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तीसरा दर्जा
तीसरा दर्जा
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© Aditya Agnihotri

Drama

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मैं हमेशा तीसरे दर्जे में सफ़र करती हूँ. इसलिए नहीं कि मैने गांधीजी को पढ़ा. गांधीजी को पढना इतना आसान नहीं. एक व्यक्ति ने मुझसे इसी पर सवाल किया था. उस व्यक्ति के सवाल में जवाब भी था.

“ क्या गांधीजी ने कहा है इसलिये तीसरे दर्जे में सफ़र करती हो?

उस वक़्त मुझे गांधीजी से थोड़ी सी जलन हुई. हर अच्छे आदर्श का श्रेय गांधीजी ले जाते हैं. मुझे याद है मैने उससे क्या कहा था.

" ये जो इतने सारे लोग इन डब्बों में जानवरों की तरह भरे पड़े हैं, जैसे भगवन ने एक्सपेरिमेंट के लिए अपनी लेबोरेटरी में रखा है, सब आपको गांधीजी के फ़ोलोवर लगते हैं?

"लेकिन आप तो काफ़ी पढ़ी-लिखी लगती हैं, और इतना कमाने वाली भी, आपको नहीं लगता कि ए.सी. में होना चाहिए आपको?

मुझे एक सेकंड के लिए लगा कि ये मेरे पास कितने पैसे हैं, जानने की ताक़ में तो नहीं हैं. मैंने अपना हैंडबैग उसके बिना दिखा हुए अपने पास सिमटा लिया.

“हाँ, तुम्हारा अंदाज़ा सही है. ए.सी. में सफ़र करना चाहिए मुझे, लेकिन ए.सी. की घुटन मेरे बर्दाश्त के बाहर है, और जब तक मैं तीसरे दर्जे में सफ़र करने लायक हूँ, मेरा मतलब बूढ़ी नहीं हो जाती, मैं तीसरे दर्जे में ही खुश हूँ. यहाँ इतने सारे लोग हैं कोई कहीं से, कोई कोई कहीं से,इतनी सारी बातें हो जाती हैं ,कोई खाना शेयर कर देता है, कोई खुद बैठने को जगह दे देता है. रिज़र्वेशन में तो लोगों को लगता है भगवान ने ३६ न. की राजगद्दी पर उनका नाम लिख दिया है. कोई गलती से बैठ भर जाए तो ऐसे उठाते हैं जैसे ट्रेन ही उनके नाम पर हो..”

“लेकिन घुटन तो लोगों को जनरली जनरल के डब्बों में हुआ करती है?

“आप मेरा मतलब समझे नहीं, मुझे ए.सी. से कोई तकलीफ़ नहीं, मैं जिस ऑफिस में काम करती हूँ, उस के तो हर कोने में ए.सी. है, जहाँ ज़रूरत नहीं वहां भी. मुझे ए.सी. की आदत है. लेकिन ऑफिस में लोग होते हैं, और मेरा अपना एक काम होता है, जो शायद वैसे माहोल में ही मुमकिन है. लेकिन अब घर जाते वक़्त मेरे पास कोई काम नहीं होता, ए.सी. के डब्बे के लोग तो किताबे निकाल कर पढने लगते हैं. कुछ वाकई पढ़ते हैं पर ज़्यादातर टाइमपास करने के लिए. मैं किताबे ज्यादा पढ़ती नहीं, और टाइम सिर्फ पास करना भी मुझे पसंद नहीं, किताबों के मुर्दा चरित्रों से बात करने के बजाये मुझे सांस लेते हुए जिंदा लोगों से बतियाना ज्यादा पसंद है.”

"आपको किताबों के उन सजीव चित्रों के बजाये ये, ये तीसरे दर्जे के लोग जिंदा लगते हैं?”

“तो क्या ए.सी. के बंद डब्बों के पहले दर्जे के लोग जिंदा होते है?. जिनकी बातों का अंदाज़ा आपको पहले से होता है. जैसे आप किसी कस्टमर केयर पे बात कर रहे हों. वे इतने नेक बनते हैं लेकिन उनकी नेकदिली के पीछे उनका तीसरे दर्जे से पहले दर्जे में पहुचने का घमंड हमेशा छलकता रहता है. कांच की खिड़की से एक तरफ की दुनिया देख कर वे सारे मुद्दों को हल करने का दम बांध लेते हैं और जिस दिन इस खिड़की में दरार पड़ जाती है तो सूरज की ताज़ा रोशनी उनको स्किन कैंसर कर देती है"

“कभी कभी मुझे लगता है कि ए.सी. में बंद लोग तीसरे दर्जे वालों से कतराते हैं, बल्कि जलते भी हैं क्योंकि तीसरे दर्जे वाले के पास हमेशा बातें करने को होंगी, क्या बात करनी चाहिए क्या नहीं, उन्हें नहीं पता, पर बात तो होती है.”

"लेकिन दीदी, इस डिब्बे में सुरक्षा की बात भी तो होती है, इतनी भीड़ में चोरी-चकारी का डर होता है. और आप लेडीज़ के लिए तो और भी.... "

"हाँ ये बात तो सही है, थोडा डर तो रहता है. लेकिन अपनी सुरक्षा अपने हाथ है. सावधान तो हमें वैसे भी हर पल रहना चाहिए. और वैसे तुम बताओ कि अकेलेपन में ज्यादा डर लगता है या भीड में? आप अकेले हों तो आपको पता होता है कि मदद करने कोई नहीं आएगा, और आएगा भी तो खबर पहुचने में कुछ वक़्त तो लगेगा, यहाँ भीड़ में तो मदद करने के लिए कई लोग मौजूद हैं. ऐसे ही एक बार की बात बताती हूँ

"मैं ऐसे ही जनरल में पंजाब जा रही थी. भीड़ इतनी थी कि लेडीज़ डब्बे में भी बहुत सारे आदमी भरे पड़े थे. त्यौहार का माहौल था. ज़्यादातर मजबूरी में तीसरे दर्जे में सफ़र कर रहे थे. उस साइड तो जनरल में भी पढ़े लिखे लोग होते हैं. जो फॉरेन फिल्मे देखा करते हैं थोडा बहुत इंग्लिश में चबड़ चबड भी कर लेते हैं, उनकी नज़रों से ही आप उनका चरित्र समझ सकते हैं जो कि असल में होता ही नहीं. मुझे भी डर लग रहा था. एक अंकल ने मेरा हाथ पकड़ लिया ४०-५० ऐज होगी उसकी. मैंने हाथ छुड़ाया और कुछ नहीं कहा. जितना डर मुझे था शायद उससे ज्यादा डर उसको भी था. मुझे लगा शायद इस के साथी भी इसी डब्बे में हों तो ऐसे मौके पर शांत रहना ही अच्छा है. उसने फिर वही हरकत दोहराई, मैं काफी डर गई, मुझे पसीने आने लगे. मैंने झट से अपना हाथ छुड़ाया, और २-४ कदम आगे जा कर खड़ी हो गई. मुझे लगा कोई देख न ले, फ़ालतू में चार बातें होगी. थोडा देर सुकून से खड़ी हुई थी कि अचानक से एक बड़ी सी सुरंग आ गई. और घुप्प अँधेरा चारों तरफ. मेरा दिल बहुत ज़ोरों से धड़कने लगा था. मैं बस इंतजार कर रही थी कि ये नाशपिटी सुरंग खत्म कब होगी. इंतजार खत्म हुआ धीरे धीरे दोनों तरफ की खिडकियों से रोशनी आना चालू हो गई. मैंने अपना पसीना पौंछा. इतने में मुझे अपनी कमर पर कुछ महसूस हुआ, कुछ कीड़े की तरह रेंगता हुआ. मैंने पलट कर देखा तो उसी व्यक्ति का हाथ था. मैंने हाथ झटका इतने में पंजाबी सी हिंदी में हो-हल्ला शुरू हो गया

"लड़की को छेड़ता है, साले हरामखोर माँ, बहिन नहीं है तेरे घर में, उम्र का कुछ तो लिहाज कर, अधेड़ साले एक घंटे से देख रहा हूँ, औरत कुछ नहीं कह रही तो पीछे ही पड़ गया हरामी, मारो साले को, साला इस जैसों ने ही हम मर्दों को बदनाम कर रखा है मारो, मारो मारो."

इस के बाद उन सब लोगों का पारा और चढ़ गया. वो ठेट भाषा बोलने लगे जो मुझे समझ नहीं आई, बहुत बहुत देर तक मारो मारो होती रही, फिर अगले स्टेशन पर उसे उस बुरी हालत में

पहले अस्पताल भेजा गया या पुलिस स्टेशन , मुझे पता नहीं. लेकिन कमाल की बात ये रही कि जिन्हें में गलत समझ रही थी. उन्ही लोगों ने बिना मांगे ही मेरी मदद की. मुझे लग रहा था कि कोई ये सब नहीं देख रहा. लेकिन जाने कितने लोगों की उस व्यक्ति की हरकतों पर नज़र थी. आज-कल टी.वी और अख़बार की खबरों ने हमारी मानसिकता ही खराब कर दी है.

"लेकिन दी, आपको छेड़ने वाले को अच्छा मज़ा चखा दिया गया? उसकी धुनाई देख कर आपको भी मज़ा आया होगा न?”

"सच बताऊँ तो, नहीं. जब वे उसे पीट रहे थे तो मुझे पूरे समय इसी बात का डर खाया जा रहा था. कि वे उसके सिर पर न मार दें, कहीं वो मर न जाए. उन लोगों की अपनी-अपनी ज़िन्दगी का सारा गुस्सा उसकी एक हरकत पे फूट गया था. मेरे ख्याल से ये वही लोग थे जिन्हें रिज़र्वेशन न मिल पाने के कारन मजबूरी में तीसरे दर्जे में सफ़र कर रहे थे.

"हा...हा...हा दी, ये भी सही कही आपने, रोज़मर्रा वाले लोग होते तो शयद इतना न मारते उसे"

"हाँ, फिर भी जब तय हो ही गया है कि आपको आपकी मर्ज़ी के मुताबिक़ सफ़र करने नहीं मिलना है, तो लोगों को समझदारी से काम लेना चाहिए, लेकिन मैं तो हमेशा अपनी मर्ज़ी के मुताबिक सफ़र करती हूँ, भगवान् हर बार मेरी मर्जी मान लेता है.

"अरे वाह, वो इसलिए कि तीसरे दर्जे से नीचे कोई दर्जा ही नहीं होता.”

"करेक्ट! लेकिन कम से कम मुझे पता तो है अपने दर्जे और अपने सफ़र का. हम बस अपना अपना दर्जा तय कर लें बस. मैं तो आज भी तीसरे दर्जे की बुद्धू हूँ. वैसे अगली बार तुम किस दर्जे में सफ़र करने वाले हो?

"अगली बार का तो कुछ पता नहीं, पर कोशिश करूँगा कि आपके दर्जे में!”

मेरी उस लड़के से फिर शायद ही कभी मुलाक़ात हो. लेकिन मुझे पता भी नहीं चला कि मेरा सफ़र बातों-बातों में कब निकल गया. बात-चीत होती रहे तो वाकई जिंदगी का मज़ा ही कुछ और है. वो मुझे दीदी कहने लगा था. अब भले ही इस रिश्ते की डोर हममे से किसी के हाथ में नहीं पर रिश्ता तो है. ऐसे ही में मेरे कई सफ़र गुज़रे हैं और हर बार मेरे पास अपनो को बताने के लिए कुछ नये किस्से हो जाते हैं. अगर तीसरे दर्जे के लोग वाकई इतने मजेदार होते हैं तो मै हमेशा तीसरे दर्जे में ही रहूँ.

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