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किरदार
किरदार
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© Nishant Parmar

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ऑफिस से घर जाते वक्त एक आदमी को उसके दोस्तों ने कहा “चलो आज यहाँ बाज़ार में होने वाला मंचीय नाटक देखते है।" वे लोग सभागार में गये तो देखा नाटक शुरू हो चुका था, जिसमें कोई व्यक्ति डाक्टर का किरदार निभा रहा था, कोई इंजीनियर का और कोई बेचारा किसान का। उस आदमी को डाक्टर का वेतन देख डाक्टर का किरदार पसंद आ गया।

 

उसने घर आकर अपनी पत्नी को कहा कि मैं अपने छोटू को डाक्टर बनाऊँगा। दस साल के छोटू के दिमाग में ये बात बैठा दी गई कि तुम्हें डाक्टर ही बनना है, उसको हर वो मुमकिन शिक्षा दिलाई गई जो एक डाक्टर बनने के लिए चाहिए, खेल कूद के समय को पढ़ाई के समय में परिवर्तित कर दिया गया, जबरदस्ती मेहनत करने पर मजबूर किया गया, दूसरे बच्चे खेलते लेकिन छोटू पढ़ता रहता। और एक दिन ऐसा आया जब मेहनत करने का समय खत्म हो चुका था। उस दिन छोटू के पिता उसे उसी मंचीय नाटक में ले गये जहां वे बहुत साल पहले गये थे।

 

छोटू को जबरदस्ती पर्दे के उस पार जाने के लिये कहां गया, वो डरता हुआ उस पर्दे के उस पार तो चला गया लेकिन उसने देखे, कुछ उदास चेहरे जो केवल पर्दा खुलने पर मुस्कुराते हैं। ना चाहते हुए भी छोटू उस नाटक का एक 'किरदार' बन गया जिसे केवल पर्दा खुलने पर नाटकीय मुस्कान देनी थी। छोटू की सफलता देख उसके पिता बहुत खुश थे व दर्शक आशीर्वाद देते और छोटू कि प्रशंसा करते।

 

लेकिन केवल छोटू जानता था कि वो एक सोने के पिंजरे में कैद है जिसे उसके पिता ने उसके लिये बनाया है और उस पिंजरे का नाम है किरदार, लोग केवल पिंजरे का सोना देखकर छोटू कि सफलता का अंदाज़ा लगा रहे थे लेकिन किसी को भी उसमें कैद छोटू नहीं दिखा।

 

धीरे धीरे पिंजरे का आकार छोटा होता गया जिसमें छोटू का सांस लेना मुश्किल हो गया। छोटू ने अपने एक दोस्त को अपने पास बुलाया और भावुक होकर कहा तुम्हें पता है, कि यह संसार एक नाटक है? जिसमें हर व्यक्ति अपना किरदार निभा रहा है, किसी ने अपना किरदार खुद चुना तो किसी को जबरदस्ती सौंप दिया गया। क्यों एक व्यक्ति अपने किरदार से बाहर आकर इस संसार कि खुली हवाओं में नहीं जी सकता” यह सब कहते कहते एक बहुत गंभीर बात छोटू ने कही, उसने कहा “मुझे इस किरदार ने जकड़ लिया है और मुझे आभास है कि मैं बहुत जल्द मरने वाला हूँ और मेरी एक आखिरी इच्छा है” छोटू अपनी मौत के बाद अपनी कब्र पर अपने नाम के बजाये एक शब्द लिखवाना चाहता था

 

कुछ दिनों बाद छोटू मर गया।

 

उसके पिता आज भी उस कब्र पर वो शब्द देखकर रो पड़ते हैं क्योंकि वो शब्द था 

 

किरदार।

 

 

 

सपने जो पूरे नही होते।

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