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माँ

Drama Fantasy Romance

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7 वर्षीय राहूल, 3० वर्षीय राजेन्द्र तथा 25 वर्षीय कमला ये इस कहानी के पात्र हैं तथा इनके ईर्द-गिर्द यह कहानी घुमती है।

कहानी यूँ है।

माँ, माँ कहाँ गई मुझे बहुत भूख लगी है। खाना दो, - राहूल ने कहा। अभी बना रही हूँ बेटे। तेरा पापा भी ड्यूटी से आने वाला है तब हम सभी खाना खा लेगें। नहीं माँ, मैं तो अभी खाऊँगा। बहुत भूख लगी है। तू बहुत शरारती हो गया है और जिद्दी भी। ला मैं तेरे लिए दो रोटी बना देती हूंँ। आह्, आज तो माँ ने मेरे कहने पर तुरन्त खाना बना दिया, जी भरकर खाना खाऊँगा।

उसने खाना खाया और सो गया। तभी सांय करीब 7-8 बजे राजेन्द्र भी अपनी ड्यूटी से घर लौटा। सुनती हो, कहाँ हो ? आज तो अपना राहूल दिखाई नही दे रहा, कहाँ है राहूल ? वो तो कब का खाना खाकर सो चुका है, कमला रसोई से बोली। आज इतनी जल्दी सो गया है वो, क्या बात है वो तो कभी नहीं सोता था। पता नहीं क्या बात है, तुम ही जाकर देख लो, क्या बात है ? ठीक है, मैं जाता हूँ। इतने में तुम 2-4 गिलास पानी गर्म करना मैं हाथ-पैर तथा मुँह धौऊँगा। ठीक है, कमला ने कहा।

राहूल के कमरे में पहुँचकर राजेन्द्र ने राहूल को जगाया। राहूल क्या बात है, आज तुम जल्दी सो गये। मगर आज तो राहूल का रोम-रोम लहरा रहा था और शरीर ऐसी तपन बिखेर रहा था, मानो आग का धधकता गोला। सूनती हो, यहाँ आओ।

राहूल को तो तेज बुखार है, यहाँ इसके पास आकर बैठो मैं डॉक्टर के लाता हूँ। थका होने के बावजूद भी उसने अपनी साईकिल उठाई और डॉक्टर को लेने चला गया। इधर कमला ने भी जब सुना कि राहूल को तेज बुखार है तो अपना सारा काम छोड़कर उसके पास आकर बैठ गई। राहूल का सारा बदन तप रहा था। वह उसके पास बैठकर उसका सिर सहलाने लगी तथा राजेन्द्र डॉक्टर को लेकर जल्दी ही घर आ गया। डॉक्टर राहूल को एक टीका लगाता है और कुछ दवाई देकर कहता है कि कोई बात नही थोड़ा सा बुखार था, सो सुबह तक ठीक हो जायेगा। राहूल अचेत सा पड़ा हुआ था। उसे उस समय कोई होश ही न था।रात करीब एक बजे राहूल के पापा आप सुबह ऑफिस जायेंगे। इसलिए आप सो जाओ।और तुम ? मैं बाद में सो जाऊँगी। यह कहकर राजेन्द्र वहीं सो गया, मगर कमला तो माँ थी उसे नींद कहाँ आने वाली थी। सुबह छह बजे जब राजेन्द्र जगा तो कमला तुम सोई ही नहीं। नहीं तो ? मैं तो सोई हुई थी, यूँ ही कुछ बड़बड़ा उठी। तभी माँ मुझे प्यास लगी है, - राहूल बोला। अभी लाई बेटा, जल्दी से उठती हुई कमला रसोई की तरफ बढ़ गई और दो गिलास पानी गर्म करके ले आई। राहूल दोनों गिलास पानी गटक-गटक करता हुआ पी गया।क्या हुआ माँ आज रात को तुम नही सोई क्या ? क्या हुआ मुझे ? कुछ नही बेटे तुम्हें थोड़ा-सा बुखार हो गया था। जिसके कारण मैं ना सो सकी। अब कैसे हो ?

मैं ठीक हूँ। माँ पानी गर्म करो तब तक मैं बाहर घुम कर आता हूँ, राहूल कहता हुआ बाहर की तरफ निकल गया।

अपने इस जिगर के टुकड़े के लिए इतनी परेशान ना हुआ करो। क्यों ना होऊँ ? है तो मेरा ही। और मेरा, मेरा कुछ नहीं है राहूल। कमला कुछ न बोली, चुपचाप रसोई में चली गई और पानी गर्म किया खाना बनाया, मगर अचानक उसके हृदय में दर्द होने लगा। "राहूल के पापा मुझे जोर-जोर से दर्द हो रहा है।" क्या हुआ माँ ? पापा तो यहाँ नही है। राहूल अभी-अभी नहाकर बाहर आया था उसने जल्दी से कपड़े पहने और चल दिया डॉक्टर को लेने। राहूल के पापा उस समय घर पर नहीं था वह कुछ समय बाद घर लौटा तो घर का नज़ारा ही कुछ और था। कमला पलंग पर लेटी हुई थी तथा डॉक्टर उसे इंजेक्शन दे रहा था।क्या हुआ डॉक्टर साहब इन्हें, हड़बड़ी से पूछता है ? कुछ नहीं हुआ वो थोड़ा सा दिल का दौरा पड़ा था। कुछ दवाईयाँ और इंजेक्शन दे दिया है। कुछ देर बाद सब ठीक हो जायेगा। कुछ देर बाद राहूल एक कोने में खड़ा सुबक रहा था राहूल का पापा राजेन्द्र इधर से ऊधर टहल रहा था तभी कमला को होश आया। राहूल, बेटे राहूल, जरा यहाँ आओ तो मेरे पास आओ। राहूल के पापा तुम भी मेरे पास आओ, - कमला बोली। अब तुम्हारी तबियत कैसी है ? मैं ठीक हूँ, पर तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ। क्या कहना चाहती हो बताओ। देखों अभी मैं घड़ी दो घड़ी की मेहमान हूँ। तुम मेरे राहूल को माँ के प्यार की कमी का एहसास न होने देना। हो सकेगा तो मैं फिर आऊँगी। यह कहते ही कमला के प्राण निकल गये।

राजेन्द्र उसके गले से लिपट कर जोर-जोर से रोने लगा। उसके परिवार में उसे ही कमला की मौत का ज्यादा सदमा लगा था। उसकी पत्नी की लाश को गाँव में ले जाया गया। वहाँ पर राजेन्द्र का पूरा परिवार माँ-बाप दादी आदि सभी ने मिलकर कमला का अंतिम संस्कार आदि किया।

कुछ दिन वहाँ रहने के बाद राजेन्द्र, राहूल को लेकर वापिस शहर आ गया। अब तो वह घर खाने को दौड़ता। कमला के चले जाने के बाद राहूल कुछ उदास रहता और स्कूल से सीधा घर न आकर पिता के ऑफिस चला जाता, वहाँ पर ऑफिस के कर्मचारी उसे प्यार करते और कभी-कभार उसे दुकान पर या घुमाने ले जाते। इस तरह से राहूल ने तो अपने दिन बिताये और सात महीने में ही उसकी स्थिति सुधर गई, मगर उसके पिता राजेन्द्र को तो जैसे घोर अंधकार ने घेर लिया हो।

वह तो कमला के विरह में पागल सा हो गया था। ऑफिस में तो उसका दिन ऑफिस के कामों में उलझे रहने के कारण तुरंत कट जाता, मगर घर आते ही जैसे उसका माथा ठनक जाता। वह जब घर में घूसता तो कमला को याद करके एकाएक उसकी आँखों से अश्रु धार फूट पड़ती, मगर कहीं राहूल को पता न चल जाये इसलिए वह जल्द ही रसोई में जाकर खाना बनाता ओर दोनों बाप-बेटे खाना खाते और सो जाते। सुबह जल्द ही उठते और राहूल को नहला कर खुद नहाता फिर खाना खाकर दोनों तैयार हो चल देते। राजेन्द्र के ऑफिस के पास ही राहूल का स्कूल था। राजेन्द्र उसे स्कूल छोड़ देता और खुद ऑफिस चला जाता।

एक दिन राहूल के स्कूल में एक नई अध्यापिका का आना हुआ। वह अध्यापिका हिन्दी पढ़ाने के लिए आई थी। सभी बच्चों में उत्साह था हिन्दी की नई अध्यापिका का। मगर राहूल को तो उस दिन अपनी माँ की याद आ रही थी। वह कक्षा में सबसे आगे बैठता था। कक्षा में अध्यापिका आई सभी बच्चे उसके सम्मानार्थ खड़े हो गये मगर राहूल बैठा रहा। " ये कौन है जो अभी तक खड़ा नही हुआ, नई अध्यापिका ने कहा ।" जी बहनजी, जब से इसकी माँ का देहान्त हुआ है तब से यह बेचारा इसी तरह से गुमशुम सा रहता है, - एक बच्चे ने कहा। क्या नाम है इस नन्हें से बच्चे का ? जी बहनजी, राहूल, राहूल, राहूल ईधर आओ ! - कुर्सी पर बैठते हुए नई अध्यापिका ने कहा। मगर राहूल पर इसका कोई असर हुआ ही नही, वह चुपचाप बैठा रहा। अध्यापिका कुर्सी से उठकर राहूल के पास जाकर कहती है। राहूल-राहूल खड़े हो जाओ। तभी, राहूल एकाएक खड़ा होकर अध्यापिका की ओर देखता है तथा माँ कहकर उसके पैरों से चिपक गया और रोते हुए कहने लगा - "माँ तुम इतने दिनों कहाँ थी ? जो आज आई ओर अभी भी मुझसे प्यार नही करती हो।" एकाएक अध्यापिका के अन्दर भी प्रेम का संचार हो गया ना चाहते हुए भी उसके हाथ राहूल के सिर पर घुमने लगे। राहूल उससे चिपक कर रो रहा था। अब अध्यापिका की आँखों में भी आंसू आते उससे पहले ही राहूल चुप हो गया और अध्यापिका भी उसके पास से हटकर कुर्सी पर जाकर बैठ गई। अब तो राहूल की खुशी की ठिकाना न रहा। अब हर दिन राहूल खुशी-खुशी स्कूल जाता और एक दिन वह अध्यापिका से बोला कि माँ तुम अपने घर कब चलोगी ? देखो, बेटा तुम मुझे स्कूल में माँ मत कहा करो और रही घर चलने की बात तो मैं फिर कभी घर आऊँगी। इस प्रकार से अब राहूल खुश रहने लगा। और समय पर जल्दी से उठकर अपने स्कूल पहुँचता। राहूल अब अच्छी तरह से पढ़ाई करने लगा।

राजेन्द्र उसके इस व्यवहार से अचंभित था। उसने राहूल को इतना खुश उसकी माँ कमला के पास ही देखा था। एक दिन राहूल अपनी अध्यापिका को अपने घर ले आया। सांय करीब छ:-सात बजे जब राजेन्द्र घर लौटा तो सोचता है कि आज तो राहूल भी ऑफिस नहीं आया। शायद वह घर पहुंच गया है। यह सोचते-सोचते वह घर पहुंच गया। घर का बाहरी दरवाजा खुला था तो एकाएक वह दरवाजे के बाहर ही रूक गया। तभी, माँ एक ओर रोटी लाना। आज ये राहूल किसे माँ कहकर रोटी माँग रहा है! चलो अन्दर चल कर देखता हूँ। अरे राहूल कौन है ? पिताजी आज माँ घर आई है। तेरी माँ ! हाँ पिताजी, वह रसोई में हैं। राजेन्द्र रसोई में जाकर उसे देखता है तो असमंजस में पड़ गया। वह अध्यापिका को देखकर हक्का-बक्का रह गया ! हूबहू वही चेहरा, वही नाक-नक्श, एक बार तो वह पुराने ख्यालों में खो जाता है, तभी जी, वो राहूल मुझे यहाँ ले आया है। आप शायद राहूल की अध्यापिका हैं। जी, फिर आप, मेरा मतलब मेरे घर। कई दिनों से राहूल मुझे घर लाने की जिद्द कर रहा था तो सोचा कि क्यों ना मैं आज चलूँ। मेरा काम हो गया, मैं चलती हूँ। ओह ! आप आज पहली बार मेरे घर आई हैं बैठिए हम दो-चार बातें करते हैं। नहीं फिर कभी आऊँगी, चलती हूँ। चलो ना सही, पर अपना नाम तो बताती जाती। "मेरा नाम कमला है।" यह सुनते ही चौंक पड़ा राजेन्द्र ! वही नाम, वही शक्ल, कहीं यह कमला की आत्मा तो नही। उस रात को सारी रात राजेन्द्र यही सोचता रहा।

दूसरे दिन, राजेन्द्र ने अपने ऑफिस का सारा काम नकी किया और चल दिया घर की तरफ। आज फिर राहूल की अध्यापिका उसके घर आई थी। आज राजेन्द्र ने हिम्मत करके कमला से कहा- "क्या आपकी शादी हो चुकी है ?" नही तो। "क्या आप मुझसे शादी करेंगी ?" क्या ? जी, मेरा मतलब है राहूल तुमसे बहुत प्यार करता है और तुम्हें अपनी माँ समझता है। उसे उसकी माँ मिल जायेगी, और मेरा घर जो करीब एक साल से विरान पड़ा है उसमें फिर से बहार आ जायेगी। "मैं सोचूँगी।" कितना समय चाहिए आपको सोचने का ? जी करीब एक दिन चाहिए ही, अच्छा तो चलती हूँ।एक दिन, ठीक है, मैं तुम्हें दो दिन का समय देता हूँ। दो दिन बाद कमला फिर राजेन्द्र के घर आई। राहूल ओ राहूल, कहाँ हो तुम ? आया माँ। तुम्हारे पिताजी कहाँ हैं ? क्या हुआ ? कमला जी आपने कुछ सोचा, राजेन्द्र बोल पड़ा। हाँ, मैं काफी सोच-विचार कर इस नतीजे पर पहुँची हूँ कि,किस नतीजे पर ? "कि मैं तुमसे विवाह करने को तैयार हूँ।" राहूल और राजेन्द्र दोनों में एक खुशी की लहर दौड़ गई।

इस प्रकार से दोनों की शादी हो गई। राहूल को उसकी माँ मिल गई और राजेन्द्र को उसकी खोई हुई कमला। उस विरान हुए घर में फिर से बहार आ गई।

मां खुशी वात्सलय

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