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हिम स्पर्श - 05
हिम स्पर्श - 05
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© Vrajesh Dave

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वफ़ाई सावधानी से पहाड़ी मार्ग, जो अभी भी हिम से भरा था, पर जीप चला रही थी। मार्ग घुमावदार और ढलान वाला था। हिम के कारण फिसलन भी थी। फिर भी वह अपने मार्ग पर चलती रही।

पाँच घंटे की यात्रा के पश्चात वह सीधे और साफ मार्ग पर थी। आकाश साफ था, धूप निकल आई थी। हिम कहीं पीछे छूट गया था। हवा में उष्णता थी। उसे यह वातावरण अच्छा लगा।

कोने की एक होटल पर वह रुकी। चाय के साथ थोड़ा कुछ खाना खाया। गरम चाय ने वफ़ाई में ताज़गी भर दी, थकान कहीं दूर चली गई।

वफ़ाई ने जीप के दर्पण में स्वयं को देखा, स्वयं को स्मित दिया। उसे अपना ही स्मित पसंद आया। इस यात्रा में वफ़ाई का यह प्रथम स्मित था जो सुंदर था, मनभावन था।

वफ़ाई ने स्वयं को वचन दिया,”इस यात्रा के प्रत्येक मोड़ पर मैं स्वयं को स्मित देकर प्रसन्न रखूंगी।“

वफ़ाई फिर से चल पड़ी।

पाँच दिनों में दो हजार किलो मीटर से भी लंबी यात्रा के पश्चात वफ़ाई कच्छ के द्वार पर आ पहुंची। वफ़ाई ने चाबी घुमाई, जीप शांत हो गई। उस ने घड़ी देखी, वह शाम के 04:07 का समय दिखा रही थी। उस ने गाड़ी की खिड़की का कांच खोल दिया। हवा का एक टुकड़ा जीप के अंदर कूद पड़ा। पहाड़ की ठंडी हवा की तुलना में यहाँ की हवा उष्ण थी। वसंत ऋतु यहाँ दस्तक दे चुकी थी। अत: हवा थोड़ी ठंडी भी थी, थोड़ी गरम भी थी। वफ़ाई को यहाँ की हवा भा गई।

वफ़ाई ने उस स्थल पर विहंग द्रष्टि डाली। उसे कहीं भी मरुस्थल नहीं दिखाई दिया।

“तो मरुस्थल है कहाँ?” वफ़ाई ने स्वयं से पूछा।

वह एक छोटा सा गाँव था। वहाँ कुछ लोग घूम रहे थे, छोटी मोटी कुछ दुकानें भी थी। लोग अपने काम में व्यस्त थे। इन दिनों अज्ञात लोगों का आगमन गाँव वालों के लिए सामान्य बात थी अत: वफ़ाई के आगमन पर किसी ने खास ध्यान नहीं दिया।

प्रति वर्ष हजारों लोग यहाँ आते हैं। नवंबर से फरवरी तक यह मरुस्थल सारे विश्व की नजर में रहता है। ठंड, मरुस्थल, स्थानीय संस्कृति आदि को चाहने वाले यहाँ आते रहते हैं। कई प्रसिद्ध हस्तियाँ भी यहाँ आती है। देश के प्रत्येक कोने से और विदेशों से भी यात्री आते रहते हैं।

यात्री यहाँ ‘रण उत्सव’ का भरपूर आनंद उठाते रहते हैं, जिसमें जीवन के अनेक रंग देखे जाते हैं। स्थानीय लोगों के लिए यात्रियों का आगमन कोई विशेष घटना नहीं होती है। अत: किसी ने भी वफ़ाई के आगमन पर ध्यान नहीं दिया।

वफ़ाई ने जीप से नीचे उतकर और हाथ-पैर को झटका। शरीर के अंगों को मरोड़ा। गहरी सांस ली, पानी के कुछ घूंट पिये। वफ़ाई ने वह स्थल और वहाँ के वातावरण में अपने आप को ढालने का प्रयास किया।

दस बारह मिनिट में वफ़ाई ने उस परिवेश से अनुकूलन साध लिया। उसे अच्छा लगा। उसके अधरों पर स्मित था।

“भाई साब, मरुस्थल कहाँ है? वहाँ जाने का मार्ग कौन सा है?’ वफ़ाई ने किसी से पूछा।

“आप को थोड़ा और आगे जाना होगा। उसके बाद एक छावनी आएगी। वहाँ से प्रवेश पत्र लेना होगा। आप को इस दिशा में जाना होगा।“ उसने मरुस्थल के मार्ग की तरफ हाथ खींचा।

“धन्यवाद।“ वफ़ाई मरुस्थल के मार्ग पर जाने लगी।

“एक मिनिट रुको, मरुस्थल जाने से पहले गाड़ी में पेट्रोल की टंकी पूरी भरा लो। यह जो पेट्रोल पंप है वह अंतिम पंप है, आगे नहीं मिलेगा।“ उसने वफ़ाई को सलाह दी।

“ठीक है, फिर से धन्यवाद।“

वफ़ाई ने गाड़ी की टंकी पूरी भरवा ली। दो बड़े डिब्बे में भी पेट्रोल भरवा लिया। वह मरुस्थल की तरफ चल पड़ी।

कुछ मिनिट पश्चात वह सैनिक चौकी पर पहुँच गई जहां से उसे प्रवेश पत्र लेना था। चौकी पर कोई नहीं था। बिना प्रवेश पत्र के ही वह मरुस्थल की तरफ चल पड़ी।

वफ़ाई जीप को धीरे धीरे चला रही थी। वह उस स्थान का निरीक्षण करना चाहती थी, अत: मार्ग के दोनों तरफ देखते देखते जा रही थी। उसने देखा की सभी वाहन मरुस्थल की दिशा से नगर की तरफ आ रहे थे।

“इन लोगों के लिए उत्सव पूरा हो गया होगा।“ वह मन ही मन बोली,” किन्तु यह क्या? सभी वाहन मरुस्थल की विरूद्ध दिशा में जा रहे हैं। मैं ही अकेली मरुस्थल की दिशा में जा रही हूँ। कुछ तो बात है।‘ वफ़ाई फिर भी मरुस्थल की दिशा में जा रही थी।

वह उत्सव के स्थल पर आ पहूँची। वहाँ अस्थाई रूप से बना तंबुओं का एक नगर था। पर वहाँ कोई नहीं था, कुछ भी नहीं था। केवल एक नगर, जो अभी अभी खंडित हुआ था, के अवशेष बचे थे। नगर अपना जीवन खो चुका था।

‘नगर ऐसे ही मर जाते होंगे...’ वफ़ाई ने स्वयं से कहा।

“यह नगर ऐसे क्यों है?” वफ़ाई ने किसी से पूछा

“मरुस्थल का उत्सव चार दिन पहले ही पूरा हो गया। इस नगर को छोड़कर यात्री जा चुके है। यह तो अस्थाई नगर है। अगले उत्सव तक यहाँ कोई नहीं आएगा।“ उस व्यक्ति ने उत्तर दिया।

“तो पूर्णिमा कब है?” वफ़ाई ने दूसरा प्रश्न किया।

“पूर्णिमा की रात्री चार दिन पहले ही बीत चुकी, अब पचीस दिनों के पश्चात ही पूर्णिमा आएगी।“

“तो वह अदभुत घटना, सूर्यास्त और चंद्रोदय वाली घटना ....” वफ़ाई के शब्द अधूरे रह गए। वह व्यक्ति जा चुका था।

वह निराश हो गई।

“हवाई यात्रा का प्रस्ताव यदि मैंने स्वीकार लिया होता तो उस घटना का, उस उत्सव का आनंद प्राप्त हो सकता था। किन्तु वह क्षण, वह समय जा चुका।“ वह अपने आप पर गुस्सा हो गई, “वफ़ाई, वह तेरी ही जिद थी, अब भुगतो।“

“मुझे बिना उत्सव के ही लौटना पड़ेगा।“वफ़ाई रो पड़ी।

उसने अपने अश्रुओं को बहने दिया। उस ने उसे शक्ति दी। कुछ समय लगा उसे अपने आप को संभालने में। उसने जीप के दर्पण में स्वयं को देखा और स्मित किया। स्थिति को समझा और फिर से स्मित किया।

“जो खो चुकी हूं उसकी पीड़ा तो है किन्तु पीड़ा को साथ लेकर क्या हाथ लगेगा? मुझे नए रूप से कुछ करना होगा।“ वफ़ाई ने स्वयं को आश्वस्त किया।

ठंड की ऋतु धरती को छोड़ कर जा रही थी और ग्रीष्म ऋतु वसंत ऋतु का हाथ पकड़ कर आ रही थी। हवा की एक शीतल लहर वफ़ाई को छूकर निकल गई।

पूर्णिमा हवा धूप

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