Quotes New

Audio

Forum

Read

Contests


Write

Sign in
Wohoo!,
Dear user,
इलायची
इलायची
★★★★★

© Jiya Prasad

Drama

15 Minutes   14.3K    26


Content Ranking

मुझे अपने स्कूल के दिन याद आ रहे हैं। सर्दियों वाले। सुबह-सुबह जगा दिया जाता था। रज़ाई में से ही पाँच मिनट और...पाँच मिनट और...बस उठ ही रही हूँ, वाली पंक्ति आज सोचकर अपने पर हंसी ही आती है। हम तीन बहनों में सर्दियों का मौसम मुझे ही बेकार लगता था। कई बार तो मैंने भगवान से शिकायत भी की कि इस मौसम को बनाने की क्या जरूरत थी! तुम्हें भी सर्दियों में स्कूल जाना पड़ता तो पता चलता! सभी के जगाने पर भी मेरी पाँच मिनट वाली मांग बनी रहती थी। लेकिन जैसी ही दादी की दहाड़ कानों में पड़ती वैसी ही मैं बिच्छू के डंक लगे जख्मी लड़की की तरह उछल पड़ती थी। मैंने कई बार इस बात की भी शिकायत की थी कि ऐसी दादी मुझे ही क्यों दी गई है। खुद की ऐसी दादी होती तो भगवान को भी अच्छी तरह पता चल जाता। सर्दियों में रविवार का दिन और इलायची वाली चाय, ये दोनों ही मेरी पसंद के दायरे में आते थे। रविवार को मुझे एक घंटे अधिक सोने की इजाजत प्राप्त थी क्योंकि उस दिन पिताजी घर में रहते थे और किसी भी प्रकार की दहाड़ घर में सुनने को नहीं मिलती थी। इसके अलावा सतुआ, मेरी बड़ी बहन जो घर के काम रविवार को संभाल लिया करती थी, भी रहती थी। शनिवार के दिन क्लास में बैठे बैठे मैं उन लोगों को कोटी कोटी प्रणाम करती थी जिसने रविवार को छुट्टी का दिन बनाया था।

पिता जी का इलायची का छोटा सा धंधा था जो घर में घुसते ही महक से हर किसी को पता चल जाता था। मुझे भी इलायची को देखकर ही बहुत खुशी होती थी। हल्का हरा रंग और उसमें महकते काले दाने मानो एक नई दुनिया सी दिखलाते थे। मैं इन दानों को इलायची के बच्चे कहकर पुकारा करती थी। घर में इलायची का भरपूर इस्तेमाल होता था। पिताजी को मुनाफा कमाने का शौक था या लालच नहीं पता, लेकिन उन्हों ने इलायची के साथ साथ कुछ ही दिनों में अन्य मसालों का धंधा भी छोटे धंधे में जोड़ लिया। इसलिए बहुत से साबुत मसालों का उस समय तक नाम और विवरण कुछ हद तक मुझे पता था। खाने में भी भरपूर मसाले झोंकें जाते थे। मसालों के मामले में हमारी आँख भले ही धोखा दे जाये पर घर के पूरे परिवार की नाकें धोखा नहीं देती थीं। या यूं कहूँ कि सूंघने के मामले में घर का प्रत्येक व्यक्ति हुनरमंद था। यही हुनर जन्म के साथ साथ मुझमें भी आ गया। और सूंघने का प्रतिशत मुझमें अधिक था क्योंकि स्कूल के बाद मेरा सारा समय मसालों के हिसाब किताब में गुजरता था। मुझे एक तरह से मुनीम बना दिया गया था। आसपास के घरों में किसी को मेरा असली नाम तक नहीं मालूम था। वे लोग भी मुझे मुनीम जी कहकर ही पुकारते थे।

इसके अलावा दादी को भी अदरक इलायची वाली चाय भाती थी। अगर बिना इनके चाय बन भी जाये तो वे पूरा घर सिर पर उठा लेती थीं। उनका खयाल था कि इन सब चीजों के असर पड़ते हैं। शरीर ठीक रहता है। सो मुझे भी यह बात खूब जम गई। बिना अदरक और इलायची के चाय नहीं पीती थी।

हमारा परिवार छोटा था। हम तीन बहनें घर में दृश्य होते हुए भी अदृश्य ही मानी जाती थीं। घर में रहते हुए भी हमारे हिस्से बहुत कुछ ऐसा नहीं था जिससे पता चल जाए कि इस घर में तीन लड़कियां सांस लेती हैं। बड़ी बहन का नाम सतुआ था। दादी ने ही रखा था। सतुआ को अपना नाम बेहद 'ओल्ड फेशन्ड' लगता था। बाक़ी बची हम दोनों बहनों के नाम नए जमाने से मैच करते थे। हम तीनों पर एक जोड़ी बूढ़ी आँखें जब तब पीछा किया करती थीं। यह सब बहुत गुस्सा दिलाने वाला भी होता था। कुर्ता भी सिलवाया जाता तब कॉलर लगवा दी जाती और आगे से बंद गला। 'तहजीब बंद कपड़ों में होती है'- दादी का यही कहना था। कभी ऐसा लगता था कि हम तीनों की कन्डीशनिंग हो रही हो। ज़ुबान भी उतनी खोलने की इजाजत थी जितने की जरूरत होती। ‘लड़कियां चुप रहते हुए ही अच्छी लगती हैं’- यह पंक्ति हमेशा कान से टकराया करती थी। लेकिन दादी औरत होते हुए भी बहुत बोलती थीं। उनकी आवाज़ का वॉल्यूम भी सामान्य से अधिक रहता था। न मालूम कहाँ से वे सीखकर सतुआ को इन सब से सबसे ज़्यादा चिढ़ होती थी। क्योंकि उसके कॉलेज का वक़्त भी दादी नोट किया करती थीं। एक मिनट इधर उधर हुआ तो घर में हाहाकार मच जाता था। सतुआ का हर खयाल बहुत ज़्यादा बड़ा होता था। उसका मानना था कि हम आसमानी उल्का पिंड थे। गलती से इस धरती पर ‘टपक’ गए हैं। जिस दिन बड़ी वाली आसमानी चुंबक हमें खींचेगी हम तुरंत उड़ते हुए अपनी अपनी जगह चले जाएंगे। इस कथा में मेरी दूसरी बहन छाया का उत्सुकता में पूछा गया सवाल सतुआ की आँख में किरकिरी जैसा ही होता था। “सतुआ, आसमान में पहुँचने के बाद क्या करेंगे? उल्कापिंड होना भी कोई ज़िंदगी है!” सतुआ इसके बाद नाक बनाती हुई जाती और कहती- “यहाँ सपनों की कोई कद्र ही कहाँ है!” इसके बाद मैं जाती हुई सतुआ को देखती और फिर बाद में छाया पर नज़र ले जाती। छाया का भी हाल सतुआ जैसा ही था। विद्रोही टाइप का। मेरा कुछ भी नहीं था। मैं बोलती ही नहीं थी। ...मुझे बोलना ही नहीं आता था। मुझे स्कूल जाना और घर में रहना आता था। हिसाब किताब करना आता था। सूंघना आता था। मेरी इस तरह की आदत दादी को पसंद थी। मुझे अपने घर में अपने ही लोग अजनबी लगते थे। इस अजनबियत को मैंने अपने अंदर समेट लिया था। जो कहा जाए वैसे करती थी। जो नहीं कहा जाता था वो नहीं करती थी। मैं पूरी तरह से आदर्श के खाके में फिट होने के लिए मुनासिब चरित्र बन ही चुकी थी। पर भला हो एक अजनबी औरत का जिसके चलते यह अनहोनी घटना होते होते रह गई। 

इन्हीं दिनों हमारे सामने वाले घर में एक औरत किराए पर रहने आई। उस घर के मकान मालिक दूसरी जगह रहते थे सो उस औरत ने वह पूरा घर ही किराए पर ले लिया। लंबा क़द था। रंग गेहुआँ था। काले बाल। एक दम सीधे। बड़ी बड़ी आँखों में मोटा काजल लगाती थी। नाक में मोती का लॉन्ग हुआ करता था। कट बाजू वाले सूट पहना करती थी। बिंदी लगाती थी लेकिन सिंदूर नहीं। इस बात पर गली में एकाद बहस भी हुई कि वह शादीशुदा है या नहीं। लेकिन किसी की हिम्मत नहीं हुई उससे से सीधे पूछने की। मुझे वह बहुत अच्छी लगती थी। इतना ही नहीं सतुआ भी उससे प्रेरित हुई तो काजल लगाने लगी। इस पर दादी ने कहा कि बड़ी लड़की के लक्षण ठीक नहीं लग रहे। तब पिताजी ने कहा कि काजल लगाने में क्या गड़बड़ है। दादी चुप तो हो गईं पर हम तीनों पर निगरानी और बढ़ गई। दादी का खयाल था कि हम उस नई 'बदचलन औरत' से ज़्यादा ही इंस्पायर्ड हो गए हैं। सब ऐसे ही चला रहा था। एक दिन घर में किसी के न रहने पर मुझे अखबार की जरूरत आन पड़ी। मैंने अपने घर के छज्जे से ही उनसे पूछा- “आपके पास आज का अखबार होगा?” वह मुस्कुरा कर बोलीं- “हाँ है। उसे लेने आपको मेरे घर में आना होगा।” अगले दस मिनट में मैं चुपके से उनके घर में थी। घर में प्रवेश करते ही पीले रंग से मुलाक़ात हुई। मुझे पेंट की महक आई। बहुत ताज़ा ताज़ा ही पेंट हुआ था। सीढ़ियों की दिवारों पर सुंदर सुंदर पैंटिंग्स टंगी थीं। सीढ़ियां एक बैठक के गुलाबी पेंट वाले कमरे में ले जाती थीं। वहाँ लकड़ी का एक चरमराया हुआ सोफा रखा था। लेकिन उसकी सजावट मिट्टी रंग के कुशन से ऐसे की गई थी जैसे कोई संगीत महफिल लगने की तैयारी चल रही हो। मैंने सीढ़ियों के पास ही खड़े होकर अखबार मांगा। उन्होने मुस्कुराते हुए कहा- “जानती हूँ मुनीम लोग बहुत बिज़ी लोग होते हैं। पर उन्हें चाय पीने का वक़्त निकाल लेना चाहिए।” मैंने थोड़ा शर्माते हुए कहा- “आपको भी पता चल गया।...मैं फिर कभी आ जाऊँगी। अभी तो बस अखबार दे दीजिये।” उन्हों ने जिद्द की। मुझे चाय के लिए बैठाकर कर वह बैठक के दाई ओर बनी रसोई में प्रवेश कर गईं। रसोई की दीवारों का रंग सफ़ेद था।

दो कप चाय लाते हुए वे मेरा नाम पूछने लगीं। मुझे खुद दो मिनट इस बात को सोचते हुए लग गए कि मेरा नाम मसाला है, मुनीम है या फिर रोल नंबर 33। उन्हों ने दुबारा पूछा- “नाम क्या है आपका?” मैंने अपने पैरों पर बल देते हुए और सिर नीचे किए ही तारा कहा। वो तुरंत मज़ाक में बोलीं- “अरे वाह! तुम धरती पर क्या कर रही हो? तुम तो आसमान की रहने वाली हो।” मैंने कुछ कहने की बजाय मुस्कुराना ठीक समझा। मेरे पास कहने को कुछ था ही नहीं। मैंने धीरे से अपने हाथ कप की तरफ बढ़ाए। चाय में से इलायची की महक आ रही थी। मैंने सूंघते हुए कहा- “आप भी इलायची वाली चाय पसंद करते हो?” वो फिर अखबार खोजते हुए बोलीं- “हाँ। मुझे पसंद है। मुझे इसकी महक अच्छी लगती है।” महक का नाम आते ही मैंने अपने कपड़ों में से मसालों की महक को एक बदबू की तरह पाया और मन ही मन शर्मिंदा हुई। मैंने अपने कपड़ों को सूंघा। मुझे उबकाई आई। मैंने उनसे और ज़्यादा बात नहीं की। वापस लौट आई।

इसके बाद अगली बार उनके यहाँ किस कारण जाना हुआ यह याद नहीं। लेकिन जो बात याद रही वह यह थी कि उनके निजी कमरे का रंग आसमानी था। मैंने कुछ देर के लिए अपनी आँख बंद की तब मुझे उल्का पिंड अपने चारों तरफ घूमते हुए दिखाई दिये। गुब्बारों से भी हल्के। जब उन्हों ने मेरा नाम पुकारा तब मेरा ध्यान टूटा और मैं अपने चारों तरफ हैरानी से देखने लगी। खुद में सवाल किया उल्का पिंड कहाँ गए!

पहली बार आसमान को किसी कमरे में पाया। मैं वह कमरा कभी भूल नहीं सकती। मुझे आज भी उस कमरे की रोशनी का शीतल अहसास है। वहाँ खूबसूरत चित्र थे। मैं हैरान थी। मैंने पूछा- “आप क्या करती हैं?' इस सवाल पर वह मेरा हाथ पकड़ कर एक ऐसे कमरे में ले गईं जहां सभी रंगों को मिक्स करके दीवारों में पुताई हुई थी। वहाँ एक अधूरी पेंटिंग को पूरा करने की तैयारी चल रही थी। और पूरे कमरे में बने हुए तरह तरह के चित्र रखे हुए थे। मुझे कुछ पल को हैरानी हुई।

मैंने चित्रों पर नज़र फिराते हुए पूछा- “आप इतने रंगों में कैसे रहती हैं? आपके सिर दर्द नहीं होता?”

वो अपनी आदत की तरह मुस्कुराते हुए बोलीं- “जब आपका जिसमें मन रम जाता है तो आप वही हो जाते हो। मन रमा तो राम भी बन सकते हो। जो न लगा तो वही बनते हो जो बाकी लोग हैं। मशीन!”

मैंने मुंह में कड़वा सा कुछ महसूस किया और दूसरा छोटा सवाल पूछा- “कैसे?”

रसोई में जाते हुए वह बोलीं- “दुनिया रंगती हूँ।...इलायची वाली चलेगी?” मैंने कहा- “हाँ, बिलकुल।” 

वो आगे बोलीं- “मशीनों को देखा है...कैसे एक जगह बैठी रहती हैं। जो बटन दबाया जाता है वैसे ही वे काम करती हैं। उन्हें देखकर मुझे ऊब आती है। बात तो यही है कि आज़ादी की महक को आजमाना चाहिए। हमें यह तय करना चाहिए कि हम मशीन बनेंगे या फिर वो जो हम बनना चाहते हैं। मैंने पेंटर बनने का इसलिए नहीं सोचा कि यह मेरा पेशा है। बल्कि इसलिए क्योंकि यहाँ किसी की रोक टोक नहीं होती। जो मन आए वो करने की आज़ादी मिल जाती है जो बाहर की दुनिया में नहीं मिलती।”मुझे उनकी बात समझ नहीं आई। मैंने अगली बार उनसे फिर मिलने का वादा किया और लौट आई। मुझे उनसे मिलना और बात करना अच्छा लगने लगा था। मुझे नहीं पता उनके रंगों का सम्मोहन था या फिर कुछ और था। यह तय था कि वह कमाल की औरत थीं जो किचन के लिए नहीं बनी थीं। वो अकेली ही रहती थीं। उनके यहाँ कुछ लोग आते थे जो उनके चित्रों के संबंध में आते थे। कुछ लोग तो मेरे सामने भी आते थे जो एफ. एन. सुज़ा से लेकर विंसेंट वॉन गोग जैसे नाम लेते थे। उस वक़्त ये नाम मुझे अजीब लगते थे। जब इनके बारे में सतुआ से पूछा तो उसने बताया कि ये नामी चित्रकार हैं।

सतुआ और छाया को जब इनके बारे में बताया तो उन दोनों में भी उस औरत से मिलने की ललक जग गई। इसी बीच सतुआ अपने कॉलेज के किताबघर से एक किताब लाई थी। उस किताब का नाम ‘एकांत के सौ वर्ष’ था। उसकी पढ़ने की आदत से हम दोनों बहनों को बहुत फायदा होता था। उसे लगभग हमारे हर सवाल का जवाब मालूम होता था। और वह न मालूम होने पर भी हमारे सवालों के जवाब खोज खोजकर बताया करती थी। उस दिन मैंने ‘एकांत के सौ वर्ष’ जैसा नाम के पीछे के कारण को जानना चाहा तब उसने किताब की कहानी टूटी फूटी तरह से हम दोनों के आगे परोस दी। उसने बहुत सारे किरदारों के नाम लिए और उनमें से एक रेमेदियोस के बारे में बताया जो बहुत सुंदर थी और एक दिन अचानक आसमान में चली जाती है...उड़कर। मैंने इस किरदार को कुछ इस तरह से समझा जैसे सतुआ की हमारे उल्का पिंड होने की कहानी। मुझे अब उसकी बात पर यकीन हुआ कि हम तीनों इस धरती के नहीं हैं। यहाँ ढेर सारे दरवाजे हैं जहां हर वक़्त ताला ही लगा रहता है। तालों के पीछे का कारण चोरी नहीं हैं बल्कि कोई लड़की घर से न बाहर चली जाये, यही इकलौती वजह थी।   

कुछ दिनों बाद एक दिन आया। जाने क्यों? सुबह सुबह भयानक शोर घर में दस्तक दे रहा था। कहीं बहुत झगड़ा हो रहा था। छज्जे से झाँका तो वही औरत बीच में बहुत गुस्से में खड़ी थी और आसपास बहुत लोग खड़े थे। इतने में उसके मकान मालिक भी आ गए। ...मैंने बहुत कोशिश की कि मुख्य मुद्दे को सुना और समझा जाये। पर पीछे से दादी ने एक तेज़ आवाज़ हम तीनों पर धमाके के साथ फेंक दी। हम डर गए। ...पापा ने जो खबर हमें दी वह यह थी कि गली के कुछ लोगों को उसके अकेले रहने से परेशानी थी। इसके अलावा उसके काम के बारे में किसी को मालूम नहीं था। सबका खयाल था कि वह कोई गलत काम में शामिल है। ऐसी औरत का गलत प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए उसे घर खाली करने को कहा गया है। मैंने इस बीच यह कहा कि वह तो एक पेंटर है। चित्रकारी करती है। इतना ही कहना था कि दादी टूट पड़ीं। उस दिन वो न जाने क्या क्या बोलती रहीं। मुझे सिर्फ एक पंक्ति ही याद है। यह लड़की तो भाग जाएगी एक दिन। मैंने इसे सुनकर मन में कहा- “हम्म ...रेमेदियोस की तरह। मैं आपके यहाँ नहीं रहूँगी। मुझे घुटन होती है। बहुत!” इसके बाद मैंने इलायची के रखे पैकटों को गिनने काम शुरू किया और कई घंटें लगातार करती रही। इलायची की महक मेरे अंदर घुसती रही। सतुआ के जबरन उठाने पर ही खाने के लिए उठी। ...कुछ दिनों बाद एक बड़ा ट्रक आया जिसमें उस औरत का सामान रखा गया। जाते जाते उन्हों ने हल्की गर्दन ऊंची की और मेरी तरफ देख कर मुस्कुरा दीं। वो चली गईं। अंदर दादी ने हुकुम दिया कि चाय बनाओ, इलायची वाली। रसोई में मैं दो तीन इलायची कूटने लगी। एक बहुत तेज़ महक उठी और साँसों के सहारे मेरे अंदर फिर घुस गई...दिमाग तक पहुँच गई। मुझे भयानक चक्कर आए। पर जल्दी ही ठीक हो गई।

दिन ऐसे ही बीत रहे थे। इस बीच एक ऐसी घटना घटी जिससे मैं और सतुआ खुश हुए पर पिताजी और दादी को बड़ा सदमा लगा। छाया किसी के साथ घर छोड़ कर जा चुकी थी। ये बात पूरे मौहल्ले में दादी के लाख छुपाने के बाद भी लीक हो चुकी थी। छाया की बात हम दोनों से होती रहती थी पर इस बात का पता घर के बाकी दो लोगों को नहीं मालूम था। कुछ दिन पिताजी के सीने में दर्द की शिकायत रही और अंत में उनका दर्द यह कहकर गया कि आज से वो हमारे लिए मर चुकी है।

अब हम दोनों ही अपनी बातों का बंटवारा करते। सतुआ का सपना बड़ा अजीब था। उसका कहना था कि वह सपने बेचने का काम करेगी। जो बच्चा या औरत- आदमी जिस तरह के सपने देखना चाहेंगे वह वही उनको बेचा करेगी। मसालों से कितनी गंदी महक आती है। इसलिए वह इन सब से दूर महकदार सपने बेचा करेगी जिसमें भीनी भीनी महकें आया करेंगी। उसकी इस बात पर मैं बहुत देर तक हंसा करती थी। तब तक जब तक आँखों में पानी न आ जाए। इसके बाद पलट कर वह अपनी बड़ी आँखों में शरारत लाते हुए पूछती- “तारा, तू बता... तू क्या बनेगी?” ...मैं बिना सोचे समझे झट कहती- “इलायची!” इस पर वह हंस कर कहती- “तब तो दादी तुझे कूट कूट कर चाय में घोल घोल कर गट कर जाएंगी।” ऐसे ही बात कर के हम आधी रात करते और सुबह फिर उठ जाते मशीन बनने की तैयारी में। ये हमारे अच्छे दिन थे। और हम दोनों ने चाहा कि ये दिन रुके रहें पर ऐसा नहीं होता। सतुआ की शादी आनन-फानन में तय हुई। कुछ दिनों बाद ही दादी के कहे अनुसार सतुआ को निपटा दिया गया। उसकी पसंद को पूछे बिना या फिर जाने बिना। सतुआ में मौजूद विद्रोही स्वभाव को पिताजी ने अपने दो आंसुओं से लगभग समाप्त कर दिया था जिसका पता मुझे सतुआ के बताने पर चला कि पिताजी ने उसे अपना वास्ता देकर शादी के लिए मनाया है। उनको इस बात का डर था कि कहीं सतुआ भी छाया की तरह घर से न चली जाये। सतुआ की शादी के बाद फोन पर होने वाली बातचीत में वह जरा भी खुश नहीं मालूम होती थी। कई बार वह मेरी बीमारी का बहाना बनाकर हमारे पास कई दिनों तक रहती थी। मुझे उसके लिए बीमार होना पसंद भी था। इस पर भी दादी की नज़र पड़ी और उसने आना लगभग बंद कर दिया।

बहुत दिनों तक उसका हाल नहीं पता चला। उसने मुझसे भी बात करना लगभग बंद कर दिया। एक रोज़ फोन की घंटी बजी और पता चला कि सतुआ के साथ दुर्घटना घटी है। वह लगभग पूरी तरह से जली अवस्था में अस्पताल में मेरी आँखों के सामने पड़ी हुई थी। उसने कुछ बोलने की कोशिश भी की पर हम जान ही नहीं पाये कि आखिर क्या कहना चाह रही है। वह मर गई। मेरे सामने। मैंने रोते हुए आँखें बंद कीं। मुझे दिखा कि वो उल्का पिंड बनी हुई धीरे धीरे धरती से ऊपर उठ रही है। उसे कोई चुंबक खींच रही है। जाते हुए उसने कहा- “देख, मैं न कहती थी कि हम इस धरती के नहीं हैं।”   

कई दिन बीत गए। सर्दियाँ आईं। मुझे चाय बनाने का हुक्म हुआ। मैंने इलायची कूटना शुरू किया और न जाने एक जहरीली महक मेरे दिमाग पर चढ़ी और उल्टी होने लगी। बहुत उल्टी हुई। इसके बाद मुझे याद नहीं कि क्या हुआ। मुझे जब होश आया तब सिर दर्द से फट रहा था। दादी को लगा कि मुझ पर किसी हवा का साया है। सो एक ताबीज़ बनवाकर गले में डाल दिया। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। रात के समय में मेरे कमरे में रोशनी उतर आती। खूब सारे उल्का पिंड और इनके साथ ही सतुआ, छाया और वह औरत धीरे धीरे आसमान से उतरतीं। फिर जो बातों का सिलसिला चलता तो सुबह होने पर ही समाप्त होता। वह औरत पेंटिंग बनाती। सतुआ अपने साथ हमारे फर्माइशी सपने लाती। छाया और मैं दर्शक बनते। कुछ दिनों बाद यह खबर फैली कि तारा पागल हो गई है। मैंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया। हालांकि मुझे अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया था। फिर भी मैंने अपने पागल होने पर कभी यकीन नहीं किया।  

महक रंग सपने आसमान घुटन

Rate the content


Originality
Flow
Language
Cover design

Comments

Post

Some text some message..