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हमदर्द साथी - प्रथम भाग
हमदर्द साथी - प्रथम भाग
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© Varman Garhwal

Drama

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चार जनवरी, बुधवार की रात को एक बजे आयु में पच्चीस वर्ष का क्लीन शेव चेहरे वाला स्मार्ट और हैंडसम सुदर्शन कुर्सी पर बैठा अपने टेबल पर रखी चाँदी की ईयर रिंग्स चैक कर रहा है। सवा एक बजे सुदर्शन सभी ईयर रिंग्स चैक करके खड़ा होता हुआ अपनी कुर्सी पीछे सरकाकर टेबल पर रखा सामान गिनकर सीढ़िया चढ़ते हुए ऊपर आया। सामने सोफे पर नाइट सूट पहने आयु में पैंतालिस वर्ष के क्लीन शेव चेहरे वाले बहुत ही स्मार्ट और हैंडसम जयसिंह अपने से चार वर्ष बड़ी नाइट सूट पहने आयु में उनचास वर्ष की बहुत ही सुन्दर सुजाता के साथ बैठे प्यार भरी रोमांटिक बातें कर रहे हैं।

सुदर्शन ने कहा—“सेठ जी, सभी ईयर रिंग लॉक लगाने के बाद चैक कर ली। अब बस पैक करना बाकी है। आप एक बार आकर देख लो।”

जयसिंह—“अब सुबह देखेंगे, यार। सारा काम टेबल पर छोड़ दो और ऊपर कपड़ा डाल देना। एक से ऊपर टाइम हो गया। अब तुम भी जाओ।”

सुदर्शन—“ये भी सही है।”

सुदर्शन ने सीढ़िया उतरते हुए बेसमेंट में आकर सारा सामान टेबल से उठाकर जयसिंह के केबिन में कपड़े से ढककर रख दिया और केबिन लॉक करके सीढ़िया चढ़ते हुए वापस ऊपर आकर ऑफ़िस के दरवाजे पर ताला लगाने लगा।

जयसिंह और सुजाता सोफे से उठकर खड़े हुए। सुजाता चलकर सुदर्शन के पास आई। सुदर्शन ने सुजाता को चाबी दी और घर का दरवाजा खोलकर बाहर चला गया। सुजाता ने दरवाजा अन्दर से बन्द किया और मुड़कर बैडरूम की ओर आने लगी। सुजाता के पास आते ही बैडरूम के दरवाजे के पास खड़े जयसिंह एक हाथ सुजाता के गले में डालकर कंधे पर रखते हुए दूसरे हाथ से दरवाज़ा खोलते हैं। दोनों अन्दर चले गए और जयसिंह बैडरूम का दरवाजा बन्द कर लेते हैं।

घने कोहरे के आगोश में एकदम सुनसान क्वीन्स रोड़ पर थोड़ी–थोड़ी दूर लगे खम्बों पर जलती लाईटों की रोशनी में डरावनी आवाजें निकालकर सन–सन करती ठंडी–ठंडी हवाएँ चल रही हैं, जिससे थरथराती सर्दियों की रात अत्यंत भयावह लग रही है। सुदर्शन हर रोज की तरह अपने दोनों हाथ पेन्ट की जेबों में डाले कड़ाके की सर्दी से काँपते हुए तेज–तेज कदमों से चलता जा रहा है।

सुदर्शन चलते–चलते ठंड से काँपता हुआ मन में बोला कि सेठ जी के घर और ऑफ़िस में तो सर्दी का पता ही नहीं चलता। वहाँ अन्दर तो ऐसा लग रहा था, जैसे मार्च–अप्रेल का महीना हो और बाहर आते ही पूरा शरीर काँपने लगा।

सुदर्शन चलता हुआ अभी पन्द्रह मिनट दूर आया, तभी उसने देखा कि आगे कुछ दूर सड़क पर खड़ी एक गाड़ी के पास एक लड़के और एक लड़की के बीच मारपीट हो रही है। दो अन्य लड़के उनके पास खड़े हैं। सुदर्शन चलते–चलते रुक गया और दूर खड़ा रहकर उनको देखने लगता है।

लड़का और लड़की लड़ते–लड़ते एक–दूसरे के बाल खींचते हुए सड़क पर गिरकर एक–दूसरे में उलझे हुए लोट–पोट होने लगते हैं। लड़की धीरे-धीरे लड़के पर भारी पड़ने लगी और लड़की ने लड़के को दबोच लिया।

इसी बीच पास खड़े दोनों लड़के लड़की को पकड़कर लड़के को लड़की के हाथो से छुड़ाकर लड़की को लड़के से दूर कर देते हैं। लड़की दोनों लड़कों से छुटने के लिए छटपटाने लगती है।

सड़क पर गिरा लड़का उठकर आकर लड़की के घूसे(मुक्के) और लातें मारने लगता है। कुछ देर लड़की को बुरी तरह पीटकर लड़का लड़की के बाल पकड़ता है। दोनों अन्य लड़के लड़की को छोड़कर पीछे हट गए। लड़की के बाल पकड़ने वाले लड़के ने लड़की को बुरी तरह सड़क किनारे पटक दिया और लड़की के सर और पेट पर चार–पाँच लातें मारकर पास खड़े दोनों लड़कों के पास आकर खड़ा होता है। तीनों लड़के गाड़ी के पास जाकर खड़े हुए और कुछ देर बाद लड़की को वहीं छोड़कर तीनों लड़के गाड़ी में बैठकर चले गए।

सुदर्शन घबराकर काँपते हुए सोचने लगा कि आगे जाऊँ या रास्ता बदल लूँ ? पता नहीं, क्या चक्कर है ? छोड़ यार ! क्यों मुसीबत को गले लगाना ? इन लड़कियों में भी अक्ल तो होती नहीं है। पहले बेकार लोगों से प्यार, फिर ये हाल। वैसे भी आजकल टाइम बहुत खराब है। मैं मदद करने जाऊँ और ब्लात्कार या मर्डर के इल्जाम में खुद ही अन्दर हो जाऊँ। रहने दें, गोली मार।

सुदर्शन रास्ता बदलकर तेज-तेज चलता हुआ दूसरे रास्ते से जाने लगता है। कुछ दूर आकर अचानक सुदर्शन रुक जाता है।

सुदर्शन ने कुछ याद करके मन में खुद से कहा कि भूल गया क्या, सुदर्शन ? कभी तू भूख से तड़पकर कचरे में से सड़े–गले फल उठाकर खा रहा था। उस वक्त तुझे रोता देखकर एक देवी जैसी नारी तेरे पास आई और तेरे आँसू पोंछकर तुझे अपने घर ले गई। जरा सोच, अगर वो नारी भी तेरी तरह मुँह फेरकर चली जाती, तो तेरा क्या हाल होता ? इतनी ठंड में बेचारी लड़की सड़क पर पड़ी है। वो लड़के उसे कितनी बुरी तरह पीटकर गये हैं। और तू उसकी मदद करने की जगह रास्ता बदलकर जा रहा है। कहीं मर गई तो ? नहीं यार ! कम से कम एक बार जाकर देख तो सही उसको। जो होगा देखा जाएगा।

सुदर्शन मुड़कर तेज–तेज कदमों से चलता हुआ वापस क्वीन्स रोड़ पर आकर लड़की की ओर आता है। लड़की अभी तक वहीं पड़ी हुई दिखाई देती है। सुदर्शन धीरे–धीरे लड़की के पास आने लगा।

नशे में पूरी तरह धुत्त बहुत ही मासूम चेहरे वाली बटन लगा हुआ घूटने तक आने वाला कुर्ता और जींस पहने दिखने में बहुत ही आकर्षक और सुन्दर आयु में सताईस वर्ष की लड़की सर के बिखरे हुए बाल और अस्त-व्यस्त कपड़ों में पड़ी-पड़ी कुछ बड़बड़ा रही है।

सुदर्शन ने लड़की के पास बैठकर कहा—“आपका घर कहाँ है ? आपके घर का कोई नम्बर बता दो, मैं आपके घर से किसी को बुला लेता हूँ।”

सुदर्शन की आवाज़ सुनकर लड़की ने नशीली आँखों से सुदर्शन की ओर देखकर अपना हाथ बढ़ाया। सुदर्शन लड़की का हाथ पकड़कर लड़की को सहारा देकर खड़ी करता है।

लड़की सुदर्शन का कॉलर पकड़कर क्रोध से बोली—“साले कमीने, मुझे धोखा देता है। छोड़ूगी नहीं तुझे।”

सुदर्शन घबराकर मन में बोला कि अरे, ये क्या हो रहा है ?

सुदर्शन अपना कॉलर छुड़ाने की कोशिश करते हुए बोला—“मैं तो आपकी मदद के लिए आया हूँ।”

लड़की सुदर्शन को धक्का देकर लड़खड़ाती हुई बोली—“मैनें तुझे कितना प्यार किया। तेरे लिए अपने मॉम–डेड से झगड़े किये और तू एक साल मजे लेने के बाद कहता है, तेरे जैसी बहुत मिलती है। किस–किस से शादी करूँ ?”

सुदर्शन चिन्तित होकर मन में सोचने लगा कि लगता है, उस लड़के ने शादी का वादा करके टाइमपास किया और छोड़ दिया। अब ये शराब के नशे में मुझे वहीं लड़का समझ रही है।

लड़की हाँफती हुई इधर–उधर देखकर एक पत्थर उठाकर बोली—“अब कहाँ जाएँगा बचकर ? आ सामने ! बताती हूँ तुझे, मैं कितनी बेकार हूँ ?”

लड़की को पत्थर मारती देखकर सुदर्शन पीछे हटते हुए बोला—“अरे…क्या कर रही हो ? लग जाएँगी।”

लड़की आँखों से गुस्सा दिखाती हुई बोली—“साले, आगे आ, तेरी माँ की। अब पीछे क्यों हट रहा हैं ? सर फोड़ूँगी आज तेरा।”

लड़की सुदर्शन की ओर पत्थर फेंकती है।

सुदर्शन खुद को पत्थर लगने से बचाकर लड़की के पास आया और लड़की को पकड़कर बोला—“देवी जी, मैनें आपको धोखा नहीं दिया। मेरे ऊपर रहम करो।”

लड़की खुद को सुदर्शन से छुड़ाने की कोशिश करती हुई बोली—“छोड़ कमीने, इतनी आसानी से तुझे जाने नहीं दूँगी।”

सुदर्शन लड़की को समझाने का प्रयास करता है, लेकिन लड़की सुदर्शन की बात सुनने की बजाय गन्दी–गन्दी गालियाँ निकालती हुई सुदर्शन पर हाथ–पैर चलाने लगती है।

जब लड़की सुदर्शन के काबू में नहीं आई, तो सुदर्शन मन में बोला कि इन बेवड़ों का एक ही ईलाज है।

सुदर्शन खुद को लड़की से छुड़ाकर लड़की को दूर धकेलता है। लड़की गन्दी गाली निकालकर फिर से सुदर्शन पर झपटने का प्रयास करती है, लेकिन सुदर्शन लड़की के दोनों गालों पर एक के बाद एक चार जोरदार चांटे(थप्पड़) जड़कर लड़की के दोनों गालों को लाल कर देता है। लड़की लड़खड़ाकर सड़क पर गिर जाती है।

सुदर्शन घबराकर लड़की को देखता है। लड़की सड़क पर बैठकर रोने लगती है।

सुदर्शन मन में बोला कि लगता है ज्यादा हो गया।

सुदर्शन लड़की के पास आया और नीचे बैठकर बोला—“एम सॉरी, प्लीज रोईये मत।”

लड़की छोटी बच्ची की तरह रोती–रोती बोली—“यार ! क्या हो गया तुझे ? मेरे प्यार में क्या कमी रह गई ? तेरे लिए क्या नहीं किया मैनें ? जब तू प्रोब्लम में था, तो तुझे पैसे दिये। तुझे हमेशा खुश रखा। तेरी खुशी के लिए तूने जो–जो कहा, मैनें वो सब किया। तेरे मतलब पूरे हो गए, तो अब तू मुझे मार रहा है। तू चाहें जितना मरजी मार ले। लेकिन मुझे छोड़कर मत जा। मैं तेरे बिना जी नहीं सकती। प्लीज यार ! तू एकदम से इतना कैसे बदल गया ? आई लव यू, यार। लव यू सॉ मच।”

लड़की को रो–रोकर गिड़गिड़ाते हुए देखकर सुदर्शन को दया आने लगती है।

लड़की सुदर्शन के पैर पकड़कर बोली—“प्लीज यार ! मैं तेरे पैर पकड़ती हूँ। तू जो बोलेगा, वो सब करूँगी। बस तू मुझे छोड़कर मत जा।”

सुदर्शन लड़की के हाथ पकड़कर अपने पैर छुड़ाते हुए बोला—“अरे, क्या कर रही हो ? आप उठो पहले।”

लड़की गर्दन हिलाती हुई बोली—“नहीं, पहले तू बोल। तू मुझे छोड़कर नहीं जाएगा।”

सुदर्शन ने असमंजस से इधर-उधर देखा और लड़की को खड़ी करते हुए बोला—“अब क्या करें ? हाँ में हाँ मिलाने में ही भलाई है। हाँ–हाँ, मैं कहीं नहीं जाऊँगा। अब तो उठो।”

सुदर्शन ने रोती हुई लड़की को खड़ी करके लड़की के कपड़े ठीक किये और लड़की के बिखरे हुए सर के बाल ठीक करता हुआ लड़की को बहलाकर चुप करवाने का प्रयास करते हुए लड़की को पास के बस स्टॉप पर लेकर आता है।

सुदर्शन ने लड़की को बस स्टॉप की कुर्सी पर बिठाकर मन में कहा कि इसको संभालना अपने बस की बात नहीं है। यहाँ बिठा दिया है। अब आगे इसकी किस्मत।

सुदर्शन बस स्टॉप से नीचे उतरकर अपने रास्ते जाने लगता है।

लड़की ने सुदर्शन को जाते देखकर छोटी बच्ची की तरह कहा—“तू मुझे छोड़कर क्यों जा रहा है ?”

सुदर्शन ने तेज-तेज चलते हुए मन में कहा कि जल्दी-जल्दी चल, वरना ये फिर गले पड़ जाएँगी।

लड़की उठकर सुदर्शन के पीछे–पीछे आती हुई गाना गाने लगी—

“छोड़के ना जा…

छोड़के ना जा…

तेरे बिना मर जाऊँगी,

मैं………मर जाऊँगी,

प्यार बहुत है, दिल में मेरे,

समझता नहीं क्यूँ, दिलबर मेरे,

चला है कहाँ तू ? छोड़कर मुझे,

तेरे साथ जीने के है सपने मेरे,”

सुदर्शन चलते–चलते मन में कहने लगा कि कहाँ फँस गया, यार ! ये तो मेरे ही पीछे ही पड़ गई।

इस बीच रात में गश्त लगाने वाली पुलिसवेन सायरन बजाती हुई क्वीन्स रोड़ पर आई।

पुलिसवेन देखते ही लड़की बोली—“मुझे छोड़ के जाएगा ? अब देख ! तुझे पुलिस में देती हूँ। केस करूँगी तुझ पर मोहब्बत का।”

पुलिसवेन का सायरन सुनकर सुदर्शन रूका और मुड़कर पुलिसवेन की ओर देखते हुए मन में बोला कि हत, तेरे की। इनको भी अभी आना था। जब वो लड़के इस लड़की की पिटाई कर रहे थे, तब नहीं आए।

लड़की सड़क के बीच में आकर पुलिसवेन के सामने खड़ी हो गई। पुलिसवेन लड़की के पास आकर रुकती है।

लड़की ड्राइवर के पास बैठे आयु में लगभग सैंतालिस वर्ष के पुलिसवाले के पास आकर हाथ जोड़ती हुई छोटी बच्ची की तरह बोली—“पुलिसवाले अंकल ! देखो ना, वो मुझे छोड़कर जा रहा है। उसको समझाओ ना, मुझे छोड़कर ना जाए। मैं उससे बहुत प्यार करती हूँ। मैं मर जाऊँगी, उसके बिना।”

पुलिसवाले ने अपनी नाक पर हाथ रखकर कहा—“पीछे खड़ी हो। कित्ती दारू पी रखी है।”

पुलिसवेन में पीछे बैठा आयु में लगभग पचास(50) वर्ष का पुलिसवाला पुलिसवेन से बाहर निकलकर गरजते हुए बोला—“कौण है रे, इस बेवड़ी के साथ ?”

सुदर्शन सोचने लगा कि अगर मैनें कहा, मैं इस लड़की को नहीं जानता, तीन लड़के इसकी पिटाई करके, इसको यहाँ छोड़कर भाग गए। तो पुलिस स्टेशन, लड़की का नशा उतरने का इंतजार, उन लड़कों को पहचानों, ये मुझे बॉयफ्रैंड क्यों बोल रही है ? बहुत सारे सवाल। फिर जब उन लड़कों को पकड़ा जाएगा। खुद को बचाने के लिए वो मुझे लपेटने लगे तो ? और फिर इन बिस्तर पर सोने वाली लड़कियों का कोई भरोसा नहीं होता। ये बॉयफ्रैंड के लिए सब कुछ भूल जाती है। कहीं बॉयफ्रैंड के लिए मुझे ही झूठा साबित कर दिया तो ? नहीं यार, इस झमेले में नहीं पड़ना। ये तुझे अपना बॉयफ्रैंड तो समझ ही रही है। एक बार जान छुड़ाने के लिए बोल दें, ये तेरी गर्लफ्रैंड है।

पुलिसवेन से बाहर खड़े पुलिसवाले ने सुदर्शन की ओर हाथ से संकेत करके कहा—“ओए ! इन्ने आ।”

सुदर्शन पास आकर पुलिसवाले से थोड़ा दूर खड़ा हुआ।

पुलिसवाला—“अरे, आगे आजा। इन्वीटेशन दे ग बुलाऊ के तन ?”

सुदर्शन डरता हुआ पास आता है।

पुलिसवाले ने कहा—“के चक्कर है ? क्यों आधी रात न सड़क पर रौळो(हंगामा) मचा राख्यो है ?”

सुदर्शन ने भोला–भाला बनकर मासूमियत से कहा—“रौळो म मचा राख्यो है ? आ देखो थे इन्ने, दारू पीर किया बावळी हो री है। तो म रीस म आर केयो, क म तो तन छोड़ अर जाऊ अब। बस ई बात पर आ रोण लाग गी।”

सभी पुलिसवाले ठहाका लगाकर हँसते हैं।

ड्राइवर के पास बैठे पुलिसवाले ने कहा—“झाभर जी, देख ल्यो। जमानो कित्तो बदल ग्यो। पैली आदमी दारू पीर बावळो होर घूमतो, हर लुगाई केवती, तू दारू पीये, म तो जाऊ छोड़ अर। अब छोरी दारू पीर ड्रामा करे हर छोरो केवे, तू दारू पीये ई वास्ते तन छोड़ अर जाऊँ।”(हिन्दी अनुवाद : झाभर जी, देख लो। जमाना कितना बदल गया। पहले आदमी शराब पीकर पागल होकर घूमता था और औरत कहती थी, तू तो शराब पीता है, मैं तो जा रही हूँ तुझे छोड़कर। अब लड़की शराब पीकर ड्रामा करती है और लड़का कहता है कि तू शराब पीती है, इसलिए तुझे छोड़कर जा रहा हूँ।)

पीछे बैठा आयु में लगभग बावन वर्ष का एक पुलिसवाला बोला—“चालो, अब आपणा बस गी बात थोड़ी है। आने नीबेड़ो जल्दी।”

पुलिसवेन के बाहर खड़ा पुलिसवाला—“हाँ, घर कठे है तेरो ?”

सुदर्शन—“आम्रपाली कॉलोनी म।”

ड्राइवर के पास बैठा पुलिसवाला—“ई छोरी न जाणे है नी तू ?”

सुदर्शन हाँ में सर हिलाता है।

पुलिसवेन के बाहर खड़े पुलिसवाले ने अपनी जेब से अपना स्मार्टफोन निकालकर पुलिसवेन के सामने आकर खड़े होने का संकेत करते हुए कहा—“इन्ने आओ दोन्यू जणा।”

पुलिसवाला लड़की और सुदर्शन को पुलिसवेन के सामने ले जाकर पुलिसवेन की आगे की लाइट की रोशनी में एक साथ खड़ा करके उनकी फोटो निकालकर सुदर्शन से बोला—“बे लारे बैठ्या है, बांग खन जा। हर बे पूछे जको, सच्ची–सच्ची बता दई।”

सुदर्शन पीछे बैठे पुलिसवालों के पास आता है। आयु में लगभग छत्तीस वर्ष और आयु में लगभग चालीस वर्ष के दो पुलिसवाले सुदर्शन से पूछताछ करते हैं।

सभी पुलिसवालों को सुदर्शन अच्छा लड़का लगा और पीछे बैठे पुलिसवाले उसे ड्राईवर के पास बैठे पुलिसवाले के पास जाने के लिए कहते हैं। सुदर्शन ड्राईवर के पास बैठे पुलिसवाले के पास आता है।

पुलिसवेन से बाहर खड़े पुलिसवाले ने लड़की से पूछा—“ऐ छोरी ! तेरो के नाम है ?”

लड़की नशे में मुस्कुराकर बोली—“मेरो नाम प्रेम–दीवानी है।”

ड्राइवर के पास बैठे पुलिसवाले ने कहा—“छोरी, घरबार गो पतो–ढिकाणो बूझा। सावळ बता दें।”

लड़की—“मेरो घर इंगो दिल है, अंकल जी। ओ अब दिल उ काडणा चावे मन्ने। थे बताओ, म के करूँ ?"

पुलिसवाला—“कुँआ म पड़।”

पुलिसवाले ने सुदर्शन से सुदर्शन का नाम, पता और मोबाइल नम्बर लिखवाकर कहा—“अब सीधा घृह चल्या जाओ। ई छोरी न तो होश कोनी, ई वास्ते खाली तेरो नाम, पतो लिख्यो है। कोई गड़बड़ होई, तो हिसाब लगा लई।”

सुदर्शन ने हाथ जोड़कर कहा—“पर साब, म इन जबरदस्ती चग ग थोड़ी ले जाण लाग रयो हूँ। फेर मेरो नाम पतो क्यों ?”

पुलिसवेन के बाहर खड़ा पुलिसवाला—“अरे, चिन्ता आळी बात कोनी। बस म्हारी फॉर्मेलटी वास्ते लिख्यो है। बो भी तू ठीक छोरो लाग्यो जद। नई तो चाल बैठ म्हारे सागे। फेर सारी रात बैठ्यो रेयी जैळ म। सवेरः घरगा ही आर छुड़ावःला।”

सुदर्शन—"नयी–नयी (नहीं-नहीं), साब। ठीक है। घणो–घणो धन्यवाद थारो। म्हे चाला अब।”

पुलिसवाला—“ठीक है।”

ड्राइवर पुलिसवेन स्टार्ट करता है।

सुदर्शन लड़की के बाजू पकड़कर लड़की को पीछे हटाते हुए पुलिसवेन से दूर करता है।

पुलिसवेन से बाहर खड़ा पुलिसवाला जाकर पीछे बैठता है और पुलिसवेन सायरन बजाती हुई गश्त करते हुए चली जाती है।

सुदर्शन लड़की के बाजू छोड़कर लड़की की ओर देखता है। लड़की नशे में मदहोश सुदर्शन की ओर देखकर मुस्कुराने लगती है।

सुदर्शन ने हाथ जोड़कर कहा—“अब चले, देवी जी।”

लड़की सुदर्शन के गले लगकर भावुकता से बोली—“आई लव यू, यार।”

सुदर्शन ने लड़की को खुद से दूर करके कहा—“अरे, अब ये क्या है ? पुलिस दूबारा आ गई तो प्रोब्लम हो जाएगी।”

लड़की हँसकर बोली—“तू पुलिस से डरने लगा। तू तो बोलता था, जब प्यार किया तो डरना क्या।”

सुदर्शन ने सख़्ती से कहा—“अब तुम चल रही हो या फिर मैं जाऊँ ?”

लड़की मुँह पर उँगली रखकर चुपचाप सुदर्शन के साथ चलने लगती है।

सुदर्शन ने चलते हुए मन में कहा कि मेरे मन में कुछ गलत नहीं है। मेरे साथ कुछ गलत ना जाएँ ?

लड़की ने पहले की तरह बोलना बन्द कर दिया और शान्त होकर चलने लगी। लड़की पैदल चलते–चलते थक गई और उसे नींद आने लगी। सुदर्शन लड़की को लड़खड़ाती देखकर लड़की को कमर से पकड़कर संभालता है। लड़की के मासूम चेहरे पर कुछ चोटों के निशान है। सुदर्शन लड़की को कमर से थामकर लड़की का एक हाथ अपने कंधे पर रखकर चलने लगता है।

सुदर्शन ने चलते–चलते मन में सोचा कि अभी तो गली सुनसान होगी। इसे बिल्डिंग में साथ ले जाता हूँ। सुबह उजाला होने से पहले इसे जाने के लिए कह दूँगा। बस इसका नशा उतर जाएँ।

सुदर्शन एक चार मंजिल की तीन–तीन बैडरूम के चार फ्लेट वाली बिल्डिंग में सबसे ऊपर वाले फ्लेट में किराये पर रहता है। बाकी तीन फ्लेट खाली है, इसलिए बिल्डिंग के मालिक ने पूरी बिल्डिंग सुदर्शन को ही संभालने के लिए दे रखी है।

बीस मिनट पैदल चलने के बाद सुदर्शन की बिल्डिंग आती है।

सुदर्शन ने बिल्डिंग के दरवाजे पर खड़े होकर लड़की से कहा—“मैं ताला खोलता हूँ। फिर अन्दर चलते हैं।”

सुदर्शन ने लड़की का हाथ अपने कंधे से हटाया। लड़की दीवार से पीठ लगाकर दीवार के सहारे खड़ी हो गई।

सुदर्शन ने बिल्डिंग के दरवाजे का ताला खोलकर लड़की को सहारा देते हुए सीढ़िया से चढ़कर सबसे ऊपर वाले फ्लेट के दरवाजे पर आकर फ्लेट का ताला खोला और लड़की को फ्लेट के अन्दर लाकर फ्लेट में लाईट जलाई।

सुदर्शन के फ्लेट में बस एक सिंगल बैड है, जो एक कमरे में लगा हुआ है। ओढ़ने–बिछाने के लिए सुदर्शन के पास एक गद्दा, एक रजाई और एक कम्बल है।

सुदर्शन लड़की को बैड वाले कमरे में लाकर अपने बैड पर सुलाकर कमरे में लाइट जलाकर लड़की के सैंडल निकालकर उसे रजाई ओढ़ा देता है और कमरे निकलकर फ्लेट से बाहर आकर सीढ़िया उतरते हुए वापस नीचे आकर मुख्य दरवाजे पर ताला लगाकर बिल्डिंग के मालिक के आदेशानुसार और चोरों के खतरे को ध्यान में रखते हुए रोज की तरह सोने से पहले पूरी बिल्डिंग के सारे खिड़की–दरवाजें और ताले चैक करते हुए वापस सीढिया चढ़ते हुए सबसे ऊपर वाले फ्लेट में आकर दरवाजा अन्दर से बन्द करके बाहर की लाईट बन्द करता है और कमरे में आकर कमरे की लाईट जलती छोड़कर बैड पर बैठ जाता है।

सुदर्शन सोचने लगा कि अब मैं कहाँ सोऊँ ? गर्मी होती, तो फर्श पर ही सो जाते। लेकिन इतनी ठंड में फर्श पर सोया तो सुबह तक मेरी कुल्फी जम जाएगी।

कुछ देर तक सोचने के बाद सुदर्शन ठंड से कंपकंपी बढ़ती देखकर अपने जूते निकालता है और कम्बल लेकर बैड पर ही लड़की से दूरी बनाकर पीठ के बल सीधा होकर कम्बल ओढ़ते हुए लेट जाता है।

रात के चार बज गए, लेकिन सुदर्शन को नींद नहीं आई। इस बीच लड़की नींद में सुदर्शन के पास आकर सुदर्शन से लिपट गई। सुदर्शन चौककर थोड़ा दूर हुआ और लड़की को वापस पीछे करके ठीक से सुला दिया।

कुछ देर बाद फिर से यहीं हुआ।ऐसा तीन–चार बार होने के बाद सुदर्शन ने बैड से खड़े होकर मन में कहा कि अब समझ में आया, पराई लड़की के साथ क्यों नहीं सोना चाहिए ? लेकिन अब इतनी सर्दी में कहाँ जाऊँ ? मैनें तो रजाई भी तुझे दे दी। कम से कम कम्बल में तो सोने दें।

कुछ देर खड़ा रहकर सुदर्शन वापस बैड पर बैठ जाता है और बैठे–बैठे लड़की के चेहरे की ओर देखकर मन में सोचता है कि कितनी मासूम लड़की है। समझ में नहीं आता, इतनी प्यारी लड़की को इतनी बुरी तरह मारते हुए, उन लड़कों के हाथ क्यों नहीं काँपे ? चल तू भी सोजा, यार। सिर्फ साथ में सोने से कुछ नहीं होता। जब दिल और दिमाग में गन्दगी हो, तब कुछ होता है।"

सुदर्शन फिर से पीठ के बल सीधा लेटकर कम्बल ओढ़ लेता है।

सुदर्शन को सड़क पर कहीं हुई लड़की की बातें याद आने लगती है। लड़की का कॉलर पकड़ना, आँखों से गुस्सा दिखाना, पत्थर उठाकर मारना, आई लव यू बोलना, बच्चों की तरह रो–रोकर गिड़गिड़ाना, गाना गाकर मनाना, पुलिसवालों से समझाने के लिए कहना, प्यार से गले लगाकर बोलना, आई लव यू, यार।

अचानक लड़की फिर से सुदर्शन के पास आकर सुदर्शन से लिपट गई। इस बार सुदर्शन ने उसे दूर नहीं किया।

लड़की के सर पर हाथ फेरते हुए लड़की का चेहरा देखकर सुदर्शन मन में बोला कि अगर ये बेवड़ी ना होती, तो कितना अच्छा होता। समझ में नहीं आता, ये लोग अपनी मासूमियत में नशा क्यों मिला रहे हैं ? खैर, क्या कर सकते हैं ?

सुदर्शन लड़की को ओढ़ाई हुई रजाई अपने ऊपर भी डाल लेता है और लड़की को सीने से लगाए लेटा रहता है। सुबह के पाँच बजे बाद सुदर्शन की भी आँख लग गई।

सुबह के छः बजे सुदर्शन की नींद खुल गई। लड़की अभी तक सुदर्शन के सीने से लगकर सुदर्शन की बाहों में ही सो रही है। सुदर्शन लड़की को साइड में सुलाकर बैड से खड़ा होकर लड़की को जगाता है।

लड़की आँखें खोलकर सामने सुदर्शन को पाकर चौकती हुई इधर-उधर देखकर सख़्ती से बोली—“तुम कौन हो ? और मुझे यहाँ कैसे लाए ?”

सुदर्शन पीछे हटकर बोला—“मेरा नाम सुदर्शन है। रात को आप नशे में सड़क पर गिर गई थी, तो मैं आपको यहाँ ले आया।”

लड़की रजाई हटाकर बैड से उठी और अपनी सैंडल पहनकर कमरे से बाहर आई। सुदर्शन भी चप्पल पहनकर लड़की के पीछे–पीछे कमरे से बाहर आता है।

लड़की ने इधर–उधर देखा और एक हाथ सर पर हाथ रखकर बोली—“लेकिन मैं तो दिव्यांश के साथ थी। फिर सड़क पर कैसे गिर गई ?”

सुदर्शन—“वो सब मुझे नहीं पता। मैं बस इन्सानियत के नाते आपको यहाँ ले आया। वरना इतनी ठंड में सड़क पर पता नहीं क्या हाल होता आपका ?”

लड़की घुटनों के बल नीचे बैठी और दोनों हाथ सर पर रखकर बोली—“ओह गॉड, इसका मतलब मैं रात भर तुम्हारे साथ थी ?”

सुदर्शन ने लड़की के पास बैठकर कहा—“एम सॉरी, मैं यहाँ किराये पर रहता हूँ। मेरे पास बस एक सिंगल बैड और एक रजाई–गद्दा है। अब ठंड बहुत ज्यादा थी, इसलिए कम्बल ओढ़कर मैं आपके पास ही लेट गया। लेकिन मेरा यकिन करो, मेरे मन में कुछ गलत नहीं था और ना ही मैनें आपके साथ कुछ किया है। मैं बस सोया ही था।”

लड़की सर से हाथ हटाकर चेहरा ऊपर करके बोली—“अरे, कोई बात नहीं यार… कुछ कर भी लेते तो क्या फर्क पड़ जाता ? मैं तो वैसे भी एक कमीने के चक्कर में बेवकूफों की तरह सब करवा चुकी हूँ।”

सुदर्शन बिना कुछ बोले खड़ा होकर पीछे हो गया। लड़की खुद के हाथ को देखती है। लड़की के हाथ की कोहनी पर चोट लगी हुई है।

लड़की ने कहा—“मैं तुम्हें मिली कहाँ थी ?”

सुदर्शन—“ये क्वीन्स रोड़ पर चित्रकूट के मोड़ से थोड़ा आगे। मैं अपने ऑफ़िस से आ रहा था। तो मैनें देखा, आपकी एक लड़के के साथ बुरी तरह मारपीट हो रही थी। उसी मारपीट में उस लड़के ने आपको सड़क पर गिरा दिया और फिर आपको लातें मारी। ये चोट शायद तभी लगी होगी।”

लड़की चेहरा गंभीर करके क्रोध से बोली—“साला कमीना। फिर क्या हुआ ?”

सुदर्शन—“उसके साथ दो लड़के और भी थे। आपको वहीं छोड़कर वो तीनों गाड़ी में बैठकर चले गए। फिर मैं आपके पास आया। आप बहुत नशे में थी और नशे में आपने मुझे अपना बॉयफ्रैंड समझ लिया। तभी वहाँ पुलिस आ गई। अब अगर मैं पुलिस को ये बोलता, मैं आपको नहीं जानता। आपको तीन लड़के यहाँ छोड़कर भाग गए, तो पुलिस मुझसे सवाल–जवाब करती। शायद पुलिस स्टेशन भी ले जाती। मुझे पुलिस से बहुत डर लगता है। इसलिए मैनें पुलिसवालों को बोल दिया, आप मेरी गर्लफ्रैंड हो और आपको यहाँ ले आया।”

लड़की मुस्कुराकर बोली—“थैक्स।”

सुदर्शन—“इसमें थैक्स की कोई बात नहीं है, लेकिन एम सॉ सॉरी। अब आप यहाँ से चली जाईए। अगर आस–पड़ोस में किसी ने देख लिया, तो लोग गलत मतलब निकालेंगे और इस बिल्डिंग का मालिक, मुझे इस बिल्डिंग से निकालेगा। आप समझ रही है ना ?”

लड़की—“ओके, कोई बात नहीं।”

लड़की खड़ी होकर दरवाजे की ओर जाने लगती है।

सुदर्शन—“रुकिए !”

सुदर्शन कमरे में जाकर चप्पल निकालकर जूते पहनने के बाद बैड पर पड़ा कम्बल उठाकर लाया और लड़की को कम्बल देते हुए बोला—“इसे ओढ़ लीजिए, सर्दी बहुत ज्यादा है।”

लड़की—“नहीं–नहीं, रहने दो। इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।”

सुदर्शन—“ज़रूरत कैसे नहीं है ? देखिए, कैसे काँप रही हो आप ?”

सुदर्शन खुद ही लड़की के कंधों पर कम्बल डाल देता है। लड़की कम्बल को ठीक से लपेटकर ओढ़ लेती है।

सुदर्शन ने दरवाजा खोलकर कहा—“अब चलिए। आम्रपाली सर्किल तक आपको छोड़ आता है।”

लड़की और सुदर्शन सीढ़ियाँ उतरते हुए नीचे आते हैं। सुदर्शन बिल्डिंग के मुख्य दरवाजें को खोलकर लड़की के साथ बाहर आया और जेब से चाबियों का गुच्छा निकालकर बिल्डिंग का दरवाजा वापस लॉक करके लड़की के साथ आम्रपाली सर्किल की ओर आने लगता है।

सुबह के लगभग छः बज चुके है, लेकिन अंधेरा और ठंड ज्यादा होने के कारण अभी तक घना कोहरा छाया हुआ है।

सुदर्शन ने चलते–चलते पूछा—“आपका नाम जान सकता हूँ ?”

लड़की—“कृतिका.”

(नोट— यहाँ से आगे लड़की को ‘कृतिका’ सम्बोधित किया जाएगा।)

सुदर्शन—“तो कृतिका जी, अब कहाँ जाएँगी आप ? मेरा मतलब आप कहाँ रहती हैं ?”

कृतिका—“मानसरोवर।”

सुदर्शन—“फिर तो बहुत दूर जाना हैं आपको। अब इतनी सुबह कोई साधन भी पता नहीं, मिलेगा या नहीं ?”

कृतिका—“कोई बात नहीं, तुम चिन्ता मत करो। मैं थोड़ा इंतजार कर लूँगी।”

सुदर्शन—“हाँ, वो तो करना ही पड़ेगा।”

आम्रपाली सर्किल पर आकर दोनों किसी ऑटो का इंतजार करते हैं। आधे घंटे इंतजार करने के बाद भी कोई ऑटो नहीं आया। सुदर्शन अपनी जेब से मोबाइल निकालकर ऑटो चलाने वाले अपने एक दोस्त आलोक को फोन करता है।

आलोक चारपाई पर रजाई में मुँह ढककर अपने कमरे में सोया हुआ है। आलोक के सिरहाने पड़े मोबाइल पर कॉल आती है।

आलोक ने रजाई में मुँह ढके हुए अपना हाथ तकिए के पास लाकर मोबाइल रजाई के अन्दर लेकर कॉल रिसींव करके कहा—“हैलो।”

सुदर्शन—“गुदड़ों (बिस्तर) से बाहर आ गया या अभी गुदड़ों में ही पड़ा है ?”

आलोक—“हाँ, बोल। सुबह–सुबह कैसे याद किया ?”

सुदर्शन—“आम्रपाली चौराहे पर आजा जल्दी।”

आलोक—“अभी आया। बस दस मिनट रुक।”

आयु में तैईस वर्ष का आलोक कॉल काटकर बिस्तर से बाहर निकला और दीवार पर टंगा कोट(सर्दी में पहनने वाला टोपी लगा हुआ) पहनकर कमरे से बाहर आता है।

आलोक ने थरथराती सर्दी महसूस करके मुँह धोना कैंसल किया और घर से बाहर आकर ऑटो स्टार्ट करके आम्रपाली सर्किल की ओर निकल जाता है।

सुदर्शन के सामने ऑटो रोककर आलोक ने कहा—“हाँ, बोल।”

सुदर्शन ऑटो के पास आकर बोला—“यार ! इस लड़की को मानसरोवर जाना है।”

आलोक ने लड़की को देखकर मुस्कुराते हुए सुदर्शन को धीरे से कहा—“तुम लड़की के साथ ? वो भी इतनी स्मार्ट लड़की ? और सीधे बिल्डिंग में ले आया। तू तो ऐसा था ही नहीं ? कौन है ये ? कहाँ मिली ? कैसे मिली ?”

सुदर्शन लड़की की ओर देखकर मुस्कुराया और फिर आलोक को घूरते हुए धीरे से कहा—“जैसा तू सोच रहा है, वैसा कुछ नहीं है। अभी तुम इसे घर छोड़ आओ, प्लीज।”

आलोक ने हँसकर कहा—“अरे मजाक कर रहा हूँ, यार। (कृतिका से)आईए मैडम, बैठिए।”

कृतिका ऑटो की ओर आती हुई कम्बल निकालने लगती है।

सुदर्शन ने कृतिका से कहा—“कम्बल क्यों निकाल रहे हो ? ऑटो में तो ज्यादा ठंड लगेगी।”

कृतिका—“अरे, लेकिन कम्बल तो तुम्हारा है ना।”

सुदर्शन—“आप जहाँ उतरो, वहाँ उतरकर कम्बल इसको दे देना। ये मुझे दे देगा।”

कृतिका मुस्कुराकर बोली—“ओके, थैक्यू सॉ मच। बाए।”

सुदर्शन—“टेक केयर।”

सुदर्शन ने आलोक से कहा—“ठीक से घर छोड़ देना इनको।"

आलोक—“नो टेन्शन यार।”

आलोक ऑटो चलाते हुए निकल जाता है।

सुदर्शन वापस बिल्डिंग पर आकर ताला खोलकर अन्दर आया और ताला वापस लगाकर सीढिया चढ़ते हुए फ्लेट में आकर सोचता है कि ऑफ़िस तो दस बजे जाना है। थोड़ा और सो लेता हूँ। नौ बजे उठ जाएगें। सारी रात सोए ही नहीं।

सुदर्शन कमरे में आकर बैड पर बैठा और अपने जूते निकालकर रजाई ओढ़ते हुए लेट जाता है।तीन महीने बाद चार अप्रेल, मंगलवार की शाम को पाँच बजे मानसरोवर इलाके में एक बस सटॉप पर बस के इंतज़ार में खड़े सुदर्शन के सामने आकर एक गाड़ी रुकती है।

गाड़ी के दरवाजे का शीशा नीचे होने पर ड्राईविंग सीट पर कृतिका हल्के ब्राउन कलर का चश्मा निकालकर आँखें ऊपर करके मुस्कुराती हुई बोली—“पहचाना ?”

सुदर्शन ने पास आकर कहा—“हाँ, बिल्कुल। पहचानेगें क्यों नहीं ?”

कृतिका—“मुझे लगा, शायद भूल गए होंगे। शराब पीकर आधी रात को सड़कों पर मारपीट करने वाली एक बिगड़ैल शराबी लड़की को क्या याद रखना ?”

सुदर्शन—“नहीं–नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। अगर मैं ऐसा सोचता, तो आपको अपने साथ क्यों ले जाता ?”

कृतिका—“ओके, यहाँ कैसे ?”

सुदर्शन—“यहाँ एक दोस्त की बहन की शादी है, वहीं आया था। शादी हो गई, कुछ देर बाद बारात चली जाएगी। अब वापस जा रहा हूँ। आप यहाँ ?”

कृतिका—“मैं यहीं रहती हूँ। इससे पीछे वाली गली में ही हमारा घर है। तुम सेठ साँवरमल बागड़ी जी को जानते हो ?”

सुदर्शन—“हाँ, उनका नाम सुना है।”

कृतिका—“वो मेरे पापा है।”

सुदर्शन आश्चर्यचकित होकर बोला—“आप साँवरमल जी बेटी है ?”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, तुम कहाँ जा रहे हो ?”

सुदर्शन—“घर।”

कृतिका—“कहाँ आम्रपाली कॉलोनी ?”

सुदर्शन—“हाँ।”

कृतिका—“चलो फिर, मैं छोड़ देती हूँ।”

सुदर्शन—“नहीं–नहीं, मैं बस से चला जाऊँगा।”

कृतिका—“अरे, बैठ जाओ। मैं वहीं से जाऊँगी। रास्ते में तुम्हें उतार दूँगी।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“ये भी सही है।”

सुदर्शन गाड़ी में बैठ गया। कृतिका अपना चश्मा पहनकर गाड़ी चलाने लगती है।

कृतिका—“तुम्हारा नाम क्या है ? उस दिन नाम पूछना तो भूल ही गई।”

सुदर्शन—“उस दिन सुबह उठकर सबसे पहले आपने नाम ही पूछा था और मैनें बता भी दिया था। मेरा नाम सुदर्शन है।”

कृतिका—“ओह ! सॉरी, मैं भूल गई।”

सुदर्शन—“ये भी सही है। कोई बात नहीं।”

कृतिका—“तुम करते क्या हो ?”

सुदर्शन—“चित्रकूट में जयसिंह जी है, उनका जेम्स एण्ड ज्वैलरी का बिजनेस है। उनके पास जॉब करता हूँ।”

कृतिका—“तो रात को इतनी देर तक क्या करते हो ? ऑफ़िस तो पाँच–छः बजे ऑफ हो जाता होगा। ज्यादा से ज्यादा सात बज जाते होंगे।”

सुदर्शन—“ऑफ़िस टाइम तो छः बजे तक है, लेकिन मैं रात को दस–ग्यारह बजे तक ऑवर टाइम करता हूँ। उस रात काम बहुत ज्यादाथा, इसलिए एक बज गए थे।”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“और बदकिस्मती से मैं मिल गई।”

सुदर्शन—“आप खुद के बारे में बार–बार ऐसे क्यों बोलती हो ?”

कृतिका—“अरे, तुम्हें बहुत प्रोब्लम हुई होगी ना। तुमने बताया था, वहाँ पुलिस भी आ गई थी।”

सुदर्शन—“पुलिस के आने के कारण थोड़ा टेन्शन में आया था, लेकिन इसमें बदकिस्मती वाली कोई बात नहीं है।”

कृतिका—“ओके।”

सुदर्शन ड्राइविंग करती हुई कृतिका को देखते हुए मन में सोचने लगा कि परी जैसी खूबसूरत और गुडिया जैसी मासूम। छोटे बच्चों जैसी खिलखिलाहट और फूलों जैसी सादगी। आज तो लग ही नहीं रहा, ये लड़की बेवड़ी है। उस रात सड़क पर तो इससे दूर भागने का मन कर रहा था और आज लग रहा है, हमेशा पास ही रहें तो…(मन में मुस्कुराकर) छोड़ यार। तू भी क्या–क्या सोचने लगता है ? पता नहीं क्या–क्या कर चुकी है ?”

कृतिका सुदर्शन को मुस्कुराता देखकर बोली—“क्या हुआ ?”

सुदर्शन—“नहीं, कुछ नहीं।”

कृतिका—“कुछ याद आ गया क्या, जो मन में हँस रहे हो ?”

सुदर्शन—“असल में, मैं उस रात के बारे में ही सोच रहा था।”

कृतिका—“अरे, उसके लिए एम सॉ सॉरी। ड्रिंक तो मैं रोज करती हूँ, लेकिन उस रात मेरे बॉयफ्रेंड ने ड्रिंक में कुछ मिला दिया था। अब पता नहीं, उसने क्या मिलाया ? दस–ग्यारह बजे तक तो मैं उसके साथ बैठकर ड्रिंक कर रही थी। उसके बाद क्या–क्या हुआ, मुझे ठीक से याद नहीं। सुबह उठी तो सामने तुम थे।”

सुदर्शन—“कोई बात नहीं।”

सुदर्शन मन में सोचने लगा कि कितनी अजीब बात है। प्यार के नाम पर गर्लफ्रैंड बनकर सब कुछ करवा लिया और धोखा खाने के बावजूद शर्म–शर्मिन्दगी जैसा कुछ भी नहीं।

कृतिका ने पूछा—“अच्छा, तुम्हारे घर में कौन–कौन है ?”

सुदर्शन—“मेरे घर में मम्मी–पापा है, भाई–भाभी है, एक बड़ी बहन है, बहन की भी शादी हो चुकी है। भाई तो घर में ही एक छोटी सी दुकान करता है और मैं यहाँ जॉब करता हूँ।”

कृतिका—“और तुम्हारे पापा ? वो क्या करते है ?”

सुदर्शन—“वो जमींदार है। वैसे अब तो सब भाई के साथ दुकान चलाते हैं।”

कृतिका—“ओके।”

सुदर्शन—“आपसे एक बात पूछूँ, अगर आप बुरा ना माने तो ?”

कृतिका—“हाँ, पूछो।”

सुदर्शन—“आप खुद को बिगड़ैल बोलती है। जब आपको पता है, आप बिगड़ैल क्यों है ? तो उन बातों से दूर क्यों नहीं रहती ? मेरा मतलब ये शराब पीना छोड़ दीजिए।”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“अब मुझे बिगड़ैल कहलाना अच्छा लगता है।”

सुदर्शन—“ये भी सही है।”

कृतिका ने हँसकर कहा—“सब सही ही है, यार ! जब बिना गलती के सज़ा मिलती है, तब यहीं लगता है। इससे अच्छा तो गलती कर ही लो।”

सुदर्शन—“मुझे आपकी जिन्दगी के बारे में कुछ मालूम तो नहीं है, लेकिन उस रात आपने जो बातें कहीं। उस तरीके से प्यार के नाम पर बेवकूफ बनना तो पूरी तरह से महामुर्खता है। आप शायद ये समझती है, आपने तो सच्चा प्यार किया था, लेकिन वो लड़का धोखा देकर चला गया। अब लोग आपके सच्चे प्यार को समझ नहीं सकते और बिना गलती के सज़ा देते हैं। मतलब आपको गलत बोलते हैं। अब प्यार के नाम पर गलत रास्ते पर चलेंगे, तो गलत ही कहलाएगें। प्यार का ये मतलब थोड़े ही है, हम प्यार के नाम पर कुछ भी मनमानी करें। मुझे तो ये सब करने वाली लड़कियाँ बहुत बेकार लगती है।”

सुदर्शन की बात सुनकर कृतिका का खिला हुआ चेहरा गंभीर होकर तनावग्रस्त हो जाता है। कृतिका गाड़ी की गति बढ़ाने लगती है।

सुदर्शन गाड़ी की गति बढ़ती देखकर कृतिका की ओर देखते हुए घबराकर मन में बोलने लगा कि क्या कर रहा है ? भूल गया, उस रात हाथ में पत्थर लेकर कैसे शेरनी की तरह दहाड़ रही थी ? अब तू नागिन की पूँछ पर पैर क्यों रख रहा है ?

सुदर्शन ने मासूमियत भरी आवाज़ में कहा—“कृतिका जी, मैं इतनी जल्दी मरना नहीं चाहता। अभी तो मेरी शादी भी नहीं हुई। कोई गर्लफ्रैंड भी नहीं बनाई। प्लीज ! गाड़ी धीरे चलाईए।”

कृतिका ने गाड़ी की गति कम करते हुए कहा—“ओह ! एम सॉ सॉरी। एम रियली वैरि सॉरी।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“कोई बात नहीं, इतना सॉरी बोलने की जरूरत नहीं हैं।”

कृतिका मुँह से कुछ बोले बिना सामने की ओर देखती हुई चुपचाप गंभीर मुद्रा में सामान्य गति से गाड़ी चलाती रहती है।

सुदर्शन मन में कहने लगा कि कुछ भी हो, हमें दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखना चाहिए। मुझे पूरी बात जाने बिना इस तरह ज्ञान नहीं बाँटना चाहिए।

सुदर्शन बार-बार कृतिका की ओर देखता है। कृतिका के मासूम चेहरे पर गंभीर तनाव साफ़-साफ़ झलक रहा है। कृतिका पूरे रास्ते चुपचाप ड्राईविंग करती रहती है।

आम्रपाली कॉलोनी नज़दीक आते ही सुदर्शन ने हाथ से आम्रपाली सर्किल की ओर संकेत करके कहा—“मुझे वहाँ उतार दीजिए।”

कृतिका सुदर्शन की बताई जगह पर आकर गाड़ी रोक देती है।

सुदर्शन ने कहा—“एम सॉरी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मेरी बातों से आपको बुरा लगा ना।”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“अरे, तुम क्यों सॉरी बोल रहे हो ? तुमने तो ठीक ही कहा, गलती तो मुझसे हुई है।”

सुदर्शन—“फिर भी, मुझे सोच–समझकर बोलना चाहिए। कोई भी इन्सान जान–बुझकर खुद का नुकसान नहीं करता। खुद का नुकसान तो गलती से, अन्जाने में या मजबुरी में ही करता है।”

कृतिका—“अब छोड़ो, यार ! मुझे तुम्हारी बात का बिल्कुल भी बुरा नहीं लगा।”

सुदर्शन—“थैक्यू। वैसे मेरे सॉरी बोलने की एक वजह और भी है।”

कृतिका—“क्या ?”

सुदर्शन—“उस रात मैनें भी आपको चांटे मार दिये थे।”

कृतिका खिलखिलाकर हँसती हुई बोली—“अच्छा।”

सुदर्शन ने आश्चर्य से कहा—“आप हँस रही है ?”

कृतिका—“मुझे हँसी इसलिए आई। क्योंकि तुम पहले इन्सान हो, जिसने मुझे चांटे मारने के बाद माफ़ी माँगी है। वरना मैं तो बचपन से बहुत चांटे खा चुकी हूँ।”

सुदर्शन—“अच्छा, लेकिन ऐसा क्यों ?”

कृतिका—“बस ऐसे ही। कभी मम्मी–पापा से, कभी स्कूल टीचर से, कभी फ्रैंड्स से और कभी–कभी आप जैसे अजनबी दोस्तों से। वो क्या है, मैं बचपन में बहुत शरारती थी और कॉलेज में आने के बाद बहुत बिगड़ गई। इसलिए डांट और चांटे खाने की आदत है।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“बचपन में शरारतें बहुत लोग करते हैं।”

कृतिका—“हाँ, लेकिन मैं कुछ ज्यादा ही करती थी और उस रात भी मैनें कुछ ना कुछ ऐसा किया होगा, जिसके कारण तुमने मुझे मारा। बताओ, क्या किया था मैनें ?”

सुदर्शन—“हम्म…अगर दूबारा मुलाकात हुई, तो बताऊँगा। अभी मैं चलता हूँ।”

कृतिका—“ठीक है, बाए।”

सुदर्शन ने गाड़ी से उतरकर दरवाजा बन्द करके शीशे नीचे की हुई खिड़की में से कहा—“अच्छा, फिर मिलेंगे।”

कृतिका—“हाँ, जरूर। तुम वहाँ किराये पर रहते हो ना ?”

सुदर्शन—“हाँ, मैं हनुमानगढ़ का रहने वाला हूँ। साढ़े चार साल से यहाँ जॉब कर रहा हूँ। पहले दो साल तक तो हर चार–छः महिने में किराये के कमरे बदलता रहा। फिर एक जान–पहचान वाले ने इस बिल्डिंग के मालिक से मिलाया। इस बिल्डिंग के मालिक ने कहा, मेरी इस बिल्डिंग में चार फ्लेट है। जब तक चारों फ्लेट बिक नहीं जाते, तब तक आराम से रहो। किराये के दो हजार रुपये दे देना। आपका किराया कम लगेगा और मेरे पूरी बिल्डिंग की देखभाल हो जाएगी। तब से ढ़ाई साल हो गए, यहीं रहता हूँ।”

कृतिका—“ओके, मैं अक्सर इधर से गुजरती हूँ। अब पहचान तो हो ही गई है। कभी आते–जाते मिलने पर हाल–चाल तो पूछ ही सकते हैं।”

सुदर्शन—“हाँ–हाँ, बिल्कुल। अच्छा अब मैं चलता हूँ।

कृतिका—“ठीक है। बाए।”

सुदर्शन गाड़ी से दूर हुआ और कृतिका शीशा ऊपर करके चली गई। सुदर्शन मुस्कुराता हुआ अपनी बिल्डिंग की ओर चला जाता है।

चार दिन बाद आठ अप्रेल, शनिवार की शाम को साढ़े सात बजे सुदर्शन कुर्सी पर बैठा अपने टेबल पर नगीने (कीमती पत्थर) चैक कर रहा है।

केबिन में जयसिंह अपनी चेयर पर बैठे कम्प्यूटर में कुछ काम पूरा करके उठकर केबिन से बाहर आकर बोले—“सुदर्शन ! मैं ऊपर जा रहा हूँ। तुम ये काम कर लेना।”

सुदर्शन—“ठीक है।”

जयसिंह सीढिया चढ़ते हुए ऊपर आकर किचन की ओर आने लगे। किचन में सुजाता खाना बनाने की तैयारी कर रही है।

जयसिंह किचन में आकर सुजाता की कमर पर हाथ डालते हुए सुजाता को पेट से पकड़कर अपने पास खींचकर सुजाता के गाल पर गाल मलते हुए बोले—“क्या बना रही हो ?”

सुजाता अपना गाल दूर करके मुस्कुराकर डांटती हुई बोली—“कुछ तो शर्म करो, नीचे सुदर्शन बैठा हैं। वो पहले भी कई बार हमें देख चुका है। पता नहीं, क्या सोचता होगा, हमारे बारे में ?”

जयसिंह सुजाता का गाल चूमकर मुस्कुराते हुए बोले—“क्या सोचता होगा ? यहीं सोचता होगा, शादी के चौबीस साल बाद भी सेठ जी और मैडम एक–दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। और फिर अपनी पत्नी से प्यार करने में कैसी शर्म ?”

सुजाता खुद को जयसिंह से छुड़ाकर जयसिंह को पीछे धकेलकर बोली—“हाँ, ठीक है। तुम्हें तो बस बहाना चाहिए। लेकिन अभी बाहर जाओ।”

जयसिंह—“अरे–अरे।”

सुजाता ने मुड़कर जयसिंह को किचन से बाहर धकेलते हुए कहा—“अरे–अरे, कुछ नहीं। अभी बाहर बैठो और मुझे खाना बनाने दो। जितना प्यार करना है, सुदर्शन के जाने के बाद बैडरूम में।”

जयसिंह सोफे की ओर जाते हुए बोले—“कोई बात नहीं। बना लो खाना। बैडरूम में आओ, फिर देखता हूँ तुम्हें।”

सुजाता मुस्कुराकर किचन के काम में लग गई।

जयसिंह सोफे पर बैठते हैं और दो मिनट बाद खड़े होकर वापस किचन के दरवाजे पर आकर बोले—“अभी खाना बनाना शुरू थोड़े ही किया है ?”

सुजाता किचन के काम में लगी हुई बोली—“क्या हुआ ? तुम्हारा कुछ खाने का मन है, तो बताओ। वहीं बना दूँगी।”

जयसिंह—“नहीं, खाना बनाना रहने दो। आज खाना बाहर खाते हैं।”

सुजाता आश्चर्य से मुड़ती हुई बोली—“ये अचानक बाहर खाने का ख़्याल कैसे आया ?”

जयसिंह—“बस आ गया, तो आ गया। तुम जल्दी से तैयार हो जाओ, मैं सुदर्शन को भेज देता हूँ।”

जयसिंह मुड़कर नीचे बेसमेंट में आकर सुदर्शन से बोले—“सुदर्शन, ये कल कर लेना। यार ! आज हम खाने के लिए बाहर जा रहे हैं।”

सुदर्शन—“ये भी सही है।”

सुदर्शन खड़ा होकर टेबल पर रखा सामान समेटने लगता है।

जयसिंह ने केबिन लॉक करके देर होती देखकर सुदर्शन से कहा—“ये सब टेबल पर ही पड़ा रहने दो। कल आकर कर लेना।”

सुदर्शन ने टेबल का सामान छोड़कर कहा—“ये भी सही है।”

जयसिंह ने सुदर्शन को चाबी देकर कहा—“सारी लाईट बन्द करके ऑफ़िस लॉक कर दो और तुम जाओ।”

जयसिंह सीढ़िया चढ़कर ऊपर चले गए। सुदर्शन सारी लाईटें बन्द करके सीढ़िया चढ़ते हुए ऊपर आकर ऑफ़िस लॉक करके सोफे पर बैठे जयसिंह के पास आकर चाबी देता है।

जयसिंह ने चाबी लेकर कहा—“थोड़ी देर बैठ जाओ। मैडम तैयार होकर आ रही है, फिर साथ ही चलते हैं। तुम्हें छोड़ देंगे।”

सुदर्शन जयसिंह के पास बैठ जाता है।

दस मिनट बाद बैडरूम का दरवाजा खोलकर सुजाता गले में दुपट्टा लपेटे हुए बन्द गले की घूटनों तक आने वाली डेनिम कुर्ती और चूड़ीदार लेगिंग पहने बाहर आती है।

जयसिंह और सुदर्शन सुजाता को निहारते हुए खड़े होते हैं।

सुजाता के आकर्षक और अनुपम सौन्दर्य को देखकर सुदर्शन ने मन में सोचा कि अगर कृतिका भी ऐसी होती तो कितना अच्छा होता। लेकिन वो तो बेवड़ी है। ऊपर से एक साल तक गर्लफ्रैंड बनकर सब कुछ करवा चुकी है। छोड़ यार, अपने को क्या ? जिसके साथ उसकी शादी होगी, उसकी किस्मत फूटेगी।

जयसिंह ने सीत्कार करते हुए कहा—“हाए…क्या लग रही हो। बाहर जाना कैंसल करके बैडरूम में चले ?”

सुजाता सांस भरती हुई मुँह फुलाकर हुई बोली—“अरे, सुदर्शन खड़ा है। बोलने से पहले आस–पास देखकर सोच तो लिया करो, क्या बोल रहे हो ?”

जयसिंह ने सुदर्शन के कंधे पर हाथ रखकर कहा—“अरे यार… अच्छा सुदर्शन तुम बताओ। मैनें कुछ गलत कहा ?”

सुदर्शन मुँह से कुछ बोले बिना चुपचाप मुस्कुराने लगता है।

जयसिंह—“लड़कियों की तरह शर्मा क्यों रहा है ? शर्माना छोड़कर ये बताओ, इतनी सुन्दर नारी सामने हो, तो उसके साथ बैडरूम में जाने का मन करता है या नहीं करता ?”

सुजाता अपने सर पर हाथ रखकर "हे भगवान !" बोलकर चलती हुई जयसिंह और सुदर्शन के पास आकर सुदर्शन के कंधे से जयसिंह का हाथ हटाकर खुद सुदर्शन के कंधे पर हाथ रखकर बोली—“चलो दूर हटो इससे। सुदर्शन में शर्म–लिहाज नाम की चीज है। इसे अपनी तरह बेशर्म मत बनाओ।”

जयसिंह हँसकर बोले—“इसमें बेशर्मी क्या हैं ? मैं अपनी पत्नी के साथ बैडरूम में जाने की बात कर रहा हूँ। किसी पराई नारी के लिए थोड़े ही कहा है। तुम तो ऐसे बोलकर रही हो, जैसे ये शादी के बाद अपनी पत्नी के साथ बैडरूम में जाएगा ही नहीं।”

सुजाता सुदर्शन के कंधे से हाथ हटाकर दोनों हाथ अपनी कमर पर रखकर बोली—“उफ्फ ! अब चलना है या यहाँ खड़े–खड़े बैडरूम–बैडरूम ही करोगे ?”

जयसिंह—“हाँ–हाँ, चलना क्यों नहीं है ?”

सुजाता—“हाँ, तो चलिए ना फिर।”

सुजाता, सुदर्शन और जयसिंह घर से बाहर आते हैं।

सुजाता ने अपने सैंडल पहनकर सुदर्शन से कहा—“सुदर्शन, तुम आ जाओ। वो लॉक कर देगें।”

सुदर्शन ने अपने जूते पहने और सुजाता के साथ चलते हुए बाहर गली में आया। गाड़ी में ड्राइवर के पास वाली सीट पर सुजाता बैठ गई और पिछली सीट पर सुदर्शन बैठ जाता है।

सुजाता ने कहा—“इनकी बातों पर ध्यान मत दिया करो। ये तो ऐसे ही मज़ाक में बोलते रहते हैं।”

जयसिंह ने घर के दरवाजे पर ताला लगाकर अपने जूते पहनकर घर के अन्दर की लाइट का स्वीच ऑफ किया और घर के मुख्य दरवाजे को बन्द करके गली में आकर गाड़ी में ड्राइविंग सीट पर बैठकर गाड़ी स्टार्ट करके चल पड़ते हैं।

जयसिंह अपना बचपन याद करके बोले—“सुजाता, मैनें तो आठ–दस साल की उम्र में ही तुमसे शादी करने का मन बना लिया था।”

सुजाता हँसकर बोली—“झूठे, इतना मत फेंको। पीछे बैठा सुदर्शन मन ही मन हँस रहा होगा। आठ–दस साल की उम्र में शादी की समझ थी तुम्हें, जो शादी करने का मन बना लिया था ?”

जयसिंह ने हँसकर कहा—“शादी की समझ नहीं थी, लेकिन फिल्मों और टीवी सीरियल में सुनता था। पति ने सारी रात पत्नी को बहुत तंग किया। पति रात भर पत्नी को सोने नहीं देता।”

सुजाता—“हाँ, तो ?”

जयसिंह—“तो तुम्हें याद होगा, बचपन में खेलते–खेलते हम बहुत बार आपस में लड़ते थे। तुम हर बार मुझे पीट देती थी और मैं रोने लगता था।”

सुजाता हँसकर बोली—“हाँ, लेकिन बाद में तुम्हें सॉरी बोलकर मनाती भी तो थी। और तुम हजार नखरे करने के बाद मानते थे।”

जयसिंह हँसकर बोले—“हाँ, बाबा, मनाती थी। तुम मनाती थी, तभी तो तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारी बहुत याद आती थी और एक–एक दिन गिनकर मैं तुम्हारे वापस आने का ईंतजार करता था। कई बार तुम्हारी बुआ और तुम्हारे भाईयों (बुआ के दो बेटे) से पूछता था, सुजाता कब आएँगी ? इस बार सुजाता आई क्यों नहीं ?”

सुजाता मुस्कुराती हुई बोली—“हम्म…मेरा भी यहीं हाल था। फिर ?”

जयसिंह—“फिर मैनें कई लोगों से पूछा, ये पति सारी रात पत्नी को तंग करते हैं, परेशान करते हैं। पति को कोई रोकता क्यों नहीं ? तो सबने कहा, पति को कोई नहीं रोक सकता। पति चाहे पत्नी को कितना भी परेशान करे, कितना भी तंग करे। और रात को तो बिल्कुल भी नहीं रोक सकते।”

सुजाता—“ओह,,,,, फिर तुमने क्या सोचा ?”

जयसिंह—“ये बातें सुनकर उस वक्त आठ–दस साल की उम्र में मैनें सोचा। जैसे तुम मुझसे बड़ी हो, इसलिए मेरी पिटाई कर देती हो। इसी तरह सभी लड़के बचपन में किसी ना किसी लड़की से पिटते होंगे। क्योंकि पति को कोई रोक नहीं सकता, इसलिए लड़के बड़े होकर शादी करके पति बन जाते हैं और फिर सारी रात पत्नी को तंग करके, पत्नी को परेशान करके बचपन की पिटाई का बदला लेते हैं। हमारे आस–पड़ोस के कई घरों में भी पति अपनी पत्नी की पिटाई करते थे। उनको देखकर मैं यहीं सोचता था, ये लोग अपने बचपन की पिटाई का बदला ले रहे हैं। लेकिन उस बचपन में पीटने वाली लड़की की शादी तो लड़के से पहले हो जाती है, इसलिए उसका बदला किसी दूसरी लड़की से लेते हैं। सभी लोग बहुत गलत करते है। पिटाई कोई और लड़की करती है, बदला किसी और लड़की से लेते हैं। शायद सब के सब अपने से बड़ी लड़की से डरते हैं। मैं ऐसा नहीं करूँगा। मैं तो बड़ा होकर सुजाता से ही शादी करूँगा और सुजाता से ही बचपन की पिटाई का हिसाब बराबर करूँगा।”

सुजाता खिलखिलाकर हँस पड़ी और अपनी हँसी रोककर बोली—“अच्छा, तो तुमने बचपन की पिटाई का हिसाब बराबर करने के लिए मुझसे शादी की है।”

जयसिंह—“और नहीं तो क्या ? तुम्हें तंग करके हिसाब तो बराबर करना ही था। और ये तो तुम्हें पता ही है, मैं हिसाब का कितना पक्का हूँ।”

सुजाता—“हम्म…तुम वापस घर आओ आज। फिर मैं बताती हूँ तुम्हें, तंग करना किसको कहते हैं ?”जयसिंह हँसकर बोले—“फिर तो आज बहुत मज़ा आएगा। गिन–गिनकर एक–एक बात का हिसाब करेंगे।”

सुजाता मुस्कुराकर बोली—“चुप करो ! अभी गाड़ी चलाओ चुपचाप।”

जयसिंह और सुजाता के बीच बातचीत करते हुए एक–दूसरे को छेड़ना–चिढ़ाना चलता रहता है। पिछली सीट पर सुदर्शन चुपचाप जयसिंह और सुजाता की बातें सुन रहा है। कभी–कभी सुजाता भी सुदर्शन की परवाह छोड़कर जयसिंह को छेड़ती और चिढ़ाती है। आम्रपाली सर्किल पर आकर जयसिंह गाड़ी रोकते हैं।

सुदर्शन ने लेफ्ट साइड गाड़ी से निकलकर कहा—“ठीक है, सेठ जी।”

जयसिंह—“हाँ, ठीक है। कल आराम से आ जाना, बारह–एक बजे तक।”

सुदर्शन—“ये भी सही है।”

सुदर्शन अपनी बिल्डिंग की ओर आते हुए मुस्कुराता हुआ मन में कहने लगा कि सेठ जी और मैडम के हाव–भाव देखकर लग रहा है, दोनों आज सारी रात जागेंगे और कल दोपहर तक सोएंगे। वरना हमेशा तो कहते हैं, सुबह जल्दी आना। और आज कह रहे हैं, बारह–एक बजे तक आराम से आना। ये भी सही है। सेठ जी ना मोटे, ना पतले। बिना दाढ़ी–मूँछ के क्लीन शेव चेहरे वाले पैंतालिस साल की उम्र में भी एकदम फिट गोरे रंग के अच्छे सेहतमंद और तंदुरुस्त सुडौल शरीर के मालिक। और मैडम उनचास साल की उम्र में भी गोल–मटोल कसावट भरे सेहतमंद और तंदुरुस्त अच्छे खूबसूरत चुस्त शरीर की मालकिन। मैडम के चेहरे पर ऐसी रौनक और ऐसा तेज है, जैसे कोई देवी हो। सेठ जी से चार साल बड़ी होकर भी हर मामले में सेठ जी को बराबर की टक्कर देती है। और फिर इसमें बुराई भी क्या है ? सबको खुश रहने का अधिकार है। सिर्फ उम्र के कारण पाबंदी लगाना गलत है। आखिर दोनों पति–पत्नी है, कुछ गलत थोड़े ही कर रहे हैं।

जयसिंह गाड़ी आगे चलाने लगे, तभी सुजाता ने कहा—“अरे, रुको।”

जयसिंह—“क्या हुआ ?”

सुजाता—“सुदर्शन साढ़े चार साल से हमारे पास काम कर रहा है। लड़का भी बहुत अच्छा है। रात को देर तक ऑफ़िस में काम करता है। संडे को छुट्टी के दिन भी आता है। हमारे किसी काम के लिए कभी मना नहीं करता। तो कभी तुम भी उसके बारे में सोच लिया करो।”

जयसिंह—“काम के बदले पैसे देता तो हूँ। रात के ऑवर–टाइम के अलग से पैसे देता हूँ, संडे के अलग से पैसे देता हूँ। अब और क्या सोचूँ ?”

सुजाता—“उफ्फ ! अरे, कल छुट्टी दे देते ना उसे। वो भी थोड़ा घूम–फिर लेगा। उसका मन बहल जाएगा। यहाँ अकैला रहता है। बस हमारा ऑफ़िस और घर। पता नहीं, मन कैसे लगता है उसका ?”

जयसिंह—“हम्म, बात तो सही है। चलो, बोल देते हैं, कल मत आना।”

जयसिंह गाड़ी आगे लाकर सुदर्शन के पास रोकते हैं। सुदर्शन रुक जाता है।

सुजाता—“सुदर्शन, इधर आना।”

सुदर्शन सुजाता के पास आता है।

जयसिंह—“अरे, भई ! तुम्हारी मैडम कह रही है, सुदर्शन यहाँ अकैला रहता है। कभी उसके बारे में भी सोच लिया करो। कल उसे छुट्टी दे दो, वो भी थोड़ा घूम–फिर लेगा, उसका भी मन बहल जाएगा। तो कल तुम मत आना। परसो सोमवार को ही आ जाना।”

सुदर्शन—“ठीक है, सेठ जी।”

सुदर्शन जाने लगता है।

सुजाता बोली—“सुदर्शन, रुको तो।”

सुदर्शन ने मुड़कर कहा—“हाँ, मैडम।”

सुजाता ने जयसिंह से कहा—“इसे कुछ दे तो दो।”

जयसिंह—“क्या दूँ ?”

सुजाता—“ओहो ! अपना पर्स दो।”

जयसिंह ने अपनी जेब से पर्स निकाल कर सुजाता को दिया और सुजाता ने पर्स में से एक पाँच सौ का नोट निकालकर सुदर्शन से कहा—“इधर आना।”

सुदर्शन आगे आता है।

सुजाता ने पाँच सौ रुपये का नोट सुदर्शन को देते हुए कहा—“ये लो। कल कहीं घूम–फिर लेना, कुछ खा–पी लेना। ठीक है।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“लेकिन पैसे देने की क्या जरूरत है ? सेठ जी सैलरी देते तो हैं।”सुजाता ने मुस्कुराकर कहा—“सेठ जी का हिसाब सेठ जी के साथ किया करो। ये मेरी तरफ़ से है। अगर तुम्हारी मम्मी तुम्हें पॉकेट मनी के पैसे देती, तो तुम मना करते क्या ?”

सुदर्शन जयसिंह की ओर देखता है। जयसिंह ने मुस्कुराते हुए पलकें झपकाई। सुदर्शन सुजाता की ओर देखकर मुस्कुराते हुए पैसे ले लेता है।

जयसिंह ने सुजाता से कहा—“अब चले।”

सुजाता—“हाँ, चलो।”

जयसिंह गाड़ी चलाकर जाने लगते हैं।

सुदर्शन जाती हुई गाड़ी को देखते हुए मुस्कुराकर मन में बोला कि ये मैडम भी यार………कभी–कभी इमोशनल कर देती है। इतने प्यार से बोलती है। जहर खाने को बोले, तब भी मना करना मुश्किल है। बहुत किस्मत वाले हैं, सेठ जी। खूबसूरत पत्नी तो बहुत सारे लोगों को मिलती है, लेकिन मैडम का दिल मैडम की खूबसूरती से भी ज्यादा खूबसूरत है। अच्छी बात ये है, सेठ जी मैडम का बहुत सम्मान करते हैं। वरना सौ(100) में से निनन्यानवें(99) पति अपनी पत्नी की बुराई ही करते हैं। और उन निनन्यानवे(99) में से नब्बे(90) पति झूठी बुराई करते हैं। समझ में नहीं आता, पहले तो पुरुष हाथ धोकर नारी के पीछे पड़ते हैं। फिर वहीं नारी जब पत्नी बन जाती है, तो बुराई करते हैं। खैर, इन्सान के पास जो होता है, इन्सान उसकी कदर नहीं करता। जो लोग कदर करते हैं, वो सेठ जी और मैडम की तरह हमेशा खुश रहते हैं।

जयसिंह की गाड़ी नजरों से ओझल होने के बाद सुदर्शन अपनी बिल्डिंग की ओर चला जाता है।

गाड़ी में जयसिंह ने सुजाता से कहा—“तुम्हें सुदर्शन को पाँच सौ रुपये देने की क्या जरूरत थी ? नहीं देते, तो भी चल जाता। फिर भी अगर देने ही थे, तो सौ–पचास दे देती। वो भी बहुत थे।”

सुजाता—“ओहो, आज बहुत दिनों बाद तुमने बाहर डिनर के लिए कहा। हम दोनों इतने खुश है। खुशी में मैनें उसे पाँच सौ रुपये दे दिये, तो कौनसा बड़ा नुकसान हो गया ?”

जयसिंह—“अरे, तुम गलत समझ रही हो। नुकसान कुछ नहीं हुआ, मगर ऐसे पैसे देने से आदत पड़ जाती है। अब कल को मैं खुश होकर उसे सौ–पचास रुपये दूँगा, तो वो पाँच सौ की उम्मीद करेगा। मैडम ने तो पाँच सौ रुपये दिये थे, सेठ जी सौ–पचास रुपये से ऊपर ही नहीं उठते।”

सुजाता ने हँसकर कहा—“तुम भी ना। हर बात में बिजनेस करना नहीं छोड़ते। खुश होकर पैसे भी हिसाब लगाकर देते हो। फिर बोलते हो, लोग मुझे कंजूस क्यों कहते हैं। जयसिंह ने मुस्कुराकर कहा—“चलो, हम कंजूस ही सही। तुम पाँच सौ–पाँच सौ देकर तारीफ़ बटोरती रहो। लोग दानवीर कर्ण की जगह दानवीर सुजाता बोलने लगेंगे।”सुजाता ने खिलखिलाकर हँसते हुए कहा—“तो तुम्हें मेरी तारीफ़ से जलन क्यों हो रही है ?”

जयसिंह—“जलन तो होगी ही। कहीं तुमने खुद की तारीफें सुनकर मुझे भाव देना बन्द कर दिया तो ?”

सुजाता—“फिर तो अगली बार सुदर्शन को हजार रुपये दूँगी। तुम्हें और ज्यादा जलाने के लिए।”

जयसिंह—“हाँ, देती रहो। वसूल तो तुमसे ही करूँगा, वो भी सूत समेत।”

सुजाता—“हाँ, मैं भी देखती हूँ। कैसे वसूल करते हो ?”

जयसिंह मुस्कुराकर बोले—“अभी डिनर के बाद घर वापस आकर देख लेना। जब हमेशा की तरह तुम्हें सारी रात सोने नहीं दूँगा।”

सुजाता ने मुस्कुराकर कहा—“ओह…ये तो डिनर के बाद घर आकर ही देखेंगे। हमेशा की तरह कौन, किसको सोने नहीं देगा ?”

जयसिंह ने मुस्कुराकर कहा—“अच्छा…ये बात है ?”

सुजाता ने मुस्कुराते हुए कहा—“हम्म………इसलिए तो सुदर्शन को कल छुट्टी दिलवाई है। ताकि हम दोनों प्यार करते हुए डिस्टर्ब ना हो और जी भरकर एक-दूसरे को प्यार दे सकें।”

जयसिंह—“हम्म…? ये तो मैनें सोचा ही नहीं।”

सुजाता—“तुम्हीं तो हर वक्त मौका ढूंढते रहते हो। फिर हमें काफ़ी दिन भी हो गए हैं। मैनें सोचा, बच्चे तो मंडे (सोमवार) को शाम तक आएँगे। सुदर्शन को छुट्टी दे देते हैं। घर में सिर्फ हम दोनों होंगे, तो टेन्शन फ्री होकर एक-दूसरे से प्यार कर सकते हैं।”

जयसिंह ने सुजाता की जांघ पर हाथ रखकर सीत्कार करते हुए कहा—“हाए,,,तुमने तो दिल खुश कर दिया।”

सुजाता खिलखिलाकर हँसती हुई जयसिंह की हथेली अपनी जांघ से हटाकर अपनी हथेली में लेकर बोली—“लेकिन अभी खुद पर काबू रखो और सामने देखकर गाड़ी चलाओ। प्यार करने के लिए घर जिन्दा पहुंचना भी जरूरी है। समझे ?”

जयसिंह ने मुस्कुराकर कहा—“आई लव यू, सुजाता। तुम इसी तरह प्यार देती रहो, हम अपना ख़्याल रखते रहेंगे।”

सुजाता ने दोनों हाथों से जयसिंह की हथेली पकड़कर कहा—“लव यू टू, जय। तुम भी अपने प्यार में कमी मत आने देना।”

जयसिंह और सुजाता दोनों मुस्कुराते हुए सामने देखने लगते हैं। जयसिंह अपना हाथ सुजाता के हाथों से हटाकर वापस स्टीयरिंग पर ले आए और एक रेस्टोरेन्ट की पार्किंग में आकर गाड़ी रोककर बन्द कर देते हैं। दोनों गाड़ी से उतरकर हाथ में हाथ डाले रेस्टोंरेन्ट में आकर एक टेबल पर आमने-सामने बैठते हैं।

जयसिंह ने कहा—“तो बताओ, क्या खाओगी ?”

सुजाता—“जो तुम खिलाना चाहो। तुम डिनर पर लाए हो, इसलिए आज तुम्हारी पसन्द।”

जयसिंह—“अच्छा, आज मेरी पसन्द ?”

सुजाता ने स्टाइल से कहा—“हाँ, तुम भी क्या याद करोगे ? तुम्हें तुम्हारी पसन्द से चलने वाली घरवाली मिली है।”

जयसिंह—“और हर वक्त जो तुम मुझ पर ऑर्डर चलाती हो वो ?”

सुजाता हँसकर बोली—“अब प्यार में इतना अधिकार तो होता है ना ?”

जयसिंह ने मुस्कुराते हुए कहा—“चलो, जब बात प्यार की है, तो ठीक है। हम तुम्हारा हर सितम सह लेंगे। दिल दिया है, लेकिन जान नहीं देंगे। जब तक जियेगें, तुमसे प्यार करेंगे। बोलो, मंज़ूर है ?”सुजाता ने खिलखिलाकर हँसते हुए कहा—“जी, हुज़ूर ! बिल्कुल मंज़ूर है।"

तीन वेटर जयसिंह और सुजाता के पास ऑर्डर लेने के लिए आते हैं। जयसिंह ने सुजाता की पसन्द से खाने का ऑर्डर दिया।

पाँच मिनट बाद चार वेटर खाना ले आए और टेबल पर सजा देते हैं। जयसिंह और सुजाता मुस्कुराते हुए खाना खाने लगते हैं। खाने के दौरान जयसिंह रोमांटिक बातें करते हुए सुजाता को छेड़कर चिढ़ाते हैं। सुजाता भी रोमांटिक होकर खुलकर जयसिंह की हर बात का जवाब देती है। खाना खाकर पन्द्रह मिनट बाद जयसिंह ने सुजाता की पसन्द से दो आइसक्रीम मंगाई। आइसक्रीम खाने के बाद जयसिंह ने वेटर को बुलाकर बिल मँगाया। बिल देकर जयसिंह और सुजाता टेबल से उठे और बाहर आकर एक–दूसरे के हाथों में हाथ डाले रोड़ पर घूमते हुए रोमांटिक होकर रोमांस की बातें करने लगते हैं।

कुछ देर टहलकर सुजाता ने कहा—“अब घर चलते हैं, बहुत हो गया सड़क पर रोमांस।”

जयसिंह—“चलते हैं, इतनी भी क्या जल्दी है ? अभी तो सिर्फ पौने दस ही बजे हैं।”

सुजाता—“हाँ, लेकिन अब आस–पास सिर्फ यंगस्टर रह गए हैं। हमारी उम्र के सब लोग अपने–अपने घर चले गए।”

जयसिंह—“तो क्या हुआ ? यंगस्टर से क्या प्रोब्लम है ? सुदर्शन के सामने तो तुम खुलकर बातें करती हो, वो यंगस्टर नहीं है क्या ?”

सुजाता—“अरे, सुदर्शन की बात अलग है। वो बहुत अच्छा और समझदार लड़का है। उसे पता है, हम पति–पत्नी है।”

जयसिंह—“हम्म,,,,,तो चलो, इन सबको भी बता देते हैं, हम पति-पत्नी है।”

सुजाता ने हँसकर कहा—“अरे, तुम भी ना। सुदर्शन के दिल में हमारे लिए बहुत इज्ज़त है। ये हमें पता है, लेकिन इन सबके बारे में हमें क्या पता ? कौन कैसा है ? कौन क्या सोचता है ?”

जयसिंह ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ–हाँ, मैं सब समझता हूँ। इसलिए तो मैं सुदर्शन के इलावा स्टाफ में किसी और को ज्यादा मुँह नहीं लगाता।”

सुजाता—“हम्म।”

जयसिंह—“अच्छा, चलो चलते हैं। अब यहाँ सिर्फ शराबी ही घूम रहे हैं।”

सुजाता ने हँसकर कहा—“हाँ, इसलिए तो कहा मैनें। कहीं हमें भी सुदर्शन की तरह साँवरमल जी की बेटी कृतिका जैसी कोई प्रेम–दीवानी या कोई प्रेम–दीवाना ना मिल जाएँ ?”

जयसिंह ने हँसकर कहा—“हाँ, चलो।”

जयसिंह और सुजाता वापस रेस्टोरेन्ट की पार्किंग में आकर गाड़ी में बैठे और जयसिंह गाड़ी स्टार्ट करके पार्किंग से निकालकर अपने घर की ओर आने लगते हैं।

जयसिंह ने रात के समय घर की निगरानी के लिए बहादुर नाम का एक नेपाली चौकीदार रखा हुआ है। बहादुर रात को दस बजे आता है और सुबह छः बजे तक घर की पहरेदारी करता है।

जयसिंह की गाड़ी घर के सामने आकर रुकती है। दरवाजें के पास कुर्सी पर हाथ में लम्बा और मोटा डंडा लिए बैठा आयु में चालीस(40) वर्ष का बहादुर खड़ा होकर दरवाजा खोलकर गाड़ी से उतरकर आए जयसिंह और सुजाता को सल्यूट करता है।

जयसिंह—“और बहादुर, सब ठीक है ?”

बहादुर—“हाँ, शाब।”

जयसिंह अपनी हाथ घड़ी में टाइम देखते हैं। रात के दस बजकर चोदह मिनट हुए है।

जयसिंह ने बहादुर से कहा—“टाइम के बहुत पक्के हो। दस बजे से पहले ही आ गए होंगे ?"

बहादुर ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, शाब। ड्यूटी टो ईमानदारी शे करना चाहिए ना ?"

जयसिंह ने मुस्कुराकर कहा—“बिल्कुल सही बात है।"

जयसिंह और सुजाता अन्दर आकर जूते-सैंडल निकालते हैं। सुजाता घर के अन्दर की लाइट का स्वीच ऑन करती है और जयसिंह ताला खोलने लगे। बहादुर बाहर का मुख्य दरवाजा बन्द करके अपनी कुर्सी पर बैठ जाता है

जयसिंह दरवाजा खोलकर अन्दर आकर ताला दीवार के खाने में रखकर बैडरूम में चले गए और सुजाता अन्दर से दरवाज़ा बन्द करने लगी। जयसिंह बैडरूम में आकर मोबाइल, पर्स वगैरह निकालकर टेबल पर रखकर बॉथरूम में चले गए।

सुजाता हॉल की लाइट बन्द करके बैडरूम में आकर दरवाजा बन्द करके अपना दुपट्टा आईने के पास टांग कर बैड पर बैठती है। जयसिंह बॉथरूम से बाहर आकर तौलिए से हाथ–मुँह पोंछने लगे। सुजाता उठकर बॉथरूम में चली गई। जयसिंह तौलिया रखकर म्यूजिक प्लेयर के पास आकर म्यूजिक प्लेयर ऑन करके गाने सलेक्ट करने लगते हैं। सुजाता बॉथरूम से निकली और तौलिया उठाकर हाथ–मुँह पोंछने लगी। जयसिंह रोमांटिक गानों का एक नया फोल्डर बनाकर मध्यम आवाज़ में गाने चलाते हैं।

पहला गाना शुरू होता है—

चन्दन सा बदन, चंचल चितवन,

धीरे से तेरा ये मुस्काना,

मुझे दोष न देना जगवालों,

हो जाऊं अगर मैं दीवाना,

जयसिंह आकर बैड पर बैठकर गाना सुनते हुए तौलिए से हाथ–मुँह पोंछती हुई सुजाता को प्यार भरे मिलन की हसरत से निहारने लगते हैं।

सुजाता हाथ–मुँह पोंछकर तौलिया रखकर आईने के सामने जाकर जयसिंह की ओर पीठ करके खड़ी होकर अपने हाथों से चूड़ियाँ, कानों से ईयर रिंग और गले से मंगलसुत्र निकालकर आईने के सामने रखती है और सर के बाल खोलती हुई मुड़कर जयसिंह के सामने खड़ी हुई। जयसिंह सुजाता को निहारते हुए खड़े होकर अपनी शर्ट और बनियान निकाल देते हैं।

सुजाता और जयसिंह एक–दूसरे को निहारते हुए करीब आते हैं। जयसिंह के हाथ सुजाता की कमर पर और सुजाता के हाथ जयसिंह के कंधों पर आ गए।

सुजाता की आँखों में देखते हुए मुस्कुराहट के साथ जयसिंह बोले—“हम्म, रास्ते में बहुत बोल रही थी। अब देखो, आज तुम्हारा क्या हाल करता हूँ ?”

जयसिंह से आँखें मिलाकर मुस्कुराती हुई सुजाता बोली—“देखते हैं। जैसे बचपन में मुझसे पिटकर रोते थे, कहीं आज भी उसी तरह रोना शुरू मत कर देना। पता है ना, मंडे की मॉर्निंग तक सिर्फ तुम हो और मैं हूँ।”

जयसिंह रोमांचित होकर सुजाता को अपनी ओर खींचकर सुजाता की पीठ और गाल सहलाते हुए बोले—“हाए,,,,तभी तो तुमसे कह रहा हूँ, सुजाता। बचपन में मुझे बार-बार रुलाकर तुमने जवाँन होते-होते मेरे दिल में अपने प्यार की ऐसी प्यास जगाई, जो तुम्हें पाकर भी बिल्कुल वैसी ही है, जैसी चौबीस साल पहले थी।”

सुजाता मचलकर जयसिंह की पीठ और गाल मलती हुई बोली—“मैं भी तुम्हारे लिए उतनी ही दीवानी हूँ, जय। जितनी चौबीस साल पहले थी।”

जयसिंह सुजाता का गाल चूमकर बोले—“और हो भी क्यों ना ? हम मिले भी तो बहुत मुश्किलों से थे। भूल गई, हम कितना तड़पे थे एक-दूसरे के लिए ?”

सुजाता भावुक होकर बोली—“मुझे सब याद है। मेरी तो सारी उम्मीदें ही टूट गई थी, जब तुम किसी और के हो गए थे। मैंने तो तुम्हें किसी और का मान भी लिया था।”

जयसिंह जज़्बाती होकर बोले—“मैं भी बहुत रोया था, तुम्हारे लिए। जब तुम मुझे झूठा, धोखेबाज, फरेबी, बेवफा और मक्कार बोलकर गई थी। उस वक्त मेरी जीने की चाहत ही खत्म हो गई थी।”

सुजाता अफ़सोस के साथ बोली—“एम सॉरी, जय। मुझे माफ़ कर दो। मैं तुम्हें किसी और के साथ सहन नहीं कर पाई। उस वक्त मैं टूटकर बिखर गई थी।"

जयसिंह सुजाता का गाल सहलाते हुए बोले—“नहीं सुजाता, तुम माफ़ी मत माँगो। अगर तुम वो सब नहीं कहती, तो शायद हमारा मिलना नामुमकिन था।”

सुजाता जयसिंह का गाल सहलाती हुई बोली—“हमारा प्यार सच्चा है, जय। जिनके प्यार में सच्चाई और गहराई होती है, उनका मिलन जरूर होता है।

जयसिंह ने सुजाता का गाल चूमकर कहा—“सही कहा, तुमने। मुश्किलें तो बहुत आई, लेकिन आखिर में जीत हमारे प्यार की हुई और हमने हमेशा के लिए एक-दूसरे को पा लिया।”

सुजाता अधीर होकर अपने होंठ जयसिंह के होंठो के पास लाकर बोली—“हाँ ! चलो, आज फिर प्यार में खोकर एक-दूसरे समा जाए।”

जयसिंह बेक़ाबू होकर सीत्कार करते हुए सुजाता की पीठ और गाल मलते हुए बोले—“हाँ ! आओ। जब तक हम अकैले है, सब कुछ भूलकर सिर्फ एक-दूसरे से प्यार करें।”

सुजाता और जयसिंह एक–दूसरे के होंठो को अपने होंठो में लेकर आपस में परिरंभ करके एक-दूसरे का बदन सहलाते और मलते हुए चुम्बन में मग्न होकर गाना सुनते हुए एक–दूसरे के होठों का रसपान करने लगते हैं।

म्यूजिक प्लेयर में गाना चल रहा है—

नारी— होठों पे बस, तेरा नाम है,

तुझे चाहना, मेरा काम है,

तेरे प्यार मे पागल हूँ मैं, सुभ-ओ-श्याम,

जानम ! आई लव यू, यू लव मी।

पुरुष— होठों पे बस, तेरा नाम है,

तुझे चाहना, मेरा काम है,

तेरे प्यार मे पागल हूँ मैं, सुभ-ओ-श्याम,

जानम ! आई लव यू, यू लव मी।

सुजाता के साथ परिरंभ करके चुम्बन में मग्न जयसिंह कामावेश में एक हाथ सुजाता के गाल पर रखकर सुजाता के दूसरे गाल पर अपना गाल मलते हुए बोले—“आई लव यू, सुजाता।”

जयसिंह की पीठ और सर के बालों को सहलाती हुई सुजाता कामोत्तेजना में जयसिंह के सर के बाल पकड़कर जयसिंह की सांसों से सांस मिलाकर बोली—“लव यू टू, जय।”

सुजाता और जयसिंह एक–दूसरे को अपनी बाहों में कसकर परिरंभ करते हुए चुम्बन में मग्न होकर एक-दूसरे का बदन सहलाते और मलते हुए धीरे–धीरे बैड पर आते हैं। दोनों के बीच प्यार भरी कुश्ती शुरू हो जाती है। तन के कपड़े एक–एक करके आहिस्ता–आहिस्ता तन से अलग होकर फर्श पर गिरते हैं। एक–दूसरे के चुम्बन और आलिंगन से दोनों के जिस्मों में गर्माहट बढ़ने लगती है। एक–दूसरे के शरीर को सहलाते और मलते हुए कामोन्माद में दोनों के मुँह से कभी सीत्कार और कभी आह निकलती है। एक–दूसरे के साथ रमण में पूर्णतः तल्लीन हो चुके सुजाता और जयसिंह के प्यार भरे मिलन में शरीर से शरीर टकराने की आवाजें बार–बार गुँजने लगती हैं। दोनों तन से तन के मिलन की मस्ती में लीन होकर एक–दूसरे का बराबर साथ निभाते हुए बारंबार आपस में उलझकर एक–दूसरे पर प्यार के सावन की मूसलाधार बरसात करते हुए एयरकंडीशनर का वातानुकूलित तापमान होने पर भी पसीने में भीग जाते हैं।एक-दूसरे को पति–पत्नी के मधुर मिलन का अनुपम सुख देते हुए प्रेम में मस्त होकर दोनों बार-बार चरमोत्कर्ष पाकर थकान के बावजूद रुक-रुककर एक-दूसरे से लिपटकर फोरप्ले करते हुए संगीतमय वातावरण में सुस्ताने के बाद कामोन्माद में आकर बारंबार प्यार के समुन्द्र में गोते लगाकर एक–दूसरे की तेज–तेज चलती साँसों में इश्क की बिखरती खुशबू को महसूस करके मस्ती में आकर बारंबार प्रेम के आकाश में ऊँची–ऊँची उड़ानें भरकर एक–दूसरे के दिलों की बढ़ी हुई धड़कनों की रफ़्तार को सुनकर सुजाता और जयसिंह असीम प्रेम–आनन्द अनुभव करते हैं।

म्यूजिक प्लेयर में एक के बाद एक रोमाटिंक गाने चल रहे हैं–

यार को मैंने, मुझे यार ने, सोने ना दिया,

प्यार ही प्यार किया, प्यार ही प्यार किया,

प्यार ने सोने ना दिया,

उसकी बाहों के समन्दर, में यू कश्ती सा बदन,

प्यार की मौज़ ने, दिलदार ने, सोने ना दिया,

मुझसे लिपटा था, दुपट्टे की तरह, मेरा सनम,

मेरी चाहत के तलबदार ने, सोने ना दिया,

रात के पौने तीन बजे एक-दूसरे को अपनी बाहों में समेटकर हाँफते हुए तीव्रता से मिलन में मग्न सुजाता और जयसिंह चरमोत्कर्ष पाकर एक-दूसरे से कसकर लिपटते हुए लम्बे चुम्बन के बाद अलग होकर हाँफते हुए लेटकर सुस्ताने लगते है।

सुजाता आनंदित होकर हाँफती हुई जयसिंह की ओर देखकर बोली—"आज तो पुराने दिन याद आ गए। अक्सर शादी के कुछ साल बाद लोगों का प्यार कम हो जाता है, लेकिन हमारे प्यार में हमारे हर मिलन के बाद एक नई ताज़गी महसूस होती है। जैसे शादी के बाद हमारा प्यार धीरे-धीरे जवाँन हुआ है।

जयसिंह हर्षित होकर हाँफते हुए सुजाता की ओर देखकर बोले—"प्यार कम होता नहीं है। लोग घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी और बच्चों की परवरिश में उलझकर प्यार करना भूल जाते हैं। लेकिन हम मौका मिलते ही एक-दूसरे से टूटकर प्यार करते हैं। जैसे हमें प्यार करने का आखिरी मौका मिला हो।"

सुजाता मुस्कुराती हुई बोली—"हाँ, घर-गृहस्थी और बच्चों की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए पति-पत्नी के लिए रेग्युलरली एक-दूसरे को मिलन का सुख देना पॉसिबल नहीं है। लेकिन पति-पत्नी को एक-दूसरे के लिए भी वक्त निकालना चाहिए। पति-पत्नी एक-दूसरे को खुशी नहीं देंगे, तो और कौन देगा ?

जयसिंह हाँफना कम करके बोले—"हाँ, अगर पति-पत्नी एक-दूसरे की हर खुशी का ख्याल रखें, तो उनके प्यार में कभी कमी नहीं आएगी। पति-पत्नी के बीच प्यार बनाए रखने के लिए ये सुख भी जरूरी है।"

सुजाता सुस्ताकर मुस्कुराती हुई जयसिंह के ऊपर आकर बोली—"हम्म, जरूरी तो है। वैसे बचपन में मुझसे हुई पिटाई का हिसाब बराबर हुआ या नहीं ? फिर हमें सुदर्शन को दिये पाँच सौ रुपये का हिसाब भी करना है।"

जयसिंह उत्साहित होकर सुजाता की जांघों पर हाथ फेरते हुए बोले—"हिसाब बराबर करना कौन चाहता है ? मेरा फायदा तुम्हारा हिसाब बराबर करने में नहीं, तुम्हारे साथ हिसाब बरकरार रखने में है। और ये तो तुम्हें पता ही है, मैं ऐसा कुछ नहीं करता, जिसमें मेरा नुकसान हो।"

सुजाता प्रफुल्लित होकर जयसिंह की हथेलियों को अपनी हथेलियों में लेकर जयसिंह के ऊपर लेटती हुई बोली—"चलो, फिर तैयार हो जाओ। तुम्हारे हिसाब में इज़ाफा करती हूँ। तुम भी क्या याद करोगे ? तुम्हें इतना प्यार देने वाली घरवाली मिली है।"

सुजाता रोमांचित होकर एक बार फिर जयसिंह के ऊपर छा गई और जयसिंह पुलकित होकर सुजाता का उत्साह बढ़ाने लगे। दोनों को तन से तन के मिलन में एक-दूसरे का सम्मानजनक साथ पाकर मन से मन के मिलन का अनुपम प्रेम-आनंद मिल रहा है। एक-दूसरे में समाकर तन और मन से अनुपम मिलन के आंनद का अद्वितीय प्रेम-सुख अनुभव करते हुए जयसिंह बचपन की पिटाई का बदला लेते हैं और सुजाता हिसाब बराबर करती है। एक-दूसरे से सम्मानपूर्वक पूर्ण सहयोग मिलने के कारण उत्साहित होकर एक-दूसरे को तन और मन से मिलन का अपार सुख देने के लिए बारंबार आपस में उलझते हुए थकान से चूर होकर पस्त होने तक सुजाता और जयसिंह एक-दूसरे से बेशुमार प्यार करते हैं।

सुबह के पौने पाँच बजे एक-दूसरे से पति-पत्नी के मिलन का भरपूर सुख पाकर एक-दूसरे को तन और मन से पूर्णतः तृप्त करके थकान से शिथिल होकर सुजाता के ऊपर लेटे हुए थकान से शिथिल होकर जयसिंह के पैरों में पैर उलझाए सुजाता अपनी बाहों में समेटकर जयसिंह को सीने से चिपकाए जयसिंह की बाहों के आगोश में सुजाता पीठ पर हाथ डालकर जयसिंह के नीचे लेटी हुई सुजाता के होंठो से लगे हुए जयसिंह के होंठो के बीच दोनों के मधुर मिलन में सुजाता और जयसिंह को मिली तन और मन की पूर्णतः तृप्ति का अनुभव करवाता हुआ चुम्बन चल रहा है।

म्यूजिक प्लेयर में गाना चल रहा है—

तुम मिले, दिल खिले,

और जीने को क्या चाहिए…

ना हो तू उदास, तेरे पास पास,

मैं रहूँगा ज़िन्दगी भर।

सारे संसार का प्यार मैंने तुझी में पाया,

तुम मिले, दिल खिले,

और जीने को क्या चाहिए,

सुजाता और जयसिंह के होंठ से अलग होते हैं।

जयसिंह पूर्णतः तृप्ति से सुजाता के गाल पर गाल रखकर ठंडी आह भरते हुए बोले—“हमारे मिलन से मेरी आत्मा तृप्त हो जाती है। सुजाता, आई लव यू।”

सुजाता पूर्णतः तृप्त भाव से जयसिंह के सर पर अपना एक हाथ ले जाकर जयसिंह के बालों में ऊँगलियाँ फिराती हुई बोली—“लव यू टू, जय। मेरी आत्मा तो सिर्फ हमारे मिलन से ही तृप्त होती है।”

सुजाता और जयसिंह मुस्कुराते हुए एक–दूसरे का चेहरा निहारने लगे। अपने अनुपम मिलन का असीम प्रेम–सुख अनुभव करते हुए दोनों के चेहरों पर अद्वितीय निखार आ गया है। दोनों को एक-दूसरे के चेहरे का तेज अलौकिक प्रतीत हो रहा है।

जयसिंह के चेहरे को निहारती हुई सुजाता मुस्कुराकर जयसिंह के माथे को चूमकर मुस्कुराने लगी। जयसिंह मुस्कुराकर सुजाता के होंठ पर अपने होंठ रख देते हैं। दोनों चुम्बन में लिप्त होकर एक-दूसरे से लिपटे हुए करवट बदलकर आमने–सामने बराबर में लेटकर एक–दूसरे में समाकर सो जाते हैं।

सुबह के साढ़े पाँच बजे रविवार का सूरज निकलता है।

सुदर्शन रोज सुबह सात बजे से आठ बजे के बीच उठता है, लेकिन आज ऑफ़िस नहीं जाना, इसलिए सुबह छः बजे जागकर भी बिस्तर में ही लेटा हुआ है। सुदर्शन को बार–बार कृतिका याद आ रही है।

सुबह के नौ बजे सुदर्शन बिस्तर से निकला और नहा–धोकर तैयार होकर छोटे आईने(दस–बारह इंच वाला) के सामने खड़ा होकर बाल बनाते हुए सोचने लगा कि ऑफ़िस से तो मैडम ने आज छुट्टी दिलवा दी। पाँच सौ रुपये देकर नुकसान भी नहीं होने दिया। अब घूमने–फिरने कहाँ जाए ? हम्म………(मुस्कुराकर) कृतिका से मिलकर आते, लेकिन नम्बर तो लिया नहीं। चलो, घर तो पता ही है। उसके घर के पास चलते हैं। घर से अन्दर–बाहर आते–जाते मिल जाएगी।

सुदर्शन ने बाल बनाकर कर जूते पहने और फ्लेट से बाहर आकर फ्लेट लॉक करके सीढ़िया उतरते हुए नीचे आकर बिल्डिंग लॉक करके पैदल चलते हुए बस स्टॉप पर आता है। कुछ देर बाद बस आकर रुकती है। सुदर्शन बस में चढ़ता है और बस चली जाती है।

सुबह के दस बजे कृतिका अपने घर की छत पर खड़ी सुदर्शन के साथ हुई दोनों मुलाकातें याद करके सोच रही है कि ये लड़का मुझे क्यों इतना याद आ रहा है ? जिससे प्यार किया, उसने दिल बहलाकर छोड़ दिया। दूसरे फ्रैंड मुझसे मिलना तो दूर, बात तक नहीं करते। ये लड़का ठीक ही तो कह रहा था, प्यार के नाम पर महामुर्ख ही तो बनी हूँ मैं। दिव्यांश एक साल तक प्यार का नाटक करके मेरे साथ खेल रहा था और मैं खुशी–खुशी उसे खेलने दे रही थी। उस रात भी मैं उसे शादी के लिए मनाने गई थी। उसके साथ बैठकर ड्रिंक कर रही थी। दिव्यांश ने पता नहीं कब ? मेरी ड्रिंक में क्या मिलाया ? जिससे मैं अपने होश खोकर एक बार फिर उसका दिल बहलाने लगी। अपना काम होने के बाद दिव्यांश जाने लगा। मैं उसके पीछे–पीछे गई। दिव्यांश ने मुझे गाड़ी में बिठा लिया। गाड़ी में मैनें शादी की बात की। फिर हमारा झगड़ा शुरू हुआ। क्वीन्स रोड़ पर गाड़ी रोककर दिव्यांश मुझे गाड़ी से उतारकर पीटने लगा। मैं भी उसे मारने लगी। फिर उसके दोस्त बीच में आ गए और वो तीनों मेरी पिटाई करने के बाद मुझे वहीं सड़क पर छोड़कर चले गए। फिर वहाँ सुदर्शन आ गया और मैं नशे में पागल सुदर्शन को दिव्यांश समझ बैठी। कहाँ वो हरामखोर दिव्यांश और कहाँ ये सीधा–साधा सुदर्शन। बेचारे को उस रात मैनें कितना परेशान किया होगा, मुझे ठीक से कुछ याद भी नहीं है।…………………………आज संडे है। सुदर्शन घर पर ही होगा। उससे मिलकर आती हूँ।…………………………लेकिन वो क्या सोचेगा ? ये शराबी और बिगड़ैल लड़की मुझसे मिलने क्यों आई है ? कहीं अब मुझे फँसाने तो नहीं आई ? (मुस्कुराकर) सोचने दें, क्या फर्क पड़ता है ? वैसे भी सब यहीं तो सोचते हैं। और फिर मैं कौनसा उसे सच में फँसाने बनाने जा रही हूँ। कुछ देर बाद वापस आ जाऊँगी। सारा दिन गाड़ी में अकैली पड़ी रहती हूँ। इस बहाने कुछ देर किसी का साथ मिल जाएगा।

कृतिका छत से नीचे आकर सीढ़िया उतरती हुई घर से बाहर आकर गाड़ी में बैठती है और सामने रखा चश्मा पहनकर गाड़ी स्टार्ट करके निकल आती है। सुदर्शन की बिल्डिंग के सामने गाड़ी रोककर कृतिका गाड़ी से उतरकर बिल्डिंग की ओर आने लगती है। कृतिका की नज़र बिल्डिंग के दरवाजे पर लगे ताले पर पड़ती है।

कृतिका ने खुद से कहा—“ओह नो ! यार, तेरी किस्मत ही खराब है। आज संडे के दिन ये कहाँ गया होगा ?”

कृतिका को इधर–उधर देखते हुए एक प्रचून(किरयाना) की दुकान नज़र आती है।

कृतिका ने मन में कहा कि वहाँ पूछकर देखती हूँ।

कृतिका ने गाड़ी में बैठकर गाड़ी स्टार्ट करके दुकान के सामने आकर गाड़ी रोककर दुकान में टीवी देखते हुए कुर्सी पर बैठे आयु में तीस(30) वर्ष के नारायण से पूछा—“भैया, उस बिल्डिंग में एक सुदर्शन नाम का लड़का रहता है। वो कहाँ गया है ?”

नारायण ने कुर्सी से उठकर कहा—“वो जहाँ काम करता है, वहाँ मिलेगा। संडे को छुट्टी नी(नहीं) करता वो।”

कृतिका ने मन में सोचा कि उसने बताया था, वो रात को दस–ग्यारह बजे तक ऑवर–टाइम करता है।

कृतिका नारायण से बोली—“वो आज भी देर से आएगा या जल्दी आ जाएगा ?”

नारायण—“ये तो पता नहीं। मेरे पास तो जब भी आता है, सुबह–सुबह आता है। नौ बजे से पहले–पहले। महीने में कभी–कभार ऐसा होता है, जब वो रात को आकर कुछ देर बैठता है।”

कृतिका—“ओके, थैंक्यू भैया।”

नारायण—“कोई जरूरी काम है, तो उसके ऑफ़िस चले जाओ। नयी(नहीं) तो फोन कर लो।”

कृतिका—“नहीं, कोई जरूरी काम नहीं है। थैंक्यू।”

कृतिका गाड़ी चलाती हुई निकल गई और नारायण वापस अपनी कुर्सी पर बैठकर टीवी देखने लगता है।

सुदर्शन दोपहर के एक बजे तक सेठ साँवरमल बागड़ी के घर के आस–पास घूमता रहता है, लेकिन कृतिका नजर नहीं आई। आखिरकार सुदर्शन उसी बस स्टॉप पर आकर बैठ गया, जहाँ मंगलवार की शाम कृतिका गाड़ी लेकर आई थी।

सुदर्शन मन में सोचने लगा कि उसका नम्बर माँग लेता, तो अच्छा होता। बात तो बहुत अच्छी तरह कर रही थी। शायद नम्बर के लिए मना नहीं करती। लेकिन अब क्या कर सकते हैं ?

सुदर्शन का कृतिका से मिले बिना वापस जाने का मन नहीं कर रहा है। थोड़ी देर और देखता हूँ–थोड़ी देर और देखता हूँ, करते–करते शाम के पाँच बजे तक सुदर्शन कभी कृतिका के घर की ओर चक्कर लगाता है, कभी बस स्टॉप पर आकर बैठ जाता है, लेकिन कृतिका कहीं नज़र नहीं आई।

आखिर में सुदर्शन ने सोचा कि किसी से पूछकर देखता हूँ।

सुदर्शन सेठ साँवरमल बागड़ी के घर से थोड़ी दूर एक दुकान पर आकर दुकान के बाहर कुर्सी पर बैठे आयु में लगभग चालीस–बयालिस(40–42) वर्ष के दुकानदार को एक पाँच रुपये का सिक्का देते हुए बोला—“पाँच सेन्टर फ्रैश च्यूंगम देना।”

दुकानदार ने पाँच रुपये लेकर जेब में डालते हुए कहा—“ले लो, उसमें से।”

सुदर्शन पाँच सेन्टर फ्रैश च्यूंगम निकालकर चार पेन्ट की जेब में डालता है और एक का रेपर निकालकर मुँह में रखता है।

दुकानवाला कुर्सी पर बैठा–बैठा बड़बड़ाते हुए बोला—“आजकल तो किसी पर विश्वास करना ही महापाप है।”

सुदर्शन ने खड़े–खड़े च्यूंगम चबाते हुए कहा—“ऐसा क्या हो गया ?”

दुकानदार—“कुछ नहीं, यहाँ पास में डेढ़ साल पहले एक आदमी रहने के लिए आया था। शुरू–शुरू में एक–दो महीने तक नगद सामान लेता था। एक बार उसने एक सौ दस रुपये का सामान लेने के बाद कहा, दस का सामान कम कर दो। मेरे पास सौ ही रुपये है। मैंने कहा, कोई बात नहीं, दस रुपये बाद में दे देना। फिर धीरे–धीरे दस–बीस रुपये से उधार का सिलसिला शुरू हुआ, जो सौ–पचास रुपये से होते हुए हजार–पाँच सौ तक पहुँच गया। वो आदमी पहले वाली उधार के पैसे दे जाता था और नई उधार के पैसे लिखवा जाता था। उसका व्यवहार बहुत अच्छा था, इसलिए मैं भी खुशी–खुशी उसको उधार दे रहा था। अब छः महीने पहले उस पर आठ हजार की उधार हो गई। पिछले चार महीने से मुँह ही नहीं दिखाया। मैं पैसे माँगने उसके घर जाता हूँ, तो गालियाँ निकालते हैं, मारपीट करने पर उतर आते हैं।”

सुदर्शन—“धोखेबाजों का तो यहीं काम है। पहले अच्छा व्यवहार करके विश्वास जीतते हैं। विश्वास जीतकर अपना मतलब(स्वार्थ) पूरा करते हैं। मतलब पूरा होने के बाद अपना असली रंग दिखाते हैं।”

दुकानदार—“हाँ, इस तरीके से लोग मेरे एक–डेढ़ लाख रुपये खा गए, जो अब वापस नहीं आएँगें। लड़ाई–झगड़े करने वाले तो अपने पैसे निकलवा लेते हैं, लेकिन हम अब दुकानदार आदमी। दुकानदारी करें या लड़ाई–झगड़े करें ?”

सुदर्शन कुछ देर तक दुकानदार के साथ इधर–उधर की बातें करते हुए दुकानदार की बातें सुनता है। फिर अपने मतलब पर आकर पहले सेठ साँवरमल बागड़ी और फिर सेठ साँवरमल बागड़ी की बेटी कृतिका के बारे में बातें करने लगता है।

दुकानदार ने बताया—“साँवरमल जी तो बहुत अच्छे आदमी है और उनकी पत्नी भी बहुत भली लूगाई(नारी, महिला या औरत) है। मगर बेटी तो उफ्फ………एक नम्बर की बेवड़ी और बिगड़ैल। सारी–सारी रात घर से बाहर घूमती फिरती है। एक लड़के के साथ उसका चक्कर भी चल रहा है। उसके माँ–बाप ने बहुत बार गली में सबके सामने उसको थप्पड़ मारे हैं, लेकिन उस लड़की पर तो थोड़ा सा भी असर नहीं हुआ। बहुत ही अड़ियल, जिद्दी, बेशर्म और बेकार लड़की है। वो तो गई इनके हाथ से। बाकी किसी की बुराई करना, अपनी आदत नहीं है।”

सुदर्शन ने दुकानदार के मुँह से कृतिका की ढेर सारी बुराईयाँ सुनकर कहा—“ये भी सही है। ये जानकर बहुत खुशी हुई, किसी की बुराई करना, आपकी आदत नहीं है। अच्छा, अब घर को चलते हैं।”

सुदर्शन वापस आकर बस स्टॉप की कुर्सी पर बैठकर मन में कहने लगा कि छोड़ यार, तू भी कहाँ एक बेवड़ी को तलाश करने आ गया। ये तो बहुत ही बेकार लड़की निकली। चल घर चलते हैं। सारा दिन खराब हो गया इसके चक्कर में।

कुछ देर बाद बस आकर रुकती है। सुदर्शन बस में चढ़ता है और बस चली जाती है।

शाम के आठ बजे सुदर्शन बिल्डिंग से निकलकर नारायण की दुकान पर आता है।

सुदर्शन को देखते ही नारायण बोला—“किया भाई, तू भी लाग ग्यो छोरियाँ ग चक्कराः म ?”सुदर्शन आश्चर्यचकित होकर मन में सोचने लगा कि इसको कैसे पता चल गया ? आज मैं लड़की के चक्कर में घूम रहा था। मैनें तो उस बेवड़ी के घर की तरफ़ जाने का सोचा भी आज सुबह ही था।

सुदर्शन—“किसी छोरी ? भाय जी।”

नारायण—“ओई तो म तन बूझू।”

सुदर्शन—“बात थे काडया हो और बूझो मन्ने हो ?”

नारायण ने हँसकर कहा—“तेरी सकल गो रंग तो ईया उडयो है, जाणा सच्ची म कोई छोरी गो चक्कर है।”

सुदर्शन—“मेरो थानः पतो कोनी के ? हौळी–दयाळी हर कोई तीज–त्यौहार ग इलावा मेरो सेठ खुद आप छुट्टी दयोवे जद तो म छुट्टी करूँ। मेर खन आ फालतू कामा वास्ते टेम खठे है ?” (हिन्दी अनुवाद : मेरे बारे में आपको पता नहीं क्या ? हौली–दिवाली और कोई तीज–त्यौहार के इलावा मेरे बॉस खुद मुझे छुट्टी देते है, तब तो मैं छुट्टी करता हूँ। मेरे पास इन फालतू कामों के लिए टाइम कहाँ है ?)

नारायण—“अरे, मन सब ठा है। म तो मजाक करो हो। आज सवेरः एक छोरी आई ही, गाडी लेर। बा तेरो बूझी ही, जद म तन बूझ्यो।”

सुदर्शन—“छोरी ? नाम कोनी बतायो के ?”

नारायण—“ना, नाम तो कोनी बतायो।”

सुदर्शन—“दिखणा म किसी क ही ?”

नारायण—“दिखणा म तो घणी हाई–फाई छोरी ही। चश्मो पेर राख्यो हो। सुणी भी भोत ही।”(हिन्दी अनुवाद : दिखने में तो बहुत हाई–फाई लड़की थी। चश्मा पहन रखा था। सुन्दर भी बहुत थी।)

सुदर्शन—“समझ ग्यो। बा थाने बताई ही नी। एक बार रात न दारू पीर छोरा सागः लड़ः ही। बे तीन छोरा बिन कूट अर भाग ग्या। बा होणी।”

नारायण—“अच्छया, तो अाज के लेण आई ही ?”(हिन्दी अनुवाद : अच्छा, तो आज क्या लेने आई थी ?)

सुदर्शन—“के बेरो अब ? मिलसी, जद पूछा गा। फेर थाने भी बता द्या गा। अबार तो थोड़ी पेट–पूजा कर ल्या। आज सवेरः गी रोटी कोनी खाएड़ी।”(हिन्दी अनुवाद : क्या मालूम अब ? मिलेगी, जब पूछेगें। फिर आपको भी बता देंगे। अभी तो थोड़ी पेट–पूजा कर लें। आज सुबह से खाना नहीं खाया।)

नारायण—“तो रोटी मेर खन खा ले आज।”(हिन्दी अनुवाद : तो खाना मेरे पास खाले आज।)

सुदर्शन—“नई–नई, थे पाईया भुजिया दे द्यो। आपणः इत्तो भोत है।" (हिन्दी अनुवाद : नहीं–नहीं, आप तो दो सौ पचास ग्राम भुजिया दे दो। अपने को इतना बहुत है।)

नारायण—“भुजिया उ पेट भरे है के ? चाल आजा, रोटी मणन लाग री है।”

सुदर्शन—“ये भी सही है, फेर म बिल्डिंग ग ताळो लगायाउ।”

सुदर्शन बिल्डिंग की ओर चल पड़ता है।

नारायण के घर खाना खाने के बाद सुदर्शन नारायण की दुकान के बाहर कुर्सी पर बैठकर नारायण के साथ बातें करने लगता है।

रात के साढ़े दस बजे सुदर्शन ने खड़े होते हुए कहा—“अच्छा, भाई। अब सोवा जार।”

नारायण—“हाँ, ठीक है।”

सुदर्शन अपनी बिल्डिंग की ओर चला जाता है और नारायण कुर्सियाँ उठाकर दुकान में रखकर दुकान मंगल करके घर के अन्दर चला जाता है।

रात को बैड पर लेटा सुदर्शन सोचता है कि ये कृतिका आज क्यों आई थी ? मैं सारा दिन उसके घर के आस–पास घूम रहा था और वो यहाँ आ गई। लेकिन वो नशेड़ी और अय्याश लड़की है। हाँ, अगर वो नशे से दूर होती और उसने बॉयफ्रैंड ना बनाया होता। छोड़ यार, तब भी तू क्या कर लेता ? वो सेठ साँवरमल बागड़ी की बेटी है। उसके सपने मत देख। सोजा चुपचाप।

सुदर्शन करवट बदलकर सो जाता है।

अगले दिन दस अप्रेल, सोमवार की सुबह सवा सात बजे सुदर्शन उठकर नहा-धोकर तैयार होकर सुबह पौने नौ बजे फ्लेट से बाहर आकर ताला लगाता है और बिल्डिंग के सभी खिड़कियाँ–दरवाज़ें चैक करते हुए सीढ़िया उतरता हुआ नीचे आकर बिल्डिंग का दरवाजा लॉक करके ताला लगाकर चाबी जेब में डालकर रोज की तरह पैदल चल पड़ता है। आम्रपाली सर्किल पर आकर सुदर्शन ने देखा कि कृतिका चश्मा पहने ड्राईविंग सीट पर बैठी सुदर्शन की ओर देखकर मुस्करा रही है।

सुदर्शन ने कृतिका के पास आकर कहा—“आप यहाँ ?”

कृतिका—“मैं तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी। मैं कल भी आई थी, लेकिन तुम्हारी बिल्डिंग के पास वो दुकानवाले ने बताया, तुम संडे को भी ऑफ़िस जाते हो और सुबह नौ बजे से पहले–पहले चले जाते हो। इसलिए आज मैं पौने नौ बजे ही यहाँ आ गई।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“लेकिन क्यों ?”

कृतिका—“बस यू ही। तुमसे मिलने का मन हुआ, तो चली आई।”

सुदर्शन—“लेकिन अभी तो मैं ऑफ़िस जा रहा हूँ और सेठ जी ने जल्दी भेज दिया, तो ठीक है। वरना रात को दस–ग्यारह बजे बाद ही आऊँगा।”

कृतिका—“चलो, कोई बात नहीं। मैं तुम्हें ऑफ़िस छोड़ देती हूँ। वैसे भी मुझे तो सारा दिन यू ही भटकना है।”

सुदर्शन—“ये भी सही है। चलिए।”

सुदर्शन दूसरी साइड आकर गाड़ी में बैठ गया। कृतिका गाड़ी स्टार्ट करके चित्रकूट की ओर चल पड़ती है।

कृतिका—“अब बताओ, उस रात मैनें क्या किया था, जिसके कारण तुमने मुझे चांटे मारे ?”

सुदर्शन मुस्कुराकर बोला—“तो आप ये जानने के लिए कल आयी थी और आज पौने नौ बजे से इंतज़ार कर रही है ?”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“ऐसा ही समझ लो।”

सुदर्शन—“चलिए, फिर बता ही देता हूँ। आप मुझे अपना बॉयफ्रैंड समझकर गन्दी–गन्दी गालियाँ निकालते हुए मुझ पर हाथ–पैर चला रही थी। मैनें आपको समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन आप मेरी बात सुन ही नहीं रही थी। इसलिए आपसे बचने का मुझे यही रास्ता नजर आया। एम सॉ सॉरी। प्लीज, अब आज मेरी पिटाई मत कर देना।”

कृतिका अफ़सोस के साथ बोली —“ओह…मैंने तुम्हें गालियाँ दी थी। सच में बहुत बेकार हूँ मैं। बहुत अच्छा किया तुमने मुझे चांटे मारकर। मैं इसी लायक हूँ।”

सुदर्शन—“आप बेकार तो नहीं लगती। हाँ, आपके अन्दर गलत आदतें बहुत हैं। आप इन गलत आदतों को छोड़कर अपनी अच्छी बातों पर ध्यान दीजिए।”

कृतिका—“मेरे अन्दर अच्छी बातें कौनसी नजर आई तुम्हें ?”

सुदर्शन—“अभी तक नजर तो नहीं आई। लेकिन हर इन्सान में कुछ ना कुछ बुरी बातें और कुछ ना कुछ अच्छी बातें जरूर होती है।”

कृतिका—“लेकिन मेरे अन्दर तो सिर्फ बुरी बातें ही हैं। अच्छी बात कुछ भी नहीं।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“एक अच्छी बात तो मैं बता देता हूँ। आप ये मत समझना, मैं फ्लर्ट कर रहा हूँ। आप जब नशे में नहीं होती, तब बहुत अच्छी लगती है।”

कृतिका मुस्कुराकर बोली—“नहीं-नहीं। वैसे ये इत्तेफ़ाक है। जब पिछले हफ्ते मैं तुमसे मिली, तब मेरे पास शराब खत्म हो गई थी और आज भी खत्म है। वरना सुबह उठते ही सबसे पहले दो घूट शराब गले में उतारती हूँ।”

सुदर्शन—“ये भी सही है। हर किसी का जिन्दगी जीने का अपना ढंग होता है।”

कृतिका ने हँसकर कहा—“तुम तो शायद नहीं पीते होंगे ?”

सुदर्शन—“नहीं, मैं नशे और नशे करने वालों को बिल्कुल पसन्द नहीं करता।”

कृतिका—“हम्म…फिर तुम्हें मुझ पर गुस्सा नहीं आया ? सुबह–सुबह एक शराबी लड़की को अपने रास्ते में खड़ी देखकर ?”

सुदर्शन—“देखिए, पसन्द नहीं करना और गुस्सा आना। इन दोनों में फर्क होता है। मेरे सेठ जी और मैडम को भी सभी तरह का नशा और नशा करने वाले बिल्कुल पसन्द नहीं है, लेकिन अभी हमारे ऑफ़िस में मेरे इलावा आठ लोग हैं। चार लेडिज और चार जेन्टस। उनमें से एक लड़की और तीन आदमी शराब पीते हैं। जो एक आदमी शराब नहीं पीता, वो भी गुटखा, सिगरेट, इन सबका नशा करता है। फिर भी मेरे सेठ जी ने उनको जॉब पर रखा है। हाँ, ये वॉर्निंग(चैतावनी) जरूर दे रखी है, किसी भी तरह का नशा करके कोई भी घर(ऑफ़िस घर के अन्दर ही नीचे बेसमेंट में है) के अन्दर नहीं आएगा। अब आपकी तरह बहुत सारे लोग नशा करते हैं। किस-किस पर गुस्सा करें ? फिर आपने मेरा क्या बिगाड़ा है, जो आप पर गुस्सा करूँ ? उल्टा आप तो मुझे ऑफ़िस छोड़ रही है, वरना रोज की तरह पैदल ही जाता।”

कृतिका ने आश्चर्य से कहा—“इतनी दूर तुम रोज पैदल जाते हो ? मुझे तो कोई दस–पन्द्रह मिनट चलने के लिए कहें, तो ये सुनकर ही मेरे पैरों में दर्द होने लगता है।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“अपनी–अपनी जिन्दगी है। सबकी जिन्दगी अलग–अलग होती है।”

कृतिका—“हम्म…ये तो है।”

सुदर्शन के साथ बातें करती हुई कृतिका गाड़ी चित्रकूट ले आती है।

सुदर्शन ने कहा—“मुझे वहाँ उतार दीजिए।”

कृतिका सुदर्शन की बताई जगह लाकर गाड़ी रोक देती है।

सुदर्शन ने मोबाइल में टाइम देखकर कहा—“आज तो आप पौने घंटे जल्दी ले आयी। अभी तो सवा नौ भी नहीं हुए।”

कृतिका ने गाड़ी बन्द करके कहा—“तो अब पौने घंटे क्या करोगे ?”

सुदर्शन—“आपको कहीं जाना है ?”

कृतिका—“नहीं, मैं तो यू ही गाड़ी लेकर सारा दिन सारे शहर में घूमती रहती हूँ और मेरे बाप के पैसे उड़ाती हूँ।”

सुदर्शन ने मन में सोचा कि बाप के पैसे उड़ाती हूँ ? पिताजी, पापा, डेडी, डेड कुछ नहीं, सीधा बाप। लेकिन ये भी सही है। अपने कहने से कौनसी सुधर जाएगी ? इसके बाप के पास पैसे है, इसलिए उड़ाती है। अपने बाप के पास पैसे नहीं है, इसलिए उल्लू की तरह कमाते हैं।

सुदर्शन ने कृतिका से कहा—“चलिए, फिर दस बजे तक आपसे बात ही कर लेते हैं।”

सुदर्शन और कृतिका दस बजे तक आपस में बातें करते रहते हैं।

मोबाइल में टाइम देखकर 9:50 होते ही सुदर्शन ने कहा—“अच्छा, अब चलता हूँ। आपका बहुत–बहुत धन्यवाद। आज आप आराम से गाड़ी में ले आयी। वरना रोज तो पैदल आते हुए पौने दस और दस के बीच ही यहाँ पहुँचता हूँ।”

कृतिका—“इसमें धन्यवाद की क्या बात है ? जहाँ सारा दिन फालतू घूमती हूँ, वहाँ थोड़ी देर तुम्हारे काम आ गई।”

सुदर्शन ने मुस्कुराते हुए कहा—“ये भी सही है।”

सुदर्शन गाड़ी से उतरकर दरवाज़े की खिड़की में से बोला—“अच्छा, फिर मिलेगें।”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, जरूर। तुमसे बातें करके बहुत अच्छा लगा।”

सुदर्शन—“मुझे भी आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा। अब मैं चलता हूँ।”

कृतिका—“तुम दोपहर को खाना खाने कब आते हो ?”

सुदर्शन—“खाना तो मुझे सेठ जी खिला देते हैं।”

कृतिका आश्चर्य से बोली—“दोनों वक्त ? दिन में भी।”

सुदर्शन—“हाँ, सेठ जी और मैडम बहुत भले लोग है। सुबह चाय–नाश्ता भी यहीं आकर करता हूँ। दोपहर का खाना, फिर शाम की चाय, फिर रात का खाना, सब यहीं करता हूँ। बस जिस दिन मैं ऑफ़िस नहीं आता या रात को जल्दी चला आता हूँ। सिर्फ उस दिन किसी होटल में खाना खाता हूँ। वरना सेठ जी और मैडम खाना खाए बिना आने ही नहीं देते। वहाँ बिल्डिंग में तो बस रात को सोता हूँ और सुबह तैयार होकर ऑफ़िस आ जाता हूँ।”

कृतिका—“तुम्हारे सेठ जी और मैडम तो रियली बहुत अच्छे लोग हैं।”

सुदर्शन—“हाँ, इनके जैसे लोग तो दुनिया में बस इक्का–दुक्का गिने–चुने ही होते हैं। सेठ जी और मैडम तो कहते हैं, हमारे घर पर ही रह लो। लेकिन मैनें सोचा, अच्छे लोगों की अच्छाई का जरूरत से ज्यादा फायदा उठाना ठीक नहीं है। मेरे लिए इतना करते हैं, जितना कोई किसी अपने के लिए भी नहीं करता। अच्छा, मुझे देर हो रही है। मैं चलता हूँ।”

कृतिका—“ओके, बाए।”

सुदर्शन जयसिंह के घर की ओर जाने लगता है।

कृतिका गाड़ी में बैठी सुदर्शन को जाते हुए देखकर सोचने लगी कि इसके सेठ जी और मैडम इसके लिए इतना करते हैं। मेरे लिए तो कोई चांस ही नहीं छोड़ा। सोचा था, दोपहर को खाने के बहाने फिर से आऊँगी। वैसे लड़का बातें अच्छी करता है। दिल का साफ़ और बहुत सीधा है। लेकिन टाइम नहीं है इसके पास। तेरी किस्मत में अकैले भटकना ही लिखा है। तू बस जी भरकर पी और दिल खोलकर रो। तेरे पापों का घड़ा बहुत बड़ा है, कृतिका।

कृतिका मुस्कुराकर गाड़ी स्टार्ट करती है और सुदर्शन के मोड़ मुड़ने ही चली जाती है।

एक महीने बाद दस मई, बुधवार की रात को पौने ग्यारह बजे कृतिका की गाड़ी आम्रपाली सर्किल पर आकर रूकती है।

शराब के नशे में धुत्त कृतिका गाड़ी बन्द करके सुदर्शन की ओर देखकर बोली—“लो ! आ गई तुम्हारी मंजिल।”

सुदर्शन ने दया भाव से कृतिका की ओर देखकर कहा—“हाँ, मेरी मंजिल तो आ गई। तुमसे एक बात पूछू ?”

कृतिका—“हाँ, पूछो ना।”

सुदर्शन—“तुमने कहा था, कभी–कभी तुम मुझे घर से ऑफ़िस और ऑफ़िस से घर छोड़ दो, तो इसमें क्या बुराई है ? लेकिन तुम तो पिछले एक महीने से हर रोज सुबह मुझे यहाँ से ऑफ़िस छोड़ती हो। फिर रात को जब तक मैं ना आऊँ, मेरा इंतज़ार करती हो। मुझे ऑफ़िस से घर छोड़कर खुद अपने घर रात के बारह–एक बजे बाद पहुँचती हो। मुझे तुम्हारी ये बात समझ में नहीं आई ?”

कृतिका हँसकर बोली—“पता नहीं, यार। मैंने बताया था ना, सुबह उठते ही दो घूट लगाकर गाड़ी लेकर निकल जाती हूँ। दिन में अगर नींद आती है, तो गाड़ी में ही सो लेती हूँ। कभी-कभी तो रात भी घर से बाहर गाड़ी में सो कर गुजारती हूँ। कोई बात करने वाला या कोई मिलने वाला है नहीं। एक दिव्यांश था, मतलब पूरा होने के बाद वो भी अपने रास्ते निकल गया। तुमसे दो-चार बार मिली, तो मुझे अच्छा लगा। इसलिए सुबह–शाम कुछ वक्त तुम्हारे साथ बिता लेती हूँ। यू डॉन्ट वैरि। मैं तुम्हें फँसाने की कोशिश नहीं कर रही हूँ। डॉन्ट वैरि।”

सुदर्शन—“नहीं, मेरा ये मतलब नहीं था। आई मीन, तुम्हारे और फ्रैंड्स नहीं हैं ? धोखा तो सिर्फ बॉयफ्रैंड ने ही दिया है, बाकी फ्रैंड्स कहाँ गए ?”

कृतिका—“बाकी फ्रैंड्स……...बाकी फ्रैंड्स में लड़कों के बारे में तो तुम्हें भी पता ही होगा। लड़कों को लड़की की बस एक चीज में दिलचस्पी होती है, इसलिए किसी से बात करने या मिलने का मन ही नहीं करता। और जो थोड़े–बहुत अच्छे लड़के हैं, वो एक बिगड़ी हुई लड़की से क्यों बात करेंगे ?”

सुदर्शन—“और लड़कियों के साथ दोस्ती नहीं है तुम्हारी ?”

कृतिका—“लड़कियों से दोस्ती है, लेकिन वहीं बात। मैं शराब पीती हूँ, देर रात तक घर से बाहर रहती हूँ। कुछ लड़कियों को मुझसे हमदर्दी है, लेकिन उन लड़कियों के घरवाले उन लड़कियों से कहते हैं, ये कृतिका बेकार लड़की है। इसके साथ रहोगी, तो तुम भी इसकी तरह बिगड़ जाओगी। इसलिए इससे दूर रहो।”

सुदर्शन ने मन में सोचा कि अब तुमसे क्या कहूँ ? तुम्हारी हालत देखकर तुम पर तरस भी बहुत आता है, लेकिन बात तो सबकी ठीक ही है। तुम्हें सुधरने के लिए कहूँगा, तो तुम सुधरोगी नहीं।

कृतिका ने सुदर्शन को सोच में खोया देखकर कहा—“क्या हुआ ? तुम ये बार–बार सोच में क्यों डूब जाते हो ? खुलकर बोला करो, जो बोलना हो। बिन्दास। जैसे मैं बोलती हूँ, सीना ठोककर। समझ गये ? अगर तुम्हें भी मुझसे मिलना अच्छा नहीं लगता, तो मैं नहीं आऊँगी। तुम परेशान मत हो। अब जाओ, घर जाकर सो जाओ।”

सुदर्शन—“नहीं–नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है।”

कृतिका—“फिर क्या सोच रहे हो ? कोई प्रोब्लम है तुम्हें ? मुझे बताओ, कृतिका ने तुम्हें दोस्त बनाया है। कृतिका के होते हुए कृतिका के दोस्त को कोई प्रोब्लम हो, तो थू है *****(खुद के लिए बहन की गन्दी गाली निकालकर)***** कृतिका पर।”

सुदर्शन—“नहीं, मुझे कोई प्रोब्लम नहीं है। तुमने मुझे अपना दोस्त बनाया, इसकी मुझे बहुत खुशी है।"

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“कुछ खाओगें ?"

सुदर्शन—“नहीं।"

कृतिका—“अरे, पीछे नमकीन, चिप्स वगैरह रखें हैं। खालो।"

सुदर्शन—“नहीं, मैं सेठ जी के घर खाना खाकर आया हूँ। मुझे बिल्कुल भी भूख नहीं है।"

कृतिका—“ठीक है, फिर मुझे तो अभी दो पैग लगाने हैं। मेरा दिमाग बहुत खराब हो रहा है। तुम तो पीते नहीं हो। और मैं नहीं चाहती, तुम पियो। इसलिए तुम घर जाकर सो जाओ।"

सुदर्शन—“तुम सारा दिन पीती तो रहती हो। जब मैं आया था, तब भी पता नहीं कब से पी रही थी ? अब तुम्हें घर जाना चाहिए और तुम कह रही हो, दो पैग और लगाने हैं।"

कृतिका हँसकर गाना गाने लगी—

“किसी की याद सताए, शराब पी लेना।

कोई ख़्याल रूलाए, शराब पी लेना।"

सुदर्शन—“शराब पीने से याद आनी बन्द हो जाएगी ? तुम ये शराब पीना छोड़ क्यों नहीं देती ? इससे तुम्हें कोई फायदा तो मिल नहीं रहा। हेल्थ को तो नुकसान हो ही रहा है। उस पर तुम बहुत अच्छी लड़की होकर भी सिर्फ इस शराब के कारण बदनाम हो।”

कृतिका बिफ़रकर बोली—“अरे, क्या अच्छी लड़की यार ? जब शराब नहीं पीती थी, तब कौनसा मेरा नाम था ? कोई गलती ना होते हुए भी मुझे बातें सुननी पड़ती थी। बिना गलती के मेरी पिटाई होती थी। अब कम से कम इस बात का सुकून है। मैं गलत हूँ, इसलिए बदनाम हूँ।”

सुदर्शन—“बिना गलती मतलब ?”

कृतिका—“बिना गलती मतलब। मेरे स्कूल की बात बताती हूँ। एक बार मेरी क्लास में एक लड़का–लड़की आपस में बातें कर रहे थे। तभी टीचर ने पूछा, ये कौन बोल रहा है क्लास में ? तो सबने मुझसे बदला लेने के लिए मेरा नाम लगा दिया। टीचर ने मुझे बुलाकर मुझे आठ–दस थप्पड़ टिका दिये। मैनें टीचर से कहा, मैम, मैं बेकसूर हूँ। आपने मुझे बिना गलती के मारा है। तो टीचर चिढ़ गई। वो मुझे पकड़कर प्रिंसिपल सर के पास ले गई और बोली, मैनें उनको गाली निकाली है। क्लास के सब स्टूडेंटस ने भी मुझे सज़ा दिलाने के लिए टीचर की हाँ में हाँ मिला दी। फिर प्रिंसिपल सर ने मेरे मॉम–डेड को बुलाया और घर आने के बाद मॉम–डेड ने मेरी धुलाई की। ऐसा मेरे साथ एक–दो बार नहीं, बहुत बार हुआ।”

सुदर्शन—“लेकिन सब के सब तुमसे बदला किस बात का ले रहे थे ?”

कृतिका ने हँसकर कहा—“वो यार, मैं बचपन में बहुत शरारती थी। अलग–अलग तरीके से सबको बहुत परेशान करती थी। अब यू तो मैं किसी के ताबे(काबू में) आई नहीं, तो वो लोग झूठी शिकायतें करके मुझसे बदला लेते थे।”

सुदर्शन—“कमाल है। चलो, वो सब तो तुम्हारी तरह बच्चे थे, लेकिन टीचर को तो अक्ल होनी चाहिए। सज़ा देने से पहले ये तो देखना था, गलती की भी है या नहीं ?”

कृतिका—“अरे, इतना कौन सोचता है यार ? जब मॉम–डेड ही नहीं समझते, तो दूसरों से क्या शिकायत ?”

सुदर्शन—“हम्म………कभी–कभी माँ–बाप भी गलती कर देते हैं। उनको पहले तुम्हारी बात सुननी चाहिए थी।”

कृतिका—“गलती नहीं। मेरे मॉम–डेड की तो आदत है, मुझे पीटना। मैं छोटी थी, तब से वो ऐसे ही है। कई बार तो डेड ने मुझे बेल्ट से और मॉम ने डंडे से पीटा है। वो भी बिना गलती के। मैं उस वक्त सिगरेट पीती नहीं थी, मैंने बस सिगरेट जलाकर सिगरेट मुँह में लेकर अपने फ्रैंड्स के सामने सिगरेट पीने की एक्टिंग की थी। पहले मॉम ने डंडे से पीटा, फिर रात को डेड ने घर आकर बेल्ट से पीटा। मैंने बहुत कहा, मैं सिर्फ एक्टिंग कर रही थी, लेकिन उन्होंने मेरी एक नहीं सुनी। मुझे मजबूर होकर प्रोमिस करना पड़ा, अब नहीं पीयूगी। लेकिन अब मैं उनके सामने पीकर बोलती हूँ, आओ मारो मुझे, मैं सिगरेट पी रही हूँ। मैं शराब पी रही हूँ, मुझे मार डालो। अब पता नहीं क्यों ? मारते ही नहीं है।"

सुदर्शन—“माँ-बाप कभी-कभी अन्जानें में बच्चों के साथ गलत कर सकते हैं, लेकिन कोई भी माँ-बाप जान-बूझकर अपने बच्चों के साथ बुरा नहीं करते, कृतिका।"

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“येस ! आई नो। मैं जानती थी, तुम यहीं कहोगे। गलती तो हमेशा बच्चे ही करते हैं।"

सुदर्शन—“नहीं, कृतिका। मैंने ये नहीं कहा, गलती हमेशा बच्चे करते हैं। कभी-कभी माँ-बाप को गलतफ़हमी भी तो हो सकती है ना ?"

कृतिका ने हँसकर कहा—“गलतफ़हमी। एक किस्सा और सुनाती हूँ गलतफ़हमी का। ये मेरे कॉलेज की बात है। मेरी एक फ्रैंड के बारे में मुझे पता चला, वो एक लड़के के साथ रिलेशन में है। मैंने उस लड़के के बारे में मालूम किया, तो पता चला, वो कोई प्यार-व्यार नहीं करता। बस टाइमपास और इंजॉयमेन्ट के लिए मेरी फ्रैंड को फँसाया है। जब मैंने उसके बारे में मेरी फ्रैंड को बताया, तो उस लड़के ने कहा, मैंने उसे अपना बॉयफ्रैंड बनने के लिए कहा था। उसने मना कर दिया, इसलिए मैं उससे बदला ले रही हूँ।"

सुदर्शन—“तुमने उसे समझाया नहीं। और लड़के के बारे में जैसे तुम्हें पता चला, उसी तरह उसे भी बताती।"

कृतिका—“वो कुछ समझना चाहती, तब ना। उस लड़के ने बोल दिया, वो सब अतीत की गलतियाँ है और मेरी फ्रैंड ने कहा, हर इन्सान गलतियाँ करके ही सीखता है। किसी को पास्ट में की हुई गलतियों की सज़ा नहीं देनी चाहिए।"सुदर्शन—“ये भी सही है। जब कोई खुद ही अपनी पैरों पर कुल्हाड़ी मारे, तो दूसरे क्या कर सकते हैं ?"

कृतिका—“हाँ, और इस बात पर मेरी फ्रैंड ने मुझे गलत समझकर मेरे साथ फ्रेंडशिप तोड़ दी और मुझे अपनी दुश्मन मानकर मुझे सबक सिखाने की कोशिश करने लगी।"

सुदर्शन ने आश्चर्य से कहा—“अरे, ये क्या ? जो लड़की उसका भला सोच रही थी, उसे ही दुश्मन मानकर सबक सिखाने की कोशिश।"

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, वहीं तो बता रही हूँ। मुझे सबक सिखाने की कोशिश में उसके साथ तीन-चार बार मेरी मारपीट भी हुई। मैंने उसे बहुत समझाया, लेकिन वो नहीं समझी और एक दिन मुझे सबके सामने गन्दी-गन्दी गालियाँ देकर कॉलेज से बाहर मिलने के लिए बोली। मुझे भी गुस्सा आ गया। कॉलेज के बाहर हमारी फाइट हुई और फाइट में मैंने उसका सारा नशा उतार दिया।"

सुदर्शन ने आश्चर्यचकित होकर कहा—“तुम फाइटर भी हो। फिर क्या हुआ ? वो मान गई ?"

कृतिका—“कहाँ मान गई ? जब वो अकैली मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाई, तो उसने मुझे पीटने के लिए लड़के तक भेजें। फिर भी मेरे सामने उसकी दाल नहीं गली। तो आखिर में उसने अपने फ्रैंड्स के साथ मिलकर मेरे मॉम–डेड के सामने ये बात फैला दी, मेरा किसी लड़के के साथ चक्कर चल रहा है। उसके बॉयफ्रैंड ने मेरे डेड को जाकर बोल भी दिया, मैंने उसे फँसाने की कोशिश की थी और उसे अपने साथ रिलेशन बनाने के लिए कहा था। फिर तो बस। कई हफ्तों तक मॉम-डेड मुझे बातें सुना–सुनाकर पीटते रहें। गली में, कॉलेज में, सबके सामने बहुत बार मुझे अनाप-शनाप बोलकर मुझे मारा। सब मेरा मज़ाक उड़ाने लगे। सब मुझ पर हँसते थे। जैसे गलती करने वाले अपनी गलती नहीं मानते, उसी तरह कृतिका खुद को गलत थोड़े ही कहेंगी। अमीर बाप की बिगड़ैल बेटी। सब मुझे लड़के फँसाने वाली समझने लगे। जबकि मेरी लाइफ़ में दिव्यांश के सिवा कभी कोई नहीं आया।”

सुदर्शन—“ये भी बड़ी प्रोब्लम है। शायद तुम्हारे मम्मी–पापा तुम्हें गलत रास्ते पर चलने से रोकने के चक्कर में जरूरत से ज्यादा सख़्ती कर बैठे और उनकी इस जरूरत से ज्यादा सख़्ती के कारण तुम दुःखी होकर शराब पीने लगी।”

कृतिका—“शराब पीना मैनें कॉलेज में शुरू किया था। कॉलेज में मेरे कुछ फ्रैंड्स शराब पीते थे। उनके साथ मैं भी पीने लगी और धीरे–धीरे उन सबसे ज्यादा बिगड़ैल बन गई।”

सुदर्शन—“और तुम्हारा वो बॉयफ्रैंड ?”

कृतिका—“वो तीन साल पहले मिला था। मुझसे पहले उसका चार गर्लफ्रैंड से ब्रेकअप हो चुका था।”

सुदर्शन ने आश्चर्यचकित होकर कहा—“चार गर्लफ्रैंड से ब्रेकअप हो चुका था। ये जानते हुए भी तुमने उसे अपना बॉयफ्रैंड बना लिया। हद होती है, मुर्खता की। पहले जान–बुझकर मुर्खता की, अब उसके लिए आँसू बहाती हो। और तुम तो अपनी फ्रैंड को रोक रही थी ना। आगे चलकर तुमने वहीं किया, जो तुम्हारी फ्रैंड ने किया।”

कृतिका—“यार…वो कहता था, लड़कियों ने उसको धोखा दिया है।”

सुदर्शन क्रोध से कहा—“उसने कहा और तुमने मान लिया। इसे महामुर्खता कहते हैं।”

कृतिका ने हँसकर कहा—“अब यार सच तो यहीं है। मैं महामुर्ख हूँ।”

सुदर्शन ने क्रोध बरकरार रखते हुए कहा—“और बॉयफ्रैंड बनाया तो बनाया, रिलेशन(शारीरिक संबंध) बनाने की क्या जरूरत थी ?”

कृतिका उद्विग्न होकर बोली—“मैनें मिलते ही एकदम से रिलेशन थोड़े ही बनाए थे। तुम तो ऐसे बोल रहे हो, जैसे मैं रिलेशन बनाने के लिए मरे जा रही थी।”

सुदर्शन—“फिर भी तुम्हें सोचना चाहिए था। उसने तुम्हें गर्लफ्रैंड बनने के लिए कहा और तुमने बिना सोचे–समझे उसे बॉयफ्रैंड बना लिया।”

कृतिका—“नहीं, मैनें उसे एकदम से बॉयफ्रैंड भी नहीं बनाया। दोस्ती होने के चार–पाँच महीने बाद अब से ढ़ाई साल पहले उसने मुझे प्रपोज किया। उस वक्त मैनें मना कर दिया था, लेकिन उससे दोस्ती बनाए रखी।”

सुदर्शन—“फिर दोस्त से बॉयफ्रैंड कैसे बनाया ?”

कृतिका ने मायूस होकर कहा—“वो बहुत रोता था। अपने दुःख-दर्द और अपनी परेशानियों की बातें सुनाता रहता था। कहता था, मैं बहुत अकैला हूँ। मुझे कोई नहीं समझता। सब मुझसे दूर चले जाते हैं। तू भी मुझे नहीं समझती। मेरे प्यार को नहीं समझती, मेरे जज़्बात तुझे झूठ लगते हैं। ऐसी बहुत सारी बातें बोलता था। मैं खुद अपनी लाइफ़ में परेशान और दुःखी थी। उसकी बातें सुनकर, उसको दुःखी देखकर मुझे उससे हमदर्दी हो गई। मैनें सोचा, हम दोनों मिलकर एक–दूसरे का सुख–दुःख बाँट लेगें। फिर धीरे–धीरे हमदर्दी प्यार में बदल गई और मैं उसकी गर्लफ्रैंड बन गई। गर्लफ्रैंड बनने के बाद उसने कई बार मुझे रिलेशन(शारीरिक संबंध) बनाने के लिए कहा। शुरू में हर बार मैनें मना किया। लेकिन एक रात हम दोनों साथ बैठकर ड्रिंक कर रहे थे। हम दोनों को ज्यादा हो गई। और फिर नशे में सब हो गया। कुछ दिनों तक मुझे बहुत बुरा लगा। खुद पर बहुत गुस्सा भी आया। फिर दिव्यांश ने समझाया, हमें शादी तो करनी ही है। अगर शादी से पहले रिलेशन बना रहे हैं, तो इसमें क्या बुराई है ? एक–दूसरे करीब होकर हमारे बीच के सारे फासले मिट जाते हैं। हमारा प्यार इतना कमजोर है क्या, जो शादी के बंधन में बधे बिना हम प्यार नहीं कर सकते ? और भी बहुत सारी बड़ी–बड़ी बातें करता था। लेकिन पिछले साल जब मैं उसे शादी के लिए कहने लगी, तब समझ में आया। वो सब उसका ड्रामा था, दुःखी होना, परेशान होना, दुःख–दर्द वाली बातें, ये सब वो लड़कियों को इम्प्रेस करने के लिए करता है। एक साल तक मेरे साथ जी भरकर इंजॉय करने के बाद वो मुझे कहता है, जो लड़की शादी किये बिना सब कुछ करती है, वो सिर्फ मजे लेने के लिए होती है, शादी करने के लिए नहीं। तेरे जैसी तो रोज बहुत मिलती है, किस–किस से शादी करूँ ?”

सुदर्शन ने नरम होकर कहा—“तुमने गलती तो की है, लेकिन तुमने उसे धोखा नहीं दिया, उसने तुम्हें धोखा दिया है। तुम्हारी परेशान हालत और दुःख का गलत फायदा उठाकर। और तुम बिगड़ैल और बेकार नहीं हो। भटक गई हो। मैनें तुम्हारे बारे में सेठ जी और मैडम को भी सब कुछ बताया है। वो भी यहीं कह रहे थे। तुम भटक कर गलत रास्ते पर चली गई और उस गलत लड़के ने इस बात का फायदा उठा लिया। तुम्हें खुद के बारे में सोचने की जरूरत है।”

कृतिका ने खिन्न होकर कहा—“क्या सोचू यार ? उसके साथ रात–रात भर रूकती थी, अगले दिन मॉम–डेड से मार खाती थी। और वो हरामजादा बोलता है, तू तो बहुत मस्त लड़की है। एक बार किसी को बिस्तर पर अपनी परफॉर्मेंस दिखा, कोई भी तेरे से शादी कर लेगा। तेरे बाप के पास पैसे भी बहुत है। तू तो किसी को भी पटा सकती है। फिर मेरे गले क्यों पड़ रही है ?”

कृतिका की आँखों से आँसू बहने लगे और कृतिका हैंडल पर सर रखकर फूट–फूटकर रोने लगती है।

सुदर्शन ने कृतिका के कंधे पर हाथ रखकर कहा—“अरे, रो क्यों रही हो ? वो बहुत ही घटिया लड़का है। और घटिया लड़के तो यहीं करते हैं।”

कृतिका रोती हुई बोली—“तुम्हें नहीं पता, यार। उसने क्या–क्या बोला है मुझे ?”

सुदर्शन—“अब देखो, जो हो गया है, तुम्हारे रोने से वो बदल नहीं जाएगा। इसलिए जो हो गया, उसे भूल जाओ। और आगे के लिए ध्यान रखो, जिसको शादी करनी होगी, वो शादी से पहले रिलेशन(शारीरिक संबंध) क्यों बनाएगा ? रिलेशन तो शादी के बाद बनते ही हैं।”

कृतिका ने सुदर्शन की ओर देखकर आँसू बहाते हुए कहा—“अब क्या ध्यान रखूँ ? उसकी बातें याद करके तो ऐसा लगता है, कॉलगर्ल औरतें भी मुझसे अच्छी है। वो पैसे के लिए मजबुरी में लोगों को मजे देती है। मेरी तो कोई मजबुरी नहीं थी, फिर भी एक साल तक उसे मज़े करवा रही थी।”

सुदर्शन ने कृतिका के कंधे से हाथ हटाकर कहा—“अरे, ये क्या सोचने लगी तुम ? तुमने जो किया, वो नासमझी थी। एक गलत फैसला। एक गलत इन्सान को पहचानने में गलती। अब आगे की जिन्दगी के बारे में सोचो। अतीत पर रोने से अतीत बदलता नहीं है।”

कृतिका वापस हैंडल पर सर रखकर रोने लगती है। कृतिका को बिलख–बिलखकर रोती देखकर सुदर्शन की आँखों में भी नमी आ गई।

सुदर्शन मन में खुद से बोलने लगा कि तू भी गधा हैं यार। बिना मतलब ये फालतू बातें पूछने लगा। तुझे पता हैं, ये रोने लग जाती हैं। फिर भी हर दूसरे–तीसरे दिन तू वहीं बात कर देता है। और तू क्या इस बेचारी को बार–बार मुर्ख–महामुर्ख बोलता रहता है। तू खुद भी तो कभी मुर्ख बना था। इसको तो उस लड़के ने फँसाया है, लेकिन तू तो खुद चलकर आया था मुर्ख बनने के लिए। तू बार–बार क्यों भूल जाता है ? कभी तू खुद भी इस लड़की की तरह रो रहा था।

सुदर्शन ने कृतिका का बाजू पकड़कर कहा—“प्लीज ! चुप हो जाओ। मुझे अच्छा नहीं लग रहा, तुम्हें रोते देखकर।”

कृतिका रोना बन्द करके सिसकने लगती है, लेकिन कृतिका के आँसू थम नहीं रहें हैं।

कृतिका दस मिनट बाद अपनी आँखें पोंछकर मुस्कुराती हुई बोली—“एम सॉरी, यार। तुम्हें बहुत देर हो गई। अब तुम घर जाओ। तुम सारा दिन ऑफ़िस में काम करके थके हुए आते हो और मैं अपना रोना लेकर बैठ जाती हूँ।”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“एक तरफ तो तुमने मुझे अपना दोस्त बना लिया। फिर कहती हो, मैं अपना रोना लेकर बैठ जाती हूँ। दोस्त होते किसलिए है ? प्यार में धोखा खाए हुए दोस्तों का रोना–धोना सुनने के लिए।”

सुदर्शन हँसने लगता है। सुदर्शन को हँसते देखकर कृतिका को भी हल्की सी हँसी आ जाती है।

कृतिका ने मुस्कुराते हुए कहा—“अच्छा, अब तुम जाओ। बाकी रोना–धोना कल करूँगी।”

सुदर्शन—“तुम ठीक हो।”

कृतिका—“हाँ।”

सुदर्शन—“घर चली जाओगी ?”

कृतिका—“हाँ, यार ! रोज जाती हूँ ना।”

सुदर्शन—“रास्ते में रुककर शराब तो नहीं पियोगी ?"

कृतिका मुस्कुराने लगती है।

सुदर्शन—“देखो, मुझे पता है, तुम शराब पीना नहीं छोड़ोगी। लेकिन आज तुम पहले ही बहुत पी चुकी हो, इसलिए अब और मत पीना। प्लीज।"

कृतिका—“हम्म,,,,,रास्ते में नहीं पियूंगी। अगर पीनी होगी, तो घर जाकर पियूगी। अब ठीक है ना ?"

सुदर्शन—“ये भी सही है। मतलब पियोगी जरूर। चलो, ठीक है। अपना ख्याल रखना और गाड़ी ध्यान से चलाना। तेज मत चलाना।”

कृतिका—“हम्म…”

सुदर्शन ने गाड़ी से उतरकर कहा—“फिर मिलेगें, टेक केयर।”

कृतिका—“यू टू।”

सुदर्शन गाड़ी का गेट बन्द करके गाड़ी से दूर हुआ। कृतिका ने गाड़ी स्टार्ट करके चली जाती है।

सुदर्शन अपनी बिल्डिंग की ओर चल पड़ता है।

सुदर्शन ने चलते-चलते सोचा कि कृतिका बहुत अपसेट होकर रोते हुए गई है। उस दिन मानसरोवर से आते टाइम उसने कैसे गाड़ी की स्पीड बढ़ा दी थी। पिछले हफ्ते भी वो इसी तरह रोते हुए गई थी और दूसरे दिन एक्सीडेंट करके सर में चोट खाई हुई मिली थी। कहीं वो आज फिर से कोई एक्सीडेंट ना कर ले ?

सुदर्शन जेब से मोबाइल निकालकर कृतिका को कॉल करता है।

गाड़ी में ड्राइविंग करती हुई कृतिका ने मोबाइल देखें बिना ही मम्मी-पापा का कॉल समझकर कॉल रिसींव नहीं किया।

सुदर्शन अपनी बिल्डिंग तक आते–आते कृतिका को चार बार कॉल करता है, लेकिन कृतिका ने एक भी कॉल रिसींव नहीं किया।

गाड़ी में कृतिका के पास पाँचवा कॉल आता है। कृतिका ने मोबाइल उठाकर गुस्से में कॉल देखें बिना ही मोबाइल स्वीच–ऑफ़ कर दिया।

सुदर्शन छटी बार कॉल करने पर नम्बर स्वीच–ऑफ सुनकर चिन्तित हो गया और मुड़कर तेज–तेज कदमों से चलता हुआ वापस आम्रपाली सर्किल पर आता है।

सुदर्शन सोचने लगा कि कृतिका ने कॉल रिसींव क्यों नहीं किया ? कहीं कोई प्रोब्लम तो नहीं हो गई ?

कुछ देर बाद सुदर्शन को ख़्याल आया कि शायद मोबाइल साइलेंट हो या बैटरी ख़त्म हो गई हो। मैं बुरा ही क्यों सोच रहा हूँ ?

सुदर्शन आधे घंटे तक परेशान खड़ा रहने के बाद वापस अपनी बिल्डिंग की ओर चल पड़ता है।

रात के एक बजे सुदर्शन बिस्तर पर लेटा हुआ जाग रहा है। आज सुदर्शन को नींद नहीं आ रही है। सुदर्शन चिन्तित होकर थोड़ी–थोड़ी देर बाद कृतिका को कॉल करता है, लेकिन कृतिका का मोबाइल बन्द है। सुदर्शन सारी रात कृतिका के बारे में सोच–सोचकर चिन्तित होते हुए कभी छत पर आकर खड़ा होता है और कभी वापस फ्लेट में आकर लेट जाता है। आखिरकार सुबह के पाँच बजे सुदर्शन को नींद आई।

सुबह के छः बजे सुदर्शन उदास मन से उठकर रोज की तरह ऑफ़िस जाने के लिए तैयार होकर सुबह साढ़े आठ बजे बिल्डिंग लॉक करके चलता हुआ आम्रपाली सर्किल पर आकर कृतिका की गाड़ी देखकर राहत की सांस लेता है और सुदर्शन की जान में जान आती है।

सुदर्शन तेजी से चलते हुए आकर गाड़ी में बैठकर नाराज होते हुए बोला—“तुमने कल रात कॉल रिसींव क्यों नहीं किया ? मैं सारी रात उल्लू की तरह जागते हुए परेशान हुआ।”

कृतिका खिलखिलाते हुए हँसकर बोली—“ओह………वो तुम्हारा कॉल था क्या ? एम सॉ सॉरी, यार। मुझे लगा मॉम–डेड का कॉल है, तो मैनें कॉल देखे बिना ही मोबाइल बन्द कर दिया।”

सुदर्शन क्रोध से बोला—“अरे, कॉल किसी का भी हो। रिसींव करके जवाब तो देना चाहिए ना। अगर टाइम ना हो, तो फ्री होने के बाद भी जवाब दिया जा सकता है।”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“एम सॉरी यार, आगे से ऐसा नहीं करूँगी।”

सुदर्शन ने मुँह फेरकर कहा—“ये भी सही है।”

कृतिका मुस्कुराती हुई बोली—“अरे, तुम तो नाराज़ हो गए। लेकिन तुम इतना क्यों परेशान हो गए ?”

सुदर्शन तुनककर बोला—“अरे, मैं परेशान नहीं हो सकता क्या ? या परेशान होने के लिए बॉयफ्रैंड बनना जरूरी है ? दोस्त भी परेशान होते हैं।”

कृतिका ने मुस्कुराकर गाड़ी स्टार्ट करते हुए कहा—“हाँ, यार। अब लाइफ़ में बस एक तुम ही तो दोस्त हो मेरे। प्लीज, अब गुस्सा छोड़ो और मुझे माफ़ कर दो।”

कृतिका रोज की तरह सुदर्शन के साथ बातें करती हुई गाड़ी जयसिंह के घर की ओर ले जाती है।

शेष आगे जारी है...

धोखा प्यार शराब

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