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वह कौन थी ?
वह कौन थी ?
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© Anita Purohit

Drama

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घाटगेट बस स्टाप से जरा कुछ पहले ही वह बस में दाखिल हुई थी। रोज की अपेक्षा अंदर भीड़ कुछ कम थी। ज्यादातर जनानी सवारियां ही थीं। मिनी बस के बेरहम धक्कों के बीच किसी तरह अपने को थामे, जगह की तलाश में उसने इधर-उधर निगाह दौड़ाई। कोई सीट खाली नहीं थी। एक निराशा भरी उच्छवास ले वह बस के धक्कों और किसी अन्य से टकराने से खुद को बचाने लगी। कुछ ऐसा था जो उसे निरंतर पीड़ा दे रहा था।

कोई चौदह की उम्र। मगर उस वय की अल्हड़ता की जगह उसके चेहरे पर वेदना की लकीरें थीं। हल्के आसमानी रंग की चौकड़ी का मैला सा स्कर्ट पहने थी वह। उस पर डला सफेद स्कूली शर्ट आपस में मेल नहीं खा रहे थे। उस पर अंग्रेजी फैशन में कटे उसके बॉब-कट बाल, बार-बार लहरा कर उसके पतले चेहरे के सामने आ रहे थे, उसके व्यक्तित्व को और उलझाते हुए। एक अदा के साथ वह उन बालों को पीछे झटक देती थी। लेकिन हवा का सहारा लेकर वे फिर उसके गालों से आ लगते। जिन्हें झटक कर वह फिर पीछे कर देती।ऐसा करते उसके बदन में एक लोच पड़ती और पैरों में पड़े ऊँची एड़ी के सैंडिल खटखटा उठते जो किसी अभिजात वर्गीय स्टाम्प की तरह उसके पॉंव से चिपके हुए थे। उनके ऊपर की नंगी पतली टाँगों पर जहाँ तहाँ फोड़ों का एक जंगल सा बिछा था जिन से रिसता मवाद उसकी पीड़ा की कहानी आप ही कह रहा था। गौर से देखने वह उस सुन्दर इमारत की तरह दिखाई दे रही थी जिसे दीमकों ने चाट कर खंडहर कर दिया हो।

यूँ उसकी ये दशा उसकी संपन्नता का अहसास तो नहीं कराती थी, मगर किसी अभिजात वर्गीय बाला की तरह सा उसका आचरण चौंकाने वाला था। इसमें साथ दे रहा था उसके कंधे से लटका, वेलवेट का वह खूबसूरत-सा पर्स जो बस के धक्कों के साथ इधर-उधर डोल रहा था। बड़ी ही नफासत से उसे पकड़ वह अपने हाथों से दबा देती, मानों वह कोई छोटा बच्चा हो, जिसे बस के धक्कों से पहुँची पीड़ा पर सहलाना जरूरी हो।

टॉंसपोर्ट नगर पर एक सवारी के उतरते ही उसके बगल वाली सीट खाली हो गई। उसे लेने वह तेजी से लपकी। इस प्रक्रिया में उसका पॉंव पास बैठी एक संभ्रांत बाला के पैर से जा टकराया। हालांकि दोष उस बाला का नहीं था फिर भी वह उस से उलझ पड़ी। "ओह..., क्या समझ रखा है अपने आप को। बड़ी मेम बनती है। अरे, इंसानियत नाम की कोई चीज भी है तुममें। मुझे क्या जानवर समझा है जो जानबूझ कर टॉंग मार दी। अरे, तेरे जैसी स्या.....।** उसे पीड़ा हो रही थी यह तो साफ था, मगर उसके ये तेवर देख वह बाला कुछ सहम सी गई। अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिये उसने कुछ कहना चाहा, लेकिन पास वाली सवारी ने उसे रोक दिया।

इस घटना के बाद यकायक ही वह बस में सबकी नजरों का केन्द्र बन गई। उसके हाव-भाव और क्रिया कलाप सब के लिये कौतूहल का विषय बन गए। सवारियां उसे लेकर खुसुर-पुसुर करने लगीं। इन सब बातों का आभास धीरे-धीरे उसे भी होने लगा। उसे लगा जैसे वह एक मकड़ जाल में उलझ गई है। जितना वह उसकी गिरफ्त से छूटने की कोशिश करती उतना ही उसमें उलझती जाती। आस-पास की जिज्ञासा से अपने को बचाने के लिये वह अजीब-अजीब हरकतें करने लगी। कोई उसे पागल समझ रहा था। कोई कुछ और....। इस से परे अपनी कल्पना में कोई उसकी कुछ अलग ही तस्वीर खींच रहा था।

सवारियों की उन सवालिया निगाहों से अब उसे घबराहट होने लगी थी। इस घबराहट में वह बार-बार अपने कीमती पर्स से एक मटमैला रूमाल निकालकर अपने माथे पर छलछला आई पसीने की बूंदों को पोंछती। ऐसा कर वह शायद अपने आस पास की सवारियों को यह जतलाना चाह रही थी कि वह भी एक संपन्न, सलीकापसंद लड़की है लेकिन उसका वह पर्स खुलते ही उसकी संपन्नता का वह राज भी खोल गया, जिसे वह अपनी अदाओं के जरिये बतलाना चाह रही थी।

पर्स के अंदर चंद मुड़े-तुड़े कागज, कुछ रुपये और रेजगारी थी। एक घिसी हुई सस्ती लिपिस्टिक के अलावा उसमें एक मैल से सनी फेस पाउडर की डिबिया भी थी। ये सभी बातें मिलकर उसकी शख्सियत के एक ऐसे काले पहलू की ओर संकेत कर रही थी, जिस पर उसकी कम उम्र को देखते यकीन करना मुश्किल था।

एक रहस्यमय आवरण में लिपटी वह अपने आसपास के लोगों के लिये पहेली बन गई थी। बार-बार वह यही जतलाने की कोशिश कर रही थी कि वह उन सबसे अलग नहीं है। उनमें से ही एक है। एक नकली कोशिश....। उधर दूसरी तरफ इस रहस्य भी पहेली का हल खोजने की बेताबी और बढ़ने लगी थी। सभी सवारियां टकटकी बांधे उसे घूर रही थीं। माने नजर हटते ही उसकी सच्चाई हाथों से फिसल जाएगी।

उनकी इस हरकत से उसे बड़ी असुविधा हो रही थी। उनकी आवाज की हल्की सुगबुगाहट, घूरती निगाहें, होठों में दबा परिहास। इन सबसे उसे झुंझलाहट होने लगी थी। अपनी अकुलाहट में कभी वह अपने हाथों को मसलती कभी सीट के आगे पीछे होती। जल्द बहुत जल्द वह उस माहौल से दूर हो जाना चाहती थी। एक अज्ञात-सा भय भी उस पर काबिज था। लगता था जैसे अपनी पहचान को छिपाना चाहती हो। लेकिन क्यों ? इस सवाल का जवाब अभी ढूँढ़ना शेष था।

यूँ देखा जाए तो उसमें कुछ खास ऐसा नहीं था जिस पर गौर करना जरूरी हो। इक हरा बदन, कटे बालों के बीच अटका पतला सा चेहरा, मैले कपड़े, गोद में पड़ा वह कीमती पर्स और फोड़ों से भरी पतली टाँगें। हाँ, मगर उन उभरे फोड़ों, उनसे रिसते मवाद और उसके अपने आपके बीच कोई न कोई गहरा रिश्ता था जरूर। शायद दर्द का, जिसे वह ही बेहतर जानती और समझती होगी।

बड़ी ही बेसब्री से वह अपने स्टाप के आने का इंतजार कर रही थी। उसके चेहरे की परेशानी और अकुलाहट इसकी गवाही दे रहे थे। इस बीच बस हमेशा की तरह झटके के साथ बर्फखाना स्टाप पर आकर रुकी। शायद यही उसकी मंजिल थी। मुक्ति और राहत की एक क्षणिक रेखा उसके चेहरे पर चमक डाल कर बुझ गई। अपने-अपने को संयत कर वह तेजी से उठी और बाहर निकलने लगी। जल्दबाजी में उतरते उसका पाँव बस में चढ़ती एक सवारी से टकरा गया और घुटने के नीचे पके हुए फोड़े से खून रिस आया। गहरी पीड़ा से काँप उठी वह। बस के अंदर इतनी देर से समेटी हुई सारी घुटन एक साँस में उसने उस सवारी पर उलट दी। सवारी के माफी माँगने पर भी वह कुछ देर उस पर बड़बड़ाती रही। साथ ही अपने चोट खाए पाँव को भी सहलाती रही।

उसके रिसते घाव की कुरूपता से विचलित एक सिसकारी के साथ अंदर बैठी सवारियों ने उस पर से अपनी नजरें हटा लीं। यही तो चाहती थी वह। सबकी नजरों से खुद को बचाना। अपने गंतव्य की ओर बढ़ने से पहले उसने अपने चारों ओर का सावधानी से अवलोकन किया। इस तसल्ली के लिये कि कहीं कोई उसे देख तो नहीं रहा। बस में बैठी सवारियों को बरगलाने के लिये भी वह पहले कुछ कदम दाँँए गई फिर बाएँ। जब उसे यकीन हो गया कि उसे नहीं देख रहा तो वह लंगड़ाते कदमों से सामने की ओर बढ़ गई। बस की पिछली सीट से लगे शीशे के पार कई निगाहें उसे अब भी घूर रही थीं। अपने गंतव्य के पास आकर एक पल वह ठिठकी, पलटकर देखा। बस काफी आगे जा चुकी थी। बड़े इत्मीनान से फिर वह अपने सामने के बीयर बार का दरवाजा खोल, अंदर प्रवेश कर गई।

बेबसी लाचारी गरीबी

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