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लैला (भाग २)
लैला (भाग २)
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© Munshi Premchand

Classics

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सहसा राज्य–भवन के द्वार पर शोर मचने लगा। एक क्षण में मालूम हुआ कि जनता का टीडी दल; अस्त्र शस्त्र से सृसज्जित राजद्वार पर खड़ा दीवरो को तोडने की चेष्टा कर रहा हे। प्रतिक्षण शारे बढता जाता था और ऐसी आशंका होती थी कि क्रोधोन्मत्त जनता द्वारों को तोडकर भीतर घूस आयेगी। फिर ऐसा मालूम हुआ कि कुछ लोग सीढिया लगाकर दीवार पर चढ़ रहे है। लैला लज्जा और ग्लानि से सिर झुकाय खड़ी थी उसके मुख से एक शब्द भी न निकलता था। क्या यही वह जनता है, जिनके कष्टों की कथा कहते हुए उसकी वाणी उन्मत्त हो जाती थी? यही वह अशक्त, दलित क्षुधा पीड़ित अत्याचार की वेदा से तड़पती हुई जनता है जिस पर वह अपने को अर्पण कर चुकी थी।

नादिर भी मौन खड़ा था; लेकिन लज्जा से नही, क्रोध स उसका मुख तमतमा उठा था, आंखो से चिरगारियां निकल रही थी बार बार ओठ चबाता और तलवार के कब्जे पर हाथ रखकर रह जाता था वह बार बार लैला की ओर संतप्त नेत्रो से देखता था। जरा इशारे की देर थी। उसका हुक्म पाते ही उसकी सेना इस विद्रोही दल को यो भगा देगी जैसे आंधी। पतों को उड़ा देती है पर लैला से आंखे न मिलती थी।

आखिर वह अधीर होकर बोला-लैला, मै राज सेना को बुलाना चाहता हूं क्या कहती हो?

लैला ने दीनतापूर्ण नेत्रो से देखकर कहा–जरा ठहर जाइए पहले इन लोगो से पूछिए कि चाहते क्या है।

आदेश पाते ही नादिर छत पर चढ़ गया, लैला भी उसक पीछे पीछे ऊपर आ पहुंची। दोनों अब जनता के सम्मुख आकर खड़े हो गये। मशलों के प्रकाश में लोगों न इन दोनो को छत पर खड़े देखा मानो आकाश से देवता उतर आयें हों, सहस्त्रो से ध्वनि निकली–वह खड़ी है लैला वह खड़ी।’ यह वह जनता थी जो लैला के मधुर संगीत पर मस्त हो जाया करती थी।

नादिर ने उच्च स्वर से विद्रोहियों को सम्बोधित किया–ऐ ईरान की बदनसीब रिआया। तुमने शाही महल को क्यो घेर रखा है? क्यों बगावत का झंडा खडा किया है? क्या तुमको मेरा और अपने खुदा का बिल्कुल खौफ किया। है? क्या तुम नहीं जानतें कि मै अपनी आंखों के एक इशारे से तुम्हारी हस्ती खाक में मिला सकता हूं? मै तुम्हे हुक्म देता हुं कि एक लम्हे के अन्दर यहां से चलो जाओं वरना कलामे-पाक की कसम, मै तुम्हारे खून की नदी बहा दूंगा।

एक आदमी ने, जो विद्रोहियों का नेता मालूम होता था, सामने आकर कहा–हम उस वक्त तक न जायेगे, जब तक शाही महल लैला से खाली न हो जायेगा।

नादिर ने बिगड़कर कहा-ओ नाशुक्रो, खुदा से डरो!’ तूम्हे अपनी मलका की शान में ऐसी बेअदबी करते हुए शर्म नही आती!’ जब से लैला तुम्हारी मलका हुई है, उसने तुम्हारे साथ किनती रियायते की है।‘ क्या उन्हें तुम बिलकुल भूल गये? जालिमो वह मलका है, पर वही खना खाती है जो तूम कुत्तों को खिला देते हो, वही कपड़े पहनती है, जो तुम फकीरो को दे देते हो। आकर महलसरा में देखो तुम इसे अपने झोपड़ो ही की तरह तकल्लफु और सजावट से खाली पाओगे। लैला तुम्हारी मलका होकर भी फकीरो की जिंदगी बसर करती है, तुम्हारी खिदमत में हमेशा मस्त रहती है। तुम्हें उसके कदमो की खाक माथे पर लगानी चाहिए आखो का सुरमा बनाना चाहिए। ईरान के तख्त पर कभी ऐसी गरीबो पर जान देने वाली उनके दर्द में शरीक होनेवाली गरीबो पर अपने को निसार करने वाली मलकाने कदम नही रखे और उसकी शान में तुम ऐसी बेहूदा बातें करते हो।’ अफसोस मुझे मालूम हो गया कि तुम जाहिल इन्सानियत से खाली और कमीने हो।’ तुम इसी काबिल हो कि तुम्हारी गरदेन कुन्द छुरी से काटी जायें तुम्हें पैरो तले रौदां जाये...

नादिर बात भी पूरी न कर पाया था कि विद्रोहियों ने एक स्वर से चिल्लाकर कहा-लैला हमारी दुश्मन है, हम उसे अपनी मलका की सुरत में नही देख सकते।

नादिर नेजोर से चिल्लाकर कहा-जालिमो, जरा खामोश हो जाओं, यह देखो वह फरमान है जिस पर लैला ने अभी अभी मुझसे जबरदस्तीर दस्तखत कराये है। आज से गल्ले का महसूल घटाकर आधा कर दिया गया है और तुम्हारे सिर से महसूल का बोझ पांच करोड़ कम हो गया है। 

हजारो आदमियों ने शोर मचाया–यह महसूल बहुत पहले बिलकुल माफ हो जाना चाहिए था। हम एक कौड़ी नही दे सकते। लैला, लैला हम उसे अपनी मलका की सुरत में नही देख सकते।

अब बादशाह क्रोध से कापंने लगा। लैला ने सजल नेत्र होकर कहा-अगर रिआया की यही मरजी है कि मैं फिर डफ बजा-बजा कर गाती फिरुं तो मुझे उज्र नहीं, मुझे यकीन है कि मै अपने गाने से एक बार फिर इनके दिल पर हुकूमत कर सकती हूं।

नादिर ने उत्तेजित होकर कहा- लैला, मैं रिआया की तुनुक मिजाजियों का गूलाम नहीं। इससे पहले कि मै तुम्हे अपने पहलू से जूदा करुं तेहरान की गलियां खून से लाल हो जायेगी। मै इन बदमाशो को इनकी शरारत का मजा चखाता हूं। 

नादिर ने मीनार पर चढकर खतरे का घंटा बजाया। सारे तेहरान मे उसकी आवाज गूंज उठी, शाही फौज का एक आदमी नजर न आया।

नादिर ने दोबारा घंटा बजाया, आकाश मंडल उसकी झंकार से कम्पित हो गया। तारागण कापं उठे; पर एक भी सैनिक न निकला। 

नादिर ने तीससी बार घंटा बजाया पर उसका भी उत्तर केवल एक क्षीण प्रतिध्वनि ने दिया मानो किसी मरने वाले की अतिंम प्रार्थना के शब्द हों।

नादिर ने माथा पीट लिया। समझ गया कि बुरे दिन आ गये। अब भी लैला को जनता के दुराग्रह पर बलिदान करके वह अपनी राजसत्ता की रक्षा कर सकता था, पर लैला उसे प्राणों से प्रिय थी उसने छत पर आकर लैला का हाथ पकड लिया और उसे लिये हुए सदर फाटक से निकला विद्रोहियों ने एक विजय ध्वनि क साथ उनका स्वागत किया, पर सब के सब किसी गुप्त प्ररेणा के वश रास्ते से हट गये। 

दोनो चुपचाप तेहरान की गलियों में होते हुए चले जाते, थे। चारों ओर अंधकार था। दुकाने बंदथी बाजारों में सन्नाटा छाया हुआ था। कोई घर से बाहर न निकलता था। फकीरों ने भी मसजिदो में पनाह ले ली थी पर इन दोनो प्राणियो के लिए कोई आश्रय न था। नादिर की कमर में तलवार थी, लैला के हाथ में डफ था उनके विशाल ऐश्वर्य का विलुप्त चिह्न था।

पूरा साल गुजर गया। लैला और नादिर देश-विदेश की खाक छानते फिरते थे। समरकंद और बुखारा, बगदाद और हलब, काहिरा और अदन ये सारे देश उन्होंने छान डाले। लैला की डफ फिर जादू करने मेला लगी उसकी आवाज सुनते ही शहर में हलचल मच जाती, आदमीयों का मेला लग जाता आवभगत होने लगती; लेकिन ये दोनो यात्री कहीं एक दिन से अधिक न ठहरते थे। न किसी से कुछ मागंते न किसी के द्वार पर जाते। केवल रुखा-सुखा भोजन कर लेते और कभी किसी वृक्ष के नीचे कभी पर्वत की गुफा में और कभी सड़क के किनारे रात काट देते थे। संसार के कठोर व्यवहार ने उन्हें विरक्त हर दिया था, उसके प्रलोभन से कोसों दूर भागते थे। उन्हे अनुभव हो गया था कि यहां जिसके लिए प्राण अर्पण कर दो वहीं, अपना शत्रु हो जाता है, जिसके साथ भलाई करो, वही बुराई की कमर बांधता है, यहा किसी से दिल न लगाना चाहिए। उसके पास बड़े-बड़े रईसो के निमंत्रण आते उन्हे एक दिन अपना मेहमान बनाने केलिए हजारो मिन्नतें करते; पर लैला किसी की न सुनती। नादिर को अब तक कभी कभी बादशाहत की सनक सवार हो जाती थी। वह चाहता था कि गुप्त रुप से शक्ति संग्रह करके तेहरान पर चढ़ जाऊं और बागियों को परास्त करके अखंड राज्य करुं; पर लैला की उदासीनता देखकर उसे किसी से मिलने जुलने का साहस न होता था। लैला उसकी प्राणेश्वरी थी वह उसी के इशारों पर चलता था।

उधर ईरान में भी अराजकता फैली हुई थी। जनसत्ता से तंग आकर रईसो ने भी फौजे जमा कर ली थी और दोनो दलो मे आये दिन संग्राम होता रहता था। पूरा साल गूजर गया और खेत न जुते देश में भीषण अकाल पड़ा हुआ था,व्यापार शिथिल था, खजाना खाली। दिन–दिन जनता की शक्ति घटती जाती थी और रईसो को जोर बढता जाता था। आखिर यहां तक नौबत पहुंची कि जनता ने हथियार डाल दिये और रईसो ने राजभवन पर अपना अधिकार जमा लिया। । प्रजा के नेताओ को फांसी दे दी गयी, कितने ही कैद कर दिये गये और जनसत्ता का अंत हो गया। शक्तिवादियों को अब नादिर की याद आयी। यह बात अनुभव से सिद्ध हो गयी थी कि देश में प्रजातंत्र स्थापित करने की क्षमता का अभाव है। प्रत्यक्ष के लिए प्रमाण की जरुरत न थी। इस अवसर पर राजसत्ता ही देश का उद्धार कर सकती थी। वह भी मानी हुई बात थी कि लैला और नादिर को जनमत से विशेष प्रेम न होगा। वे सिंहासन पर बैठकर भी रईसो ही के हाथ में कठपुतली बने रहेगें और रईसों को प्रजा पर मनमाने अत्याचार करने का अवसर मिलेगा। अतएव आपस में लोगों ने सलाह की और प्रतिनिधि नादिर को मना लाने के लिये रवाना हुंए।

संध्या का समय था। लैला और नादिर दमिश्क में एक वृक्ष के नीचे बैठे हुए थे। आकाशा पर लालिमा छायी हुई थी। और उससे मिली हुई पर्वत मालाओं की श्याम रेखा ऐसी मालूम हो रही थी मानो कमल-दल मुरझा गया हो। लैला उल्लसित नेत्रो से प्रकृति की यह शोभा देख रही थी। नादिर मलिन और चिंतित भाव से लेटा हुआ सामने के सुदुर प्रांत की ओर तृषित नेत्रों से देख रहा था, मानो इस जीवन से तंग आ गया है।

सहसा बहुत दूर गर्द उड़ती हुई दिखाई दी और एक क्षण में ऐसा मालूम हुआ कि कुछ आदमी घोड़ो पर सवार चले आ रहे है। नादिर उठ बैठा और गौर से देखने लगा कि ये कौन आदमी है। अकस्मात वह उठकर खड़ा हो गया। उसका मुख मंडल दीपक की भाति चमक उठा जर्जर शरीर में एक विचित्र स्फुर्ति दौड़ गयी। वह उत्सुकता से बोला–लैला, ये तो ईरान के आदमी, कलामे–पाक की कसम, ये ईरान के आदमी है। इनके लिबास से साफ जाहिए हो रहा है।

लैला–पहले मै, भी उन यात्रियों की ओर देखा और सचेत होकर बोली–अपनी तलवार संभाल लो, शायद उसकी जरुरत पड़े,। 

नादिर–नहीं लैला, ईरान केलोग इतने कमीने नहीं है कि अपने बादशाह पर तलवार उठायें।

लैला- पहले मै भी यही समझती थी।

सवारों ने समीप आकर घोड़े रोक लिये। उतकर बड़े अदब से नादिर को सलाम किया। नादिर बहुत जब्त करने पर भी अपने मनोवेग को न रोक सका, दौड़कर उनके गले लिपट गया। वह अब बादशाह न था, ईरान का एक मुसाफिर था। बादशहत मिट गयी थी, पर ईरानियत रोम रोम में भरी हुई थ्री। वे तीनों आदमी इस समय ईरान के विधाता थे। इन्हे वह खूब पहचानता था। उनकी स्वामिभक्ति की वह कई बार परीक्षा ले चुका था। उन्हे लाकर अपने बोरिये पर बैठाना चाहा, लेकिन वे जमीन पर ही बैठे। उनकी दृष्टि से वह बोरिया उस समय सिंहासन था, जिस पर अपने स्वामी के सम्मुख वे कदम न रख सकते थे। बातें होने लगीं, ईरान की दशा अत्यंत शोचनीय थी। लूट मार का बाजार गर्म था, न कोई व्यवस्था थी न व्यवस्थापक थे। अगर यही दशा रही तो शायद बहुत जल्द उसकी गरदन में पराधीनता का जुआ पड़ जाये। देश अब नादिर को ढूंढ रहा था। उसके सिवा कोई दूसरा उस डुबते हुए बेडे को पार नहीं लगा सकता था। इसी आशा से ये लोग उसके पास आये थे। 

नादिर ने विरक्त भाव से कहा- एक बार इज्जत ली, क्या अबकी जान लेने की सोची है? मै बड़े आराम से हूं।’ आप मुझे दिक न करें।

सरदारों ने आग्रह करना शुरु किया–हम हुजूर का दामन न छोड़ेगे, यहां अपनी गरदनों पर छुरी फेर कर हुजूर के कदमो पर जान दे देगे। जिन बदमाशों ने आपकी परेशान किया। अब उनका कहीं निशान भी नहीं रहा हम लोगो उन्हें फिर कभी सिर न उठाने देगें ,सिर्फॅ हुजूर की आड़ चाहिए। 

नादिर नेबात काटकर कहा-साहबो अगर आप मुझे इस इरादे से ईरान का बादशाह बनाना चाहते है, तो माफ कीजिए। मैने इस सफर मे रिआया की हालत का गौर से मुलाहजा किया है और इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि सभी मुल्को में उनकी हालत खराब है। वे रहम के कबिल है ईरान में मुझे कभी ऐसे मौके ने मिले थे। मैं रिआया को अपने दरवारियों की आखों से देखता था। मुझसे आप लोग यह उम्मीद न रखे कि रिआया को लूटकर आपकी जेबें भरुगां। यह अजाब अपनी गरदन पर नही ने सकता। मैं इन्साफ का मीजान बराबर रखूंगा और इसी शर्त पर ईरान चल सकता हूं। 

लैला ने मुस्कराते कहा-तुम रिआया का कसूर माफ कर सकते हो, क्योकि उसकी तुमसे कोई दुश्मनी न थी। उसके दांत तो मुझे पर थे। मै उसे कैसे माफ कर सकती हूं। 

नादिर ने गम्भीर भाव से कहा-लैला, मुझं यकीन नहीं आता कि तुम्हारे मुंह से ऐसी बातें सुन रहा हूं। 

लोगो ने समझा अभी उन्हें भड़काने की जरुरत ही क्या है। ईरान में चलकर देखा जायेगा। दो चार मुखबिरो से रिआया के नाम पर ऐसे उपद्रव खड़े करा देंगे कि इनके सारे ख्याल पलट जायेगें। एक सरदार ने अर्ज की- माजल्लाह; हुजूर यह क्या फरमाते है? क्या हम इतने नादान है कि हुजूरं को इन्साफ के रास्ते से हटाना चाहेगें? इन्साफ हीबादशाह का जौहर है और हमारी दिली आरजू है कि आपका इन्साफ ही नौशेरवां को भी शर्मिदां कर दे,। हमारी मंशा सिर्फ यह थी कि आइंदा से हम रिआया को कभी ऐसा मौका न देगें कि वह हुजूर की शान में बेअदबी कर सके। हम अपनी जानें हुजूर पर निसार करने के लिए हाजिर रहेंगे।

सहसा ऐसा मालूम हुआ कि सारी प्रकृति संगीतमय हो गयी है । पर्वत और वृक्ष, तारे, और चॉँद वायु और जल सभी एक स्वर से गाने लगे। चॉँदनी की निर्मल छटा में वायु के नीरव प्रहार में संगीत की तरंगें उठने लगी। लैला अपना डफ बजा बजा कर गा रही थी। आज मालूम हुआ, ध्वनि ही सृष्टि का मूल है।द पर्वतों पर देवियां निकल निकल कर नाचने लगीं अकाशा पर देवता नृत्य करने लगे। संगीत ने एक नया संसार रच डाला। 

उसी दिन से जब कि प्रजा ने राजभवन के द्वार पर उपद्रव मचाया था और लैला के निर्वासन पर आग्रह किया था, लैला के विचारों में क्रांति हो रही थी जन्म से ही उसने जनता के साथ साहनुभूति करना सीखा था। वह राजकर्मचारियें को प्रजा पर अत्याचार करते देखती थी और उसका कोमल हृदय तड़प उठता था। तब धन ऐश्वर्य और विलास से उसे घृणा होने लगती थी। जिसके कारण प्रजा को इतने कष्ट भोगने पड़ते है। वह अपने में किसी ऐशी शक्ति का आह्वाहन करना चाहती थी कि जो आतताइयों के हृदय में दया और प्रजा के हृदय में अभय का संचार करे। उसकी बाल कल्पना उसे एक सिंहासन पर बिठा देती, जहां वह अपनी न्याय नीति से संसार में युगातर उपस्थित कर देती। कितनी रातें उसने यही स्वप्न देखने में काटी थी। कितनी बार वह अन्याय पीड़ियों के सिरहाने बैठकर रोयीथी लेकिन जब एक दिन ऐसा आया कि उसके स्वर्ण स्वप्न आंशिक रीति से पूरे होने लगे तब उसे एक नया और कठोर अनुभव हुआ! उसने देखा प्रजा इतनी सहनशील इतनी दीन और दुर्बल नहीं है, जितना वह समझती थी इसकी अपेक्षा उसमें ओछेपन, अविचार और अशिष्टता की मात्रा कहीं अधिक थी। वह सद्व्यहार की कद्र करना नही जानती, शाक्ति पाकर उसका सदुपयोग नहीं कर सकती। उसी दिन से उसका दिल जनता से फिर गया था। 

जिस दिन नादिर और लैला ने फिर तेहरान में पदार्पण किया, सारा नगर उनका अभिवादन करने के लिए निकल पड़ा शहर पर आतंक छाया हुआ था।, चारो ओर करुण रुदन की ध्वनि सुनाई देती थी। अमीरों के मुहल्ले में श्री लोटती फिरती थी गरीबो के मुहल्ले उजड़े हुएथे, उन्हे देखकर कलेजा फटा जाता था। नादिर रो पड़ा, लेकिन लैला के होठों पर निष्ठुर निर्दय हास्य छटा दिखा रहा था। 

नादिर के सामने अब एक विकट समय्या थी। वह नित्य देखता कि मै जो करना चाहता हूं वह नही होता और जो नहीं करना चाहता वह होता है और इसका कारण लैला है, पर कुछ कह न सकता था। लैला उसके हर एक काम में हस्तक्षेप करती रहती, थी। वह जनता के उपकार और उद्धार के लिए विधान करता, लैला उसमे कोई न कोई विध्न अवश्य डाल देती और उसे चुप रह जाने के सिवा और कुछ न सुझता लैला के लिए उसने एक बार राज्य का त्याग कर दिया था तब आपति-काल ने लैला की परीक्षा की थी इतने दिनों की विपति में उसे लैला के चरित्र का जो अनुभव प्राप्त हुआ था, वह इतना मनोहर इतना सरस था कि वह लैला मय हो गया था। लैला ही उसका स्वर्ग थी, उसके प्रेम में रत रहना ही उसकी परम अधिलाषा थी। इस लैला के लिए वह अब क्या कुछ न कर सकता था? प्रजा की ओर साम्राज्य की उसके सामने क्या हस्ती थी। 

इसी भांति तीन साल बीत गये प्रजा की दशा दिन दिन बिगड़ती ही गयी। 

एक दिन नादिर शिकर खेलने गया। और साथियों से अलग होकर जंगल में भटकता फिरा यहां तक कि रात हो गयी और साथियों का पता न चला। घर लौटने का भी रास्ता न जानता था। आखिर खुदा का नाम लेकर वह एक तरफ चला कि कहीं तो कोई गांव या बस्ती का नाम निशान मिलेगा! वहां रात, भर पड़ रहुंगा सबेरे लौट जाउंगा। चलते चलते जंगल के दूसरे सिरे पर उसे एक गांव नजर आया। जिसमें मुश्किल से तीन चार घर होगें हा, एक मसजिद अलबत्ता बनी हुई थी। मसजिद मे एक दीपक टिमटिमा रहा था पर किसी आदमी या आदमजात का निशान न था। आधी रात से ज्यादा बीत चुकी थी, इसलिए किसी को कष्ट देना भी उचित न था। नादिर ने घोड़े का एक पेड़ स बाध दिया और उसी मसजिद में रात काटने की ठानी। वहां एक फटी सी चटाई पड़ी हुई थी। उसी पर लेट गया। दिन भर तक सोता रहा; पर किसी की आहट पाकर चौका तो क्या देखता है कि एक बूढा आदमी बैठा नमाज पढ़ रहा है। उसे यह खबर न थी किरात गुजर गयी और यह फजर की नमाज है। वह पड़ा–पड़ा देखता रहा। वृद्ध पुरुष ने नमाज अदा कही फिर वह छाती के सामने अजिल फैलकर दुआ मांगने लगा। दुआ के शब्द सुनकर नादिर का खून सर्द हो गया। वह दुआ उसके राज्यकाल की ऐसी तीव्र, ऐसी वास्तिवक ऐसी शिक्षाप्रद आलोचना थी जो आज तक किसी ने न की थी उसे अपने जीवन में अपना अपयश सुनने का अवसर प्राप्त हुआ। वह यह तो जानता था कि मेरा शासन आदर्श नहीं है, लेकिन उसने कभी यह कल्पना न की थी कि प्रजा की विपति इतनी असत्य हो गयी है। दुआ यह थी-

‘‘ए खुदा! तू ही गरीबो का मददगार और बेकसों का सहारा है। 

तू इस जालिम बादशह के जुल्म देखता है और तेरा वहर उस पर नहीं गिरता। यह बेदीन काफिर एक हसीन औरत की मुहब्बत में अपने को इतना भूल गया है कि न आखों से, देखता है, न कानो से सुनता है। अगर देखता है तो उसी औरत की आंखें से सुनता है तो उसी औरत के कानो से अब यह मुसीबत नहीं सही जाती। या तो तू उस जालिम को जहन्नुम पहुंचा दे; या हम बेकसों को दुनिया से उठा ले। ईरान उसके जुल्म से तंग आ गया है। और तू ही उसके सिर से इस बाला को टाल सकता है।’ 

बूढें ने तो अपनी छ़डी संभाली और चलता हुआ, लेकिन नादिर मृतक की भातिं वहीं पड़ा रहा मानों उसे पर बिजली गिर पड़ी हों।

एक सप्ताह तक नादिर दरबार में न आया, न किसी कर्मचारी को अपने पास आने की आज्ञा दी। दिन केदिन अन्दर पड़ा सोचा करता कि क्या करुं। नाम मात्र को कुछ खा लेता। लैला बार बार उसके पास जाती और कभी उसका सिर अपनी जांघ पर रखकर कभी उसके गले में बाहें डालकर पूछती–तुम क्यों इतने उदास और मलिन हो। नादिरा उसे देखकर रोने लगता; पर मुंह से कुछ न कहता। यश या लैला, यही उसके सामने कठिन समस्या थी। उसक हृदय में भीषण द्वन्द्व रहाता और वह कुद निश्चय न कर सकता था। यश प्यारा था; पर लैला उससे भी प्यारी थी वह बदनाम होकर जिंदा रह सकता था। लैला उसके रोम रोम में व्याप्त थी।

अंत को उसने निश्चय कर लिया–लैला मेरी है मै लैला का हूं। न मै उससे अलग न वह मुझेस जुदा। जो कुछ वह करती है मेरा है, जो मै करता हू। उसका है यहां मेरा और तेरा का भेद ही कहां? बादशाहत नश्वार है प्रेम अमर । हम अनंत काल तक एक दूसरे के पहलू में बैठे हुए स्वर्ग के सुख भोगेगें। हमारा प्रेम अनंत काल तक आकाश में तारे की भाति चमकेगा।

नादिर प्रसन्न होकर उठा। उसका मुख मंडल विजय की लालिमा से रंजित हो रहा था। आंखों में शौर्य टपका पड़ता था। वह लैला के प्रेमका प्याला पीने जा रहा था। जिसे एक सप्ताह से उसने मुंह नहीं लगाया था। उसका हृदय उसी उमंग से उछता पड़ताथा। जो आज से पांच साल पहले उठा करती थी। प्रेम का फूल कभी नही मुरझाता प्रेम की नीदं कभी नहीं उतरती।

लेकिन लैला की आरामगाह के द्वार बंद थे और उसका उफ जो द्वार पर नित्य एक खूंटी से लटका रहता था, गायब था। नादिर का कलेजा सन्न-सा हो गया। द्वार बदं रहने का आशय तो यह हो सकता हे कि लैला बाग में होगी; लेकिन उफ कहां गया? सम्भव है, वह उफ लेकर बाग में गयी हो, लेकिन यह उदासी क्यो छायी है? यह हसरत क्यो बरस रही है।’

नादिर ने कांपते हुए हाथो से द्वार खोल दिया। लैला अंदर न थी पंगल बिछा हुआ था, शमा जल रही थी, वजू का पानी रखा हुआथा। नादिर के पावं थर्राने लगे। क्या लैला रात को भी नहीं सोती? कमरे की एक एक बस्तु में लैला की याद थी, उसकी तस्वीर थी ज्योति-हीन नेत्र।

नादिर का दिल भर आया। उसकी हिम्मत न पड़ी कि किसी से कुछ पूछे। हृदय इतना कातर हो गया कि हतबुद्धि की भांति फर्श पर बैठकर बिलख-बिलख कर रोने लगा। जब जरा आंसू थमे तब उसने विस्तर को सूघां कि शायद लैला के स्पर्श की कुछ गंध आये; लेकिन खस और गुलाब की महक क सिवा और कोई सुगंध न थी।

साहसा उसे तकिये के नीचे से बाहर निकला हुआ एक कागज का पुर्जा दिखायी दिया। उसने एक हाथ से कलेजे को सभालकर पुर्जा निकाल लिया और सहमी हुई आंखो से उसे देखा। एक निगाह में सब कुछ मालूम हो गया। वह नादिर की किस्मत का फैसला था। नादिर के मुंह से निकला, हाय लैला; और वह मुर्छित होकर जमीन पर गिर पड़ा। लैला ने पुर्जे में लिखा था-मेरे प्यारे नादिर तुम्हारी लैला तुमसे जुदा होती है। हमेशा के लिए । मेरी तलाश मत करना तुम मेरा सुराग न पाओगे । मै तुम्हारी मुहब्बत की लौड़ी थी, तुम्हारी बादशाहत की भूखी नहीं। आज एक हफते से देख रही हूं तुम्हारी निगाह फिरी हुई है। तुम मुझसे नहीं बोलते, मेरी तरफ आंख उठाकर नहीं देखते। मुझेसे बेजार रहते हो। मै किन किन अरमानों से तुम्हारे पास जाती हूं और कितनी मायूस होकर लौटती हूं इसका तुम अंदाज नहीं कर सकते। मैने इस सजा के लायक कोई काम नहीं किया। मैने जो कुछ है, तुम्हारी ही भलाई केखयाल से। एक हफता मुझे रोते गुजर गया। मुझे मालूम हो रहा है कि अब मै तुम्हारी नजरों से गिर गयी, तुम्हारे दिल से निकाल दी गयी। आह! ये पांच साल हमेशा याद रहेगें, हमेशा तड़पाते रहेंगें! यही डफ ले कर आयी थी, वही लेकर जाती हूं पांच साल मुहब्बत के मजे उठाकर जिंदगी भर केलिए हसरत का दाग लिये जाती हूं। लैला मुहब्बत की लौंडी थी, जब मुहब्बत न रही, तब लैला क्योंकर रहती? रूखसत!’

मुंशी प्रेमचंद लैला शहज़ादा

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