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मुक्ति
मुक्ति
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© Abha Srivastava

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मुक्ति 

मेरे घर से चाय बिस्कुट एक और परिवार से भोजन और जिससे जो बन पड़े हाँ यही सजा थी उनके शादी न हो पाने की  जब तक काम कर पाती थी पूछ बनी रही घर में पर अब वो बीमार थी और लघुशंका भी कभी कभी कपड़ों में हो जाती थी अशक्त थी और एक दिन उनके गहने भी पता नहीं कहाँ चोरी हो गए थे, अब क्या काम उनका घर में ?  पर वो एक ऊँचे मकान और मंदिर के ट्रस्टी की बेटी और बहन थी जिसकी झलक उनकी आवाज़ में सुनाई देती थी जब वो बच्चों को डांटती थी परेशान करने पर,

 

पिछले कई दिनों से सन्नाटा था मुंडेर पर कोई नहीं, पता लगा वृद्धाश्रम में मोहल्ले वाले छोड़ आये हैं कपड़ों से बदबू आती थी और बच्चों को बहुत डांटती थी दो चार रोज़ और बीत गए मेरा मन रोज़ धिक्कारता था मुझे अगले दिन कॉलेज के बाद सीधी पहुँच गयी मिलने उनसे मैनेजर ने कहा--

 "कितनी बुरी अवस्था में छोड़ा, आप लोगों ने चार दिन में क्या मैं अमृत दे देता कल रात मुक्ति मिल गयी "

मेरे आँखों की नमी ज़ज़्ब हो गयी मेरे अंदर, संतोष की एक साँस ली और बस.................

 

parivaar

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