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© Mahebub Sonaliya

Drama

3 Minutes   13.9K    15


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दरवाजा टूट जाए इतनी ज़ोर से खटखटाने के आवाज से विजयगीरी स्तब्ध रह गए।काफी जदोजहद  के बाद हिम्मत जूटा के दरवाजा खोल पाये । विजयगीरी अपने बेटे को देखते  ही रह गये । पसीने से भीगा हुआ अनिकेत विचारो में गूम खड़ा था।

"क्या हुआ बेटा ...? इस तरह क्यों ...? इस वक़्त...?" विजयगीरी के मुख से सवालो की बरसात हो गयी।

डरे- डरे से चहेरे पे बिखरे हुए बाल, लाल- लाल आँखे और थका हुआ शरीर  पच्चीस साल का अनिकेत मानो जैसे अभी बोलना सिख रहा हो ऐसे हिचक  रहा था।

"पापा आपका सामान पैक कर लीजिये, चलीये  जल्दी  कीजिए।" वो सिर्फ इतना ही बोल पाया।

"पर हुआ क्या बेटा?" विजयगीरी को सब कुछ पता था, मगर पूछने लगे ।

"आपने अख़बार नहीं पढ़ा? बाहर क्या चल रहा है आपको खबर नहीं?" वो अब भी काँप रहा था।

"तू पहले शांत हो जा, थोड़ा आराम करले" विजयगीरी ने बात को  टालने  की कोशिश की।

"इन लोगों ने सबका आराम हराम कर दिया है "

"किसने बेटा?"

"इन टोपिवालो ने" अपने मस्तिष्क पर से बाल को ऊपर करता अनिकेत बोला

" कहाँ जायेंगे ? हर जगह यही आलम है" विजयगीरी खुद विचारमग्न हो कर आह भरने लगे।

"मुझे खबर है, अहमदाबाद में एक जगह ऐसी है जहाँ हम महफूज़ रहेंगे। आप प्लीज़ जल्दी करें। वो काफी तेज़ स्वर में  बोला।

" बेटा, अपने गाँव को अभी तक ये ज़हरीली हवा नहीं लगी। हम यहाँ ही ज़्यादा महफूज़  है।"अनिकेत के कंधो पर हाथ रखते हुए विजयगीरी बोले।

"आप कैसी बात कर रहे हो, पूरा गाँव किसका है आपको खबर है ना?पूरे गांव में सिर्फ पांच दस घर शिव शिव करने वाले है। फिर भी आपको ये गांव महफूज़ लग रहा है?"अनिकेत की आँखों में गुस्सा उभरता दिख रहा था।

"बेटा मेरा बचपन यहां गुज़रा है । तुम भी यहीं खेल कर बड़े हुए हो।गाँव के कण -कण में मेरी साँस है।और साँस के बिना  कोई ज़िन्दा रह सकता है?" विजयगीरी के गाल की झुरियोँ पर बिन मौसम बरसात आ गई।

"ये वक़्त फिलॉसॉफी  का नहीं, सब कुछ जल रहा है,अभी मैं कहूँ ऐसा कीजिए।कुछ समय बाद वापिस चले....।"

खटखट दरवाजे पे हुई दस्तक ने अनिकेत की बात काट दी

विजयगीरी ने कांपते हाथों से दरवाजा खोला।

बाहर हथियारों से लेस पन्द्रह बीस आदमी अपने मुखिया करीम खान के पीछे खड़े थे।

लम्बे और मजबूत हाथों में नंगी तलवार, बड़ी आँखे, आँखे तो जैसे अंगारे, कदावर शरीर, कफनी पर पान के दाग और सर पर टोपी दोनों का रंग लाल,

"भगत ये तो किसी की भी नहीं सुनती क्यों की ये अपने पराये का भेद नहीं समझती और इसकी धार को हंमेशा खून की प्यास रहती है।" खुली तलवार को हवा में नृत्य करवाता वो बोला।

"ये क्या कह रहे हो करीम खान?" विजयगीरी इतना ही  मुश्किल से बोल पाये ।

"सच कह रहा हूँ भगत, ये तलवारे तुम्हारे लिए है।"

"पठान ......" विजयगीरी डर के मारे बीच  में ही बोल पड़े ।

" ये तलवारे तुम्हारे लिए है भगत, ये मेरे लोग भी तुम्हारे है। गांव के पूरे दस घर की  ज़िम्मेदारी अब से मेरी । किसी का बाल भी बांका नहीं होने दूँगा।अगर ऐसी नौबत आई तो तुम्हारे आगे मैं खड़ा हूँ। और ये तलवारे किसी की भी नहीं सुनती क्यों की ये अपने पराये का भेद नहीं समझती और इसकी धार को हमेशा  खून की प्यास रहती है।तुम शांति से सो जाओ , मैं जाग रहा हूँ।" कोई भी प्रत्युत्तर की आशा के  बगैर  पठान  दरवाजा बन्द कर के बाहर खड़ा हो गया।

विजयगीरी अपने बेटे को देखते ही रह गये । पसीने से भीगा हुआ अनिकेत विचारो में ग़ुम  खड़ा था।

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