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शहीद (भाग -१ )
शहीद (भाग -१ )
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© Sanjeev Jaiswal

Drama Others

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उबड़-खाबड़ पथरीले रास्तों पर दौड़ती हुई हमारी जीप तेजी से छावनी की ओर बढ़ रही थी। आस-पास नैर्सगिक सौन्दर्य बिखरा हुआ था किन्तु इस समय उसको निहारने की फुर्सत न थी। मैं जल्द से जल्द श्रीनगर से 85 किमी. दूर बनी अपनी छावनी तक पहुंच जाना चाहता था।

     आज सुबह ही तो मैं सेना केअधिकारियों की बैठक में भाग लेने श्रीनगर आया था। कश्मीर रेंज में तैनातब्रिगेडियर और उससे ऊपर के रैंक के सभी अधिकारी इस बैठक में शामिल हुये थे। वहां

अत्यन्त गोपनीय एवं संवेदनशील विषयों पर चर्चा होनी थी। इसलिये किसी भी अधीनस्थअधिकारी को बैठक कक्ष के भीतर आने की इजाज़त नहीं थी।

     बैठक दो बजे समाप्त हुई। मैं बैठक कक्ष से बाहर निकला ही था कि सार्जेन्ट राम सिंह ने बताया, ''सर, छावनी से कैप्टन बोस का दो बार फोन आ चुका है। वे आपसे फौरन बात करना चाहते हैं।''

      ''कोई चिंता वाली बात तो नहीं है?'' मेरा दिल किसी अनिष्ट की आशंका से धड़क उठा। आज कल मिलेट्री कैम्पों और छावनियों पर आंतकवादी हमलों की घटनायें काफी बढ़ गयीं थीं जिसके कारण छावनी से दूर रहने पर भी वहां की चिंता बनी रहती थी।

       ''सर, मैंने पूछा था कि अगर चिंतावाली कोई बात हो तो बैठक कक्ष के भीतर खबर भिजवा दूं लेकिन कैप्टन साहब ने मना किया था। बोले आप जब बैठक से बाहर निकलें तब फौरन बात करवा दूं'' राम सिंह ने सम्मानित स्वर में बताया।

         राहत की सांस लेते हुये मैने राम सिंह को छावनी का नम्बर मिलाने के लिये कहा। कैप्टन बोस के लाईन पर आते ही रामसिंह ने फोन मेरी तरफ बढ़ा दिया।

         ''हैलो कैप्टन, वहां सब ठीक तो है?'' मैनें पूछा।

         ''हां सर, सब ठीक तो है लेकिन...''

         ''लेकिन क्या?'' मेरा दिल एक बार फिर तेजी से धड़क उठा। जाने क्यों मुझे लग रहा था कि वहां सब ठीक नहीं है।

         ''सर, अपनी छावनी के भीतर भारतीय फौजी की वेशभूषा में घूमता हुआ पाकिस्तानी सेना का एक लेफ्टीनेन्ट पकड़ा गया है'' कैप्टन बोस ने बताया।

         ''तुम्हें कैसा पता चला कि वह पाकिस्तानी सेना का लेफ्टीनेन्ट है और वो छावनी के भीतर घुस कैसे आया? उसके साथ और कितने आदमी है? उन्होनें छावनी में किसी को कोई नुकसान तो नहीं पहुंचाया?'' मैने एक ही सांस में प्रश्नों की बौछार कर दी।

          ''सर, आप परेशान मत हों। यहां सब ठीक-ठाक है। वह अकेला ही है। उसके पास से बरामद आई.कार्ड से पता चला कि वह पाकिस्तानी सेना का लेफ्टीनेन्ट है। हमने उससे हर तरह से पूछ-ताछ करके देख लिया किन्तु वो बता नहीं रहा है कि यहां किस लिये आया था'' कैप्टन बोस ने बताया।

 

           ''मैं फौरन यहां से निकल रहा हूं। तुम उससे पूछताछ जारी रखो लेकिन ध्यान रखना कि वह मरने न पाये। हमें उससे काफी जानकारी मिल सकती है'' इतना कह कर मैनें फोन काट दिया।

           कच्चे पहाड़ी रास्तों पर जीप की गति बहुत कम होती है। 85 किमी. की दूरी तय करने में चार घंटे का समय अवश्य लग जायेगा। मैं अंधेरा होने से पहले छावनी तक पहुंच जाना चाहता था इसलिये खाना खाये बगैर तुरंत वहां से चल दिया।

            छावनी तक पहुंचते-पहुंचते शाम हो गयी थी। हल्का-हल्का अंधेरा घिरने लगा था। मेरे आने की खबर पा कैप्टन बोस फौरन मेेरे कक्ष में आये। ''कुछ बताया उसने?'' मैने कैप्टन उन्हें देखते ही पूछा।

             ''नहीं सर'' कैप्टन बोस ने ठंढी सांस भरी फिर दांत भींचते हुये बोले, ''पता नहीं किस मिट्टी का बना हुआ है। हम लोग थर्ड डिग्री तक टार्चर कर-कर के हार गये लेकिन वह मुंह खोलने के लिये तैयार नहीं है।''

             ''परेशान मत हो। मुझे अच्छों-अच्छों का मुंह खुलवाना आता है'' मैनें सिगरेट सुलगाते हुये

कैप्टन बोस को सांत्वना दी फिर एक लम्बा कश खींच कर ढेर सारा धुंआ छोड़ते हुये पूछा, ''क्या नाम है उस पाकिस्तानी का लेफ्टीनेन्ट का?''

             ''शाहदीप खान'' कैप्टन बोस ने बताया।

             मैं सिगरेट का दूसरा कश खींच रहा था किन्तु कैप्टन बोस का उत्तर सुन बुरी तरह चौंक पड़ा। ’शाहदीप खान ‘ इन दो शब्दों ने मुझे झकझोर कर

रख दिया। पूरा धुंआ मेरे सीने में घुमड़ कर रह गया और मुझ पर खांसी का दौरा पड़ गया।

             ''क्या हुआ सर?'' कैप्टन बोस ने पूछा।

             ''धुंये की धसक लग गयी है'' कहते हुये मैने सिगरेट को एशट्रे में इस बेदर्दी से मसला जैसे अपने अंतर्मन में उठे हुये विचारों को कुचल रहा हूं।

              कैप्टन बोस ने इस बीच पंखे को चला दिया था जिससे धुंआ कुछ छंट गया था। इसी के साथ मेरे अंदर का कुहांसा कुछ हल्का हुआ। दुनिया में एक ही नाम के कई व्यक्ति हो सकते हैं। मैनें अपने मन को सांत्वना देने की कोशिश की। किन्तु क्या ’शाहदीप‘ जैसे अनोखे नाम के भी दो

व्यक्ति हो सकते हैं? क्या ऐसा अनोखा संगम सृष्टि में कहीं और संभव है? मेरे अंदर के संदेह ने पुनः

अपना फन उठाया।

               ''सर, क्या सोचने लगे?'' कैप्टन बोस ने टोंका।

 

              ''वह पाकिस्तानी यहां क्यों आया था यह हर हालत में पता लगाना ज़रूरी है'' मैने सख्त स्वर में कहा और अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।

 

               कैप्टन बोस मुझे बैरक नम्बर चार में ले आये। उस पाकिस्तानी लेफ्टीनेन्ट के हाथ इस समय छत से टंगी हुई एक रस्सी से बंधे हुये थे। नख से शिख तक वह खून से लथपथ था। मेरी अनुपस्थित में उससे काफी कड़ाई से पूंछताछ की गयी थी। मुझे देख उसकी बड़ी-बड़ी आंखे पल भर के लिये कुछ सिकुड़ीं फिर उनमें एक अजीब बेचैनी सी समा गयी।

               मुझे वे आंखे कुछ जानी-पहचानी सी लगीं किन्तु उसका पूरा चेहरा खून से भीगा हुआ था इसलिये चाह कर भी मैं उसे पहचान नहीं पाया। मुझे अपनी ओर घूरता देख उसके होंठ हल्के से फड़फड़ाये। उसने कोशिश करके अपनी बांह को हल्का सा नीचे खींचा फिर पंजो के बल ऊपर उठ कर अपने चेहरे को कमीज़ की बांह से पोंछ लिया।

               चेहरा साफ़ हो जाने के कारण उसका आधा चेहरा दिखायी पड़ने लगा था किन्तु इतना ही मेरे पूरे असितत्व को हिला देने के लिये काफी था। वह शाहदीप ही था। मेरे और शाहीन के प्यार की निशानी। हूबहू मेरी जवानी का प्रतिरूप। यदि उसके चेहरे पर बड़ी-बड़ी मूछें लगा कर सिर के बाल सफेद कर दिये जायें तो उसमें और ब्रिगेडियर दीपक कुमार सिंह में कोई अंतर नहीं रह जायेगा। आश्चर्य की बात थी कि कैप्टन बोस ने इस ओर ध्यान नहीं दिया था। मेरा अपना ही खून

आज दुश्मन के रूप में मेरे सामने खड़ा था और मुझे उससे पूंछताछ करनी थी। मेरा ही

खून मेरी आंखो के सामने बह रहा था किन्तु उसे पोंछने के बजाय उसे और बहाना मेरी ज़िम्मेदारी थी। बेटे के घावों पर मरहम रखने के बजाये उसे और कुरेदना मेरी मजबूरी थी। कैसी विचित्र विडम्बना थी। अपनी बेबसी पर मेरी आंखे भर आयीं। मेरा पूरा शरीर कांपने लगा। एक अजीब सी कमज़ोरी मुझे जकड़ती जा रही थी। ऐसा लग रहा था कि कोई सहारा न मिला तो मैं गिर पड़ूंगा।

 

               ''लगता है हिंदुस्तानी कैप्टन ने पाकिस्तानी लेफ्टीनेन्ट से हार मान ली तभी अपने ब्रिगेडियर को बुला लाया'' तभी शाहदीप ने कहकहा लगाया।

                यह सुन मेरे विचारों को झटका सा लगा। इस समय मैं दीपक कुमार सिंह नहीं बल्कि हिंदुस्तानी सेना के ब्रिगेडियर की हैसियत से वहां खड़ा था और सामने खड़ा इन्सान और कोई नहीं बल्कि दुश्मन की सेना का लेफ्टिीनेन्ट था। उसके साथ कोई रियायत बरतना अपने देश के साथ गद्दारी होगी।

                 मेरे जबड़े भिंच गये। मैने सख्त स्वर में कहा, ''लेफ्टीनेन्ट, तुम्हारी भलाई इसी में है कि सच-सच बता दो कि यहां क्यों आये थे वरना मैं तुम्हारी वो हालत करूंगा कि तुम्हारी सात पुश्तें भी तुम्हें नहीं पहचान पायेंगीं।''

                  ''आज कल एक पुश्त दूसरे पुश्त को नहीं पहचान पाती है और आप सात पुश्तों की बात कर रहे हैं? अच्छा मज़ाक है'' शाहदीप हंस पड़ा। उसके चेहरे पर भय का कोई चिन्ह न था।

                  मैने लपक कर उसकी गर्दन पकड़ ली और पूरी ताकत से उसे झकझोरते हुये बोला,'' मैं आखिरी बार पूछ रहा हूं, बता दो यहां क्यों आये हो?''

                  ''आज सुबह से यह सवाल सैकड़ों बार पूछा जा चुका है और हर बार मेरा यही जवाब है कि मैं कुछ नहीं बताउंगा'' शाहदीप का भी स्वर कड़ा हो गया।

              

                  यह सुन मेरे ऊपर एक अजीब सा पागलपन सवार हो गया। मेरी उंगलियों की पकड़ अचानक ही सख्त हो गयी और मैं पूरी शक्ति से शाहदीप की गर्दन को दबाने लगा। देशभक्ति साबित करने के जुनून में मैं बेरहमी पर उतर आया था। शाहदीप की आंखे बाहर उबलने लगीं थीं। वह बुरी तरह छटपटाने लगा। बहुत मुश्किलों से उसके मुंह से अटकते हुये स्वर निकले, ''छोड़...दो मुझे...। मैं.....सब.....बताने के लिये तैयार हूं।''

 

                 ''बताओ'' मैं उसे धक्का देते हुये चीखा। उत्तेजना के कारण मेरी सांस फूलने लगी थी। ऐसा लग रहा था जैसे मैं बहुत दूर से दौड़ कर आ रहा हूं।

                  ''मेरे हाथ खोलो'' शाहदीप कराहा।

                    मैं असमंजस की स्थित में था लेकिन कैप्टन बोस ने अपने होलस्टर से रिवाल्वर निकाल कर शाहदीप के ऊपर तान दिया। उनके इशारे पर पीछे खड़े सैनिक ने उसके हाथ खोल दिये।

                    हाथ खुलते ही शाहदीप ने अपनी गर्दन को सहलाया फिर मेरी ओर देखते हुये बोला, ''क्या पानी मिल सकता है?''

                    मेरे इशारे पर एक सैनिक पानी का जग ले आया। शाहदीप ने मुंह लगा कर तीन-चार घूंट पानी पिया फिर पूरा जग अपने सिर के ऊपर उड़ेल लिया। शायद इससे उसके दर्द को कुछ राहत मिली। उसने एक गहरी सांस भरी फिर बोला, ''हमारी ब्रिगेड को खबर मिली थी कि कारगिल युद्व के बाद हिंदुस्तानी फौज ने सीमा के पास एक अंडरग्राउंड आयुध कारखाना बनाया है। वहां खतरनाक हथियार बना कर जमा किये जा रहे हैं ताकि युद्व की दशा में फौज को तत्काल सप्लाई प्रदान की जा सके। उस कारखाने का रास्ता इस छावनी से होकर जाता है। मैं उसकी वीडियो फिल्म बनाने यहां आया था।''

                     इस रहस्योद्घाटन से मेरे साथ कैप्टन बोस भी बुरी तरह चौंक पड़े। भारतीय फौज की यह बहुत गुप्त परियोजना थी इसके बारे में पाकिस्तानियों को पता चल जाना खतरनाक था।

                     कैप्टन ने चंद पलों तक अविश्वशनीय दृष्टि से शाहदीप को घूरा फिर दांत भींचता हुआ बोला, ''इसका मतलब तुम्हारे साथ कोई और भी यहां आया है।''

 

              ''नहीं मैं अकेला हूं।''

             ''अगर अकेले हो तो तुम्हारा कैमरा कहां है जिससे तुम वीडियोग्राफी कर रहे थे?'' कैप्टन बोस ने डपटा।

 

             शाहदीप ने कैप्टन बोस की तरफ यूं देखा जैसे उन्होंने कोई बचकानी बात पूछ ली हो। इसके बाद वह मेरी ओर मुड़ते हुये बोला, ''आज के युग में फिल्म बनाने के लिये कंधे पर कैमरा लाद कर घूमना जरूरी नहीं है। मेरे गले के लाकेट में एक संवेदनशील कैमरा फिट है जिसकी सहायता से

मैने छावनी की वीडियोग्राफी की है।''

 

              इतना कह कर उसने अपने गले में पड़ा लाकेट निकालकर मेरी ओर बढ़ा दिया। वास्तव में वो लाकेट न होकर छोटा सा कैमरा था जिसे लाकेट की शक्ल में बनाया गया था। मैनें उसे कैप्टन बोस की ओर बढ़ा दिया।

              उन्होंने लाकेट को उल्ट-पुल्ट कर देखा फिर प्रसंशात्मक स्वर में बोला, ''सर, यू आर ग्रेट। हम लोग दिन भर में जिस बात का पता नहीं लगा सके उसे आपने दो मिनट में पता कर लिया। भारतीय सेना के हौसले आप जैसे काबिल अफसरों के कारण ही इतने बुलन्द हैं।''

                ‘काबिल’ यह एक शब्द किसी हथौड़ें की भांति मेरे अंतर्मन पर पड़ा था। मैं खुद नहीं समझ पा रहा था कि यह मेरी काबलियत थी या कोई और कारण जिसके खातिर शाहदीप इतनी जल्दी टूट गया है। मैं एक खानदानी राजपूत था। मेरे बाप-दादाओं की वीरता के किस्से लोक कथाओं के रूप में आज भी प्रसिद्व हैं। शाहदीप की रगों में मेरा खून दौड़ रहा है फिर वह इतना कायर कैसे हो गया? मेरे सामने टूटने के बजाय अगर वह अपनी फौज के लिये जान दे देता तो शायद मुझे ज़्यादा खुशी होती।

                ''सर, अब इस लेफ्टीनेन्ट का क्या किया जाये?'' तभी कैप्टन बोस ने मेरी तंद्रा भंग की।

                 ''इसे आज रात इसी बैरक में रहने दो। कल सुबह इसे श्रीनगर भेज देगें'' मैने किसी पराजित योद्वा की भांति सांस भरी।

                 शाहदीप को वहीं छोड़ मैं कैप्टन बोस और अन्य सैनिकों के साथ वहां से चल पड़ा। हम लोग बैरक से बाहर निकले ही थे कि शाहदीप ने आवाज़ दी, ''ब्रिगेडियर साहब, मैं आपसे कुछ बात करना चाहता हूं।''

 

                हम लोग वापस लौट पडे़ किन्तु शाहदीप ने अपने हाथ से सभी को रूकने का इशारा किया,'' मुझे केवल ब्रिगेडियर साहब से बात करनी है।''

                मैं असमंजस में फंस गया। ऐसी कौन सी बात हो सकती है जो वह मुझसे अकेले में करना चाहता है। क्या उससे अकेले में बात करना उचित होगा? कैप्टन बोस ने मेरे असमंजस को भांप लिया था। अतः वह सैनिकों के साथ दूर हट गये।

 

                मैं वापस बैरक के भीतर घुसा। मैंने शाहदीप को ध्यान से देखा। वह बुरी तरह घायल था। उसका पूरा शरीर कांप रहा था। ऐसा लग रहा था कि ठीक से खड़े होने के लिये भी उसे काफी मशक्कत करनी पड़ रही है।

 

                 मैं उसके करीब पहुंचा ही था कि उसका शरीर लहराते हुये मेरी ओर गिर पड़ा। मैने उसे अपनी बांहों में संभाल लिया। मेरी पूरी वर्दी उसके खून से रंग गयी किन्तु उसकी परवाह किये बिना मैनें उसे संभाल कर सामने बने चबूतरे पर बिठा दिया। उसने अपनी पीठ दीवार से टिका ली और लम्बी-लम्बी सांसे लेने लगा।

                  जब उसकी उखड़ी हुई सांसे कुछ नियंत्रित हुईं तो मैने पूछा, ''बताओ क्या कहना चाहते हो?''

                   ''सिर्फ इतना कि मैने आपका ऋण चुका दिया है'' शाहदीप ने अपनी बड़ी-बड़ी आंखे मेरी ओर उठायीं।

                  ''कैसा ऋण मैं कुछ समझा नहीं?''

                  ''अगर मैं चाहता तो आप मुझे मार भी डालते किन्तु मेरे यहां आने का राज़ कभी मुझसे न उगलवा पाते। मैं यह भी जानता था कि देशभक्ति के जुनून में आप मुझे मार डालेगें लेकिन यदि ऐसा हो जाता तो फिर ज़िन्दगी भर आप अपने को कभी माफ नहीं कर पाते। मेरी हत्या का पाप आपकी ज़िन्दगी को मौत से भी बदतर बना देता'' शाहदीप की आँखों में एक अजीब-सा आत्मविश्वाश झलकने लगा था।

                     ''कैसा पाप? फौजी तो अपने दुश्मनों को मारते ही रहते हैं, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है'' मैने अचकचाते हुये कहा। जाने क्यों मुझे अपना ही स्वर अंजाना सा महसूस हुआ।

                    ''लेकिन एक बाप को फर्क पड़ता है।अपने बेटे की हत्या करने के बाद वह भला चैन से कैसे जी सकता है?'' शाहदीप के होठों पर एक दर्द भरी मुस्कराहट तैर गयी।

 

               ''कैसा बाप और कैसा बेटा ? तुम कहना क्या चाहते हो ?'' मेरा स्वर कड़ा हो गया। 

                 शाहदीप ने अपनी बड़ी-बड़ी आंखों को मेरे चेहरे पर टिका दिया फिर बोला, ''ब्रिगेडियर दीपक कुमार सिंह। यही नाम लिखा है न आपकी शर्ट पर लगी नेम-प्लेट पर? सच-सच बताईये कि आपने मुझे पहचाना कि नहीं ?''

 

                  मेरा सर्वांग कांप उठा। मेरी समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या कहूं। तभी शाहदीप ने टोंका, ''अगर नहीं पहचाना हो तो मेरे चेहरे पर बड़ी-बड़ी मूछें लगा कर मेरे बाल सफेद कर दीजये शायद तब आपसे मुझे पहचानने में कोई भूल न होगी।''

                  अब तो शक की कोई गुंजाईश ही नहीं बची थी। मेरी ही तरह मेरे खून ने भी अपने खून को पहचान लिया था। हम बाप-बेटों ने ज़िन्दगी में पहली बार एक दूसरे को देखा था किन्तु अब रिश्ते बदल चुके थे। हम दुश्मनों की भांति एक-दूसरे के सामने खड़े थे। मेरे अंदर भावनाओं का समुद्र उमड़ने लगा था। मैं बहुत कुछ कहना चाहता था किन्तु जड़ हो कर रह गया। ज़ुबान ने मेरा साथ छोड़ दिया था।

 

                 ''डैडी, आपको पुत्र-हत्या के पाप से बचा कर मैं पुत्र-धर्म के ऋण से उऋण हो चुका हूं। आज के बाद जब भी हमारी मुलाकात होगी आप अपने सामने पाकिस्तानी सेना के जाबांज और वफ़ादार अफ़सर को पायेगें जो कट जायेगा लेकिन झुकेगा नहीं'' शाहदीप ने एक-एक शब्द पर ज़ोर देते हुये कहा।

 

                  ''इसका मतलब तुमने जान-बूझ कर अपना राज़ खोला है?'' बहुत मुश्किलों से मेरे मुंह से स्वर फूटा।

                 ''मैं कायर नहीं हूं। मेरी रगों में एक बहादुर बाप का खून दौड़ रहा है। मैनें अपना एक फर्ज पूरा किया है और अब दूसरा फ़र्ज़ भी पूरा करूंगा। मैं आपकी सौगन्ध खाकर वादा करता हूं कि जिस देश का नमक खाया है उसके साथ नमकहरामी नहीं करूंगा'' शाहदीप की आंखे आत्मविश्वाश से जगमगा उठीं।

                ''तुम करना क्या चाहते हो?'' किसी अनिष्ट की आषंका से मेरा स्वर कांप उठा।

               ''नमकहलाली'' शाहदीप ने एक-एक शब्द पर ज़ोर देते हुये कहा, ''मैं जिस मिशन के लिये यहां आया था उसे पूरा अवश्य करूंगा।''

              शाहदीप के स्वर मेरे कानों में पिघले शीशे की भांति दहक उठे। मैं एक फौजी था अतः अपने बेटे को अपनी फौज के साथ गद्दारी करने के लिये नहीं कह सकता था लेकिन जो वह कह रहा था उसकी भी इजाज़त कभी नहीं दे सकता था। अतः उसे समझाते हुये बोला, ''बेटा, तुम इस समय हिंदुस्तानी फौज की हिरासत में हो इसलिये कोई दुस्साहस करने का स्पप्न मत देखो। ऐसा करना तुम्हारे लिये खतरनाक हो सकता है।''

 

                ''दुस्साहस तो फौजी का सबसे बड़ा हथियार होता है, उसे मैं कैसे छोड़ सकता हूं। आप अपना फ़र्ज़ पूरा करियेगा मैं अपना फ़र्ज़ पूरा करूंगा'' शाहदीप निर्णायक स्वर में बोला।

 

                 मैं इस समय बहस करने की मनोस्थित में नहीं था। मेरे अंदर अनेकों प्रश्न घुमड़ रहे थे जिनके उत्तर खोजे बिना मुझे चैन नहीं मिलने वाला था। हमारे पास समय भी काफी कम था। बाहर खड़े कैप्टन बोस और दूसरे सैनिक ज़रूर जानना चाहेगें कि इतनी देर मैने एक दुश्मन से क्या बात की।

                  अतः दर्द भरे स्वर में बोला, ''बेटा, तुम खुशकिस्मत हो कि तुमने अपना फ़र्ज़ पूरा कर लिया किन्तु मैं इतना बदकिस्मत हूं कि चाह कर भी तुम्हें गले नहीं लगा सकता। हमारे पास समय बहुत कम है। अतः मेहरबानी करके इतना बता दो कि तुम्हारी मां इस समय कहां है और यहां आने से पहले क्या तुम मेरे बारे में जानते थे?''

 

                  ''साल भर पहले मां मेरा साथ छोड दुनिया से चली गयीं। वे बताया करतीं थीं कि मेरे सारे पूर्वज सेना में रहे हैं। मैं भी उनकी तरह बहादुर बनना चाहता था इसलिये फौज में हो गया था। अपने अंतिम दिनोंमें मां ने आपका नाम भी बताया था। मैं जानता था कि आप भारतीय फौज में हैं किन्तु यह नहीं जानता था कि आपसे इस तरह मुलाकात होगी'' बोलते-बोलते पहली बार शाहदीप का

स्वर भीग उठा और आखें नम हो गयीं।

 

                 मैं भी अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रख पा रहा था। ऐसा लग रहा था कि यदि ज्यादा देर यहां रूका तो रो पडूंगा। अतः शाहदीप को अपना ख्याल रखने के लिये कह तेजी से वहां से चला आया।

 

                ''सर, वह क्या कह रहा था?'' बाहर निकलते ही कैप्टन बोस ने पूछा।

                ''कह रहा था कि मैने आपकी मदद की है इसलिये मेरी मदद कीजये और मुझे यहां से निकल जाने दीजये'' मेरे मुंह से अनजाने में ही निकल गया। जल्दबाज़ी में इसके अलावा मुझे और कोई उत्तर सूझा ही नहीं।

                ''बास्टर्ड, अपनी ही तरह हम हिंदुस्तानियों को भी गद्दार समझता है'' कैप्टन बोस का स्वर कषैला हो उठा।

 

                     मैं तड़प कर रह गया। मेरे ही सामने मेरे बेटे को ‘हरामी’ कहा जा रहा था और मैं सुनने के लिये मजबूर था! जिस बेटे ने आज वीरता की नयी मिसाल कायम की थी उसे मेरे ही कारण

गद्दार करार किया जा रहा था और मैं चूप था! चाह कर भी दुनिया को सच्चाई नहीं बता सकता था। शाहदीप की महानता के आगे मुझे अपना कद बहुत छोटा दिखायी पड़ रहा था।

                    मैं चुपचाप अपने कक्ष में आ गया। बाहर खड़े संतरी से मैने कह दिया था कि किसी को भी भीतर न आने दिया जाये। इस समय मैं किसी का सामना करने की स्थित में नहीं था। मैं दुनिया से दूर अकेले में अपनी यादों के साथ अपना दर्द बांटना चाहता था।

 

                    सिगरेट सुलगा कर मैं कुर्सी पर बैठ गया। उसकी पुष्त से पीठ टिका कर मैने लम्बे-लम्बे तीन-चार कश खींचे और फिर ढेर सारा धुंआ छोड़ दिया। धुंये की एक पतली सी चादर मेज के सामने तैरने लगी जिससे उस पार की चींजें कुछ धुंधली-सी दिखायी पड़ने लगी थीं।

                   

उस शाम भी धुंधलका सा छाया हुआ था जब लंदन में थेम्स नदी के किनारेमैं अकेला टहल रहा था। अचानक एक अंग्रेज नवयुवक दौड़ता हुआ आया और मुझसे टकरा गया। इससे पहले कि मैं कुछ कह पाता उसने अत्यन्त शालीनता से मुझसे माफी मांगी और आगे बढ़ गया। अचानक मेरे छठी इंद्रिय जाग उठी। मैने अपनी जेब पर हाथ लगाया तो मेरा पर्स गायब था।

                ''पकड़ो-पकड़ो वह बदमाश मेरा पर्स

लिये जा रहा है'' चिल्लाते हुये मैं उसके पीछे दौड़ा।

                मेरी आवाज सुन उसने अपनी गति कुछ और तेज कर दी। मेरे और उसके बीच काफी फांसला था। लग रहा था कि मैं उसे पकड़ नहीं पाउंगा। तभी सामने से आ रही एक लड़की ने अपना पैर उसके पैरों में फंसा दिया। वह अंग्रेज मुंह के बल गिर पड़ा। मेरे लिया इतना मौका काफी था। पलक झपकते ही मैने उसे दबोच कर अपना पर्स छीन लिया। उसके भीतर पांच सौ पांउड के अलावा कुछ ज़रूरी कागज़ात भी थे। पर्स खोल कर मैं उन्हें देखने लगा इस बीच मौका पा कर वह बदमाश भाग लिया। मैं उसे पकड़ने के लिये दोबारा उसके पीछे दौड़ा।

 

              ''छोड़ दो, जाने दो उसे'' उस लड़की ने लगभग चिल्लाते हुये कहा।

 

 

.....क्रमश ..

                         

                             

शहीद hindi देशभक्ति

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