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मेरा पहला प्यार
मेरा पहला प्यार
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© VIVEK ROUSHAN

Romance

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अक्सर किताबों में हम पढ़ते हैं या लोगो को कहते सुनते हैं की प्यार करने और प्यार होने की कोई उम्र नहीं होती । बस दो दिलों का संगम हीं प्यार होता है, ये कहीं, किसी भी वक़्त किसी से हो सकता है, प्यार न उम्र देखता है, न पैसा देखता है, न जाती देखता है, न ही धर्म देखता है। अनजाने में जो एहसास किसी के प्रति जाग जाए वही प्यार कहला जाता है। इस खूबसूरत एहसास का अनुभूति मुझे भी हुई जब मैं अपने युवा अवस्था में क्लास सातवीं में था।

क्लास में कोई अध्यापक नहीं था, क्लास बच्चों के शोरगुल से पूरा गूंज रहा था। मैं भी अपने दोस्तों के साथ बात करने में मशगूल था और अपने दोस्त की किसी बात पर जोर-जोर से हँस रहा था। तभी अचानक मेरी नज़र क्लास के गेट पर गई जहाँ से एक मासूम सी लड़की को अपनी सहेलियों के संग क्लास के अंदर आते देखा। वो मेरी क्लास में हीं थी पर आज जो एहसास उसे देख कर हुआ था वो आज से पहले कभी नहीं हुआ था। साँवला रंग, बड़ी-बड़ी आँखें, लम्बे बाल और होंठ के ऊपर एक छोटा काला तिल जो उसकी ख़ूबसूरती को और बढ़ा रही थी, या यूँ कहे की भगवान ने वो तिल लोगों की बुरी नज़र से बचने के लिए दिए हो उसे। उसे देख कर मैं बस देखता रह गया। मैं बिलकुल शांत हो गया था और एक टक से उसके मासूम से सूरत को देखता जा रहा था। वो पीछे जाकर अपनी सहेलियों के संग बैठ गई थी और मैं बार-बार पीछे मुड़कर उसे देख रहा था। मुझे पता नहीं था की मैं बार-बार पीछे क्यों मुड़ रहा हूँ पर ये जो एहसास था उसके प्रति, ये एहसास कुछ अलग था और ये मेरे साथ बिलकुल पहली बार हो रहा था। आज से पहले मुझे किसी के प्रति ऐसा एहसास नहीं हुआ था। स्कूल की छुट्टी हुई और घर जाने के बाद भी मैं उसी के बारे में सोचता रहा और अगले दिन स्कूल जाने का इंतज़ार बड़ी बेसब्री से करने लगा। वो बस से आती थी इसलिए वो स्कूल जल्दी आ जाया करती थी। अगले दिन से मैं भी उसे देखने के लिए स्कूल जल्दी जाने लगा। मैंने अपने मन के एहसास का जिक्र किसी के सामने नहीं किया था। अपने दिल की बात अपने दिल में छुपा कर रखी थी। धीरे-धीरे काफी समय बीत गया और हम लोग सातवीं से आठवीं क्लास में चले गए पर अब मेरे दिल ने यह बात जान ली थी कि मुझे उस लड़की से प्यार हो गया है । मेरा छुप-छुप कर बार-बार उसे देखना और नज़र मिलने के बाद उसका नज़र हटा लेना, यह एक अलग तरह का एहसास था जो मुझे महसूस होता था शायद उसे भी महसूस होता होगा पर मेरा उससे बात करने की कभी हिम्मत नहीं होता, शायद मैं उससे बहुत जुड़ गया था। उसे खोना नहीं चाहता था, उससे दूर नहीं जाना चाहता था इसलिए मैं उसे देखकर ही खुश हो जाया करता था। मेरा उसे देखने का सिलसिला यूँ हीं चलता रहा और हम अपने स्कूल के अंतिम पड़ाव में पहुंच गए। दसवीं क्लास समाप्त होने में बस कुछ दिन और रह गए थे। जैसे-जैसे समय बीत रहा था वैसे-वैसे मेरी बेचैनी और बढ़ रही थी। बीते तीन सालों में उसने हमसे कभी बात करने की कोशिश नहीं की और मैं कोशिश करता भी तो हिम्मत नहीं जुटा पाता था उससे बात करने की। मेरा एक दोस्त जो हर समय मेरे साथ ही क्लास में बैठता था वो मेरे उस लड़की के प्रति प्यार के एहसास को जानता था क्योंकी उसने मुझे कई बार उस लड़की को देखते देखा था।

मेरी परेशानी को देख कर मेरे दोस्त ने मुझे बोला कि "अगर तू उस लड़की को पसंद करता है, प्यार करता है तो अपने दिल की बात उसे बता क्यों नहीं देता।" मैंने कहा- "डर लगता है।" मेरे दोस्त ने मेरा हिम्मत बढ़ाया और मुझे अपनी दिल की बात बोलने के लिए प्रेरित किया। थोड़ा समय लेकर और उस लड़की को अकेले देखकर मैं अपने दिल की बात बताने उसके पास चला गया ।जब उसके पास पहुंचा तो मेरे पाँव काँपने लगे थे फिर भी मैंने हिम्मत करकर बोला - "अंकिता सुनो", मेरी आवाज़ सुनते ही वो घबरा गई थी और डरी आवाज़ में बोली - "क्या?" थोड़ा देर ठहर कर मैंने बोला - "आई लव यू।" मेरी बात सुनते ही अंकिता वहां से चली गई और मैं भी उसके जवाब का इंतज़ार किये बिना वहां से चला गया अपने दोस्त के पास। स्कूल की छुट्टी हो गई और हम लोग अपने-अपने घर को चले गए। मैं बहुत खुश था अपने दिल की बात अपने प्यार को बताने के बाद और पहली बार अपने प्यार से बात करने के बाद रात लम्बी लग रही थी और मैं अगले दिन का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था। अगले दिन जब क्लास में गया तो देखा अंकिता नहीं आई है। मेरे मन में अलग-अलग विचार आने लगे, मैं डर गया था। मैंने सोच लिया था कि अगले दिन जब अंकिता क्लास आएगी तो मैं उससे माफ़ी मांग लूंगा अगर मेरी बात उसे बुरी लगी होगी तो। वो कहते हैं न किसी चीज़ चीज़ को अगर आप दिल से चाहे तो भगवान भी आपकी पूरी मदद करते हैं। ऐसा हीं कुछ मेरे साथ भी हुआ। अगले दिन जब मैं स्कूल पंहुचा तो देखा अंकिता बिलकुल अकेले बैठी है। मैं उसके पास जाने लगा। मैं उसके नज़दीक पहुंच गया तब उसने बोला कि कल वो मेरी बातो से बहुत परेशान हो गई थी। इस वजह से वो कल स्कूल नहीं आई थी। उसके बाद उसने मुझे बोला की वो भी मुझे प्यार करती है इस शब्द को सुनने में मुझे तीन साल लग गए। अपने प्यार के मुँह से ये शब्द सुनकर एक अलग एहसास हुआ और मुझे मेरे पहले प्यार का साथ मिल गया था। हम लोगों ने अपने-अपने घर के लैंडलाइन की नंबर एक दुसरे से साझा किया। हम लोग कभी-कभी फ़ोन पर मौका देख कर बात कर लिया करते थे। बारहवीं क्लास तक हम दोनों अलग-अलग स्कूल में लेकिन एक ही शहर में रहे। इस वजह से अलग स्कूल होने का कभी मलाल न हुआ हमदोनो को । एक हीं शहर में रहने की वजह से जब कभी हमें मिलने का मन करता हमलोग मिल लिया करते थे ।

बारहवीं के बाद हम दोनों दिल्ली को चले गए इंजीनियरिंग करने के लिए। हम दोनों ने एक हीं कॉलेज में दाखिला करवा लिया था अपने-अपने पिताजी को बोल कर। कॉलेज एक था पर हमारा ब्रांच अलग-अलग था। सब कुछ अच्छा चलता रहा, प्यार भी होता , तकरार भी होता, लड़ना-झगड़ना भी होता, रूठना-मनाना भी होता। इन सब प्यार-तकरार के साथ कैसे कॉलेज के चार साल बीतने को आ गए थे इसका पाता हीं नहीं चला। हम दोनो को साथ रहते अब छ: वर्ष होने को आये थे। इन छ: वर्षो में हमने ढेर सारे सपने देखे थे। हम दोनो अब फाइनल ईयर में थे और कैंपस सिलेक्शन के लिए कम्पनियाँ कॉलेज में आने लगी थी। सब लोग कैंपस सिलेक्शन के लिए मेहनत कर रहे थे। हम और अंकिता भी पढ़ रहे थे। इस बीच अंकिता का एक आईटी कंपनी में सिलेक्शन हो जाता है और में सिलेक्शन से वंचित रह जाता हूँ। हमारा कॉलेज ख़त्म हो चूका था। हम दोनों अब अपने-अपने घर को चले गए थे। हम लोग एक दूसरे से फ़ोन पे बात किया करते थे। अब हमारे रास्ते अलग हो गए थे।

एक महीना बाद अंकिता नौकरी करने हैदराबाद चली गई थी और मैं सरकारी नौकरी की तैयारी करने के लिए अपने पिताजी के कहे अनुसार दिल्ली चला गया और वहां जा कर एक कोचिंग में दाखिला करवा लिया। सब कुछ ऐसे हीं चलता रहा। हम दोनों एक दूसरे से फ़ोन पर बात करते रहे। जैसे-जैसे समय बीत रहा था। वैसे-वैसे अंकिता के मन के ख्याल भी बदल रहे थे। मेरा प्यार हमारे बीच के आये दुरी से और बढ़ रहा था और गहरा हो रहा था। मैं अपने प्यार को पाने के लिए जी-जान से मेहनत कर रहा था वहीं दूसरी तरफ अंकिता का प्यार मेरे लिए कम हो रहा था। यह मुझे उसके बात करने के अंदाज़ से एहसास होता था और वो हमारे बीच आये दुरी से और दूर जा रही थी। प्यार तो सब करते हैं पर वो बहुत खुशकिस्मत होते हैं जिनको एक साथ पूरी  ज़िन्दगी गुज़ारने का मौका मिलता है और यह मौका बहुत कम लोगों को मिलता है। इसी बीच अंकिता ने एक दिन मुझे कह दिया कि वो अब आगे मेरे साथ नहीं रह सकती है। मैं बेज़ुबान की तरह उसकी बात सुनता रहा और रोता रहा। मुझे नहीं पता  था मेरा बचपन का प्यार अब बड़ा हो गया था उसके भी पर निकल आये थे। वो भी तरह-तरह के सपने देखने लगा था,उसकी आँखों ने भी बड़ी शहरो जैसे बड़े सपने देखने शुरू कर दिए थे। छ:साल का साथ छ:महीने की दुरी की वजह से ख़त्म हो गया था और मेरा पहला प्यार मुझसे दूर चला गया था। मैं बिल्कुल टूट गया था अपनी मंज़िल से भटक गया था।

मैंने खुद को सँभालने की बहुत कोशिश की पर मैं जितना अपने-आप को सँभालने की कोशिश करता उतना ही अपने आप को जिंदगी के सवालों में और अपने अतीत के यादों में उलझा हुआ पाता। ज़िन्दगी के जाल में उलझता रहा और खुद को सुलझाता रहा। सबकुछ हार कर भी जीत की कल्पना करता रहा। टूटकर, गिरकर, बिखरकर खुद को संभालता रहा। जब कभी दर्द बढ़ जाता दो-चार बूंद आँखों से निकल जाता क्योंकि कभी-कभी आँखों से आंसू आना भी अच्छा होता है। कुछ अश्को से होते हुए सपने निकल जाते हैं बिना दर्द दिए और कुछ दिल को भी सुकून मिलता है। सब के जीवन में कुछ पल असमंजस के आते हैं। ये वह पल था मेरे जीवन का जब मेरा प्यार मुझसे दूर चला गया। बस अपनी यादें और एहसास छोड़ गया था। मैं अपने प्यार को मंज़िल तक पहुचाने में कामयाब नहीं हो पाया इसलिए मैंने अपने प्यार को एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ दिया था। आहिस्ता-आहिस्ता समय भी चलता रहा और हम भी समय के अनुकूल चलते रहे। अपनी मंज़िल को छोड़कर अपने आप को सँभालते रहे। दिन गुज़रे, महीने बीते, साल बदल गए पर मैं आज भी उसी मोड़ पर खड़ा हूँ और अपनी मंज़िल से दूर पड़ा हूँ। मेरा पहला प्यार मेरे लिए एक कहानी बन गया और मैं उस कहानी को लिखने वाला एक कहानीकार बन गया।

एहसास स्कूल इंतज़ार

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