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मुलाक़ात
मुलाक़ात
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© Gajender Rawat

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जेल के वॉर्ड नम्बर तीन के पीछे फैले उजाड़ मिट्टी के मैदान में कांति नंगे पाँव पंजों के बल मुंडेर पर बैठा था। वहीं, साथ ही उसने अपनी नई-नकोर नीली चप्पल की जोड़ी उतारी हुई थी। बाकी का सारा मैदान खाली पड़ा था, सूना, वीरान! बीच-बीच में हवा के तेज़ होने पर दूर सूखी मिट्टी उड़ती नज़र आती थी। कांति के चेहरे की समांतर ऊंचाई तक उठ आया ढेर पीले फूलों से लदा सरसों का इकलौता पौधा बड़ी ही मासूमियत के साथ हौले-हौले झूम रहा था। जब हवा चलनी बंद होती तो सरसों के छोटे-छोटे पीले फूल मानों ठहर कर कांति के चेहरे पर टकटकी लगाए देख रहे हों। हवा की धीमी सरसराहट और कांति की फूल-पौधे से चल रही कानाफूसी के अद्भुत सामंजस्य से आस-पास एक मीठी सी गुंजन घुलती जा रही थी जो धीरे-धीरे जाने-पहचाने शब्दों का जाल बुनती लग रही थी। “यहाँ! कहाँ आ धमका तू ? वो भी निपट अकेला! तुझे तो खेतों-खलिहानों में होना चाहिए था, तू यहाँ कहाँ? इस कैद में! आखिर किया क्या है तूने जो जेल की चारदीवारी में पैदा हो गया?मेरी बात अलग है मुझ पर तो सुनैना को मार डालने का इल्ज़ाम है। ये देख!” बुदबुदाते हुए कांति ने अपनी दोनों बाजू सामने फैला दी। “मेरी भी दोनों बाजूएँ जल गई थी, देख अभी तक जले हुए निशान पड़े हुए हैं। पूरे चौदह साल बाद भी! अब क्या, अब तो मरने के बाद ही मिटेंगे।’’ वो खुद भी अपनी बाजुओं पर बने निशानों को गौर से देखने लगा। कुछ देर तक चुप बना रहा फिर बोलने लगा, “तू सोच रहा होगा जिस जुर्म में मैंने कैद भी काट ली वो सब क्या झूठ था? तू ही बता मैं सुनैना को क्यूँ जलाने लगा? इतनी बड़ी दुनियाँ में एक वो ही तो थी मेरी सब कुछ। माँ के मरने के बाद घर छोडना पड़ा। भाई-भाभी ने जो नाक में दम कर रखा था। भाभी ने न जाने कितनी बार बेइज्ज़त किया होगा उस बेचारी को! वह सह नहीं पाई, मुझे भी धोखा दे दिया उसनें! जिंदगी भर साथ निभाने की कसम खाई थी और दो-ढाई साल के थोड़े से वक्त में छोड़कर चली गई, हमेशा के लिये! हाँ, जब उसने आग लगाई तो वो ज़ोर से चिल्लाई थी पर मैं बचा न सका। ये ज़रूर मेरा कसूर है। मैंने आग में झुलस रही सुनैना को अपनी बाजुओं में समेट लिया था पर फिर भी मैं .....’’ कांति की आँखें नम हो आई। उसने सरसों के पीले फूलों को उँगलियों के पोरों से छुआ फिर सिर उठाकर नीले आकाश की ओर देखने लगा और लम्बी साँस लेकर बुदबुदाया, “अब हो तो गए ......काट तो दिए चौदह साल....उम्र कैद! निकल तो गई उम्र, कैसा आया था और कैसा हो गया हूँ। सारे बाल चिट्टे हो गए हैं। कैसी सूरत हो गई है। सच में ही जिंदगी खा गई हैं ये जेल की दीवारें! एक तो सुनैना का मरना ही कितना बड़ा सदमा था ऊपर से ये कैद! बेकसूर ही काट दिये इस नरक में चौदह साल! कौन देख रहा था सच झूठ! किसे कहें ? और क्या कहें? कौन करेगा भरपाई इस कीमती वक्त की?’’ कांति ने एक बार फिर पीले फूलों को हिलते देखा। उसकी आँखें डबडबा आई। अब कोई वक्त जा रहा था कि आँखों का पानी बूंद की शक्ल अख़्तियार कर नीचे गालों की तरफ लुढ़क जाए।

“भाई!’’ उन प्राकृतिक ध्वनियों से बेमेल एक ध्वनि वहाँ की हवा में अटपटे तरीके से घुस आई।

“कांति भाई! किससे बात कर रहे हो? ’’चाँदनी महल का दस नम्बरी उसके बिल्कुल पीछे खड़ा था, विस्मित-सा।

“अबे तू कहाँ से आ टपका? मैं तो इससे बात कर रहा था।’’

कांति ने पीछे गर्दन घुमाकर देखा और हाथ के इशारे से उसे बताया।

“इससे!......पौधे से!’’ आश्चर्य से नम्बरी का मुंह खुला का खुला रह गया।

“हाँ, हाँ.......ये करता है मुझसे बात।’’

“भाई!’’ नम्बरी के मुंह से फिर बरबस निकला। भाई कहीं हिल तो नहीं गया? उसने उसी पल सोचा।

“पर अब नहीं बोलेगा तेरे सामने.....तू बाहर का आदमी है इसके लिए!

“कांति ने फिर अपना चेहरा फूलों की तरफ घुमाते हुए पूछा, “क्यों भई क्या विचार है? देख देख कैसे चुप हो गया जैसे बोलना ही न आता हो।’’

“भाई तुम भी बस!’’ नम्बरी मुँह बनाकर बोला, “हाँ मैं तो ये भूल ही गया था, भाई तुम्हारी मुलाक़ात आई है।’’

“मुलाक़ात! और वो भी मेरी! चौदह साल बाद!’’ देर तक कांति आश्चर्य चकित-सा चुप बैठा रहा।

“भाई ड्योढ़ी पहुँच जाना’’ नम्बरी उसके मूड को समझ न सका। देर तक उसे खामोश देख वो टेढ़ी-मेढ़ी मिट्टी की मुँडेरों पर ठोकर से धूल उड़ाता हुआ लौट गया।

कांति उठ नहीं पा रहा था। नम्बरी से बातचीत में उसके आँसू आँखों के इर्द-गिर्द सूख चुके थे। उसने बालों में उँगलियाँ फेरते हुए दोहराया, “मुलाक़ात! कौन हो सकता है ? “थोड़ी देर तक वो सिर हिलाता रहा फिर फुसफुसाया’’ मेरा अपना तो कोई है भी नहीं! ये कौन आ गया? कांति देर तक दिमाग पर ज़ोर डालता रहा। हो सकता है कोई हाल-फिलहाल में छूटकर गया, याद न आ रहा हो, हाँ जौहरी हो सकता है! कहता था कोई आए न आए कांति भाई मैं तो आऊँगा पक्का। क्या पता वही हो। कभी-कभी थोड़े समय जेल में रहे भी आ जाते हैं मुलाक़ात पर, वो सोचता रहा।

बड़े ही अलसाये ढंग से कांति मुंडेर से उठ खड़ा हुआ, चप्पलें पहनी और शरीर को ऊपर की ओर खींचते हुए कमर चटकाई फिर वार्ड के गेट से बाहर की दिशा में चल दिया।

कांति को सामने ड्योढ़ी का बड़ा दरवाज़ा दिखाई दे रहा था। उसी तरफ से लंगड़ाता हुआ बुंदेला चला आ रहा था। पास पहुँचकर, थोड़ा रुककर और गर्दन टेढ़ीकर कांति को देखते हुए वो बोला, “आज तो! मुलाक़ात है भाई!’’

“अबे, क्या पूरी जेल को बता दिया नम्बरी ने?’’ कांति रुककर बोला, “हाँ सुन, कल तुझे दूध नहीं दूंगा, तु डाक्टर से लिखवा क्यूँ नहीं लेता?’’

“भाई डाक्टर लिखता ही नहीं है, कहता है अच्छा खासा तो है, तुझे दूध की क्या ज़रूरत, गाली और देने लगता है’’

“मैं कुछ नहीं जानता, कल से दूध नहीं मिलेगा बस!’’ कांति ने उसे ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा।

“पर भाई मैं जानता हूँ, बचपन से आना जाना है मेरा इस जेल में! मुझे तुम्हारा पता है, तुम्हारे जैसा आदमी न अंदर है न बाहर। देखना सवेरे दूध तुम खुद ही दोगे मुझे बैरक से बुलाकर।’’ बुंदेला सिर झुकाकर बोलता जा रहा था जबकि कांति ड्योढ़ी के दरवाज़े तक पहुँच चुका था।

जेल के बंदी अपनी-अपनी तारीख़ पर कचहरी तथा अस्पताल जा चुके थे। ड्योढ़ी पर सिर्फ मुलाक़ात करने वालों की गहमा-गहमी मची हुई थी। एक साथ क्रम से बनी तीन खिड्कियों पर डबल लोहे की जालियाँ लगी थी। बड़ी मुश्किल से दूसरी तरफ बस थोड़ा-सा चेहरा और ज़रा-बहुत हरकत दिखाई दे जाती थी। इधर की बात उधर पहुचाने के लिए लगभग चिल्लाना पड़ता था।

ड्योढ़ी मुंशी मुलाक़ात लिस्ट लिए खड़ा था, कांति को देख कर बोला, “भाई, आपकी भी मुलाक़ात है!’’

“कौन है देखना?’’ कांति लिस्ट वाले कागज़ पर झुकते हुए बोला।

“भाई मोंटू है कोई’’ मुंशी की उँगली कागज़ पर ऊपर से नीचे चलते-चलते एक जगह रुक गई थी।

“मोंटू!’’ कांति की आँखों में विस्मय और होठों की मुद्रा विकृत हो गई, वो बुदबुदाया, “चलो देखता हूँ।’’

दो-तीन छोटी सीढ़ियाँ चढ़कर कांति मुलाक़ात खिड़की तक पहुँच गया। कुछ समझ न आने वाला शोर उस छोटी-सी जगह में हर तरफ से उठ रहा था। दूसरी तरफ के चेहरे अस्पष्ट दिखाई दे रहे थे। वो मुलाक़ात खिड़की से दूसरी ओर झाँकने लगा। उधर चेहरे ही चेहरे थे। “कौन है भई मोंटू?’’ वो फुसफुसाया। इतने शोरगुल में धीमी सी फुसफुसाहट का कोई अस्तित्व नहीं रहा।

“मोंटू कौन है भई?’’ कांति दोबारा ज़ोर से बोला।

कई चेहरों के बीच से एक लड़के की गोल-मटोल सूरत तेज़ी और हड़बड़ी में जाली तक आकर सट गई, वो बड़ा मुँह खोलकर चिल्लाया, “मैं हूँ मोंटू, चाचाजी!’’

“चाचाजी!’’ कांति बुदबुदाया ये सम्बोधन उसे अद्भुत लगा। जेल में सालों से छोटे-बड़े सभी उसे कांति भाई कहते थे। वो गौर से देखते हुए फिर ज़ोर से बोला, “कौन मोंटू?’’

“चाचाजी, मैं भतीजा हूँ आपका.......श्री विशम्बर लाल का बेटा!’’ वो लड़का पहले के मुक़ाबले ज़ोर से बोला। खिड़की के दूसरी ओर धक्का-मुक्की चल रही थी। लड़के की नाक दबकर पिचकी-सी दिखाई पड़ रही थी। वैसे वो चौबीस-पच्चीस साल का लग रहा था, गोरा-चिट्टा और मध्यम कद-काठी का।

“मोंटू! विशम्बर भाई का बेटा!’’ कांति धीमे से बुदबुदाया, फिर ज़ोर से बोला, “पहले तो तू कभी नहीं आया?’’

“कॉलेज की पढ़ाई से टाइम ही नहीं मिला। अब एक कम्पनी में काम करता हूँ’’ वो जाली से और सटकर कांति के चेहरे पर देखने लगा कुछ ठहर कर फिर बोला-

“ये टिफिन है पापा कह रहे थे आपको मीट बहुत पसंद है’’ कांति ने हथेली बढ़ाकर स्टील के टिफिन पर रख दी। टिफिन अभी भी गरम बना हुआ था।

“भाई नहीं आया?’’ कांति धीमे से बोला। उसने पास से देखा मोंटू की आँखें भाभी सी बिल्लोरी थी और भाई से तीखे नैन-नक्श।

“उनकी तबीयत खराब चल रही है।’’ मोंटू दूसरी तरफ से बोला। अब वो इत्मीनान से खड़ा था। थोड़ी बहुत भीड़ कम हो चुकी थी। एक लिपटे हुए पोलिथिन को आगे सरकाते हुए वो फिर बोला’’ ये स्वेटर है, अभी तो सर्दी है, सुबह-शाम पहन लेना! मम्मी ने भेजी है’’

कांति ने उसके शब्दों को अलग ढब से दोहराया, “भाभी ने! विशम्बर भाई को क्या हो गया है?’’

“गुर्दे फेल हो गए हैं, डायलिसिस होता है हफ्ते में एक बार। सारे बदन पर सूजन आ गई है। घर से बाहर निकलना नहीं हो पाता, बस घर में ही रहते हैं। खैर! अब तो आप बाहर आ जाओगे फिर संभालना अपने प्यारे भाई को, हम तो बहुत कर चुके’’ मोंटू रुक-रुक कर बोल रहा था और बीच-बीच में पलकें झपकाते हुए कांति के चेहरे पर घटित सूक्ष्म बदलावों को गौर से देख रहा था। 

“डाक्टर कह रहे हैं कि बड़ा औप्रेशन करना पड़ेगा। पापाजी ने तो साफ कह दिया कि मेरे भाई को आने दो फिर ही कुछ करना’’ इतना कहकर मोंटू सिर नीचा कर चुप खड़ा हो गया।

गुर्दे फेल हो गए हैं......औप्रेशन.......मैं ही करूंगा .........मैं भला क्या कर सकता हूँ? कांति उसकी बातें सुनते-सुनते सोचता रहा।

“पापा कह रहे थे गुर्दे की दिक्कत नहीं है, मेरा छोटा भाई है न, वो मुझ पर जान छिड़कता है’’ कहते-कहते मोंटू रुक गया। कुछ देर तक जाली के पार कांति के चेहरे पर शून्य-सा देखता रहा। थोड़ी ही देर में वो बोला, “ज़मानत की फ़िक्र न करना अब तो आपका भतीजा भी अच्छा-खासा कमाता है’’

कांति ने हथेलियाँ दोनों तरफ गालों पर रखी हुई थी और कोहनियाँ खिड़की के पत्थर पर टेकी हुई थी। गुर्दे की दिक्कत नहीं है.....बस उसकी सुनी बातों की यही एक पंक्ति बार-बार उसके भीतर गूंजनें लगी थी। भीतर की उथल-पुथल के विपरीत वे चुप खड़े थे। मोंटू देर तक हाथ के थैले में झाँकता रहा फिर एक बत्ती-सा बना कागज़ बाहर निकालकर आगे पकड़ाते हुए बहुत ही मध्यम स्वर में बोला, “चाचा इस फॉर्म पर साइन कर देना, सबसे नीचे। मैं अगले बुधवार आऊँगा।’’

बिना उत्तर दिये कुछ देर कांति मौन उसके चेहरे पर एकटक देखता रहा सभी चीज़ों को समेटकर ड्योढ़ी से बाहर निकल आया। वो वार्ड की ओर चल रहा था मगर उसके पाँव सुन्न हुए जा रहे थे। विशंबर के बारे में सोचते-सोचते उसकी आँखों के सामने कचहरी का दृश्य नाच उठा।

जज साहब पूरी प्रतिष्ठा से बैठे थे। वो हथकड़ी पहने मुजरिम के कटघरे में खड़ा था। ठीक सामने कटघरे में खड़ा विशंबर लाल गवाही दे रहा था........जनाब, मेरा छोटा भाई शादी के पहले दिन से ही सुनैना को बुरी तरह पीटा करता था .....और आखिर इसने जला ही दिया बेचारी को!.......कांति अवाक रह गया। उसका वकील क्रॉस कोश्चन करने लगा तो वो सिर्फ इतना बोला, .......वकील साहब आपसे इल्तज़ा है, मेरा केस न लड़ें.........मुझे मेरे हाल पर छोड़ दें ..........जो होगा देखा जाएगा।

वार्ड के गेट के सामने बुंदेले को देखकर उसे आभास हुआ कि वो सेल के पास आ चुका है। उसने बुंदेले को आवाज़ दी और थके-मांदे पाँवों को घसीटता हुआ सेल में घुस गया। वो भीतर तक पहुँचते-पहुँचते इतना अशक्त हो चुका था कि लकड़ी के तख्त पर धम्म से बैठ गया और हाथ की सारी चीज़ें छोड़ दी।

“हाँ भाई?’’ ये बुंदेला था जो वहीं झुककर खड़ा था।

देर तक कांति नीचे ही देखता रहा। टिफ़िन,पोलिथीन में लिपटा स्वेटर और गोल किया हुआ कागज़ तख्त पर पड़े थे। उसने बुंदेले की तरफ सिर उठाकर कहा “ले पकड़, ये खाना है, खा लेना। ये स्वेटर है पहन लेना।’’

बुंदेले ने दोनों चीज़ें हाथ में समेट ली। कुछ देर तक कांति को देखता रहा, बोलने जैसा उसके पास कुछ नहीं था। वो धीमे कदमों से सेल के बाहर हो गया।

न मालूम कितनी देर तक कांति उसी मुद्रा में बिना हिले-डुले बैठा रहा। कुछ बूंदें उसकी आँखों से गिरी। बड़ी देर तक चुप रहने के बाद वो फुसफुसाया पर बाहर तक शब्द न पहुंचे।

मुलाक़ात

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