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'पूजा' की अंगूठी
'पूजा' की अंगूठी
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© Kamal Choudhary

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दोपहर बाद से ही सब ने तैयार होना शुरू कर दिया था। क्योंकि ट्रैक्टर-ट्रॉली से जाना था तो कम से कम 2 घंटे तो आराम से लगेंगे ही। तो मै भी नाह- धोकर एक दम सेट था, मैं बस इस इंतज़ार मे था कि कब चलने के लिए बुलावा आये और कब हम चलें। मैं अकेला नही जा रहा था, मेरे पापा और मेरा छोटा भाई भी जारहे थे। छोटा भाई भी मेरे साथ ही तैयार होगया था, लेकिन उसे शायद इतनी जल्दी नही थी जाने की। या यूं कहिये की उसने सोच रखा था 'कि जब भी जाना होगा चलदेंगे, ऐसा तो नही है कि सब चले जायेंगे और मुझे छोड़ देंगे।

मुझे घूमने - फिरने का बहोत शौक था। इस बार ही नहीं, अबसे पहले भी मैं कई बार गया था शादियों और बारात मैं। तो तब भी ऐसा ही होता था, मैं सबसे पहले तैयार होजाता था। अभी पाप जी भी खेत से नही आये थे, जब कि सुरेंदर भैया ने सभी मोहोल्ला वालो को एक दिन पहले ही बता दिया था की 'कल लक्ष्मी दीदी का भात भरने जाना है तो सब टाइम से तैयार होजाना'

लेकिन पाप जी पता नही अभी तक क्यों नहीं आये।

मेरे दिमाग मे ये सवालों का झंगोल उधड़- बन कर ही रहा था कि तभी पाप जी भी आगए। उन्हें देख कर मैन चैन की सांस ली।

पाप जी भी कुछ ही देर मै तैयार होगये और उन्होंने हम दोनो भाईयों से कहा कि "तुम जाकर ट्रैक्टर- ट्रॉली मैं बैठौ मैं भी तुम्हारे पीछे आता हूं"

एक बार तो मेरे दिमाग मे आया कि 'अभी तो कोई बुलाने भी नही आया तो फिर एसे कैसे चलेजाएँ' मैं सोच ही रहा था कि पापा जी फिर दुबारा बोले "सुरेंद्र मुझे रास्ते मै ही मिलगया था। तभी उसने मुझे बतादिया था" पापा जी के इतना कहते ही जैसे मानो मेरे मन मे 'लड्डू' फूटने लगे, और मैं सरपट - सरपट ट्रैक्टर- ट्रॉली की तरफ बढ़ता चला। और मेरे पीछे मेरा छोटा भाई जिसे कोई जल्दी नही थी। वो भी मुझसे थोड़ा ही पीछे था , मैंने उसे आवाज लगते हुए कहा 'जल्दी चल यार वार्ना ट्रॉली मै जगहा नही मिलेगी'। तो तू लटक के चला जाना, उसने जवाव देते हुए अपने कदमो को थोड़ी रफ्तार दी। कुछ ही देर मैं पहुंच भी गए। वहां जाकर देखा तो सब चलने के लिए तैयार थे बस हमारा और पाप जी का ही इंतज़ार किया जा रहा था। हम ट्रॉली मैं बैठ गए। कुछ ही देर बाद पापा जी भी आगए। फिर जोर से सभी ने एक साथ 'कुटि वाले बाबा कि जेय.....' बोली और चलदिये।

पहुंचते -पहुंचते लगभग रात ही होचुकी थी और करीब 'सवा दो' घंटे मैं हम महल पहुंच गए।

औरतों ओर बच्चों को दीदी के घर ही उतर दिया था। तो मैं भी वही उतर गया, और हम दीदी के किसी पड़ोसी के घर मे ठहर गए। बाकी लोग बारात वाली जगहा पहुंच गए।

कुछ देर बाद ही भात भरने की रश्म शुरू होगयी। एक - एक करके सब पटरी पर चढ़ने लगे और थाली मै अपनी इच्छा अनुसार रुपये डालते गए और 'गोल, लड्डू' लेकर निकलते गए। साथ ही गीत की रसम भी चल रही थी। औरत भात भराई के गीत गारही थी। कुछ ही देर मै मेरा नंबर भी आने ही वाला था। लेकिन मेरा ध्यान भात पर नही, कहीं ओर ही था। मेरा ध्यान तो उसपर था जो दीदी को 'गोला ओर लड्डू' पकड़ा रही थी । उसने भी मुझे देख ही किया था लेकिन जाहिर नही होने दिया। बस चुप चाप अपने काम मैं लगी हुई थी, ओर बीच बीच मै मुझ पर नजर मरलेती थी। लेकिन मै था कि उसे घूरे जारहा था। और मन ही मन मुस्कुरा रहा था ।

तभी मेरा नंबर भी आगया। मैने पापा जी के दिये रुपये जेब से निकले और थाली में रख दिये। 'चार - पांच बार मेरा आरता किया गया। इस बीच उसकी नजर मुझ पर ही थी। लेकिन उसकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया दिखाई नही देरही थी। मेरे मांथे टीका लगाकर दीदी ने गोल लड्डू मांगा तो उस लड़की ने अपनी आंखों से मेरी तरफ इशारा करते हुए दीदी को लड्डू ओर गोल पकड़ाए।

उसका इशारा क्या था मुझे अभी तक समझ नही आया, लेकिन अंदर ही अंदर एक अजीब सी खुशी मेरे दिल मे उछाले मार रही थी। अंदर से ऐसा एहसास हो रहा था मानो 'जैसे किसी ने मेरे गाल पर पप्पी करली हो' या यूं कहो कि उस ख़ुशी को सब्दों मैं बयां करना नही रहा था। मेरी उम्र जियादा भी तो नहीं थी, जो मैं इन सब बातों का मतकब समझ पाता। मैं करीब 14,15 साल का ही हूँगा। लेकिन वो मुझसे बड़ी ही थी।

खैर मैं वहाँ से आया और दिया सामना 'गोला, लड्डू' मेने एक थैले मैं रखदिया। जैसे मेने गोला थैले मैं रखा तो उसमें से कोई आवाज आई 'जैसे उसके अंदर कोई चीज पड़ी हो। खैर मैंने इस बात पर जियादा ध्यान नही दिया।

कुछ ही देर मैं सब लोग फ्री होगये और खाना खाने चलेगये, उन्ही के साथ मैं और मेरा भाई भी चलदिये।

खाना खाने के बाद वापस उसी घर पर आगऐ। कमरे मैं थोड़ी भीड़ होगयी थी। क्योकि हमसे दूसरे रिस्तेदार भी उसी कमरे मे रुके हुए थे। मैं बैड पर लेट गया और उसी लड़की के बारे मे सोच रहा था और उसके इशारे को समझने की कोशिस कर रहा था। मैं मन ही मन उस गुत्थी को सुलझाने की कोशिस कर ही रहा था कि वो लड़की भी उसी कमरे मे आगयी। उसे देखते ही मेरी हालत समझो खराब होगयी, मैं उसे देखरहा था और वो मुझे देख रही थी। मैं शर्म के मारे जियादा देर तक नही देख पाया, लेकिन वो मुझे देखती मंद मंद मुस्कराति हुई आकर सीधा बैड पर बैठगयी।

सब लोग आपस मै बात करने मे लगे हुऐ थे। कोई खाने की बात कर रहा था

'तूने कितने रसगुल्ले खाये' एक ने पूछा।

'मेने तो चार खाये, और तूने,,,? दूसरे ने जवाव देते हुए पूछा।

'तोपै बस चार ही खाये गए, मेने तो सात खाये, चार काले और

तीन सफेद, जवाव दिया।

बाकी सब भी इसी तरह से कोई न कोई मुद्दे पर बात कर रहे थे। लेकिन मेरे दिल और दिमाग मे तो सिर्फ अब एक ही मुद्दा चल रहा था। इसे चलना नही कहेंगे इसे ससंसनी कहेंगे। दिल 'धकधक धकधक' कर रहा था, दिमाग पूरी खोपड़ी मैं फड़फड़ा रहा था।

अब वो और मैं एक ही बैड पर बैठे थे और वो पूरे कमरे मै नज़र घुमा- फिरा कर मेरी तरफ देखती, मानो जैसे कुछ कह रही हो या कहना चाहती हो। मैंने कहा था न कि मुझे इशारों की भाषा समझ नही आती।

इसी बीच उसी के गाँव की एक लड़की आकर उसके पास बैठगयी।

"तूने कहना खाना खलिया"? दूसरी लड़की ने पूछा।

"नहीं.... अभी नही खाया" उसने जवाव दिया।

"कब खायेगी...? एक बार फिर उसने पूछा।

"खालूंगी यार... अभी भूँक नही है..... अच्छा एक काम करदे"

उसने चिड़चिड़े ढंग से जवाव देते हुये कहा, जैसे मानो बस उसे वह से भागना चाहती हो।

"क्या" उसने पूछा ।

"एक ग्लास पानी चाहिए....... किसी की नींद खोलनी है... टाइम से पहले सोने जा रहा है कोई"

"ठीक है, अभी लाती हु" कहके चली गयी।

शायद उसने पूरी बात नही सुनी थी। लेकिन उसकी बात का मतलब मैं साफ साफ समझ गया था। और मैं उठकर बैठ गया। ये सोचकर कि कही वो सच मे मेरे ऊपर पानी न डालदे। एक बार को मैने सोचा कि होसकता है शायद किसी और की बात कर रही हो, लेकिन फिर सोचा कि उसके अलावा और कोई तो नही लेट रहा है कमरे मे।

"मैं सो नही रह" किसी तरह हिम्मत करके मेने उसे बताया। लेकिन उसकी तरफ से कोई जवाव नही आया और अनसुना कर के पूरे कमरे मे नज़रघुमाई

और फिर बिना कुछ कहे मेरी तरफ देख कर मुस्कुराई। शायद वो समझ गयी थी कि मैं बहोत बाद फट्टू हूँ। मेने हिम्मत करके फिर उससे पूछा "क्या आप मेरी बात तो नही कर रही हो"

उसने कुछ सोचने के बाद जवाव तो नही दिया लेकिन उल्टा एक सवाल मुझसे पूछा "तेरा नाम क्या है?"

"पवन" मेने जवाव दिया। उसने कुछ नही कहा बस मेरी तरफ फिर से क़ातिलाना अंदाज़ मै देखा। उसके बार बार के देखने से मानो वो मेरी नजरों से होती हुई सीधी दिल तक दस्तक देरही थी। और जितनी बार वो देखती उतनी ही बार मेरे तंमन्दिर और मानमंदिर मैं घंटी बजती। कुछ देर तक मैं भी इस बीच उलझा रहा कि 'मैं भी इसका नाम पूछ के देखु, या नही...., चल पूछ ही लेता हूं' और फिर मेने हिम्मत करके उससे पूछ लिया।

"और आपका क्या नाम है" मेने हल्की सी आवाज मैं डरते डरते पूछा।

"पूजा" उसने जवाव दिया।

उसका नाम जानने के बाद मेरी ख़ुशी का ठिकाना नाही था। मेने उससे उसका नाम पूछ कर मानो जैसे कोई फ़तह हासिल करली हो। अभी हम बात करने लगे ही थे कि तभी छोटा भाई आया और बोला "चलो सब ट्रॉली मैं आकर बैठ जाओ हम चलने वाले ट्रॉली जाने वाली है। रात के करीब 11 बज चुके थे। और जो हमारे साथ के बच्चे थे और औरतें थी सब चलने लगे। जाने के नाम से मेरा दिल एक दम उदास होगया, होता भी क्यों नही, मुझे अपनी ज़िंदगी मैं पहली बार प्यार का स्वाद पता चला, की ये कितना प्यारा, कितना सुहाना ओर कितना पवित्र होता है। प्यार कोई ऐसी चीज नही है जिसे जाकर मैं किसी दुकान से खरीद लूं।

जाना तो पड़ेगा, एक बार मेने उसकी तरफ देखा तो उसके चेहरे की रौनक भी मानो जैसे गायब होचुकी थी। उसकी आंखें मुझे डीगडिगी लगाए देख कुछ कहना चाहती थी। लेकिन वो बिना कुछ कहे बैठी रही और अपने हाथ की उँगली को देखने लगी। 'अरे , इसकी अंगूठी कहा है..? जो इसने भात देते टाइम पहनी हुई थी, कही गिर तो नही गयी, शायद वो ये तो नही कहना चाहती हो कि 'उसकी अंगुठी खोगई।

मेने जब उसकी उंगली देखी तो एक दम से इतने सारे सवालों ने मुझे घेर लिया था। लेकिन अब उससे पुछु भी तो कैसे, अब टाइम भी नही है, इतना भी तय है कि हम आज के बाद कभी मिलेंगे नही। मेरा मन उखड़ने लगा, मानो जैसे मेरा दिल उस लड़की ने अपने पास रख लिया है और अब उसे डेन नही चाहती। जाना था तो मैं उसे इसी हाल मैं छोड़ कर आगया। कमरे से बाहर निकलने के बाद मेने एक बार पीछे मुड़कर देखा तो वो मुझे एक खिड़की से झांक कर देख रही थी। अब मैं समझ चुका था कि जो आग इधर है वो आग उधर भी लगी है।

सब लोग आचूके थे तो हम चलदिये। मेरे लिए तो एक काम मिल चुका था, वो काम था कि पूरे रास्ते उसके ख्यालों मैं खोया रहूँ ।

चलते - चलते सब लोग बात कर रहे थे। तो उनमें से कुछ ने बात करते करते गोला खाना शुरू करदिया, जिससे सफर मैं मन लगा रहे। तो मेरी भी इच्छा हुई तो मैने भी अपने थैला से गोला निकाल लिया। मेने थैले से गोला निकला तो गोला पहले से ही चटका हुआ था, तो उसे तोड़ने मैं कोई परेशानी नही हुई। लेकिन ये क्या? मेने जब गोला तोड़ा तो देखा कि उसमें पूजा की अंगूठी थी, वही अंगूठी जो उसने भात भरते समय पहनी थी।

मैं तुरंत समझ गया कि वो क्या कहना चाहती थी। मैं अपना माथा पकड़ कर बैठ गया, और खुद को कोसने लगा, की अगर उसके इशारे को समझ जाता तो शायद वो मेरी ज़िंदगी का पहला प्यार बनजातीवगैरा ।-वगैरा ये- वो, बहोत सी बात मेरे दिमाग मे चलने लगी और मैं खुद को बद दुआ दे रहा था। लेकिन अब क्या होसकता है। मैं अपना माथा पकड़ कर पूरे रास्ते चुप बैठा रहा।

गाँव प्यार महल

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