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एक अनकही चुनौती
एक अनकही चुनौती
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© sonu garg

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कुछ अनकही बातों को भूल जाना, शायद किसी चुनौती से कम नहीं था! या यूँ कह ले पनौती बन गयी है उसकी अनकही बातें। जिसने जाना है वो जायेगा, वह क्यूँकर किसी से रुक पाया है? जाने वाले को कोई आजतक रोक पाया है, फिर हम कहाँ तक एड़ी -चोटी का ज़ोर लगाते। और लगा भी लिया तो क्या कर लिया हमने? जीवंत हो या मरण कुछ भी सदैव ना एक सामान रहता है ना स्वयं तुम्हारे साथ जाता है।

विचलित -सा मन, दुविधाओं से मिली अशांति कुछ दिन तक रहेगी घबराइए मत !!! समय हर दिन एक- सा तो नहीं रहता किन्तु एक चुभन-सी ह्रदय को खसोटती हुई निकल जाती थी। सभी तन मन से समझदार है परन्तु जब स्वयं पर विच्छेद की ध्वनि गूंज उठती है, स्वयं का ह्रदय काँपता है ,तब चर -विचर कुछ नह दीखता। मिलता है तो केवल क्षोभ!! और इसी क्षोभ से सलामती से निकल आइये तो जाने। यही तो सबसे बड़ी चुनौती थी मेरी!!

प्रैक्टिकल हो जाइये भाईसाहब, इसी से संसार चल रहा है। संवेदनाओ के तार- तार होते दिखाई दे रहे है। यदि किसी भी तरह से संवेदना में दब गए तो यह गलती आपकी स्वयं की होगी जानते है क्यूँ? प्रैक्टिकल होना ही यथार्थ बन गया है। कोई उनसे जा कर पूछ ले इतना ही दिमाग, समझदारी का इस्तेमाल करना था तो क्यू नहीं पहले ही दिन झकझोर कर हिला दिया था परन्तु नहीं साहब, वो तो आपको जीवन संगिनी बना कर घूम रहे थे यदि घूम ही रहे थे आप भी तो ये तो बता दीजिए आप कहाँ से प्रैक्टिकल हो गए ? संवेदना के तार तुम तक नहीं जाती? या फिर इसका सारा कार्यभार हम पर ही था। यदि ऐसा था तो बता तो दिया होता एकबार, सोना -चाँदी के ज़ेवरात तो नहीं मांग लिए थे , ना ही सातवें आसमान का घोड़ा मांग लिया था। किन्तु स्वयं सब जानते हुए भी सब मुझसे ही छुपाते रहे। जानता था तुम्हारा "प्रैक्टिकल मस्तिष्क " वो भी बहुत ही सलीके से क्या सही है और क्या गलत, और ये सही गलत की परिभाषा भी तो वही सही होगी जो तुमने बनाई होगी। हमारा क्या हम ठहरे "मुर्ख "!

 यही सत्य है यदि संवेदना के साथ रहोगे तो "मुर्ख " ही कहलाओगे। तो क्यों नहीं कुछ बोले "तुम"?? जीवन भर यही सवाल कौंधता रहेगा आखिर क्यों नहीं कुछ कहा ? यदि इतनी ईमानदारी थी, तो पहले ही दिन ये ईमानदारी दिखा दी होती।वास्तविकता से अवगत हम भी हो जाते, पर बड़े लोगो का बड़प्पन है भैया जो अंतिम समय में सत्य कह गए "जज़्बाती मत बनो प्रैक्टिकल बनो"। स्वयं तो वो मुर्ख ना थे, भलीभांति जानते थे क्या करना है किस दायरे में रहना है समझ नहीं आयी तो केवल हमे, चलो स्वीकार है ये अनकही चुनौती!! हम भी तुम जैसे बन जायँगे अब...

संवेदना प्रैक्टिकल संसार

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