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एक उम्र एक ख्वाब
एक उम्र एक ख्वाब
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© PARNEESH MISHRA

Drama Inspirational

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ख्वाब को जब मोक्ष प्राप्त होता है तो उस भावना को सफलता कहते हैं, एक अद्भुत अनुभूति एक अविस्मरणीय एहसास, शायद दुनिया का सबसे नशीला पदार्थ भी दिमाग में वो तरंगे उत्पन्न नहीं कर सकता जो ख्वाब की मोक्ष प्राप्ति से होती है, किन्तु मुद्दे की बात ये है कि ख्वाब किसके ?

“पुरुष प्रधान संगठन में अपनी पहचान बनाती एक मात्र महिला अधिकारी- मेघा अग्रवाल”,

इस पच्चीस वर्ष पुरानी खबर की प्रति को अपने घर की मेज के सामने वाली दीवार पर आज भी टँगा हुआ देख मेघा मुस्कुरा रही थी। वो भी क्या ज़माना था, वैश्यावृति को छोड़कर नारी बस कुछ भी ऐसा करे जो उसे पुरुष से ज्यादा नाम और धन दे तो अखबार की खबर बन जाती थी।

मेघा की माँ का बचपन से ही सपना था की वो घर की चार दीवारी में ही क़ैद न होकर रह जाए, इसलिए हमेशा उसको पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करती रही। नतीज़न मेघा अधिकारी बनने वाली अपने छोटे से नगर की पहली महिला थी। अब मेघा होनहार तो थी ही, कठिन परिश्रम से क्षमता से बढ़कर सफलता भी प्राप्त कर ली थी।

मेघा ने अपने ही समान्तर ओहदे वाले अधिकारी विवेक जिंदल से शादी भी कर ली थी, सृष्टि के नियमनुसार समय के साथ परिवार भी बढ़ गया, सब कुछ सुख में बीतता गया। मेघा की माँ के ख्वाब को मेघा की सफलता से मोक्ष प्राप्त हो गया था पर मेघा के ख्वाब का क्या ?

मेघा को अगर किसी चीज़ में सबसे ज्यादा रूचि थी तो वो थी केक बनाने में। सिर्फ बनाना ही नहीं उसे उसके स्वाद की भी उतनी ही परख थी जितनी पाककला की। वो कार्यालय के काम में कभी नहीं झुंझलाती थी किन्तु कोई केक बनाते समय गलती कर दे या स्वाद की सच्ची परख न कर पाए तो उसके मन में खलबली मच जाती थी। उसने निश्चय कर लिया था की बस दस वर्ष नौकरी करेगी, धन जमा करेगी और फिर त्यागपत्र देकर अपनी खुद की एक बेकरी खोलेगी।

अपनों की उम्मीदों और रिश्तों का बोझ लेकर चलने वाले कंधो पर खुद के ख्वाबों का स्थान नहीं होता है। जब धन इक्कठ्ठा होने लगा तो विवेक ने समझाया की जमीन जायदाद में लगा देते हैं, एक साथ खूब मिलेगा बाद में बुढ़ापा चैन से कटेगा। अधिकारी वर्ग की नौकरी छोड़के बेकरी खोलने की बात सुनकर विवेक से लेकर सब लोग हँसी में उड़ा देते। खीज कर फिर उसने बेकरी का सपना बताना ही बंद कर दिया, बस मन में ठान लिया की पूरा करना है, तब तक दस वर्ष पूरे हो चुके थे, मेघा ने ख्वाब पूरा करने की मियाद दस वर्ष और बढ़ा दी। अगले दस वर्षो में बच्चो की परवरिश, उनका भविष्य और खुद की नौकरी की जिम्मेदारियां, बेकरी का ख्वाब ओझल होने लगा पर गायब नहीं।

इसी तरह से टालते-टालते सेवानिवृत्ति वाली साठ वर्ष की उम्र की सौगात भी आ गयी। अब इस जिम्मेदारी मुक्त जीवन में बहुत वर्षो से जंग खाये एक ख्वाब को पूरा करने का समय आ गया था। भविष्य निधि का पैसा पाकर मेघा ने सब कुछ अपनी बेकरी में लगा दिया और आज उसी बेकरी का उद्घाटन है। मेज के सामने पच्चीस वर्ष पुरानी खबर के बगल में आज के अखबार की खबर लगायी, लिखा था - "वरिष्ठ महिला अधिकारी मेघा अग्रवाल जी ने नौकरी के बाद खोली अपनी खुद की बेकरी।"

कई संगी साथी लोग आज यहाँ मौजूद है, जब मेघा ने अपनी बेकरी के पहले केक को तराश के लोगों के सामने पेश किया तो समां पूरा तालियों से गूँज उठा। सबसे पहला टुकड़ा आप खाइये मैडम जी, उनके नई बेकरी के नए कारीगर बोले। "अरे नहीं, मम्मी को बीते कई सालों से बहुत घातक मधुमेह हो गया है, एक टुकड़ा भी अब उनके लिए ज़हर है" तुरंत मेघा की बेटी बोल पड़ी।

जिंदगी भर जिस पल की मिठास चखने का इंतज़ार किया आज वही बिना जिए निकल जा रहा है। पहले माँ के ख्वाब, फिर परिवार की जिम्मेदारी, समाज के ओहदे सब कुछ पूरा होने के बाद अब ईश्वर ने दिल्लगी कर दी जिस स्वाद की परख सिर्फ मेघा को है वो स्वाद की शक्ति ही ले लिया। मेघा मन ही मन मुस्कुराई और टुकड़े को चखते हुए बोली "मेरे ख्वाब को मोक्ष प्राप्त हो रहा है तो मैं अतृप्त क्यों रहूँ, जितना जीवन जिया है उतनी ही बेहतर इस टुकड़े को खाकर मिलने वाली मृत्यु होगी।”

ख्वाब मोक्ष मधुमेह बेकरी अधिकारी

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