Quotes New

Audio

Forum

Read

Contests


Write

Sign in
Wohoo!,
Dear user,
चालीस पार की औरतें
चालीस पार की औरतें
★★★★★

© Arti Tiwari

Abstract

1 Minutes   14.4K    9


Content Ranking

बेबाक़ी से रच रही हैं इतिहास

चालीस पार की औरतें

घर और बाज़ारों में

खेत खलिहानों से

संसद और सिनेमा तक

उनका होना एक गतिशील दृश्य सा

झकझोरे डाल रहा है

उनकी पकड़ और मज़बूत होती जा रही है।

शेयर मार्केट के तेज़ी से बदलते

परिदृश्य पर

पैनी -दृष्टि से वे ले रही हैं ,जायज़ा

वक़्त के बदलते मिज़ाज और

खुले परिवेश के दायरे का

उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है ,अब

घर-परिवार के साथ अपनी आकांक्षाऐं भी

बुलन्द हौसलों से वे बदलने लगी हैं

प्रस्तर चट्टान में देह की कमनीयता

चालीस पार की औरतें अब

स्वर ऊँचा कर नकार रही हैं

बीड़ी का धुआँ पसीने की बदबू

अनैच्छिक सम्बन्ध

स्पष्ट तौर पे कराने लगी हैं दर्ज़

अपना विरोध

अब नहीं करती स्नान मजबूरन पोखरों में

दहाड़ के नकारती हैं थोपी गई कुरीतियाँ

गढ़ने चल पड़ी हैं भोगा हुआ यथार्थ

समन्दर को बूँदों में समेट देने लगी हैं

किताबों की शक़्ल और

सूर्य का तेज़ एक किरण में समेट

समोने लगी वज़ूद में अपने

अब नहीं हैं निस्तेज चालीस पार की औरतेंं

जीना सीखने लगी हैं यक़ीनन

चालीस पार की औरतें

 

चालीस पार की औरतें

Rate the content


Originality
Flow
Language
Cover design

Comments

Post

Some text some message..