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© Jaya Mishra

Drama Inspirational Romance

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सुबह से बारहवीं बार शाबाद का फोन आया और शैलजा ने एक बार फिर से जी कड़ा कर फोन को साइलेन्ट पर डाल दिया। प्लीज पिक द फोन के मेसेज भी वाट्सएप पर कई बार आ चुके थे।

"क्या बात है शैली किसका फोन है, बात क्यों नहीं कर लेती ?"

"कुछ नहीं पापा ऐसे ही कोई खास फोन नहीं है।"

पापा के पूछने पर शैलजा वापस किचन में जा कर शाम के खाने की तैयारी करने लग गई। आज मां भी नहीं थी घर पर जिनके साथ वह अपनी हर प्रोब्लम साझा करती थी। पर ये दोराहा ऐसा था जिसमें से उसे खुद ही एक राह चुननी थी। एक तरफ उसका पहला प्यार साबू और आने वाली नई जिंदगी और दूसरी तरफ उसकी अपनी पहचान। शाबू के बिना रहने की तो वह एक पल की कल्पना नहीं कर सकती थी तो क्या उसके बिना पूरी जिन्दगी बिता सकेगी ? क्या मां पापा जल्दी ही शादी के लिए दबाव नहीं डालेंगे ? तो क्या करेंगी उनकी पसंद के लड़के से शादी कर लेगी ? और फिर उस रिश्ते को दिल से स्वीकार कर पाएगी ? उस दिल में जहाँ हर कोने में साबू बसा है, कोई और कैसे बस पाएगा ? इससे तो अच्छा है कि शाबाद के साथ ही आगे बढ़े। लेकिन... लेकिन ये लेकिन कहाँ से आ गया उन दोनों के बीच में, नहीं मुझे एक बार फिर से शाबाद से बात करनी चाहिए। कितना प्यार करता है मुझसे। मेरी बात जरूर समझेगा। फिर ही मां पापा से बात करूंगी। मुझे पूरा यकीन है वो मेरा साथ जरूर देंगे। हमारे प्यार को समझेंगे। यही सब सोचते सोचते शैलजा अतीत में गोते लगाने लगी।

शाबाद और शैलजा जैसे मेड फाॅर इच अदर। बहुत गहरा प्रेम था दोनों में। तीन साल पहले कालेज के अंतिम वर्ष में शुरू हुई दोस्ती ने कब प्यार का रंग ले लिया पता ही न चला पर शादी का फैसला अपने केरियर के सेट होने तक टाल दिया था। या यूँ कह ले कि इस बारे कभी खुल कर चर्चा ही नहीं की।

शैलजा को कभी-कभी इस रिश्ते को लेकर डर भी लगता कि अलग-अलग धर्म से होने के कारण ये रिश्ता आगे कैसे बढेंगा, पर फिर यह सोच कर निश्चिंत हो जाती कि जब हम दोनों साथ है तो दुनिया से क्या डरना।

वैसे शैलजा का परिवार खुले विचारों का था। उसे शुरू से अपना जीवनसाथी खुद चुनने की आजादी दी गई थी। घर में सामान्य पूजा पाठ का माहौल था, सभी धर्मों को आदर देने के संस्कार भी उसने अपने परिवार से पाए थे। यही कारण था कि अपने इस रिश्ते को लेकर शैलजा ने काफी सपने देख लिए थे।

आखिर वह दिन भी आया जब शाबाद को एक मल्टीनेशनल कम्पनी में जाॅब मिल गया और इधर शैलजा ने भी एक बैंक में जाॅब हासिल कर ली। दोनों शायद एक दूसरे के मॉरल सपोर्ट के बिना ये मुकाम हासिल नहीं कर पाते।

कितना टूट गई थी शैलजा जब पहली कोशिश में वह बैंक कम्पीटिशन पास नहीं कर पाई। उसने तो उम्मीद ही छोड़ दी थी कि अब वह कभी जाॅब कर पाएगी। रात दिन एक किए थे इस एक्जाम के लिए। पता नहीं कहाँ कमी रह गई।

शाम को जब शाबाद उससे मिलने उसके घर पहुँचा तो पापा ने बोला "बेटा अब तुम ही इसे समझाओ सुबह से रो रो कर हाल बेहाल कर रखा है इस लड़की ने। हम सब समझा समझा कर थक गये। पगली है बिल्कुल। तुम अच्छे दोस्त हो उसके शायद तुम्हारी बात समझ जाए।"

"जी अंकल मैं कोशिश करता हूँ।"

"कम ऑन शैली ये आंसू यूँ मत गँवाओ, बल्कि इन्हें तो तुम्हारी ताकत बनना है। हम फिर से कोशिश करेंगे। और फिर ये तो तुम्हारा पहला कम्पीटिशन था, जीवन में और बहुत इम्तिहान आएंगे, तुम ऐसे हार नहीं मान सकती।"

शाबाद के प्यार और हौसले ने फिर से शैलजा को ताकत दी और वो दोगुने उत्साह से एक्जाम की तैयारी में लग गई। कुछ दिनों बाद फिर से बैंक की वैकेंसी आई और अब की बार शैलजा सेलेक्ट हो गई। उससे ज्यादा तो शाबाद खुश था। शाबू भी तो जब कही भी इन्टरव्यू के लिए जाता तो उससे मिल कर जरूर जाता। अपना गुडलक चार्म कहता है उसे।

इसी उधेड़बुन में कब शाम से रात हो गई शैलजा को पता ही नहीं चला। रात को फिर शाबाद का फोन आया। इस बार शैलजा ने मन मजबूत कर शाबाद से बात करने की सोची। अब मन से सारी ऊहापोह खत्म हो चुकी थी।

"हेलो "

"थैंक गोड, तुमने फोन उठाया तो सही। और ये क्या बचपना है कितनी फिक्र हो रही थी मुझे तुम्हारी...।"

"अच्छा जी, फिक्र हो रही थी ! तो घर भी तो आ सकते थे मिलने के लिए।" शाबाद की बात को बीच में काट कर शैलजा बोली।

"हाँ, आ सकता था पर मैडम के गुस्से से डर लगता है। अच्छा , तुमने हमारी शादी के बारे में बात की अंकल से। क्या कहाँ उन्होंने, जानता हूँ मना तो कर ही नहीं सकते अपना दूसरा बेटा मानते है मुझे।" शाबाद ने माहौल को हल्का करने की कोशिश की।

"ठीक है... , ठीक है..., मुझे लगता है शाबू हमें कहीं बैठ कर बात करनी चाहिए। फिर ही मैं मम्मी पापा से बात कर पाऊंगी। अभी कुछ है जो साफ होना चाहिए।"

"क्या बात है शैली, तुम इतना सीरियसली क्यों बात कर रही हो ? क्या घर वाले नहीं मानेंगे ?"

"ऐसी बात नहीं है शाबू । कहीं न कहीं पापा मम्मी हमारे रिश्ते को समझते हैं और उनकी मौन स्वीकृति भी मैं महसूस करती हूँ पर..."

"पर क्या शैली ?"

"पर ...छोड़ो। क्या हम कल मिल सकते है ?"

"ठीक है, कल मिलते हैं सेन्ट्रल पार्क में। तुम्हारे लंच टाइम में।"

दूसरे दिन शैलजा सेन्ट्रल पार्क पहुँची तो शाबाद पहले से मौजूद था।

"आइए मल्लिका ए हुस्न, हम कब से आपकी राह तक रहे हैं। तो बताइए क्या तकलीफ हुई हमारी मल्लिका को।"

शाबाद के इस अंदाज ने शैलजा के होठों पर मुस्कान बिखेर दी।

कुछ देर इधर-उधर की बात करने के बाद शैलजा बोली, "शाबाद मुझे हमारे प्यार पर पूरा भरोसा है पर मुझे नहीं लगता कि तुमसे शादी करने के लिए मुझे इस्लाम कुबूल करना चाहिए।"

"ये कैसे हो सकता है शैलजा तुम हिन्दू हो और मैं मुस्लिम। भविष्य में क्या होगा। किस किस को जवाब दोगी तुम। और फिर तुमने ही तो कहा है इस्लाम बहुत ही प्यारा धर्म है।"

हाँ है, और संसार का हर धर्म अच्छा होता है। क्या तुमको नहीं लगता कि हिन्दू धर्म भी इस्लाम जितना ही पाक है। रूहानी है। मेरे घर की हर पूजा में त्योहार में तुमने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया है।"

"हाँ तो मैंने कब कहा कि हिन्दू धर्म बुरा है, पर तुम समझने की कोशिश क्यों नहीं करती। हमको साथ रहना है, यदि हम अलग-अलग धर्म को मानेंगे तो बहुत झोल हो जाएगा। और तो और अम्मी को भी बड़ी मुश्किल से मनाया है मैंने। वो इसी बात पर राजी हूई है कि शादी के बाद तुम इस्लाम कबूल कर लोगी। तुम्हारा तो प्यारा सा नाम भी सोच लिया है उन्होंने, शबनम।"

"तो ठीक है शाबू, इस झोल से निकलने का एक और उपाय है मेरे पास।"

"और क्या है वो उपाय।"

"क्यों न तुम हिन्दू बन जाओ।"

"ये क्या कह रही हो तुम ? ऐसा कैसे हो सकता है ? माना मैं हिन्दू धर्म की भी इज्जत करता हूँ, पर सारी जिंदगी तुमको मेरा साथ रहना है। तुम्हे हमारे रीति रिवाज निभाने है।"

"नहीं शाबू, मुझे तुम्हारे साथ साथ नहीं रहना है बल्कि हमें एक-दूसरे के साथ रहना है। हां, बहू होने के नाते मुझे बहुत सी जिम्मेदारियां निभानी पड़ेगी, पर दामाद होने के नाते कुछ परम्पराओं को तुमको भी तो निभाना होगा।

जब मैं तुमसे उम्मीद नहीं करती कि तुम शाबाद से शेखर बन जाओ तो मुझसे शबनम बनने की उम्मीद क्यों की जा रही हैं।"

"बल्कि हमारा यह रिश्ता इसी रूप में ज्यादा प्यारा और मजबूत होगा। जब हमारे बच्चे होंगे तो वे भी दोनों धर्मों को अच्छे समझ पाएंगे। तुम उनको नमाज़ अता करना सिखाना और मैं आरती करना। और तो और मैंने तो सोचा है कि हमारी शादी में जब तुम बारात लेकर आओगे तो पहले हम एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर पवित्र अग्नि के सात फेरे लेंगे फिर मौलवी साहब हमारा निकाह पढ़वाएंगे।"

" तुम जो कह रही हो वो कल्पना में अच्छा लगता है हकीकत में ये संभव नहीं। अगर तुम मुझसे प्यार करती.... और फिर क्या फर्क पड़ जाएगा शैलजा या शबनम में ... ठीक है बाहर तुम अपना नाम मत बदलना बस घर में अम्मी पापा और बाकी रिश्तेदारों के लिए तो तुम शब ....।

तुम्हें तो पता ही है आरती और बूत परस्ती हमारे घर में संभव नहीं है। तुम चाहो तो हम हर हफ्ते मंदिर चले जाया करेंगे। मैं खुद ले जाऊंगा तुमको मंदिर। क्या तुम मेरे लिए बस इतना नहीं कर सकती ? बस इस्लाम ही तो कबूल करना है।

आज तुम्हें मुझमें और अपनी जिद में से किसी एक को चुनना है। मैं जानता हूँ मेरी प्यारी शैली मेरी बात जरूर समझेगी।"

"नहीं। हर्गिज नहीं।" शैलजा ने बहुत ही कड़े लफ्जों में कहा। "तुम वो शाबाद नहीं जिसे मैं जानती थी, मैं प्यार करती थी।

तुमने तो मेरे सारे अस्तित्व को ही दाव पर लगा दिया। नहीं शाबाद, मैं जो हूँ जैसी हूँ वैसे ही रहूँगी। मेरा अपना व्यक्तित्व है ,कुछ मान्यताएं हैं जीवनशैली है। तुम उन सभी को बदलने को कह रहे हो। हां शादी के बाद थोड़ा बहुत हर लड़की बदलती है, पर तुम तो मुझे पूरी तरह बदलना चाहते हो।"

"तुमने एक बार सही कहा था, जिन्दगी में अभी बहुत से इम्तिहान आएंगे। आज अगर में तुम्हारी जिद के आगे झुक गई तो शायद कभी खुद से आँख नहीं मिला पाऊँगी।"

"चलती हूँ, ऑफिस का लंच टाइम खत्म होने वाला है।"

"सोच लो शैली हम आज के बाद फिर कभी नहीं मिलेंगे, मेरी तरफ से रिश्ता यही खत्म समझना।

अभी भी वक्त है रुक जाओ और मेरी बात मान लो। हम बहुत खुश रहेंगे।"

"गुड बाय, मिस्टर शाबाद। फिर कभी न मिलने के लिए।"

आज शैलजा को पहला प्यार टूटने का दुख तो है पर उससे ज्यादा सुकून है एक बोझिल रिश्ते बाहर निकलने का।

रिश्ता प्यार मजहब

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