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शोक-पर्व
शोक-पर्व
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© Anwar Suhail

Inspirational

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पंक्तिबद्ध बच्चे सुर मिलाकर प्रार्थना कर रहे हैं।

”वह शक्ति हमें दो दयानिधि

कर्तव्य मार्ग पर डट जावें”

समीर को हंसी आती है। समय कितना बदल गया लेकिन स्कूलों के आचरण में कुछ भी बदलाव नहीं हुआ। अब भी वही स्थितियाँ है। आगत भविष्य के आसन्न संकटों-मुसीबतों से अनभिज्ञ बच्चे! आत्म-शक्ति की तलाश में दयानिधि से हाथ जोड़कर भीख मांगते निरीह बच्चे! समीर ने सोचा कि यह हाथ जोड़कर प्रार्थना करने की कातरता इन्हें एक दिन सत्ता, ताकत, धन और अपराधियों के समक्ष कायर-बेचारा बनाकर छोड़ेगी। अपने हक की लड़ाई लड़ने से रोकेगी इन्हें। जाने कब से और किसने स्कूली बच्चों को ऐसी प्रार्थनाओं के इंजेक्शन पिलाना शुरू किया था। बच्चों में प्रतिरोध की जगह नतमस्तक होने की शिक्षा का पैटर्न क्या कभी बदलेगा? बड़ी विडंबना है की देश भर के स्कूलों में ऐसी ही प्रार्थनाएं पूरी तन्मयता और श्रद्धा से गायी जाती हैं।

जैसे निति-नियंता जानते हों कि हर बच्चा बड़ा होकर आस्तिक ही बनने वाला है।

इतने धर्म-ग्रन्थ, इतने अवतार-पैगम्बर, इतने साधू-संत फिर भी किसी भी समाज में, किसी भी ज़माने में कोई भी विद्यालय बच्चों को सर्वश्रेष्ठ नागरिक नहीं बना पाए।

समीर प्रार्थना की पंक्तियों को सुन रहा था और हँस रहा था।

समीर की हँसी कुछ इस प्रकार की हँसी है, जो शरीर के अंदर ही पनपती है और गुपचुप दम तोड़ती है।

पंक्तिबद्ध बच्चे! लड़कियाँ मैरून स्कर्ट-सफेद कमीज़ में और लड़के मैरून हाफ पेंट, सफेद शर्ट में। शिक्षक सफेद धोती-कुर्ता में, शिक्षिकाएं लाल बार्डर की सफेद साड़ियों में। चपरासी सफेद पैजामा-कुर्ता में।

प्रार्थना के सुर में खलल डालने के लिए स्कूल की बाउंड्रीवाल और छत पर चंद कौव्वे आ बैठे।

कांव-कांव… का शोर।

क्या कव्वे भी प्रार्थना करते हैं?

”पर सेवा पर उपकार में हम

निज जीवन सफल बना जावें”

प्रार्थना के शब्द स्कूल के वातावरण में तैर रहे हैं। अर्थ से अनभिज्ञ बच्चे। तोते की तरह रटे-रटाए जुमले एक बेसुरी लय में आलापे जा रहे हैं। समीर ने आज पहली बार धोती-कुर्ता पहना है। जिन्दगी में कभी नाटक-वगैरह में भी हिस्सा नहीं लिया था, इसलिए धोती-कुर्ता का यह प्रथम अनुभव असुविधाजनक लग रहा है। वह क्या करे? इस नौकरी की कई अपमानजनक शर्तों में एक प्रमुख शर्त, शिक्षिकों के लिए गणवेश की अनिवार्यता भी है। वह स्कूली दिनों में भी ड्रेस-नियम से चिढ़ता था। इसीलिए स्वप्न में भी डॉक्टर, वकील या पुलिस के रूप में स्वयं को कभी देखना नहीं चाहा था। इन सभी के लिए वर्दी की अनिवार्यता प्रथम शर्त है। ये भी क्या बात हुई, सोने के घंटे के अलावा सारा दिन वर्दी से चिपके रहो! वर्दी वाली एक और नौकरी से वह चिढ़ता था, टीटीआई की नौकरी। इसमें वर्दी के साथ-साथ ‘चवन्नी-छाप’ यात्रियों तक से समझौता करना पड़ता है। तब उसे क्या मालूम था कि समझौता तो हर हालात में आदमी को करना पड़ता है। जिंदगी से किया गया समझौता ही तो उसकी इस पहली नौकरी का आधार है… वरना अपनी मृत्यु-तिथि का जश्न मना चुका समीर धोती-कुर्ता पहन ही नहीं पाता। अपनी ही लाश फूंक कर जलाकर, उसी आग में फिर पैदा हुआ है समीर। यह जो धोती-कुर्ते के गणवेश में दीख रहा है वह समीर का क्लोन है! प्रतिरूप! कल ही तो समीर की मृत्यु तिथि थी। समीर सोच में डूब रहा है।

प्रार्थना जारी है-

”जो हैं अटके भूले-भटके

सबको तारें, खुद तर जाएंऽऽऽ

किसी को यदि अपनी मृत्यु तिथि भी ज्ञात हो जाए, तो कैसा हो? समीर को अपनी जन्मतिथि के साथ मृत्यु तिथि भी मालूम थी। कोई स्नातकोत्तर युवक, जिस दिन से, सरकारी नौकरियों के लिए प्रायोजित चयन परीक्षा की आयु सीमा लांघ जाता है, वही दिन उसकी मृत्यु-तिथि होती है। आईएएस का स्वप्न पाले समीर पीएससी के लिए भी संघर्ष करता रहा। मृत्यु-तिथि समीप नज़र आई तो फिर बैंकिंग, स्टाफ सेलेक्शन, क्लर्क-ग्रेड के लिए भी भारी हाथ-पाँव मारा।

कल शाम जो सूरज डूबा तो अपने साथ संघर्षरत समीर की आशाओं को भी डूबा ले गया। आयु-सीमा की अंतिम संध्या, ज्यों सक्रिय जीवन का अंतिम दिन ! घर में कोई था नहीं। माता-पिता गांव गए हैं। छोटा भाई अपनी नौकरी में। बहने ससुराल में। ‘रिटायर कॉलोनी’ के मकान नंबर एक सौ साठ के एक छोटे से कमरे में समीर लेटा था। उसका अपना कमरा। उसके संघर्ष का साक्षी। उसकी असफलताओं से दुखी कमरा… उसका साथी!

समीर मृत्यु का शोक-पर्व मना रहा है। यह कोई राष्ट्रीय-शोक जैसा बड़ा तमाशा हो नहीं सकता। समीर की उम्मीदों की मृत्यु का सर्वाधिकार उसी के पास सुरक्षित है। इस मृत्यु का वह स्वयं जिम्मेदार है। यह किसी हत्या का प्रसंग नहीं है। मृत्यु स्वाभाविक है। इसमें लाश का पोस्टमार्टम नहीं होता। श्मशान भी नहीं जाना पड़ता, इसलिए चार भाइयों की जरूरत नहीं पड़ती न किसी चंडाल-महापातर की चिरौरी करनी पड़ती है।

यह एक ऐसा शोक-पर्व है जिसे मृतक स्वयं मनाता है। शोकमग्न समीर अब किसी अच्छी सरकारी नौकरी में नहीं जा सकता। बी.एड. वगैरह भी किया नहीं कि मास्टर की कोई अच्छी नौकरी मिलती। बस्स… एक ही रास्ता बचा था, आदर्श प्राथमिक पाठशाला में आचार्य जी की नौकरी। आठ सौ रुपल्ली की तनख्वाह पर छब्बीस दिन सफेद धोती-कुर्ता पहनना और सभ्य-सुसंस्कृत बने रहने का ढोंग जीना ! ट्यूशन करना, शादी-विवाह करना, दो या तीन बच्चे पैदा करना, उनकी पढ़ाई-लिखाई शादी-ब्याह करना, रोग-शोक और फिर रिटायर होकर किसी दिन एक और मृत्यु का स्वाद चखना।

समीर का मन कहीं और था लेकिन देह विद्यालय प्रांगण में।

गीत की लय बदली तो उसे पता चला की जन-गण-मन चालू हो गया है। समीर तत्काल सावधान की मुद्रा में खड़ा हो गया-

”जन-गण-मन अधिनायक जय हे

भारत भाग्य विधाता…

वह चौक गया। क्या राष्ट्रगान की धुन बदल गई इन पचास वर्षों में? ‘वह शक्ति हमें दो दयानिधे… वाली प्रार्थना का सुर राष्ट्रगान की लय पर हस्तक्षेप कर रहा है। प्रधान पाठक देवरस जी, संगीत शिक्षक नामदेव और समीर की सहपाठिका अर्चना दास, किसी ने भी इस बात की नोटिस नहीं ली? क्या ये लोग राष्ट्रगान की धुन भूल चुके हैं या कि उन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा है… बच्चे जो भी गाए! वह आधी छुट्टी में ज़रूर इस विषय पर चर्चा करेगा।

”पंजाब सिंध गुजरात मराठा

द्रविड़, उत्कल बंगाऽऽ

क्या उसे भी इन सबकी आदत पड़ जाएगी। अर्चनादास तो ऐसी नहीं थी। कितना अच्छा गाना गाती थी। सुना है कि उसका पति इसका ख्याल नहीं रखता इसीलिए अपना खर्च वह स्वयं वहन करती है। एक ही छत के नीचे रहते हैं वे। बाल-बच्चा कोई है नहीं। पति ज्यादातर टूर में रहता है और इस शहर में आता भी है तो बस नाममात्र को। खाना-सोना तो उसका अर्चना की जेठानी के यहां रहता है। जेठ जी हैं नहीं। उनका स्वर्गवास उसके विवाह के पूर्व हो चुका था। जेठानी रूपसी तो है ही, मालदार भी है। पति के विभाग में अनुकम्पा नियुक्ति पाकर वह ‘डिस्पेच-क्लर्क का काम करती हैं। कामकाजी स्त्री तो बदनाम हो ही जाती है लेकिन अर्चना की जेठानी वास्तव में काफी बदनाम है।

”जन गण मंगलदायक जय हे

भारत भाग्य विधाता, जय हेऽऽ जय हेऽऽ जय हेऽऽ

‘भारत भाग्य विधाता शब्द समीर के समूचे अस्तित्व में खन-खन कर बजने लगा। उसे फख्र है कि उम्र के इस पड़ाव तक आकर वह भारत के वास्तविक भाग्य-विधाओं को जान पहचान गया है। वह जानता है उन लोगों को, जो करोड़ों हाथों की भाग्य रेखाओं को पगडंडी समझते हैं और अपने हाथों की भाग्य रेखा का ‘ग्लोबल-टेंडर’ देकर राजपथ बनवाया करते हैं। जिनकी एक जेब में राष्ट्रप्रेम का घोषणा पत्र होता है और दूसरी जेब में अंतरराष्ट्रीय पार-पत्र एवं विदेशी बैंकों में संरक्षित लाकरों की चाबियाँ!

वह अच्छी तरह जान गया है कि स्वस्थ-स्पर्धा के नाम पर कोई एक बच्चा कैसे चुन लिया जाता है और निन्यानबे बच्चे किस तरह कुंठित-भूलुंठित छोड़ दिए जाते हैं। समीर भी उन्हीं निन्यानबे में से एक है जिसे कोई चयनित ‘एक’ का ग्लैमर न जीने देता है न मरने! कोई कैसे चयनित होता है? वह एक तुम खुद क्यों नहीं? यह सवाल बड़ा टेढा सवाल है। ऐसे जाने कितने सवालों से जूझता रहता है समीर इन दिनों। देश-समाज-घर बार-बार कोंचता है, बस एक ही सवाल, बार-बार....

तुम वह ‘एक’ क्यों नहीं बन पाए…

समीर क्या जवाब देता। बस मेहंदी हसन की ग़ज़ल गुनगुनाता---

“हम ही में थी न कोई बात, याद न तुमको आ सके!”

जो चयनित हुए, हुए और जो बचे वह हर बरस हारने वाली फौज का अंग बनते जाते हैं।

सफल हुए लोगों की जमाना क़द्र करता है।

सफल बच्चा ‘पोस्टर ब्वॉय’ बनता है और जो बच्चे असफल होते हैं उनके दिल में कोई झाँक कर तो देखे।

हर ऐरा-गैरा सलाह देता फिरता है।

---“उसे देखो, सही दिशा में कितनी मेहनत की थी उसने तभी तो!”

इसका मतलब समीर जैसे असफल लोगों ने मेहनत ही की और न सही दिशा में अटैक किया था।

हर असफल बच्चा टूटे दिल से एक बार फिर उस सफल ‘एक’ की तरफ मुंह किए गिरते-पड़ते दौड़ता है। लोग हंसते हैं। आयु-सीमा का खंजर सर पर लटका रहता है। असफल बच्चों का समूह दौड़ता रहता है। इनमें से फिर कुछ बच्चे दोयम दर्जे की नौकरियों पर खप जाते हैं। बाकी बच्चे पुन: दौड़ लगाते हैं। इनमें से चंद और बच्चे तीसरे-चौथे दर्जे की नौकरियाँ पा जाते हैं। अब भीड़ में जो बच्चे बचते हैं, उन्हें एक रोज़ आयु सीमा का खंजर खचाखच काट डालता है।

इस तरह टूट जाती है उनके अरमानों की अमरबेल!

असफल बच्चे फिर भी दौड़ते रहते हैं। सेठ-महाजनों, बहुराष्ट्रीय मालिकों के दरवाज़े खटखटाते हैं। कुछ वहां खप जाते हैं। समीर की तरह के कुछ लोग आठ सौ रुपल्ली के लिए सफेद कफननुमा कपड़े पहन लेते हैं।

समीर को इन कपड़ों से चिढ़ होने लगी है।

स्कूल से छूट कर उसे कम्प्यूटर क्लास भी जाना है।

धोती-कुर्ता वाले इस गणवेश में तो मेन-मार्केट की संस्था में जाना उचित नहीं है। इसीलिए समीर घर से पैंट-शर्ट भी साथ लेते आया था हैंड-बैग में ठूंसकर!

”भारत माता की … जय !

भारत माता की… जय !

पंक्तिबद्ध बच्चे दाहिना हाथ, सामने की तरफ, कंधे तक उठाए शपथ ले रहे हैं-

”हम सब भारतवासी हैं।

भारत माता की संतान हैं

हम सब आपस में भाई-बहन हैं।

समीर अंदर ही अंदर हँस पड़ा। ये शपथ तो पहले नहीं कराई जाती थी। इस शपथ का औचित्य! उसे अपना एक मित्र सुशील गोयल याद हो आया। रक्षाबंधन में कक्षा की लड़कियाँ, लड़कों को राखी बांधती थीं। शिक्षक गण भी इस अवसर पर उपस्थित रहते। वह एक कथित धार्मिक राष्ट्रवादी स्कूल था। भारतीय जीवन-दर्शन की अनूठी छवि का संवाहक ! राखी न बंधवाने वाले या उस दिन अनुपस्थित रहने वाले छात्र को पांच रुपए का अर्थदंड देना पड़ता था। सुशील गोयल उस दिन अनुपस्थित रहता और दूसरे दिन घर से चुरा कर लाए गए पैसों में से पांच रुपए का अर्थदंड भर देता था। वह कक्षा की तीन लड़कियों में से एक साथ रोमांस करता था। भला उन्हीं से राखी बंधवाता!

प्रार्थना खत्म हुई। बच्चे पंक्तियों में अपनी-अपनी कक्षाओं में जाने लगे। प्राथमिक पाठशाला के बहुत बड़े से बोर्ड के नीचे लिखा था, स्व. धनेसरी देवी की स्मृति में! पाठशाला के दस कमरे-एक सीध में। ग्यारहवां कमरा पाठशाला को अंग्रेजी का ‘एल’ आकार प्रदान करता है। इसी में दो खण्ड हैं। एक में प्रधान पाठक देवरस जी और उनका दफ्तर, दूसरे में शिक्षकों का कमरा, दो बैंच के बीच एक लम्बी-चौड़ी मेज़ । दीवार पर सुभाष, गांधी, भगत सिंह, आज़ाद के चित्र के अलावा स्वर्गीय धनेसरी देवी का भी एक बड़ा सा चित्र है।

समीर का आज पहला दिन है। उसे कोई कक्षा ‘एलाट’ नहीं हुई है अभी। फिलहाल एक सप्ताह तक उसे प्रधान पाठक देवरस जी के साथ पाठशाला का सिस्टम समझना है। सभी शिक्षक अपनी-अपनी कक्षाओं में जा चुके हैं। समीर अकेला शिक्षक-कक्ष में बैठा है। उसने स्वप्न में भी शिक्षक बनने की कल्पना नहीं की थी। हाँ, सोचा करता था कि कुछ अच्छा न बन पाया तो ‘नेट’ पास करके कॉलेज में प्रोफेसर ज़रूर बनेगा। क्या वह अब कुछ नहीं बन सकता? पी.एच.डी. का प्रयास तो कर ही सकता है। लेकिन खर्च कौन वहन करेगा। पिता के रिटायरमेंट के बाद ये संभावना भी समाप्त हो गई है।

छोटा भाई अनुज अपने बाल-बच्चों में मग्न रहता है। आईटीआई से इलेक्ट्रीशियन परीक्षा पास कर अनुज तो इक्कीसवें वर्ष में ही कोयला खदान की नौकरी पा गया। अनुज पढ़ने में कमजोर था। घिस-पिटकर मैट्रिक पास किया तो पिताजी ने कुछ दे-दुआकर उसका एडमिशन आईटीआई में करवा दिया। तब समीर खूब हँसा करता था। कोई पूछता कि तुम्हारा छोटा भाई अनुज क्या कर रहा है? तब वह हँसकर कहा करता- ‘आईआईटी’ फिर थोड़ा रूककर बोलता---‘अरे नहीं भाई, आई टी आई’।

सुनने वाला हैरतजदा हो जाता। तब समीर स्पष्ट करता कि स्थानीय आईटीआई में इलेक्ट्रीशियन ट्रेड कर रहा है। वही आईटीआई करने वाला अनुज आज पांच-छह हजार मासिक का नौकर है और बेहद पढ़ा-लिखा समीर आठ सौ रुपयों पर अनुबंधित ‘अचारजी’!

अनुज का विवाह भी समय से हो गया। ईश्वर की अनुकम्पा से वह एक बेटे का बाप भी है। दहेज़ में स्कूटर मिला था उसे।

समीर का जब दो बार आई.ए.एस. की पूर्व परीक्षा में चयन हो गया। तब पिताजी पर उसके विवाह का दबाव बढ़ा था। उस समय समीर के पैर ज़मीन पर न टिकते थे। पिताजी से तो नहीं किन्तु मां से दंभपूर्वक वह कहा करता था- ”अनुज और मुझ में बहुत फर्क है मां…हड़बड़ी में शादी ठीक नहीं। एक बार सही जगह पा भर जाऊं फिर देखना, इस खानदान के दिन फिर जाएंगे।“

मां-पिता की बात यदि मान लिया रहता तो आज वह शादीशुदा होता। एक रिश्ता तो इकलौती लड़की का भी आया था, जिसके पिता की दवाइयों की दुकान थी। समीर के पिता समीर की ज़िद के आगे झुक गए। उस रिश्ते को ‘न’ कहते हुए बहुत दुखी हुए थे। आज समीर दुखी है।

शिक्षक-कक्ष में बैठा समीर! उसे लगता है कि धोती शायद कुछ नीचे खिसक गई है और ढीली हो गई है। उसे धोती बांधना तो आता नहीं। वह तो भला हो इसी पाठशाला के गोकुल अचार जी का। सुबह-सुबह समीर के घर आकर उसे धोती बांध गए थे। आज शाम को उनके साथ एक घंटा धोती पहनने का अभ्यास भी करना है।

सुबह जब वह ‘रिटायर-कॉलोनी’ से पाठशाला तक साइकिल से आया था तो उसे बड़ी उलझन हो रही थी। उस समय सड़क पर सिर्फ स्कूली बच्चे, अध्यापक या सफाई कर्मचारी ही दिखलाई देते हैं। लम्बा रास्ता। ‘रिटायर कॉलोनी’ नगर का पश्चिमी छोर। रेलवे की सर्विस से सेवामुक्त लोग रेलवे कॉलोनी और नगर सीमा के बड़े नाला के बीच की खाली जगह पर मकान बनाकर बसने लगे। चूंकि अधिकांश लोग रिटायर होकर वहां बसे, इसलिए सुविधानुसार इस नई बस्ती का नाम ‘रिटायर कॉलोनी’ रख दिया गया।

रिटायर कॉलोनी और आश्रम पाठशाला के बीच लगभग दो किलोमीटर का फ़ासला बीच में रेलवे कॉलोनी, स्टेशन रोड, सदर बाजार, मेन रोड, पानी टंकी, इंटर कॉलेज, न्यायालय, रेस्ट हाउस, सिंचाई विभाग का दफ्तर, गर्ल्स स्कूल, राजस्थान भवन, लोक निर्माण विभाग की घेराबंदी के बाद नगर के किनारे से गुजरता बड़ा नाला जिसके उस पार दो-दो पेट्रोल टंकियों के बाद की खाली जगह पर स्थित है, आश्रम प्राथमिक पाठशाला। इस पाठशाला के बाद मोटर गैराज हैं, फिर औद्योगिक क्षेत्र, वन परिक्षेत्र के बाद नगर पालिका का यात्री कर नाका, वनोपज नाका और पाषाण विभाग की चौकी। यानी नगर के अंतिम छोर पर स्थित पाठशाला तक साइकिल चलाकर जाने में शीघ्र ही समीर का प्रचार हो जाएगा। धोती-कुर्ता में वह कैसे जी पाएगा। कम्प्यूटर कोर्स में अभी एक साल लगना है, तब कहीं जाकर डेढ़-दो हजार का कोई काम उसे मिल पाएगा। अभी तो अनुज उसकी ‘कम्प्यूटर’ की फ़ीस पटा रहा है। तनख्वाह मिलने लगने पर वह स्वयं अपनी फीस पटा लिया करेगा। ‘कम्प्यूटर’ कक्षा ‘अटेंड’ करने के लिए हैंडबैग में वह पैंट-शर्ट लेते आया है। स्कूल की छुट्टी होने पर अपने दोस्त अशफाक के घर जाकर धोती-कुर्ता उतार पैंट-शर्ट पहन लिया करेगा। दिन के बारह बजे तो सड़क काफी व्यस्त हो जाती है। अशफाक का घर पानी टंकी के पास है। लेकिन वहां तक पहुंचने में तो फ़ज़ीहत है। उस रास्ते में साइकिल पर बैठकर फुर्र से उड़ा भी नहीं जा सकता है। बड़ा नाला के बाद इंटर कॉलेज, पानी टंकी तक एक किलोमीटर की चढ़ाई का रास्ता है। पाठशाला की तरफ आने के लिए तो ये ढाल मजा देती है, लेकिन छुट्टी होने पर थका-हारा आदमी साइकिल का कान पकड़े उसे खींचते पैदल चले, इसके अलावा कोई चारा नहीं।

एक किलोमीटर, व्यस्त रास्ते में धोती-कुर्ता-साइकिल के साथ पैदल चलते समीर का हास्यास्पद दृश्य शिक्षक-कक्ष में बैठे समीर को डरा गया। वह भयभीत हो उठा। हमेशा कपड़े के चयन में संजीदा समीर की यह दुर्गति!

दोस्त-यार देखेंगे तो क्या कहेंगे? यही ना… ”बहुत फुटानी मारता था साला…

”कलेक्टर बनने का ख़्वाब पाला था…बन गया रोड इंस्पेक्टर!

हँसना है तो हँसे… उसे फ़िक्र नहीं। धनपति मित्र कैलाश की बात याद हो आई- ”रिलेक्स रहा कर यार… पीछे से पैंट फटी हो तो भी परवाह नहीं, अपना काम करना चाहिए! संसार क्या कहता है तभी प्रधान पाठक देवरस जी ने उसे अपने कक्ष में बुला लिया...

धूप सर चढ़ आई। समीर साइकिल खींच रहा है। धोती की वजह से चलने में कठिनाई हो रही है। रास्ता लम्बा भी है, व्यस्त भी। सड़क पर कोर्ट-कचहरी का काम लेकर आमद-रफ़्त ज्यादा है। स्कूल-कॉलेज के बच्चों, अभिभावकों की भीड़। धनपति लड़कों की स्कूटर, मोटर-साइकिलें उसे मुंह चिढ़ाती भाग रही हैं। समीर शर्म से पानी-पानी है या माथे का पसीना कुर्ता भिगोते हुए धोती की तरफ बढ़ रहा है, कहा नहीं जा सकता।

आज पहली जुलाई है। आसमान साफ-सुथरा है। मानसूनी फुहार पन्द्रह दिन पहले हुई थी। उसके बाद से मौसम और भी ज्यादा गरम हो गया है। गर्मी, साइकिल और समीर की नीची निगाहों में कांपती थरथराती शर्म… उसे लग रहा था कि आने-जाने वाले लोग सिर्फ उसे ही देख रहे हैं। धोती अब खुली की तब! गोकुल अचार जी की बांधी धोती खुलनी तो नहीं चाहिए। फिर भी वह एहतियात बरत कर चल रहा है। बस, किसी तरह घर पहुंच जाए। आज उसने ‘कम्प्यूटर सेंटर’ जाने का इरादा मुल्तवी कर दिया है। कल से देखा जाएगा। आज तो भगवान, किसी तरह सही-सलामत घर पहुंचा दे। कोई उसे पहचाने ना। जैसे वह इस नगर का निवासी न हो! बीच-बीच में सर उठाकर चोरी से वह इधर-उधर ताक लेता। जल्द ही सर झुका लेता कि पकड़ा न जाए। लोग थे कि अपने में मग्न किन्तु समीर को अपना सारा जिस्म लोगों की निगाहों की मार से जख़्मी लगने लगा।

न्यायालय के सामने ‘स्पीड ब्रेकर’ पर आकर थोड़ा सुस्ताना चाहा, चाल धीमी की, इस बीच पैडल से धोती का एक सिरा फंसकर खिंच गया। साइकिल असंतुलित हुई। वह गिर पड़ा। साइकिल दूसरी तरफ गिर गई। वह तत्काल उठ खड़ा हुआ। न्यायालय के सामने काफी भीड़ है। फोटोकॉपी की तीन दुकानें, चाय-पानी की गुमटियां, अखबार, पुस्तक विक्रेता, मोची और साइकिल मरम्मत की गुमटी। वह रूआंसा हो गया।

हे भगवान! गरीबी में आटा गीला… इतनी दुर्दशा!

वह गिरा, उठा, लेकिन बाहर जगत पर कुछ भी प्रभाव न पड़ा। यह बात समीर को कौन समझाए। धोती का निचला हिस्सा फटकर झूल गया और उस पर पैडल की गंदगी भी लग गई। समीर चिंतित… यह नौकरी वह कर पाएगा या नहीं?

हर दिन तिल-तिल मरने से बेहतर है कि एक ही दिन मर लिया जाए। ग्लानि, अपमान और बेचारगी का मिलाजुला असर उसका अंतर्मन दुखा रहा है। वह क्या करे? कहां जाए? इस संसार में कोई नहीं जो उसका दुख समझे, उसका उद्धार करे। उसे लोगों की सहानुभूति नहीं चाहिए, बस एक सम्मानजनक काम चाहिए… क्या इस जन्म में संभव हो पाएगा ! प्रधान पाठक देवरसजी क्या दुश्चिंताओं से उबर पाए! आज पचपन वर्ष की उम्र तक तो निभा चुके हैं। क्या उसका भी यही हश्र होगा?

समीर इसी उधेड़बुन में कब अपने घर के पास आ गया उसे पता ही न चला।

घर में कोई है नहीं। ताला खोलकर अंदर घुसा। साइकिल अंदर की ओर स्टैंड पर लगाने के बजाय उसे एक तरफ गिर जाने दिया। सीधे अपने कमरे में आ गया। दरवाज़ा बंद किया। पता नहीं उसके मन में क्या समा गया कि कुर्ता उतार फेंका। फिर धोती को बेदर्दी से खोलकर फेंक दिया। गंजी-अंडरवियर भी उतार फेंका।

अलफ-नंगा खड़ा समीर नाचने लगा। नाचता रहा-नाचता रहा… इतना नाचा कि थक कर चूर चौकी पर बिछे बिछावन पर गिर पड़ा!

इस तरह की मृत्यु का शोक-पर्व शायद इसी तरह मनाया जाता हो?

अपने को क्या?

पढ़ाई नौकरी शोक

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