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डंडा चौथ
डंडा चौथ
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© Yogesh Suhagwati Goyal

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आज उन दिनों की सिर्फ कुछ धुंधली सी यादें ही रह गई हैं। बचपन में दोनों हाथों में छोटे छोटे से रंग बिरंगे डंडे होते थे, फिर अपने दोस्तों को इकठ्ठा कर ४ से ६ बच्चों की छोटी २ टोलियाँ बनाते थे और डंडे बजाते हुए अपनी गली मोहल्ले के हर घर में जाते थे। घर के सामने पहुँचकर सभी बच्चे मिलकर गाते थे और गुडधानी मांगते थे, बच्चों की मस्ती से त्यौहार का एक अलग ही माहौल होता था ।

खैरघडी जी खैरघडी, सासू छोटी बहू बड़ी

इत सासू पानी को जाये, उत बहू गिन्दोड़ा खाये

सासू गढ़े गढ़ाये रूपये ला, सब चट्टन को मिठाई ला, बच्चन को गुडधानी ला

इन्दर राजा पानी दे, पानी दे धानी दे, धानी दे गुडधानी दे

सभी घरों से बच्चों को खाने के लिये गुडधानी मिलती थी, डंडा चौथ के अवसर पर हर घर में गुडधानी ख़ासतौर से बनती थी। पारंपरिक रूप से गुडधानी, सिके हुए गेंहू को गुड की चाशनी में मिलाकर बनायी जाती थी। वहीँ कुछ एक समृद्ध घरों में सिके हुए गेंहू को चीनी की चाशनी में मिलाकर भी बनाते थे। देखने में गुड से बनी हुई गुडधानी थोड़ी काली सी और चीनी से बनी हुई एकदम सफ़ेद होती थी, शायद इसीलिए सभी बच्चों में सफ़ेद वाली गुडधानी की ज्यादा चाहत होती थी।

उन दिनों, यानि आज से करीब ६० साल पहले, गणेश चतुर्थी के पर्व को, लोक भाषा में, लोग डंडा चौथ के रूप में ज्यादा जानते थे और मनाते थे। उन दिनों में बच्चों की शिक्षा का आरम्भ डंडा चौथ के दिन से ही शुरू होता था। बच्चे छोटे छोटे डंडों को बजाकर खेलते थे, हिन्दुओं के प्रत्येक मांगलिक कार्य में, सभी देवताओं को पूजने से पहले, सर्वप्रथम गणेशजी का पूजन किया जाता है। गणेश पूजन से विद्या और बुद्धि की प्राप्ति तो होती ही है, साथ ही सारी विघ्न बाधाओं का समूल नाश हो जाता है।

महाराष्ट्र में शिवाजी महाराज के ज़माने से ही गणेश चतुर्थी के पर्व का विशेष महत्व है और ये पर्व ७ दिन तक मनाया जाता है। लेकिन बाकी और त्योहारों की तरह ही, धीरे धीरे अब ये पर्व भी पूरे देश में प्रचलित हो गया है महाराष्ट्र और उसके आस पास की जगहों को छोड़कर, बाकी पूरे देश में ये पर्व एक दिन का होता है। गणेश चतुर्थी का पर्व भादों के महीने में शुक्ल पक्ष के चौथे दिन मनाया जाता है । इसी दिन मध्यान्ह के समय गणेशजी का जन्म हुआ था, इस दिन गणेश पूजन करने का विशेष महत्व है ।

गणेश गुड चीनी

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