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© Rajeet Pandya

Inspirational

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न्यूज़ ऐंकर- “ प्रधानमंत्री उज्ज्वाला योजना को आज एक साल पुरा चुका है। इस योजना का उद्देश बी॰पी॰एल॰ परिवारों को सब्सिडी रेट पर एल॰पी॰जी॰ कनेक्शन और स्टोव देना है। इस योजना के अन्तर्गत पिछले एक साल में 2.5 करोड़ से भी ज़्यादा एल॰पी॰जी॰ कनेक्शन दिए जा चुके हैं।”

अब वक़्त हो चला है एक ब्रेक का, ब्रेक के बाद देखेंगे “आप की अदालत” रजत शर्मा के साथ।

ये ख़बर सुन कर आकाश मुस्कुरा दिया। कुछ शब्द उसके ज़ेहन में फुसफुसाने लगे “ तालाब चाहे कितना भी बड़ा क्यूँ ना हों, एक एक बूँद से भी तालाब को भरने की शुरुआत कि जा सकती है।”

कुछ महीनों पहले ....

चैप्टर-1

चाय की चुस्कियाँ लेते हुए, आकाश अपने सहकर्मी माधव से बोला -

- “इस साल के अप्रेज़ल का क्या होगा? नोटेबंदी की वजह से कम्पनी को जो नुक़सान हुआ है उसकी भरपाई के लिए हम लोगों का अप्रेज़ल ना रुक जाए। रियल इस्टेट मार्केट भी तो रेंग रेंग के चल रहा है।”

बस इतना बोल कर आकाश चुप हो गया और चाय के कप के किनारों पर अपनी ऊँगलियों को फिराते हुए इसी सोच में डूब गया की नोटेबंदी से किस को फ़ायदा हुआ? सरकार को? बिज़्नेस वालों को ? या फिर आम आदमी को ?

माधव का पूरा ध्यान सिगरेट सुलगाने में था। एक लम्बी कश लेते हुए माधव बोला -

“अबे आकाश तुम सोचते बहुत हो।”

बस इतना बोल कर माधव फिर से सिगरेट के गहरे कश मारने लगा।

आकाश ने जेब से 100 रुपए का नोट निकल कर चाय वाले को दिया ओर कहा - “अभी जमा कर लो हिसाब बाद में कर लेंगे ।”

माधव पैरों से जलते हुए सिगरेट की टुकड़े को बुझाते हुए बोला - 

“ शाम को रुक रहे हो ना, ईमेल तो पढ़ ही लिया होगा। एम॰डी॰ ऑफ़िस से डंडा आया है, अटेंड करना ज़रूरी हैं।

ओ॰एन॰जी॰सी॰ से कुछ लोग सरकार की “ give it up” स्कीम को लेकर प्रेज़ेंटेशन देने आने वाले हैं।”

आकाश झेंपते हुए बोला - “शुक्रवार की शाम ही मिली थी क्या ज्ञान बाँटने को ?”

आकाश पिछले 3 साल से जी॰डी॰ए॰ कन्स्ट्रक्शन कम्पनी लिमिटेड में अकाउंट्स मैनेजर की पोस्ट पे काम कर रहा है। माधव इस कम्पनी में आकाश से भी पुराना हैं ओर एच॰आर॰ डिपार्टमेंट असिस्टेंट मैनेजर की पोस्ट पे काम कर रहा हैं। 

जी॰डी॰ए॰ कन्स्ट्रक्शन कम्पनी लिमिटेड पिछले 55 सालों से सिवल कन्स्ट्रक्शन के सरकारी और गैर-सरकारी काम कर रही है। ओ॰एन॰जी॰सी॰ के लिए ऑल और गैस पाइप लाइन बिछाने का 25% काम का कॉन्ट्रैक्ट जी॰डी॰ए॰ कन्स्ट्रक्शन कम्पनी को ही मिलता है।

जी॰डी॰ए॰ हाउस का कॉन्फ़्रेन्स हॉल पूरी तरह से भरा हुआ था। ऐसा लग रहा था जैसे की आज कम्पनी का ऐन्यूअल फ़ंक्शन है। आकाश और माधव भी अपनी-अपनी जगह पे बैठ गए। सब से आगे बैठे थे कम्पनी के मालिक श्री गोपालचंद दुर्गदास अग्रवाल। कॉन्फ़्रेन्स हॉल में बैठे सभी लोगों की निगाह प्रोजेक्टर की स्क्रीन पे थी।

“सरकार एक एल॰पी॰जी॰कनेक्शन पे एक साल में 12 सिलेंडर सब्सिडी रेट पे देती है। इसका मतलब है की 650/- रुपए लागत वाला सिलेंडर आप लोगों को लगभग 450/- से 460/- रुपए में मिलता है। इस तरह से सरकार हर एल॰पी॰जी॰ कनेक्शन पे लगभग 2400/- रूपए की सब्सिडी देती है। भारत में रहने वाले 25 करोड़ परिवारों में से सिर्फ़ 15 करोड़ परिवारों को एल॰पी॰जी॰ कनेक्शन मिल पाया है। 15 करोड़ एल॰पी॰जी॰कनेक्शन पे सरकार हर साल 36,000.00 करोड़ रुपए की सब्सिडी का बोझ उठाती हैं।”

माधव चौकते हुए बोला “36,000.00 करोड़ रुपए “ 

आकाश- “तो क्या हुआ हम लोग टैक्स भी तो देते हैं सरकार को।”

रस्तोगी जी स्टेज के किनारे पर खड़े हो कर फिर से बोलना शुरू किया- “ सरकार ये अपील करती है की देश के आर्थिक रूप से सक्षम लोग स्वयं-इच्छा से मिलने वाले सब्सिडी को सरेंडर करे। इसके लिए सरकार ने #Give It Up स्कीम लॉंच की है। जो लोग अपनी एल॰पी॰जी॰ सब्सिडी सरेंडेर करना चाहते है, वे लोग अपने मोबाइल से एस॰एम॰एस॰, वेब्सायट या फिर नज़दीकी एल॰पी॰जी॰ डिस्ट्रिब्युटर से सम्पर्क कर के एल॰पी॰जी॰ सब्सिडी सरेंडेर कर सकते है।”

“आप लोगों की सुविधा के लिए, सब्सिडी सरेंडेर काउंटर कॉन्फ़्रेन्स हॉल के बाहर ही लगा रखा है।”

माधव- “ रस्तोगी जी ने बड़े ही अच्छे तरीक़े से सब्सिडी की गणित समझा दी। मुझे तो हमेशा लगता था की सरकार ही हम लोगों को लुट रही है। लेकिन अभी मालूम हुआ की हम ही लोग सरकार पे बोझ बने हुए है।”

आकाश- “ सरकार किसी मंगल ग्रह से टपकी है क्या? सरकार हम लोगों से ही तो बनी है। हम लोग ही जात-पात के आधार पर वोट देते है और चुन लेते है एक ऐसे आदमी को जो अगले 5 साल हम ही को लूटने में लगा रहता है।”

माधव- “ अरे गुरुजी शांत, अब भाषण ख़त्म हो गया हो तो चले फ़ोर्रम भर दे सब्सिडी सरेंडर करने के लिए ”आकाश - “ तुम चलो, मैं फिर किसी दिन कर लूँगा। आज पिक्चर का प्लान है और वैसे ही काफ़ी लेट हो गया हूँ ।”

चैप्टर-2

“ चूल्हा है या रेल का एंजिन” रामरती चूल्हे से निकलने वाले ढेर सारे धुएँ को देख कर बोल रही थी। रामरती ने एक लम्बी साँस ली और ज़ोर ज़ोर से चूल्हे में फूँक मरने लगी, इस उम्मीद के साथ की अबकि बार चूल्हा जल उठे। 

रामरती और चूल्हे की जंग रोज़ होती थी। जंग की शुरुआत में चूल्हा ढेर सारा धुआँ निकाल कर अपनी जीत का बिगूल बजा देता था। लेकिन रामरती भी कहाँ हार मान ने वाली थी, रामरती अपनी पूरी हिम्मत से फूँक मार-मार कर चूल्हे में ठंडे पड़े अंगारों को आग़ की लपटन में बदल देती थी। 

रामरती को ये जंग पसंद तो नहीं थी और ना ही उससे अपनी जीत पे को गौरव होता था। चूल्हे पे खाना पकाना उसकी मजबूरी थी। मिट्टी से बने बरतनों और खिलौनों को बेच कर अपना घर चलाने वाली रामरती का सपना है कि वो अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा, संस्कार और अच्छा स्वास्थ दे पाए। अच्छी शिक्षा और संस्कार तो रामरती के बच्चों को मिल रहे है। लेकिन चूल्हे से निकलने वाले धुएँ ने रामरती और उसके बच्चों का हाल ख़राब कर रखा है। इस धुएँ की वजह से आँखो में जलन , सर दर्द, चक्कर आना और साथ ही डर भी लगा रहता है की दमा, कैन्सर जैसी जान लेवा बीमारी ना हो जाए। इस धुएँ की वजह से रामरती के पति की जान चली गई थी। एल॰पी॰जी॰ स्टोव रामरती के लिए  ठीक वैसे ही है जैसे चकोर कि लिए चाँद। रामरती एल॰पी॰जी॰ स्टोव के बारे में सिर्फ़ सोच सकती है लेकिन उस तक पहुँच नहीं सकती। रोज़ सवेरे जल्दी उठ कर खाना पकाना, बच्चों को स्कूल छोड़ना फिर दिन भर मिट्टी के बर्तन- खिलौने बेच कर , शाम ढलते रामरती घर पहुँच जाती थी। घर पहुँच कर फिर से चाक के पहिए पर नए- नए बर्तन- खिलौने बनाने लग जाती थी। ऐसा लग रहा था मानो रामरती की ज़िंदगी चाक पहिए की तरह गोल - गोल घूम रही है। 

रामरती के पास पुरानी सी टूटी फूटी लकड़ी की चार पहियों वाली हाथ गाड़ी थी। हाथ गाड़ी पे मिट्टी के खिलौने व बर्तन लाद कर निकल पड़ती थी बेचने के लिए।

एक दिन रामरती अपनी हाथ गाड़ी खिंचते हुए पेट्रोल पम्प के पास से गुज़र रही थी। उसने एक बड़ा सा होर्डिंग देखा और देखते ही रुक गई। वो पेट्रोल पम्प के नज़दीक गई ओर होर्डिंग को ग़ौर से देखने लगी। होर्डिंग पे छपे सिलेंडर और प्रधान मंत्री की फ़ोटो को देख कर उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। 

“ भैया जी ये सिलेंडर की फ़ोटो यह क्यूँ छपी है?” रामरती ने कार में पेट्रोल भर रहे आदमी से पूछा। 

इस सवाल पर रामरती के हाथ में एक काग़ज़ का पर्चा पकड़ा दिया गया। “कमाल है इस पर्चे में भी वही फ़ोटो जो उस होर्डिंग पे भी लगी है।” रामरती ख़ुद से बातें करने लगी। इस से पहले वो कुछ और सवाल पूछती रामरती के “भैया जी” जा चुके थे। ऐसा नहीं था कि वहाँ दूसरे लोग नहीं थे जिन से रामरती अपने सवालों का जवाब पूछ सके, उसकी ग़रीबी ने उसके सवाल पूछने के संवैधानिक हक़ कई सालों से कुचल रखा था। रामरती की झिझक ने उसे सवाल नहीं पूछने पर मजबूर कर दिया और फिर वो अपनी हाथ गाड़ी की तरफ चल दी। रामरती ने सलीक़े से पर्चा समेट कर अपने पास रख लिया और फेरी लगाने चल पड़ी। 

सपना- “दीये क्या भाव है? “ ( सपना ने कार से उतरते हुए पूछा)

रामरती - “ मैडम जी 3 रुपए का एक दिया है। “ 

सपना - “ और ये गुलक्क?”

रामरती- “ 40 रुपए की एक। “

सपना- “ 30 दीये और 2 गुलक्क दे दो। भाव सही से लगाना ।”

रामरती- “ 30 दीये के 90 रुपए और 2 गुलक्क के 80 रुपए। कुल हुए 170 आप 150 दे दीजिए। 

सपना के एक 100 का और एक 50 का नोट रामरती की तरफ़ बड़ा दिया। 

रामरती - “ क्या आप मेरी एक मदद कर सकती है?”

सपना - “ हाँ कहो।”

रामरती ने जल्दी से सिलेंडर वाला पर्चा निकाल कर सपना को दे दिया। तब तक आकाश भी कार से नीचे उतर गया। 

आकाश ने सपना के हाथ से पर्चा ले लिया और ख़ुद पढ़ने लगा।

आकाश - “ सरकार बी॰पी॰एल॰ परिवारों को मुफ़्त में एल॰पी॰जी॰ कनेक्शन दे रही है। कनेक्शन परिवार की महिला सदस्य जिसके पास आधार कार्ड हो, उसी को दिया जाएगा। “

रामरती खुले मुँह और फटी आँखों से आकाश की तरफ़ लगतार देख रही थी। 

आकाश - “ सरकार सिर्फ़ कनेक्शन मुफ़्त में दे रही है। LPG स्टोव और सिलेंडर का ख़र्च ख़ुद ही उठाना पड़ेगा। ज़्यादा जानकारी के लिए नज़दीक के एल॰पी॰जी॰ डिस्ट्रिब्युटर से सम्पर्क करे। “ ( आकाश ने चेतावनी भरें लहजे में रामरती से कहा।)

रामरती - “धन्यवाद भैया जी। “

रामरती के चेहरे की चमक देख कर आकाश और सपना मुस्कुरा दिए। 

सपना - “ ये रहे बाक़ी के 20 रुपए।” ( सपना ने रामरती से मिले डिस्काउंट के 20 रुपए लौटा दिए) 

घर पहुँच कर रामरती चाक के पहिए के पास बैठ गयी। उसने गिली चीनी मिट्टी का एक बड़ा सा टुकड़ा उठाया और चाक के पहिए पर रख दिया और ज़ोर ज़ोर से पहिया घूमने लगी। मिट्टी के बर्तन खिलोने बनाने कि कला रामरती ने अपने पति से सीखी थी। उसका पति अक्सर कहा करता था “ असली कला हाथों में नहीं, हमारी कल्पना में होती है”। लेकिन रामरती की कल्पना को आज सिलेंडर का ग्रहण लग चुका था। 

आकाश- “ तुमने 20 रुपए वापिस क्यूँ कर दिए। “ ( आकाश कार चलाते हुए सपना से पूछा। )

सपना - “ शायद तुमने उस दीये बेचने वाली औरत के चहरे पे चमक देखी होगी जब तुमने उसे बताया था की सरकार मुफ़्त में एल॰पी॰जी॰ कनेक्शन दे रही है। फिर जब तुमने उस औरत को बताया की सरकार सिर्फ़ कनेक्शन मुफ़्त दे रही है। एल॰पी॰जी॰ स्टोव और सिलेंडर तो ख़ुद ही ख़रीदना पड़ेगा, तब उसके चेहरे पर मायूसी छा गई थी। उस वक़्त मुझे वो 20 रुपए ख़ुद पे बोझ की तरह लग रहे थे।

हम लोग शॉपिंग मॉल्ज़ से बिना किसी मोल भाव किए ख़रीदारी करते है। डिस्काउंट की दादागिरी हम सिर्फ़ फेरीवालों, सब्जीवालो पे निकलते है। 

हो सकता है की वो २० रुपए काफ़ी नहीं हो उसकी समस्या सुलझाने के लिए। लेकिन हम सब मिल कर कोशिश करे तो बूँद बूँद से भी तालाब भर सकते है और मैं अपनी तरफ़ से शुरुआत कर दी है।”

आकाश, सपना की बातें इस तरह सुन रहा था जैसे कोई छोटा बच्चा अपनी माँ की मुँह से लोरियाँ। आकाश ने कार रोड के साइड में खड़ी कर दी और अपने मोबाइल फ़ोन में कुछ टाइप करने लगा। 

सपना- क्या हुआ यहाँ क्यूँ रुक गए। गाड़ी में कोई ख़राबी हो गई है क्या?

आकाश- ख़राबी दिमाग़ में थी वो अब तुमने ठीक कर दी। में अपनी एल॰पी॰जी॰ सब्सिडी सरेंडेर कर दी है। 

चैप्टर-3

“आधार कार्ड, पैन कार्ड , बैंक पासबुक” रामरती बार बार अपने मन में दोहरा रही थी, इस डर से की कहीं वो भूल ना जाए। उसने एक दिन पहले डिस्ट्रिब्युटर से मिल कर सभी जानकारी ले ली थी। रामरती ने एक पुराने संदूक में से कुछ रुपए निकाल कर अपने पास रख लिए। डिस्ट्रिब्युटर के यहाँ कुछ देर इंतज़ार के बाद रामरती को सिलेंडर और गैस स्टोव मिल गया। 

आज की शाम रामरती के लिए ठीक वैसी ही थी जैसी आज़ादी के लिए लड़ने वालों के लिए 15 अगस्त 1947 की शाम। आज ना कोई धुआँ था, ना किसी के खाँसने की आवाज़। स्टोव से निकले वाली आग़ की लपटों में रामरती आने वाले अच्छे दिनो की सुगबुगहट महसूस कर रही थी। 

खिलौने धुआं मिट्टी

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