पास पकड़ लिया और क्रोध में भरकर उसका सिर दीवार से टकरा दिया। एक ही झटके में उसका सिर तरबूज की तरह फट गया और वह निष्प्राण होकर खन्ना की बांहों में झूल गया। खन्ना ने अपने बाघ जैसे पंजों से उसके शरीर को चीर-फाड़ दिया और हाथों से मसल-मसल कर उसे खाने लगे। वातावरण में हड्डियां चटकने की आवाजें उठ रही थी। खन्ना एकदम किसी हिंस्र पशु की तरह मानव शव का भक्षण कर रहे थे। उनका अवतार बहुत विकराल लग रहा था। मानव रक्त का स्वाद ले चुकने के बाद वे धीरे-धीरे चलते हुए फिर प्रयोगशाला में आये और वहीं लेट गए। कुछ देर में उन्हें नींद आ गई।

सुबह चिड़ियों की चहचहाहट से खन्ना की आँख खुली। आदतानुसार उन्होंने पलंग के सिरहाने पर रखी शिव की मूर्ति को देखना चाहा तो पाया कि यह उनका शयनकक्ष नहीं है। वे किसी अनजान जगह पर भूमि पर लेटे हुए हैं। वे घबराकर उठे तो पाया कि वे निर्वस्त्र प्रयोगशाला की जमीन पर लेटे हैं और आस-पास भयानक मंज़र है। उन्हें कल रात की भयानक घटनाएं याद आईं तो वे काँप गए। उन्होंने झपट कर आईने में खुद को देखा तो वे बिलकुल सामान्य थे। उन्होंने एक एप्रन उठा कर कमर में बाँधा और दौड़कर बाहर निकले। गेट के पास रघुवीर का छिन्न-भिन्न शव पड़ा हुआ था। जिसे देखकर लगता था कि उसे बुरी तरह भंभोड़ा गया है। खन्ना को उलटी सी आने लगी। वे वापस प्रयोगशाला में गए और दोनों हाथों से चेहरा छुपा कर सुबकने लगे।

 

अगले अंक में पढ़िए - क्या खन्ना को उनके गुनाह की सजा मिली?

 

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