S Suman

Drama Inspirational


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नज़रअंदाज़ किया गया बदलाव

नज़रअंदाज़ किया गया बदलाव

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आज रूचि के गये हुए पाँच साल हो गये| आज भी मैं खुद को गुन्हेगार की नज़र से देखता हूँ| समझ नहीं आता क्या करूँ?...शायद मेरी अर्थी तक ये गुनाह मेरे साथ जाएगी| इतना कुछ चल रहा था दिमाग़ में की सर फटा जा रहा था|

उसपे से आज दिया ने हद कर दी थी| चाइ लेकर आई तो, पर कुछ बोला नहीं| हमेशा जब भी वो आती थी, तब मेरे सुन-सान घर मे उसकी हसी गूँज उठती थी| पता नहीं आज क्या हो गया था उसे?!शायद मूड अच्छा नही होगा| दिया मेरे पड़ोस में ही रहती है, रूचि के जाने के बाद उसकी हसीं ही मेरे जीने का सहारा बन गयइ थी|

जब घर का अकेलापन खाने को दौरता हैं तो रूचि की तस्वीर से बाते करने की कोशिश करता हूँ| पर वो कभी जवाब नहीं देती|

कुछ भी समझ नही आया था मुझे, की कैसे अचानक से एक लम्हे में सब बदल गया था|

आज भी खुद से पूछता हूँ कौन थे वो लोग? कौन थे वो ज़ालिम जिन्होने मुझसे मेरे जीने का सहारा छिन लिया था|

मेरी रूचि, जिसको मैंने हथेली के घाव की तरह संभाल के रखा था, वो कैसे बिखर गई थी| मैंने कभी दुःख और परेसानी की परछाई तक नही आने दी थी उसके करीब, फिर ये सब कैसे हो गया था|

हाँ! ये मानता हूँ मैं की, जब उसने कॉलेज शुरू किया था तब मैं अपने दफ़्तर के काम मे कुछ ज़्यादा ही व्यस्त हो गया था| पर उस वक़्त भी ऐसा नही था की मुझे उसकी परवाह नहीं थी| मैं मेरी बेटी को अच्छी तरह समझता था, मुझे हमेशा लगा की वो बहुत समझदार है और मुझे| और उसने भी तो यही किया था ना, मुझे कभी भी दफ़्तर का काम करते वक़्त टोका नहीं|

पर क्यूँ? इतना कुछ जब हो रहा था तब तो मुझे बताना चाहिए था ना, क्यूँ नहीं बताया उसने मुझे कुछ?

शायद बताने की कोशिश की थी, पर मैंने ही उसे नज़रअंदाज़ कर दिया था| शुरूवात में उसने कोशिश की थी मुझसे बात करने की, पर मैने हीं उसकी बातें अनसुनी कर दी थी| जब उसके कॉलेज का दूसरा दिन था, तब उसने पूछा था - "पापा!आप मेरे साथ कॉलेज चलेंगे क्या?"

और ये पूछने का सिलसिला यही नहीं थमा था, उसने कई रोज़ मुझसे यही सवाल किया था अलग-अलग लफ़्ज़ों में...

"पापा आज कॉलेज मे फंकसन(function) हैं आप भी साथ चलेंगे क्या?"

"पापा कल रिक्शा नहीं मिली थी, इसीलिए क्लास देर से पहुँची थी| आज आप मुझे छोड़ देंगे क्या?"

"पापा आज मेरा अकेले जाने का मन नहीं हैं, आप भी चले ना मुझे कॉलेज तक छोड़ने जैसे स्कूल छोड़ने जाते थे?"

पर हर बार मैं अपने काम की व्यस्तता की गवाही देकर उसकी बातों को उनसुना कर देता था| हर बार मैं उसको यही समझाता था कि - "रूचि! बेटा अब आपबड़ी हो गई हो| पापा के पास बहुत काम हैं ना इसीलिए अब आपको अपना काम खुद ही करना होगा| और मेरी परी तो पापा की बेस्ट बेटी है ना|"

जब तक वो साथ थी, तब तक कभी एहसास नहीं हुआ की मैं अकेला हूँ| हमेशा हम एक दूसरे को संभाल लेते थे| जब भी मुझे राशि की याद आती थी, तो वो मुझे कंधा दे देती थी| और जब भी उसे राशि की कमी महसूस होती थी तो मैं उसके माँ का रोल निभाने लगता था| राशि, मेरी पत्नी, रूचि की माँ| उसने मेरे हाथों मे रूचि को तो दिया था, पर वो खुद हमें छोड़ कर चली गई| रूचि को पालते वक़्त मैंने हमेशा एक माँ और बाप दोनों की ज़िम्मेदारी उठाने की कोशिश की थी| जब तक रूचि थी तब तक मुझे कभी इस बात का गिला नहीं हुआ की राशि नहीं है| पर जब रूचि ने भी साथ छोड़ दिया तब एहसास हुआ मेरी कोशिश अधूरी थी|

नहीं बन पाया था मैं माँ! अगर आज राशि होती तो रूचि भी होती हमारे साथ में|

मैं इतना अंजान क्यूँ था? क्यूँ नहीं समझ पाया था अपनी बेटी को?

पहले जो लड़की जीन्स पे टॉप पहनती थी, वो अचानक से सलवार-कमीज़ पहनने लगी थी| पहले वो स्कूटी से कॉलेज जाती थी, पर अब रिक्शा से जाने लगी थी| पहले जब भी वो खरीदारी करके आती थी तो मेरा एक ही सवाल हुआ करता था-"इस से ज़्यादा रंग-बिरंगे भरकीले कपड़े तुझे दुकान मे नहीं मिले?"

और वो बोलती थी - "पापा आप नही समझोगे, यू आर एन ओल्ड मेन एंड आई एम ए यंग वुमन...इट्स न्यू ट्रेंड|"

अचानक से क्या हो गया था, इस यंग वुमन को? कॉलेज के कुछ दिनों के बाद ही वो फीके हल्के रंग के कपड़े पहनने लगी थी| हाइ हील चप्पालों की जगह काले रंग के सपाट जूतों ने ले लिया था| जिस लड़की ने आज तक दुपट्टा नहीं रखा था वो आजकल सर पर दुपट्टा रखने लगी थीं| मुझे क्यूँ नही नज़र आया था उसके अंदर का ये बदलाव? मैनें क्यूँ नहीं पूछा उस से की ये सब क्यूँ?

वैसे उसने कई बार मुझे इशारे से बताने की कोशिश की थी| एक रोज़ सफेद रंग की ढीली-ढाली कुर्ती पहन कर मेरे सामने आ गई और बोली - "पापा ये देखो कुर्ती कैसी है? ठीक लग रही है ना?"

मैंने कुछ पल के लिए नज़रें कंप्यूटर से उठाई और बोला - "हाँ ठीक है!"

एक बार मन में हुआ था की पूछूँ - सफेद रंग क्यूँ? साइज़ इतनी बड़ी क्यूँ? और सबसे बड़ी बात कुर्ती क्यूँ? तुम्हें तो टी-शर्ट और टॉप पसंद है ना, फिर ये सब क्यूँ?

पर उस वक़्त काम दिमाग़ पे हाबी था, मुझे मेरी बेटी के बदले रंग नज़र नहीं आए थे|

उसे तैयार होना बचपन से ही पसंद था| जब वो छोटी थी तब मुझे बोलती थी - "पापा आपको फैशन के बारे में कुछ भी नहीं पता| कहीं जाने के एक घंटे पहले बताया करो मुझे, तैयार होना होता हैं ना|"

जब भी आईने के सामने तैयार होती थी तो मैं वही सामने रखीकुर्सी पे बैठ कर उसको देखता रहता था| उसे देख कर राशि की याद आ जाती थी..वो भी तो ऐसी ही थी ना|

मेरी आँखो में आँसू देख कर वो बोलती थी- "माँ नही हैं तो क्या हुआ! मैं हूँ ना आपके साथ!"

ना जाने कैसे वक़्त बदल गया था! मेरी गुड़िया बड़ी हो गई थी| अब वो अपने चेहरे को एक हिज़ाब में बंद करके निकलती थीं| मैंने क्यूँ नहीं देखा ये सब? मेरी परी को ना जाने किसकी नज़र लग गई थी|

जब भी वो कॉलेज के लिए निकल रही होती और अगर मैं उस से बोल देता - "अच्छी लग रही मेरी बेटी!" तो वो परेसान हो जाती और तुरंत ही दूसरे कपड़े बदल के आ जाती थी| ना जाने कब से उसे अच्छा लगना नापसंद हो गया था? और मैंने क्यूँ नहीं गौर किया इस बदलाव पे?

एक बार गर्मी के मौसम में अचानक से बारिश होने लगी थी| मैं खुश हो गया था| जनता था! मेरी रूचि को बारिश बहुत पसंद है| मैंने दफ़्तर से जल्दी छुट्टी ली ताकि हम घर पे साथ में गरम चाइ और पकोडे खा पाए| जब घर पहुँचा तो देखा रूचि भी जल्दी ही आ गई थी| मैंने फटाफट पकोडे और चाइ बनाए और अपनी लडली को बुलाने उसके कमरे में गया था|

वो गुस्से और नाराज़गी सी शक्ल बनाए एक कोने में बैठी थी| मुझे कुछ समझा नहीं था| आज तो उसे खुश होना चाहिए था! इतनी अच्छी बारिश हो रही थी| फिरआज वो बारिश कीबूँदो से खेलने की जगह बंद कमरे के एक कोने में क्यूँ दुबक के पड़ी थी| मैनें माहौल को लाइट बनाने के लिए पूछा था -"क्या हुआ मेरी जान? कॉलेज में एग्ज़ॅम था क्या? या फिर रिज़ल्ट आए हैं?"

उसने बोला - " पापा मैं कल से कॉलेज नही जाना चाहती| और ये मेरा आख़िरी निर्णय है आप मुझे कुछ नही बोलेंगे|"

"कोई बात नहीं, ये हम कल सुबह निर्णय कर लेंगे, पर आज इतनी अच्छी बारिश हो रही है, चलो बरामदे में चाइ और पकोडे खाते है|"

"नहीं मुझे बारिश बिल्कुल पसंद नही| आप खा ले मुझे नहीं आना बाहर|"

मुझे नहीं समझ आया था कुछ भी| जो लड़की आसमान में आँखे गड़ाए बारिश का इंतज़ार करती थी, वो आज अचानक बारिश से नफ़रत कैसे करने लगी? उस पल भी मुझे एहसास हुआ था की हमारे दरम्यान फ़ासले बढ़ गये थे| मैं इस नयी रूचि को जान नहीं पाया था|

उस बारिश की वजह से सुकून देने वाली रात की सुबह ने मेरा सब कुछ छीन लिया था मुझसे| अगली सुबह रूचि का शरीर उसके कमरे में लगे पंखे से बेजान लटका हुआ पाया था मैनें| मेरी आँखो की रोशनी चली गई थी| मेरे दिल ने धड़कने से मना कर दिया था| रूचि ने एक चिट्ठी छोड़ी थी बस! लिखा था उसमे-

'पापा मुझे माफ़ कर दो! मैं नहीं जाना चाहती थी आपको छोड़ कर| पर आज के बाद भी, मैं हमेशा आपके साथ रहूंगी आपकी यादों में| आप दुनिया के सबसे अच्छे पापा हो पर मैं अच्छी बेटी नहीं बन पाई पापा! मुझे माफ़ कर देना| मैं डरपोक और बुझदिल हूँ| मुझसे नहीं झेला जा रहा ये सब कुछ इसीलिए मुझे जाना होगा| पापा! आपकी नज़रों से जब तक दुनिया देखा था तब तक सब कुछ काँच की तरह सॉफ और खूबसूरत दिखा था| पर जब मैने आपकी उंगली छोड़ कर खुद चलना सीखी तब उस काँच पे पड़ी दरारें मुझे चुभने लगी| बहुत मुश्किल हो गया है मेरे लिए इस दुनिया में रहना| ऐसा नहीं हैं कि मैंने कोशिश नहीं की| मैंने बहुत कोशिश की, खुद को बदल दिया ताकि लोगों द्वारा लड़की के लिए बनाए गये फ्रेम में खुद को फिट कर सकूँ| पर हार गई मैं| मैंनें कई दफ़ा आपको बताने की कोशिश भी की थी, पर हर बार नाकामयाब रही मैं| पापा! माना की मैं बुझदिल और डरपोक हूँ, पर क्या इसमे सिर्फ़ मेरा ही गुनाह हैं?

मैं जानती हूँ, कल लोग आपके परवरिश पे उंगलियाँ उठाएँगे| पर आप उनकी बिल्कुल मत सुनिएगा| इसमें आपकी कोई ग़लती नही है| बस ये समझ लीजिएगा की आपका और मेरा साथ बस इतना ही था|

आप जानते हैं वो बहुत सारे लोग हैं और मैं अकेली हूँ| मैं कब तक उनसे लड़ सकती हूँ| मैं डर गई हूँ| मैनें खुद को बदल दिया ताकि मैं उनके नज़रों के सामने ना आउँ| जीन्स पहनना छोड़ दिया, सर पर हिजाब बांधने लगी| फीके रंग के कपड़े पहने लगी, तैयार होना बंद कर दिया| बहुत कोशिश की इतनी बुडी दिखूं ताकि कोई मेरी तरफ नज़रे उठा के ना देखे| खुद को सफेद रंग के साफे में बाँध दिया ताकि मेरे शरीर पे कोई अपनी गंदी ज़ुबान से टिप्पणी ना करे| मैं बदल गई पर बाकी सब वैसा का वैसा ही रहा| शायद मैनें ये बात पे गौर ही नहीं किया कि मेरा लड़की होना ही काफ़ी था इन सारी घटनाओं का घटित होने के लिए| इसलिए मैनें ये सोचा, ना तो ये शरीर रहेगा और ना ही ये सारी घटनाए| मैनें सोचा की मैं आपसे सुबह बात करूँगी, पर फिर ये ख्याल आया की कब तक आप मेरी रक्षा करेंगे? आपने ही बोला था ना, मैं बड़ी हो गई हूँ इसीलिए अब मुझे खुद के काम खुद से ही करने होंगे| पापा आपने पूरी कोशिश की पर शायद मैं इस काबिल नहीं बन पाई की इस दुनिया में अपनी जगह बना सकूँ| मुझसे ये रोज़ रोज़ का डर और धमकी वाला ज़िंदगी नहीं जिया जा रहा| रोज़-रोज़ एक ही ख़ौफ़ से तकिया गीला करने से तो बेहतर है की एक बार ही ऐसी नींद सो जाउँ कि फिर से कोई सवेरा देखना ही ना पड़े| मेरी ज़िंदगी अज़ाब बन गई हैं| प्लीज़ पापा मुझे माफ़ कर देना|

पापा! बस एक बात का गिला रहेगा मुझे आपसे, वो ये कि आपने कभी मुझे ये क्यूँ नहीं बताया की मैं एक लड़की हूँ| क्यूँ नहीं मुझे पहले से ही लड़कियों की तरह जीने के तौर-तारीख़े सिखाए? क्यूँ मुझे एक बेटे की तरह पाला? मैं अपने साथ आपकी यादें लेकर जेया रहीं हूँ! बस ये याद रखिएगा आपकी रूचि आपसे बहुत प्यार करती है| और मैने कोई गुनाह नहीं किया हैं बस मुझे इस रोज़-रोज़ की अज़ीयत से छुटकारा पाना था इसलिए जा रहीं हूँ| आपको बहुत याद करूँगी पापा| -आपकी परी रूचि"

बस यही एक चिट्ठी छोड़ के चली गई थी वो| उसे क्यूँ नहीं ये बात समझी कि ये एक पन्ना काफ़ी नहीं है मुझे अकेले ज़िंदगी गुजारने के लिए|

आज भी मुझे ऐसा लगता है की रूचि ने मेरी वजह से ही सब कुछ किया| काश की मैं वक़्त रहते उसको समझ पता| काश की मैं उसके साथ खड़ा हो पता जब वो अकेले ये सब कुछ का सामना कर रही थी| मैं तो बदहवासी में पैसे कमाने के पीछे परा था| काश कि मैनें उस से पूछा होता कौन थे वो बहुत सारे लोग कौन है? सिर्फ़ 'वो लोग' बोलना ही काफ़ी नहीं था पता लगाने के लिए|

आज रूचि की यादे फिर से ताज़ा हो गई, जब मैने सुबह दिया को देखा| आज सुबह वो अपने भाई से बोल रही थी कि उसे रिक्शा से स्कूल नहीं जाना वो भाई के साथ जाना चाहती है| फिर से वहीं दिन दोहराया गया और भाई ने माना कर दिया| मैनें पिछले कुछ दिनों मे दिया के अंदर भी वही बदलाव देखें थे जिसको मैनें रूचि के वक़्त नज़रअंदाज़ कर दिया था| मैनें सोच लिया आज शाम जब चाइ लेकर दिया आएगी तो पूछूँगा कि "माज़रा क्या है? कौन उसे परेसान करता हैं|" पर किस मुँह से पूछता? वो लोग भी तो हमारे जैसे ही आम आदमी होते है| वहीं जिनके पास खुद के माँ-बाप और भाई-बहन सब कुछ होता है| फिर भी ना जाने क्यूँ अपनी जननी को भूल कर, एक लड़की से जीने का हक छीन लेते हैं| जो भी हो, मैनें एक बात तो ठान ली थी, मैं मेरी दिया को रूचि नहीं बनाने दूँगा| अब दिया को नहीं इस समाज को बदलने की ज़रूरत है.!


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