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खूनी दरिंदा  भाग 6
खूनी दरिंदा भाग 6
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© Mahesh Dube

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पहले दिन जब खन्ना रसायन के प्रभाव से पशु बने थे, तब उनकी अक्ल भी पशुवत ही हो गयी थी और एक जुनून के चलते उन्होंने रघुवीर को मार डाला था पर अब रसायन का प्रभाव धीरे-धीरे कम हो जाने के कारण उनका दिमाग पूरी तरह उनका साथ नहीं छोड़ता था। किन्तु मानव रक्त चख लेने के उपरान्त उनके भीतर उसकी अदम्य प्यास बढ़ गई थी। जैसे ही उन्होंने रवि के कंधे पर हाथ रखा उनकी उँगलियों के नाखून कुछ सेंटीमीटर बाहर निकल आये और तीक्ष्ण हो गए। चेहरा कुछ विकृत सा हो गया और जुबान थोड़ी बाहर निकल आई। रवि घबरा कर पलटा तब तक दोनों भारी प्रकाश में नहा गए। सेना की एक टुकड़ी भारी सर्चलाइट लिए गश्त कर रही थी। उन्होंने इन दोनों को घेर लिया। सेकण्ड के सौंवे हिस्से में खन्ना सामान्य हो गए। टुकड़ी के कमांडर ने पास आकर इन्हें पहचाना और सलाम करते हुए अँधेरे में न भटकने की हिदायत दी। खन्ना ने फौरन उसकी बात का समर्थन किया। सैनिक टुकड़ी गश्त पर आगे बढ़ गई तो खन्ना रविकांत से प्रयोग के किसी महत्वपूर्ण पहलू पर विचार विमर्श करने लगे परन्तु रवि का ध्यान उधर लग ही नहीं रहा था फिर खन्ना रवि को कुछ समझा कर अपने बंगले की ओर लौट गए। रवि अपने मकान पर पहुंचा और प्राथमिक उपचार पेटी से दवा निकालकर उँगली पर लगाईं और पट्टी बाँध दी फिर कपड़े उतार कर उसने अपने कंधे का निरीक्षण किया तो बुरी तरह चौंक पड़ा। उसके कंधे पर साफ़-साफ़ किसी बाघ या चीते के पंजे से खरोंचे जाने का निशान था। रवि भारी असमंजस में पड़ गया। वह अभी भी अपने कंधे पर खन्ना के पंजे का दबाव महसूस कर रहा था। उसने अपने आई फोन से कंधे की खरोंच के कई फोटो लिए और कम्प्यूटर में ट्रान्सफर करके उनकी हार्ड कॉपी प्रिंटर से निकाल ली। फिर वह सोने का प्रयत्न करने लगा पर नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। उसे बार-बार उँगली कटने पर खन्ना का झपटना और खून चूसने तथा उस समय की उनकी विकृत पाशविक मुद्रा का ध्यान आता रहा। फिर न जाने कब उसे नींद आ गई।

सुबह नियमित अलार्म बजने पर रविकांत की नींद खुली तो उसने आदतन टीवी का रिमोट उठाया और न्यूज चैनल ऑन कर दिया। रवि टीवी पर केवल न्यूज़ और डिस्कवरी और हिस्ट्री जैसे चैनल देखता था। पहले समाचार ने ही उसे चौंक कर उठ बैठने पर मजबूर कर दिया। कल देर रात सेना के एक बुजुर्ग खानसामे को दरिंदे ने मार डाला था और उसे आधा खा लिया था। वह जगह यहां से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर थी। रवि ने तुरन्त सेना पुलिस के कार्यालय में फोन किया तो उसे पता चला कि खानसामे का शव अभी हॉस्पिटल के मोर्ग अर्थात शवगृह में रखा हुआ है और दोपहर को उसका पोस्टमार्टम होना है। रविकांत फौरन कपड़े बदल कर बाहर आया और अपनी बुलेट मोटरसाइकिल लेकर हॉस्पिटल की ओर चल दिया।

मोर्ग प्रबन्धक ने पहले तो रवि को लाश दिखाने से साफ़ मना कर दिया पर रवि ने मुख्य जांच अधिकारी थापा से बात की और अपना परिचय देते हुए किसी महत्वपूर्ण बात का खुलासा करने की बात कही तो थापा के आदेश पर मोर्ग  प्रबन्धक रवि को मोर्ग में ले गया। यहां लगभग फ्रिज के अंदरूनी भाग जैसी ठंडी जगह थी जहां दीवारों से लगकर स्टील की बड़ी-बड़ी अलमारियां लगी हुई थी जिनमें दरारें थीं। हर दराज इस आकार की थी जिनमें मानव शरीर आराम से लिटाया जा सके। मोर्ग प्रबन्धक ने एक दराज के पास जाकर उसे बाहर खींचा तो वह निःशब्द बाहर निकल आया और उसमें खानसामें का क्षत विक्षत शव पड़ा था। उसकी अवस्था देखकर रविकांत को उबकाई आने लगी। उसका आधा चेहरा दांतों से उधेड़ डाला गया था। एक आँख गायब थी और पूरे शरीर पर भी जगह जगह नोचें जाने के निशान थे। रविकांत ने फिर आई फोन से उसके शरीर पर लगे पंजों के निशान की फोटो ली और फौरन बाहर निकल आया क्यों कि वहां की भयानक ठण्ड में अब उसे कंपकंपी लगने लगी थी।

घर आकर उसने नए फोटुओँ की भी कॉपी निकाली और कॉफी का मग हाथ में लेकर अपने और खानसामा के बदन की खरोंचों का तुलनात्मक अध्ययन करने लगा। कुछ देर देखने के बाद उसने एक सिगरेट सुलगाई और आराम कुर्सी पर लेट कर गहन सोच में डूब गया। उसके चेहरे पर उलझन के भाव स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहे थे।

 

 

 

क्या रविकांत खन्ना के रहस्य को जान सका?

 

पढ़िए भाग 7 ...

साइंस फिक्शन

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