Quotes New

Audio

Forum

Read

Contests


Write

Sign in
Wohoo!,
Dear user,
मैं तुझसे प्यार नही करती
मैं तुझसे प्यार नही करती
★★★★★

© Kavita jayant Srivastava

Romance

7 Minutes   3.6K    32


Content Ranking

एक शाम मैं अपने घर की बालकनी पर, फुरसत के पलों में चाय की प्याली हाथ में लेकर, नीचे सड़क पर दौड़ती गाड़ियों के झुंड को देख रही थी और आराम से चाय की चुस्कियों में अपनी शाम को खुश नुमा बना रही थी ...कि अचानक सामने एक बाइक पर एक लड़के और लड़की के जोड़े को मैंने देखा जो मेरे सामने की गली पर आकर रुका और शायद किसी बात पर लड़के एवं लड़की का झगड़ा हो रहा था ...लड़की का गुस्सा बढ़ गया था, वह बाइक रुकवा कर स्वयं उससे उतर कर अलग खड़ी हो गई थी ...जाने क्या बात हो रही थी ? अस्पष्ट था उनका वार्तालाप.. उनके अभिव्यक्त हो रहे भाव और गतिविधियों से... जो कि दूर से मुझे दिख रही थी, यह ज्ञात हो रहा था की.. एक मनुहार कर रहा था और दूसरा रूठ रहा था ! हार कर लड़का चुप हो गया शायद किसी बात पर बहस कर रहे थे दोनो...! लड़की रोने लगी मैंने देखा कि तभी लड़का अचानक अपने दोनों हाथों को कानों से लगाकर सॉरी बोलता हुआ अजीब सी मुद्रा बनाकर, रोनी सी शक्ल बनाकर खड़ा हो गया और लड़की उसकी इस हरकत से खिलखिलाकर हंस पड़ी और दोनों गले लग गए, बाइक पर बैठे और चले गए।

उन्हें देख मुझे अपने कॉलेज के दिन याद आ गए जब आज़ाद पंछी की तरह होते थे हम...यूँ ही किसी रोज़ मैं रूठ जाती और वह मुझे मनाया करता जब कभी मेरी आंखों की भाव भंगिमा और त्योरियाँ देख मुझ से डरने का अभिनय करता और हम भी खिल खिलाकर हंस पढ़ते जब वह पढ़ाई के दौर में टेंशन में आ जाता तो मैं उसे प्रॉब्लम सॉल्व करके दिखाती, मेरी आंखे नोटबुक पर होती और उसकी मेरे चेहरे पर.'... मेरे होठों पर सवाल के जवाब के अचूक नुस्खे हुआ करते थे और उसके होंठों पर ना खत्म होने वाली मुस्कुराहट, रात को भी हमारे अलग हो जाने पर हमारा आसरा बनता था फोन। जाने क्या क्या बातें करते थे हम, वह कहता मुझे नींद नहीं आ रही है और मैं कहती 'कोई गाना ही सुना दो ! वह सुनाता रहता और इधर में सो जाती वह, हेलो हेलो करता रहता और प्रत्युत्तर ना मिलने पर फोन काट देता.।

कभी मैं कहती: कि मुझे डर लग रहा है

:क्यों क्या हुआ?

:वह आज मैंने एक डरावनी फिल्म देख ली थी

:ओह ! हा हा हा हा हा हा ...

वह जोर के ठहाके लगाता और मैं गुस्से से फोन काट देती थी, वह रात भर फोन करता और सॉरी बोलता और दुबारा ना चिढाने का वादा करता ..जब बातें करते-करते मैं सहज हो जाती तो बोलता कि:

देखो सुरु तुम्हारे पीछे कोई खड़ा है.." और मैं कहती बस करो "मैं तुम्हें मार दूंगी जान से, समझे तुम..!!

और यूं ही लड़ते लड़ते हमारे सोने का कब वक़्त हो जाता हम समझ ही नहीं पाते। इन्हीं हंसी मज़ाक की किश्तों में हमारे जीवन के 4 वर्ष बीत गए और हमारा बी टेक कंप्लीट हो गया। मुझे आज भी याद है हमारे कॉलेज का वो लास्ट डे.. जब हम दोनों की आंखों में आँसू और चेहरे पर हंसी थी और हम एक दूसरे को देख रहे थे , हमारे बैच का हितेश हमें गाने गा गा कर छेड़ रहा था ..."आंखों में नमी हंसी लबों पर... क्या हाल है ,क्या दिखा रही हो " और हमारी तंद्रा उस वक्त टूटी जब हम में लोगों की तालियों की गड़गड़ाहट ने ध्यान भंग किया वरना तो हम उस गज़ल के शब्दों में अपने जीवन के 4 वर्ष के प्रेम को दोबारा जीने की नाकाम कोशिश कर रहे थे, तभी अचानक से हॉल के बीचो बीच आकर ..हाथों में माइक पकड़ कर उसने कहा :

" मिस सुरभि सान्याल आज सबके सामने मैं यह कहना चाहता हूं कि... इन 4 सालों में तुमने मुझे बहुत अच्छी दोस्ती दी है एक अनोखा रिश्ता दिया है वह रिश्ता जो मेरा किसी से नहीं बना वह एहसास जो मुझे कभी किसी के लिए नहीं हुआ मेरी कोई कभी दोस्त बन ही नहीं पाई ..! तूने 4 साल मेरी इस बेसुरी आवाज़ को सुना है ...भले ही तू सो जाती थी पर मैं तेरे सोने के बाद ही फोन रखता था ...तूने इस डफर को मैथ सिखाई ...यू नो आई एम ..आई एम सो सॉरी...मैं तुझे डराता था.. परेशान करता था ...हर पल चिढ़ाता था... कभी नकचढ़ी ,कभी चश्मिश बोलता था पर सुरभि! आज जब कॉलेज का लास्ट डे है.. तब यह लगता है कि, तेरे बिना नहीं रह पाऊंगा ...आदत हो गई है, तेरे हर वक्त की टोकाटाकी की....! तेरे परफेक्शन की ... तू ही तो मुझे पर्फेक्ट बनने की टिप्स देती थी यार ! आई कांट imazine राहुल विदआउट सुरभि... आई एम नॉट स्योर ...बट इफ यू लाइक... आई मीन आई लाइक यू... आई एम इन लव विद योर टिप्स ...योर एटीट्यूड एंड केयर फॉर मी...! जाने क्या क्या बोलता गया वो...!

और मैं वही बुत बनी सब कुछ सुनती जा रही थी, आंखों में आँसू और चेहरे पर मुस्कुराहट उस दिन जाना मैंने कि.. मैं ही नहीं शायद राहुल भी मुझसे प्यार करता है मैं जानती थी कि हम कभी शायद एक ना हो पाए..इसलिए कभी उसे नही जताया.. पर प्यार अपनी जगह बना ही लेता है दिलों में .. अफसोस हुआ कि, आज पता चला इस प्यार का काश यह प्यार पहले ही सामने आ जाता । आज जब हमारे पास साथ रहने को वक्त नहीं... साथ बिताने को एक दूसरे के साथ दिन नहीं...तब हमें इस प्यार की पहचान हुई ..पर तसल्ली इस बात की है कि हमने अपने दिल के उस एहसास को पहचान लिया जो कब से दिलों में पल रहा था और हमें इसकी भनक भी नहीं पड़ी.. राहुल तो नहीं रह सकता मेरे बिना पर क्या मैं रह सकती हूं ? मुझे उस पागल से प्यार नहीं है ? क्या मैं जानबूझकर सोने का नाटक नहीं करती थी? फोन पर ..इसके बाद तो वह सो जाए। वरना हमारी साथ रहने की इच्छा तो पूरी रात बात करने के बाद भी कभी पूरी नहीं होती! वह मेरे चुपचाप पड़े रहने पर सोचता कि शायद मैं सो गई हूं और तभी जाकर वह सो पाता था..। शायद तभी मैंने भांप लिया था अपने और उसके बीच पनप रहे इस अटूट रिश्ते को ...!

वक्त पंख लगाकर उड़ता चला गया और हम दोनों ने अपनी अपनी डिग्री ले ली मेरे पापा चाहते थे मैं इंजीनियरिंग कॉलेज में लेक्चरर बनूँ और शायद मैं भी पर राहुल अभी स्ट्रगल कर रहा था बेंगलुरु में जॉब भी कर रहा था अनेक जिम्मेदारियां थी उसके ऊपर घर परिवार की और मैं अकेली थी मेरे पिता ज्यादा दिन तक इंतजार नहीं कर सकते थे उन्हें मेरे विवाह की भी जल्दी थी उन्होंने बिना देरी किए एक जगह मेरा रिश्ता पक्का भी कर दिया यही होना था जिसे मैं उस दिन भाँप गई थी मैं तभी जानती थी जब फेयरवेल वाले दिन मैंने राहुल से कह दिया था: कि

' पागल यह तो दोस्ती है प्यार नहीं मैं तुझसे प्यार नहीं करती ...हां तेरी केयर करती हूं'

उसी दिन मैंने राहुल का दिल तोड़ दिया था शायद... क्योंकि मुझे उसकी और अपनी मजबूरियाँ पता थी मगर आज इतने वर्षों के बाद भी मैं उसे भूल नहीं सकती हूं आज भी किसी जोड़े को देखती हूं तो अनायास मुझे हमारी वह जोड़ी याद आ जाती है जो शायद एक दूसरे के साथ सात फेरों के अटूट बंधन में कभी बंध नहीं सकती थी ..किंतु जिंदा है आज भी कहीं ..मेरी अंतरात्मा में वो और उसके प्रेम की वही छुअन जो आज तक मेरी हर सांस के साथ जीवित है.. और हमेशा जिंदा रहेगा..! बेशक मेरी जिंदगी में प्यार करने वाला पति है दो प्यारे प्यारे बच्चे हैं और जिंदगी की संपूर्णता को परिभाषित करता हुआ एक संपन्न परिवार है किंतु आज भी कहीं दिल के किसी कोने में जो प्यार जिंदा है और हमेशा रहेगा ...।

आज यह सब लिखते हुए मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने अपनी जिंदगी की डायरी के वह स्वर्णिम पन्ने खोल दिए हैं जिन्हें में लाख दफ़न करने की कोशिश करूँ पर गाहे-बगाहे यह एहसास मेरे भीतर उफान मार कर बाहर आ ही जाते हैं और उनकी इस अमृत सिंचन से मैं पुनः एक नई जीवेषणा से भर उठती हूं। मैं जानती हूं कि इस एहसास को दबा पाना बहुत मुश्किल है ..और एकांत पाकर यह एहसास हमेशा अंतरात्मा से निकल कर दिल के किसी कोने में एक कसक छोड़ जाता है काश ..! काश मैं उसके प्यार को अपना पाती.. अपने प्यार को स्वीकार कर पाती..! काश.. प्यार बंधनों से.. जिम्मेदारियों से, मुक्त होता ...काश वह स्वतंत्र होता! अपने गति के अनुरूप निर्णय लेने में ...!

किंतु यथार्थ के धरातल पर यह संभव नहीं होता कभी-कभी दिल की कोमल भावनाओं को कठोर सच्चाइयों से दबाकर रखना पड़ता है क्योंकि स्वयं से ज्यादा फर्ज़ आंखों के सामने नजर आता है किंतु मैं बेहद खुश हूं अपने इस एहसास के साथ कि मैंने उसी दिन सच बोल दिया था वह सच कि हम साथ हो नहीं सकते ....मैं तेरी केयर करती हूं...! हां इतना झूठ ज़रूर बोला था कि ,' मैं तुझसे प्यार नहीं करती...!'

झूठ अंतरात्मा प्यार

Rate the content


Originality
Flow
Language
Cover design

Comments

Post

Some text some message..