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मैं वो नहीं जो हूँ।
मैं वो नहीं जो हूँ।
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© Deepak Tongad

Drama

5 Minutes   7.4K    26


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वैसे तो मेरी दिव्यांगता कमजोरी नहीं मेरी ताकत है पर लोग हमेशा इसे लेकर मजाक बनाते रहते हैं और मेरा मजाक उड़ाते रहते हैं, घर हो या बाहर हर जगह ये ही हाल, मेरी बोड़ी लेग्वेज ऐसी है कि हर कोई देखकर अंदाजा लगा लेता है कि ये जिन्दगी में कुछ नहीं कर सकता है पर मैं इन बातों को अपनी जिन्दगी में अहमीयत नहीं देता इन से भी ज्यादा दुःख मैंने अपनी ज़िन्दगी में झेले हैं और झेले रहा हूँ। मैं इन सभी चिजो के बारे में ना सोच कर अपने कल के भविष्य के बारे मे सोचता हूँ। मुझे इन कही बातों से ज्यादा खुद से और अपने सपनो से प्यार है। सपने तो बहुत लोगों ने देखे होंगे पर मेरे जैसे बहुत कम लोगों ने देखे होंगे आज नहीं तो कल पुरे होने ही है सपने ये की मेरी कलम और हाथो में जादु है। जब मैं लिखता हूँ तो अल्फाज़ भी सुख जाते हैं और बोलता हूँ तो धड़कन बढ़ जाती पर मेरे पास पैसे नहीं लोगों को अपना कृतव्यं दिखाने के लिए। मैं विश्वविख्यात लेखक बनना चाहता हूँ मैं बॉलीवुड ही नहीं हॉलीवुड कहानी भी लिखना जानता हूँ। सच तो ये है कि इंसान जितना सहता हैं उतना ही उड़ता है। कहते हैं ना हादसे बेवजह नहीं होते कुछ करने के लिए करने पडते हैं। जब मैं अपना उपन्यास प्रकाशित करवाने के लिए पैसे मांगता हूँ तो घर वाले ये कहकर टाल देते हैं कि तु कुछ नहीं कर सकता इतने पढे-लिखे लोग कुछ नहीं कर पाते तु इस दुनिया में क्या करेगा।

मैंने कहा "उनका तो पता पर नहीं पर मैं जरुर कुछ कर के दिखाऊंगा।"

घर वालो ने कहा - "तु कुछ नहीं कर सकता बस बकवास करता है हमारे पास नहीं है पैसे और आज के बाद हमसे पैसे मत मांगना।"

मैंने कहा - "ठीक है नहीं मांगूंगा।" मैं घर वालो की बात सुनकर उदास था मेरी आँखों में आसूं थे। मैं घर के किसी एक कोने में जाकर रोने चला गया।

मेरी घर वालो की शिकायत मेरे ट्यूशन सर के पास पहुंच गई।

मैं एक दिन ट्यूशन से थोड़ा लेट हो गया उस दिन सर ने मुझे एक अलग नाम से संबोधित किया लड़के-लड़कियाँ बैठे थे जैसे ही मैंने कहा "सर मैं अंदर आ जाऊं?"

"आजा भी लेखक साहब।", ये सुनकर सब बच्चे मुझे हैरानी से देखने लगे मैं क्लास के दरवाजे पकड़ कर खड़ा था। मेरा भाई मुझे छोड़कर जा चुका था मुझे देखकर मेरा एक दोस्त खड़ा हुआ उसने मुझे सम्भाला और एक कुर्सी पर बैठा दिया।

जैसे ही मैं कुर्सी पर जाकर बैठा, सर बोले - "इस महान इंसान को आप जानते हो कुछ लड़के-लड़कियाँ ने कहा - "जी सर"

"इन सर के ऊपर लेखक बनने का भुत सवार है ये बहुत बड़ा लेखक व् विचारक बनना चाहता है ये अपने आप को बहुत बड़ा बुद्धि जिवी समझता है।" कुछ लड़के-लड़कियाँ मुझ पर हँसने लगे और कुछ चुप रहे।

मैं पीछे की सीट पर गर्दन नीचे कर के बैठा रहा।

मैं खुद को उनसे छुपाने की कोशिश कर रहा था मेरे हाथ पैर कांप रहे थे और बच्चे मुझ पर हँस रहे थे।

इस महापुरुष ने घर वोलो की नाक में दम कर रखा है इसने घरवालो से पैसे मांगे और घर वालो ने साफ मना कर दिया कि हमारे पास नहीं पैसे-वैसे। हम कैसे कमाते हैं तुम्हें हम क्यों दे पैसे तु तो कुछ कर ही नहीं सकता। मेरी गर्दन नीचे और आँखो में आसूं थे पर सर यही नहीं रुके।

जानते हो इन माहश्य ने क्या किया अपने नाम से (दीपक तोंगाड़) यूट्यूब चैनल बनाया कविता, कहानी और हिन्दी भाषा में गाने भी लिखने लगे है और एक गाना "याद" यूट्यूब पर अपलोड भी कर दिया 80 सब्सक्राइबर्स भी हो गये।

सब लोग मुझे हेरानी से देख रहे थे नीचे की तरफ गर्दन कर के मैं चुप-चाप पीछे बैठा था और मेरी आँखों में आसूं थे।

मैं अपने आसूं बार-बार पोंछ रहा था।

कुछ लड़के-लड़कियाँ कहने लगे - "सर वो रो रहा है।"

सर ने जवाब दिया - "ये इसका नाटक है, लेखक साहब ये तो बताओ कि जिस किताब को प्रकाशित करवाना चाहते हो उस किताब का क्या नाम है?" मैं रोये जा रहा था।

"वे गधे उस किताब का नाम पुछ रहा हूँ तेरे आसूं नहीं।"

मुझसे रहा नहीं गया, मैं रोते हुए बेंच के सहारे खड़ा हुआ "उस किताब का नाम है 'बनना ना आपके खुद के हाथ में' जो मैंने खुद ने लिखी है।" मैं गुस्से में था आखिर कब तक सहु सहने की भी हद होती है।

"सर मौहम्मद अली को दुनिया में कोई भी नहीं हरा पाया क्योंकि उसके पास एक अच्छा दिमाग था।" मैं और गुस्से में आ गया,

"मुझे भी इस दुनिया में कोई भी नहीं हरा सकता।

सर करने वाला कुछ भी कर सकता है ना करने वाला कुछ नहीं कर सकता पहुँचने वाले तो अंतरिक्ष तक पहुँच गये। बिना मेहनत के कभी फल नहीं मिलता और कल कभी भी किसी के साथ नहीं चलता, जरुरी नहीं जो मैं आज हूँ कल भी वही रहूंगा। रही बात पैसे कमाने की किसान का बेटा हूँ मेहनत कर के कमा लुंगा।

इतने में मेरे सर ने कहा - "आखिर मैं ये ही देखना चाहता हूँ बेटा कभी भी हार नहीं मानना हालात कैसे भी हो।

दिव्यांग लेखक हार

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